शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 23
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
तेईसवाँ अध्याय
हिमालय आदि का तपस्यानिरत पार्वती के पास जाना, पार्वती का पिता हिमालय आदि को अपने तप के विषय में दृढ़ निश्चय की बात बताना, पार्वती के तप के प्रभाव से त्रैलोक्य का संतप्त होना, सभी देवताओं का भगवान् शंकर के पास जाना

ब्रह्माजी बोले — हे मुनीश्वर ! शिवजी की प्राप्ति के लिये इस प्रकार तपस्या करती हुई पार्वती का बहुत समय व्यतीत हो गया, तो भी शंकर प्रकट नहीं हुए ॥ १ ॥ तब अपने संकल्प में दृढ़ निश्चयवाली परमेश्वरी पार्वती के समीप अपनी भार्या, पुत्र तथा मन्त्रियोंसहित आकर गिरिराज हिमालय उनसे कहने लगे — ॥ २ ॥

शिवमहापुराण

हिमालय बोले — हे महाभागे ! हे पार्वति ! तुम इस तप से दुखी मत होओ, हे बाले ! रुद्र विरक्त हैं, इसलिये तुम्हें दर्शन नहीं दे रहे हैं, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३ ॥ दुबली-पतली तथा सुकुमार अंगोंवाली तुम इस तपस्या से मूर्च्छित हो जाओगी, इसमें सन्देह नहीं है, यह मैं सत्य-सत्य कहता हूँ ॥ ४ ॥

इसलिये हे वरवर्णिनि ! तुम उठो और अपने घर चलो । उन रुद्र से तुम्हारा कौन-सा प्रयोजन सिद्ध होगा, जिन्होंने पहले कामदेव को ही भस्म कर दिया है ? ॥ ५ ॥ जब र्निविकार होने के कारण वे शिव तुम्हें ग्रहण करने नहीं आयेंगे, तो हे देवेशि ! तुम उनसे प्रार्थना भी क्यों करोगी ? जिस प्रकार आकाश में रहनेवाले चन्द्रमा को ग्रहण नहीं किया जा सकता, उसी प्रकार हे अनघे ! तुम शिवजी को भी दुर्गम समझो ॥ ६-७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार मेना, सह्याद्रि, मेरु, मन्दार एवं मैनाक ने भी उन सती को बहुत समझाया, अन्य क्रौंचादि पर्वतों ने भी अनेक कारणों को प्रदर्शित करते हुए आतुरता से रहित उन पार्वती को समझाया ॥ ८-९ ॥ इस प्रकार सब लोगों के समझा लेने के बाद तपस्या में संलग्न वे पवित्र मुसकानवाली तन्वी पार्वती हँसती हुई [अपने पिता] हिमालय से कहने लगीं — ॥ १० ॥

पार्वती बोलीं — हे माता ! हे पिता ! मैंने जो बात पहले कही थी, क्या आपलोग उसे भूल गये ? हे बन्धुगण ! इस समय आपलोग भी मेरी प्रतिज्ञा सुनें ॥ ११ ॥ जिन्होंने क्रोध से कामदेव को जला दिया, वे महादेव निश्चय ही विरक्त हैं, किंतु उन भक्तवत्सल शंकर को मैं अपनी तपस्या से सन्तुष्ट करूँगी ॥ १२ ॥ आप सभी लोग परम प्रसन्न होकर अपने-अपने घरों को जायँ । वे अवश्य ही प्रसन्न होंगे, इसमें सन्देह नहीं ॥ १३ ॥ जिन्होंने कामदेव को भस्म कर दिया तथा जिन्होंने पर्वत के वन को भी जला दिया, उन सदाशिव को मैं केवल अपनी तपस्या से यहाँ अवश्य बुलाऊँगी ॥ १४ ॥ हे महाभागो ! वे सदाशिव महान् तपोबल से अवश्य प्रसन्न हो जाते हैं, यह निश्चित जानिये, मैं आपलोगों से सत्य कह रही हूँ ॥ १५ ॥

