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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 24
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
चौबीसवाँ अध्याय
देवताओं का भगवान् शिव से पार्वती के साथ विवाह करने का अनुरोध, भगवान् का विवाह के दोष बताकर अस्वीकार करना तथा उनके पुनः प्रार्थना करने पर स्वीकार कर लेना

॥ देवा ऊचुः ॥
नमो रुद्राय देवाय मदनांतकराय च ।
स्तुत्याय भूरिभासाय त्रिनेत्राय नमोनमः ॥ १॥
शिपिविष्टाय भीमाय भीमाक्षाय नमोनमः ।
महादेवाय प्रभवे त्रिविष्टपतये नमः ॥ २ ॥
त्वं नाथः सर्वलोकानां पिता माता त्वमीश्वरः ।
शंभुरीशश्शंकरोसि दयालुस्त्वं विशेषतः ॥ ३ ॥
त्वं धाता सर्वजगतां त्रातुमर्हसि नः प्रभो ।
त्वां विना कस्समर्थोस्ति दुःखनाशे महेश्वर ॥ ४ ॥

शिवमहापुराण

देवता बोले — कामदेव को विनष्ट करनेवाले रुद्र देवता को नमस्कार है, स्तुति के योग्य, अत्यन्त तेजस्वी तथा त्रिनेत्र को बार-बार नमस्कार है ॥ १ ॥ शिपिविष्ट, भीम एवं भीमाक्ष को बार-बार नमस्कार है । महादेव, प्रभु तथा स्वर्गपति को नमस्कार है ॥ २ ॥ आप सभी लोकों के नाथ और माता-पिता हैं । आप ईश्वर, शम्भु, ईश, शंकर तथा विशेष रूप से दयालु हैं ॥ ३ ॥

आप ही सब जगत् को धारण करते हैं, अतएव हे प्रभो ! आप हमलोगों की रक्षा कीजिये । हे परमेश्वर ! आपके अतिरिक्त और कौन दुःख दूर करने में समर्थ है ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] उन देवताओं का यह वचन सुनकर परम कृपा से युक्त होकर नन्दिकेश्वर शिवजी से निवेदन करने लगे — ॥ ५ ॥

नन्दिकेश्वर बोले — हे सुरवर्य ! सिद्ध, मुनि, विष्णु आदि देवगण दैत्यों से पराजित एवं तिरस्कृत हो आपकी शरण में आये हैं और वे आपके दर्शन की इच्छा करते हैं ॥ ६ ॥ इसलिये हे सर्वेश ! आप [शरणागत हुए] इन देवताओं तथा मुनियों की रक्षा कीजिये; क्योंकि आप विशेषरूप से दीनबन्धु और भक्तवत्सल कहे गये हैं ॥ ७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार जब दयालु नन्दिकेश्वर ने बार-बार शिवजी से निवेदन किया, तब उन्होंने धीरे-धीरे अपने नेत्र खोलकर समाधि का त्याग किया ॥ ८ ॥ उसके बाद समाधि से उपरत हए वे महाज्ञानी परमात्मा शम्भु सभी देवताओं से कहने लगे — ॥ ९ ॥

शम्भु बोले — आप सभी ब्रह्मा, विष्णु आदि सुरेश्वर मेरे पास किसलिये आये हैं ? उस कारण को शीघ्र कहिये ॥ १० ॥

ब्रह्माजी बोले — शिवजी के इस वचन को सुनकर सभी देवता प्रसन्न हो गये और विज्ञप्ति के लिये विष्णु के मुख की ओर देखने लगे ॥ ११ ॥ तब शिव के परम भक्त तथा देवताओं के हितकारक विष्णु मेरे द्वारा कहे गये देवताओं के इस बहुत बड़े कार्य का निवेदन करने लगे — ॥ १२ ॥

विष्णुजी बोले — हे शम्भो ! तारक से इन देवताओं को अत्यन्त अद्भुत दुःख प्राप्त हो रहा है, इसी कारण सभी देवता आपसे निवेदन करने यहाँ आये हुए हैं ॥ १३ ॥ हे शम्भो ! आपके द्वारा जो औरस पुत्र उत्पन्न होगा, उसीके द्वारा तारकासुर का वध होगा, यह मेरा कथन अन्यथा नहीं हो सकता ॥ १४ ॥ हे महादेव ! आपको नमस्कार है, आप इस बात का विचारकर देवताओं पर दया कीजिये । हे स्वामिन् ! तारकासुर से उत्पन्न इस महाकष्ट से देवताओं का उद्धार कीजिये ॥ १५ ॥

इसीलिये हे देव ! हे शम्भो ! आपको स्वयं गिरिजा का दाहिने हाथ से पाणिग्रहण करना चाहिये; क्योंकि गिरिराज हिमालय आपको पाणिग्रहण के द्वारा ही गिरिजा को प्रदान करना चाहते हैं, अतः आप उसे स्वीकार कीजिये ॥ १६ ॥

