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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 06
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
छठा अध्याय
देवी उमा का हिमवान् के हृदय तथा मेना के गर्भ में आना, गर्भस्था देवी का देवताओं द्वारा स्तवन, देवी का दिव्यरूप में प्रादुर्भाव, माता मेना से वार्तालाप तथा पुनः नवजात कन्या के रूप में परिवर्तित होना

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] कुछ समय बीतने के पश्चात् उन पति-पत्नी दोनों ने देवताओं के कार्य के लिये जन्म हेतु भक्तिपूर्वक जगदम्बा का स्मरण किया ॥ १ ॥ इधर, अपने पिता के यज्ञ में योगद्वारा शरीरत्याग करनेवाली भगवती चण्डिका ने हिमालयपत्नी मेना के गर्भ से जन्म लेने का विचार किया । प्रसन्न होने पर सम्पूर्ण कामनाओं को देनेवाली वे महेश्वरी अपने वचन को सत्य करने के लिये पूर्ण अंश से हिमवान् के चित्त में प्रविष्ट हुईं ॥ २-३ ॥

शिवमहापुराण

उस समय महामनस्वी वे हिमालय प्रसन्नता से अपूर्व कान्तिसम्पन्न होकर अग्नि के समान अधृष्य तथा तेजसमूह से युक्त हो गये ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् समाधिसम्पन्न होने से गिरिराज हिमालय ने सुन्दर कल्याणकारी समय में अपनी प्रिया मेना के उदर में शिवा के उस परिपूर्ण अंश का ध्यान किया ॥ ५ ॥ इस तरह हिमालय की पत्नी ने हिमवान् के हृदय में विराजमान करुणा करनेवाली देवी की कृपा से सुखदायक गर्भ धारण किया । सम्पूर्ण जगत् को आश्रय देनेवाली उन देवी के गर्भ में आने से गिरिप्रिया मेना सदा तेजोमण्डल के बीच में स्थित होकर अधिक शोभा पाने लगी ॥ ६-७ ॥

मेना ने अपने पति को सुख देनेवाले तथा देवताओं के आनन्द के कारणभूत शुभ अभीष्ट गर्भलक्षण को धारण किया । शरीर के अधिक दुर्बल होने के कारण उन्होंने सभी आभूषणों को उतार दिया, उनका मुखमण्डल लोध के समान [श्वेत वर्ण] हो गया और वे प्रभातकालीन चन्द्रमा के प्रकाश के क्षीण हो जाने से अल्प तारागणोंवाली रात्रि के समान दीखने लगीं ॥ ८-९ ॥ गिरिराज मिट्टी के समान सुगन्धित उनके मुखमण्डल को एकान्त में सूंघकर तृप्त नहीं होते थे और [गर्भवती होने के कारण दिनानुदिन] मेना में उनका प्रेमाधिक्य होने लगा । वे हिमालय मेना की सखियों से सदा यह पूछते रहते थे कि मेना को किन वस्तुओं की इच्छा है । वह लज्जा के कारण अपना कुछ भी इष्ट मुझसे नहीं बताती है ॥ १०-११ ॥

कष्टप्रद गर्भलक्षण के प्राप्त कर लेने पर वे मेना जिस वस्तु के लिये कहती थी, उसे अपने सामने गिरिराज के द्वारा उपस्थित हुआ देखती थीं; क्योंकि उनकी इच्छित कोई भी वस्तु तीनों लोकों में दुर्लभ नहीं थी ॥ १२ ॥ धीरे-धीरे गर्भजन्य व्यथा को पारकर पुष्ट अंगोंवाली वह मेना पत्तों से समन्वित बाललता के समान शोभित होने लगी । हिमालय ने अपनी सगर्भा पत्नी को रत्नभण्डार को अपने भीतर छिपाये रखनेवाली पृथ्वी और अग्नि को अपने भीतर छिपाये रखनेवाले शमी वृक्ष के समान समझा ॥ १३-१४ ॥

महाबुद्धिमान् हिमालय ने अपनी प्रिया के प्रीतियोग्य, अपने द्वारा अर्जित द्रव्यों के अनुसार, राजसी प्रवृत्ति एवं अपने शास्त्रज्ञान के अनुरूप संस्कार किये ॥ १५ ॥ उन्होंने प्रसवोन्मुखी अपनी प्रिया को वैद्यों के द्वारा निर्दिष्ट गर्भगृह में मेघमण्डल से आच्छादित आकाश के समान देखा । शुभ लक्षणोंवाली, गर्भ में जगदम्बा को धारण करनेवाली, महातेजयुक्त तथा सुन्दर अंगोंवाली प्रिया मेना को देखकर गिरिराज हिमवान् बड़ी प्रसन्नता का अनुभव करने लगे ॥ १६-१७ ॥ हे मुने ! उस समय विष्णु आदि देवता तथा मुनिगण आकर गर्भ में स्थित शिवा की स्तुति करने लगे ॥ १८ ॥