ब्रह्माजी बोले — पर्वतराज की पुत्री सुभाषिणी पार्वती अपनी माता मेनका, भाई मैनाक, मन्दर तथा पिता हिमालय से इतना कहकर चुप हो गयीं । इस प्रकार जब शिवा ने उनसे कहा, तब वे विचक्षण हिमनग आदि पर्वत बार-बार गिरिजा की प्रशंसा करते हुए जहाँ से आये थे, वहाँ अत्यन्त विस्मित हो चले गये ॥ १६-१७ ॥ उन सबके चले जाने पर सखियोंसहित वे पार्वती परमार्थ के निश्चय से युक्त हो और अधिक दृढ़ता से महान् तपस्या करने लगीं । हे मुनिश्रेष्ठ ! उस महान् तपस्या से देवता, असुर एवं मनुष्यसहित चराचर त्रैलोक्य सन्तप्त हो उठा ॥ १८-१९ ॥

उस समय समस्त सुर, असुर, यक्ष, किन्नर, चारण, सिद्ध, साध्य, मुनि, विद्याधर, महान् उरग, प्रजापति एवं गुह्यक तथा अन्य प्राणी बड़े कष्ट को प्राप्त हुए, किंतु वे इसका कारण न समझ सके ॥ २०-२१ ॥ तपते हुए समस्त अंगवाले तथा व्याकुल वे सभी इन्द्र आदि परस्पर मिलकर गुरु बृहस्पति से परामर्श करके मुझ ब्रह्मा की शरण में सुमेरु पर्वत पर गये । नष्ट कान्तिवाले तथा व्याकुल वे सब वहाँ पहुँचकर शीघ्र प्रणाम करके तथा स्तुति करके एक साथ मुझसे कहने लगे — ॥ २२-२३ ॥

देवता बोले — हे विभो ! इस चराचर सम्पूर्ण जगत् का आपने ही निर्माण किया है, किंतु इस समय यह सारी सृष्टि क्यों जल रही है, इसका कारण ज्ञात नहीं हो पा रहा है ॥ २४ ॥ हे प्रभो ! हे ब्रह्मन् ! इसका कारण आप बताइये; क्योंकि आप ही इसे जानने में समर्थ हैं । हम देवगणों का सारा शरीर जल रहा है । दग्ध होते हए शरीरवाले हम देवताओं का आपके अतिरिक्त कोई अन्य रक्षक नहीं है ॥ २५ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार देवताओं की बात को सुनकर मैं शिवजी का स्मरणकर हृदय में सोचने लगा कि यह सब पार्वती की तपस्या का फल है ॥ २६ ॥ सारा विश्व जल जायगा, यह जानकर मैं भगवान् विष्णु से निवेदन करने के लिये उन सभी के साथ आदरपूर्वक शीघ्र क्षीरसागर गया ॥ २७ ॥ देवगणों के साथ वहाँ जाकर मैंने देखा कि नारायण सुखपूर्वक आसनपर विराजमान हैं, उस समय मैं उन्हें प्रणामकर तथा स्तुति करके हाथ जोड़कर कहने लगा — ॥ २८ ॥

हे महाविष्णो ! तपस्या में संलग्न पार्वती की परम कठोर तपस्या से हमलोग सन्तप्त हो रहे हैं, अतः हम शरणागतों की आप रक्षा कीजिये ॥ २९ ॥

हम देवताओं का यह वचन सुनकर शेषासन पर बैठे हुए रमेश्वर हमलोगों से कहने लगे — ॥ ३० ॥

विष्णुजी बोले — मैंने सारा कारण जान लिया है । आप सब लोग पार्वती की तपस्या से सन्तप्त हो रहे हैं, अतः मैं आपलोगों के साथ अभी परमेश्वर के पास चल रहा हूँ । हे देवगणो ! हमलोग सदाशिव के समीप चलकर उनसे प्रार्थना करें कि वे पार्वती का पाणिग्रहण करें; क्योंकि शिवजी के द्वारा पार्वती का पाणिग्रहण करने पर ही लोक का कल्याण होगा ॥ ३१-३२ ॥ देवाधिदेव पिनाकधारी सदाशिव पार्वती को वर प्रदान करने के लिये जिस प्रकार उद्यत हों, उसी प्रकार का उपाय हमलोगों को इस समय करना चाहिये ॥ ३३ ॥ इसलिये अब हमलोग उस स्थानपर चलेंगे, जहाँ परम मंगल महाप्रभु रुद्र इस समय उग्र तपस्या में लीन हैं ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले — विष्णुजी की वह बात सुनकर प्रलय करनेवाले और क्रोधपूर्वक हठ से कामदेव को नष्ट करनेवाले शंकर से भयभीत वे देवता विष्णु से कहने लगे — ॥ ३५ ॥