विष्णु के इस वचन को सुनकर योग में तत्पर भगवान् शिव अत्यन्त प्रसन्न हो गये और उनकी सद्गति के लिये उत्तम उपदेश करते हुए कहने लगे — ॥ १७ ॥

शिवजी बोले — [हे देवताओ!] जब मैं सर्वसुन्दरी गिरिजादेवी को स्वीकार करूँगा, तब सभी देवता, मुनि तथा ऋषि सकाम हो जायेंगे । फिर तो ये परमार्थ मार्गपर चल न सकेंगे । मेरे पाणिग्रहण से ये दुर्गा मृत कामदेव को पुनः जीवित कर देंगी ॥ १८-१९ ॥ मैंने सबकी कार्यसिद्धि के लिये ही कामदेव को जलाया है । हे विष्णो ! ब्रह्मा के वचनानुसार ही मैंने यह कार्य सम्पादित किया है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ २० ॥

हे देवेन्द्र ! आप इस कार्याकार्य की परिस्थिति में मन से तत्त्व का विचार करके मेरे विवाह का हठ छोड़ दीजिये ॥ २१ ॥ हे विष्णो ! मैंने कामदेव को जलाकर देवताओं का बहुत बड़ा कार्य सिद्ध किया है । अब उचित यही होगा कि मेरे साथ समस्त देवगण सुनिश्चित रूप से निष्काम होकर निवास करें । हे देवताओ ! जिस प्रकार मैं तपस्या करता हूँ, उसी प्रकार आपलोग भी सहजरूप से कठोर तप में निरत हो जाइये ॥ २२-२३ ॥

अब तो कामदेव नहीं रहा, इसलिये हे देवताओ ! आपलोग निर्विघ्न समाधि लगाकर आनन्दयुक्त निर्विकार भाव से निवास कीजिये । हे विधे ! हे विष्णो ! हे महेन्द्र ! हे मुनिगण ! हे देवगण ! आपलोगों ने पूर्व समय में कामदेव के द्वारा किये गये सारे कार्य को भुला दिया है, उन सबपर विचार कीजिये ॥ २४-२५ ॥ हे देवताओ ! पहले इस महाधनुर्धर कामदेव ने हठ से सभी देवताओं का ध्यान नष्ट कर दिया था ॥ २६ ॥

काम ही नरक का द्वार है, काम से क्रोध उत्पन्न होता है, क्रोध से मोह होता है और मोह से तप विनष्ट हो जाता है । अतः आप सभी श्रेष्ठ देवताओं को काम एवं क्रोध का परित्याग कर देना चाहिये । आप सभी को मेरी यह बात स्वीकार करनी चाहिये; क्योंकि मेरी बात कभी असत्य नहीं सिद्ध होती ॥ २७-२८ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] वृषभध्वज भगवान् महादेवजी इस प्रकार कहने के बाद विधाता, विष्णु, मुनिगण तथा देवताओं से उत्तर की प्रतीक्षा करने लगे ॥ २९ ॥ तब अपने गणों से घिरे हुए वे शम्भु चुपचाप होकर समाधि में स्थित हो स्थाणु के समान अचल हो गये ॥ ३० ॥ वे शम्भु अपने अन्तःकरण में अपने निरंजन, निराभास, निर्विकार एवं निरामय स्वरूप का ध्यान करने लगे । जो सबसे परे, नित्य, निर्मम, विग्रहरहित, शब्दातीत, निर्गुण, ज्ञानगम्य तथा परात्पर है ॥ ३१-३२ ॥

इस प्रकार अनेक जगत् की सृष्टि करनेवाले वे अपने परम रूप का चिन्तन करते हुए ध्यान में स्थित हो परमानन्द में निमग्न हो गये । उस समय विष्णु, इन्द्र आदि सभी देवता शंकरजी को ध्यान में स्थित देखकर विनम्र होकर नन्दिकेश्वर से कहने लगे — ॥ ३३-३४ ॥

देवता बोले — [हे नन्दिकेश्वर!] शिवजी विरक्त होकर ध्यान में मग्न हैं । अब हमलोगों को क्या करना चाहिये ? आप शंकर के सखा, सर्वज्ञ एवं इनके पवित्र सेवक हैं ॥ ३५ ॥ हे गणाधिप ! शिवजी किस उपाय से हमलोगों पर प्रसन्न होंगे, उस उपाय को शीघ्र बताइये । हमलोग आपकी शरण में आये हैं ॥ ३६ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! जब इन्द्रादि देवताओं ने इस प्रकार नन्दी से निवेदन किया, तब शिवजी के प्रिय गण नन्दी उन देवताओं से कहने लगे — ॥ ३७ ॥