॥ देवा ऊचुः ॥
दुर्गे जय जय प्राज्ञे जगदम्ब महेश्वरि ।
सत्यव्रते सत्यपरे त्रिसत्ये सत्यरूपिणी ॥ १९ ॥
सत्यस्थे सत्यसुप्रीते सत्ययोने च सत्यतः ।
सत्यसत्ये सत्यनेत्रे प्रपन्नाः शरणं च ते ॥ २० ॥
शिवप्रिये महेशानि देवदुःखक्षयंकरि ।
त्रैलोक्यमाता शर्वाणी व्यापिनी भक्तवत्सला ॥ २१ ॥
आविर्भूय त्रिलोकेशि देवकार्यं कुरुष्व ह ।
सनाथाः कृपया ते हि वयं सर्वे महेश्वरि ॥ २२ ॥
त्वत्तः सर्वे च सुखिनो लभन्ते सुखमुत्तमम् ।
त्वाम्विना न हि किंचिद्वै शोभते त्रिभवेष्वपि ॥ २३ ॥

देवगण बोले — हे दुर्गे ! हे प्राज्ञे ! हे जगदम्बे ! हे महेश्वरि ! हे सत्यव्रते ! हे सत्यपरे ! हे त्रिसत्ये ! हे सत्यस्वरूपिणि ! आपकी जय हो, आपकी जय हो । हे सत्यस्थे ! हे सत्यसुप्रीते ! हे सत्ययोने ! हे सत्यवक्त्रे ! हे सत्यनेत्रे ! हम सभी आपकी शरण में प्राप्त हुए हैं ॥ १९-२० ॥ हे शिवप्रिये ! हे महेश्वरि ! देवताओं के दुःख को दूर करनेवाली ! आप तीनों लोकों की माता, शर्वाणी, सर्वव्यापिनी तथा भक्तों से स्नेह रखनेवाली हैं । हे त्रिलोकेशि ! आप प्रकट होकर देवगणों के कार्य को पूर्ण करें । हे महेश्वरि ! हम सभी देवगण आपकी कृपा से सनाथ हो जायँगे ॥ २१-२२ ॥ इस संसार के सभी सुखी मनुष्य आपके द्वारा ही उत्तम सुख प्राप्त करते हैं, आपके बिना इस त्रिलोक में कुछ भी शोभा नहीं देता ॥ २३ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार सभी देवगण प्रसन्नचित्त होकर गर्भस्थित महेश्वरी की बहुत स्तुति करके अपने-अपने धाम को चले गये । जब नौवाँ महीना बीत गया और दसवाँ भी पूरा हो चला, तब गर्भस्थित जगदम्बा महाकाली ने गर्भ से बाहर आने की इच्छा की ॥ २४-२५ ॥ वह समय बड़ा सुहावना हो गया, नक्षत्र, तारे तथा ग्रह शान्त हो गये, आकाश निर्मल हो गया और सभी दिशाओं में प्रकाश फैल गया । वन, ग्राम तथा सागर के सहित पृथ्वी पर नाना प्रकार के मंगल होने लगे । तालाब, नदियों एवं बावलियों में कमल खिल उठे ॥ २६-२७ ॥

हे मुनीश्वर ! अनेक प्रकार की सुखस्पर्शी वायु बहने लगी, सभी साधुजन आनन्दित हो गये तथा दुर्जन शीघ्र ही दुखी हो गये ॥ २८ ॥ देवता आकाश में आकर दुन्दुभियाँ बजाने लगे, वहाँ फूलों की वर्षा होने लगी तथा श्रेष्ठ गन्धर्व गान करने लगे । अप्सराएँ और विद्याधरों की स्त्रियाँ आकाश में नाचने लगीं, इस प्रकार आकाश-मण्डल में देवताओं आदि का महान् उत्सव होने लगा ॥ २९-३० ॥ उसी अवसर पर आद्याशक्ति सती शिवा देवी मेना के सामने अपने रूप में प्रकट हुईं ॥ ३१ ॥