देवतागण बोले — [हे विष्णो!] महाभयंकर, क्रोधी, कालाग्नि के समान प्रभावाले तथा विरूपाक्ष महाप्रभु के पास हमलोग नहीं जायेंगे; क्योंकि उन्होंने जिस प्रकार दुराधर्ष कामदेव को भस्म कर दिया, उसी प्रकार क्रोध में भरकर वे हमलोगों को भी भस्म कर देंगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ३६-३७ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! इन्द्रादि देवताओं की यह बात सुनकर वे विष्णु उन सभी देवताओं को धीरज बँधाते हुए कहने लगे — ॥ ३८ ॥

विष्णुजी बोले — हे देवगणो ! आप सभी लोग आदरपूर्वक मेरी बात सुनिये, वे सदाशिव आपलोगों को भस्म नहीं करेंगे; क्योंकि वे देवताओं के भय को नष्ट करनेवाले हैं । इसलिये आप सभी बुद्धिमान् लोग शम्भु को कल्याणकारी मानकर मेरे साथ उन परम प्रभु के पास चलिये ॥ ३९-४० ॥ वे शिव ही पुराणपुरुष, सबके अधीश्वर, सबसे श्रेष्ठ, तपस्या करनेवाले, परमात्मस्वरूप और परात्पर हैं, हमलोगों को उन्हीं का आश्रय लेना चाहिये ॥ ४१ ॥

ब्रह्माजी बोले — जब सर्वसमर्थ विष्णु ने इस प्रकार देवगणों से कहा, तब वे सब उनके साथ पिनाकी भगवान् सदाशिव के दर्शन करने की इच्छा से चले । विष्णु आदि देवगण मार्ग में पड़ने के कारण सर्वप्रथम कुतूहलवश उस आश्रम में गये, जहाँ पार्वती तपस्या कर रही थीं ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर सभी देवताओं ने पार्वती का तप देखकर उनके तेज से व्याप्त हो तेजोरूपवाली तथा तप में अधिष्ठित उन जगदम्बा को प्रणाम किया और साक्षात् सिद्धि का शरीर धारण करनेवाली उन पार्वती के तप की प्रशंसा करते हुए वे देवगण वहाँ गये, जहाँ वृषध्वज थे ॥ ४४-४५ ॥

हे मुने ! वहाँ पहुँचकर उन देवताओं ने [सर्वप्रथम] आपको शिव के समीप भेजा और वे स्वयं काम को नष्ट करनेवाले भगवान् शंकर को देखते हुए दूर ही स्थित रहे । उस समय हे नारद ! विशेषरूप से शिवभक्त आपने निर्भय होकर शिवजी के स्थान पर जाकर शिवजी को प्रसन्न मुद्रा में देखा । हे मुने ! तदनन्तर लौटकर यत्नपूर्वक उन विष्णु आदि देवताओं को बुलाकर आप शिवजी के स्थान पर उन्हें ले गये ॥ ४६-४८ ॥ तदनन्तर विष्णु आदि सभी देवताओं ने शिवजी के स्थान में जाकर प्रसन्न मन से उन भक्तवत्सल भगवान् सदाशिव को सुखपूर्वक बैठे हुए देखा । वे योगासन लगाये हुए अपने गणों से घिरे थे । वे परमेश्वररूपी शंकर साक्षात् तपस्या के विग्रहवान् रूप थे ॥ ४९-५० ॥

तब विष्णु एवं मेरे साथ रहनेवाले अन्य देव, मुनि तथा सिद्धगण उन परमेश्वर शिवजी को प्रणामकर वेद एवं उपनिषदों के सूक्तों द्वारा उनकी स्तुति करने लगे ॥ ५१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में पार्वतीसान्त्वन-शिवदेवदर्शनवर्णन नामक तेईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २३ ॥

 

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