वे वसन्त ऋतु के चैत्रमास में नवमी तिथि को मृगशिरा नक्षत्र में आधी रात के समय चन्द्रमण्डल से गंगा की भाँति प्रकट हुईं । वे शिवा मेना के गर्भ से अपने स्वरूप से इस प्रकार प्रकट हुईं, जैसे समुद्र से महालक्ष्मी का आविर्भाव हुआ था ॥ ३२-३३ ॥ उस समय भगवती के प्रकट होने पर शंकरजी प्रसन्न हो गये और अनुकूल, गम्भीर, सुगन्धित तथा शुभ वायु बहने लगी । उस समय जल की वर्षा के साथ पुष्पवृष्टि होने लगी, [अग्निहोत्र की] शान्त अग्नि प्रज्वलित हो उठी और बादल गरजने लगे ॥ ३४-३५ ॥ उनके प्रकट होते ही हिमालय के नगर में समस्त सम्पत्ति स्वतः आ गयी तथा [लोगों का] सारा दुःख दूर हो गया ॥ ३६ ॥ उस अवसर पर विष्णु आदि समस्त देवगण सुखी होकर वहाँ आ गये और प्रेम से जगदम्बा का दर्शन करने लगे । वे शिवलोक में निवास करनेवाली शिवप्रिया महाकाली दिव्यरूपधारिणी उन महामाया जगदम्बा की स्तुति करने लगे ॥ ३७-३८ ॥

देवता बोले — हे जगदम्ब ! हे महादेवि ! हे सर्वसिद्धिविधायिनि ! आप देवताओं का कार्य पूर्ण करनेवाली हैं, इसलिये हम सभी आपको सदा प्रणाम करते हैं ॥ ३९ ॥ हे भक्तवत्सले ! आप हर प्रकार से देवताओं का कल्याण करें । आपने मेना का मनोरथ पूर्ण किया है, अब शिव का भी मनोरथ पूर्ण करें ॥ ४० ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार विष्णु आदि देवता शिवा की स्तुतिकर उन्हें प्रणाम करके उनकी परम गति की प्रशंसा करते हुए अपने-अपने धाम को चले गये ॥ ४१ ॥ हे नारद ! नीलकमल के दल के समान कान्तिमयी उन श्यामा भगवती को उत्पन्न हुआ देखकर मेना परम प्रसन्न हो गयीं । उस दिव्य रूप को देखकर गिरिप्रिया मेना को ज्ञान प्राप्त हो गया । वे उन्हें परमेश्वरी जानकर अत्यन्त हर्षित होकर उनकी स्तुति करने लगीं ॥ ४२-४३ ॥

मेना बोलीं — हे जगदम्बे ! हे महेश्वरि ! हे अम्बिके ! आपने बड़ी कृपा की, जो सुशोभित होती हुई मेरे सामने प्रकट हुईं । हे शिवे ! आप सम्पूर्ण शक्तियों में आद्याशक्ति तथा तीनों लोकों की जननी हैं । हे देवि ! आप भगवान् शिव को सदा ही प्रिय हैं तथा सम्पूर्ण देवताओं से स्तुत पराशक्ति हैं । हे महेश्वरि ! आप कृपा करें और इसी रूप से मेरे ध्यान में स्थित हो जायँ और अब मेरी पुत्री के समान प्रत्यक्ष रूप धारण करें ॥ ४४-४६ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] पर्वतपत्नी उन मेना की यह बात सुनकर शिवा देवी अत्यन्त प्रसन्न होकर उन गिरिप्रिया से कहने लगीं ॥ ४७ ॥

देवी बोलीं — हे मेने ! आपने पहले तत्पर होकर मेरी बड़ी सेवा की थी, [उस समय] आपकी भक्ति से अत्यन्त प्रसन्न होकर वर देने के लिये मैं आपके पास गयी थी । वर माँगिये — मेरी इस वाणी को सुनकर आपने वह वर माँगा था — हे महादेवि ! आप मेरी पुत्री हो जायँ और देवताओं का हित साधन करें । तब मैं आपको आदरपूर्वक वह वर देकर अपने धाम को चली गयी । हे गिरिकामिनि ! अब समय पाकर मैं आपकी पुत्री हुई हूँ ॥ ४८-५० ॥ आज मैंने जो दिव्य रूप धारण किया है, वह इसलिये कि आपको मेरा स्मरण हो जाय, अन्यथा मनुष्यरूप में प्रकट होने पर मेरे विषय में आप अनजान ही बनी रहतीं ॥ ५१ ॥ अब आप दोनों पुत्रीभाव से अथवा दिव्य भाव से स्नेहपूर्वक मेरा निरन्तर चिन्तन करते हुए मेरे परम पद को प्राप्त होओगे । मैं पृथ्वी पर अद्भुत लीला करके देवताओं का कार्य सिद्ध करूँगी, भगवान् शम्भु की पत्नी होऊँगी और सज्जनों का उद्धार करूँगी ॥ ५२-५३ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर अम्बिका शिवा मौन हो गयीं और उसी क्षण माता के देखते-देखते अपनी माया से प्रसन्नतापूर्वक [नवजात] पुत्रीरूप में हो गयीं ॥ ५४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में पार्वती के जन्म का वर्णन नामक छठा अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६ ॥

 

 

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