नन्दीश्वर बोले — हे हरे ! हे विधे ! हे इन्द्र ! हे देवताओ ! हे मुनियो ! आपलोग शिवजी को सन्तुष्ट करनेवाला मेरा वचन सुनें ॥ ३८ ॥ यदि आपलोगों का ऐसा ही हठ है कि शिवजी स्त्री का पाणिग्रहण करें, तो अत्यन्त दीनभाव से आप सभी शिवजी की उत्तम स्तुति करें ॥ ३९ ॥ हे देवताओ ! महादेव भक्ति द्वारा वश में हो जाते हैं, अन्य साधारण उपायों से वशीभूत नहीं होते । वे परमेश्वर उत्तम भक्ति से अकार्य भी कर सकते हैं ॥ ४० ॥ हे ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओ ! आपलोग ऐसा ही कीजिये, अन्यथा जहाँ से आये हैं, वहीं शीघ्र ही चले जाइये, विलम्ब न कीजिये ॥ ४१ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! उनकी यह बात सुनकर विष्णु आदि वे देवता उस बात को मानकर अत्यन्त प्रेम से शंकर का स्तवन करने लगे — हे देवदेव, हे महादेव, हे करुणासागर, हे प्रभो ! महान् क्लेश से हमलोगों का उद्धार कीजिये, हम शरणागतों की रक्षा कीजिये ॥ ४२-४३ ॥
ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार बहुत ही दीन हो देवताओं ने शिवजी की स्तुति की और वे सब व्याकुलचित्त होकर उच्च स्वर से रोने लगे ॥ ४४ ॥ मुझे साथ लेकर विष्णु ने मन से शिवजी का स्मरण करते हुए परम भक्ति से युक्त होकर दीन वचनों से शम्भु से प्रार्थना की । इस प्रकार जब मैंने, विष्णु ने तथा सभी देवताओं ने शम्भु की स्तुति की, तब भक्तवात्सल्य के कारण वे महेश्वर ध्यान से विरत हो गये । तदनन्तर प्रसन्नचित्त होकर दुःखों का हरण करनेवाले वे भक्तवत्सल शंकर विष्णु आदि देवगणों को हर्षित करते हुए करुणाभरी दृष्टि से देखकर कहने लगे — ॥ ४५-४७ ॥

शंकर बोले — हे हरे ! हे विधे ! हे इन्द्रादि देवताओ ! आप सब एक साथ किसलिये आये हैं, मेरे सामने सच-सच बताइये ॥ ४८ ॥

विष्णु बोले — हे महेश्वर ! आप सर्वज्ञ, अन्तर्यामी तथा अखिलेश्वर हैं । क्या आप हमारे मन की बात नहीं जानते, फिर भी मैं आपके आज्ञानुसार निवेदन कर रहा हूँ । हे मृड ! हम सब देवताओं को तारकासुर से महान् दुःख प्राप्त हो रहा है, इसीलिये हम देवताओं ने आपको प्रसन्न किया है । वे शिवा आपके लिये ही हिमालय की कन्या के रूप में उत्पन्न हुई हैं; क्योंकि आपके द्वारा पार्वती से उत्पन्न पुत्र के द्वारा ही तारकासुर की मृत्यु होनेवाली है, यह बात अन्यथा नहीं है ॥ ४९-५१ ॥

ब्रह्माजी ने उस तारकासुर को इसी प्रकार का वरदान दे रखा है । वह अन्य किसी के द्वारा मारा नहीं जायगा, यही कारण है कि वह सबको पीड़ित कर रहा है ॥ ५२ ॥ इस समय देवर्षि नारद के उपदेशानुसार वे पार्वती तपस्या कर रही हैं और उनके तेज से चराचरसहित समस्त त्रैलोक्य व्याप्त हो रहा है ॥ ५३ ॥ इसलिये हे परमेश्वर ! आप शिवा को वर देने हेतु जाइये । हे स्वामिन् ! ऐसा करके हम देवताओं का दुःख दूर कीजिये तथा हमलोगों को सुखी कीजिये ॥ ५४ ॥

हे शंकर ! देवताओं के और मेरे मन में आपका विवाह देखने के लिये महान् उत्साह है, अतः आप उसे उचित रूप से कीजिये । हे परात्पर ! आपने रति को जो वरदान दिया है, उसका भी अवसर उपस्थित हो गया है, आप अपनी प्रतिज्ञा को सफल कीजिये ॥ ५५-५६ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार कहकर उन्हें प्रणामकर तथा अनेक प्रकार के स्तोत्रों द्वारा उनकी स्तुति करके विष्णु आदि देवता और महर्षि सब-के-सब उनके सामने खड़े हो गये । तब वेद की मर्यादा की रक्षा करनेवाले तथा भक्तों के अधीन रहनेवाले शिवजी भी देवताओं के वचन को सुनकर हँस करके शीघ्र कहने लगे — ॥ ५७-५८ ॥

शंकर बोले — हे हरे ! हे विधे ! हे देवताओ ! मैं ज्ञान से युक्त और यथोचित बातें कहता हूँ, उसे आप सब आदरपूर्वक सुनें । विवाह करना मनुष्यों के लिये उचित विधान नहीं है; क्योंकि विवाह बेड़ी के समान अत्यन्त कठिन दृढबन्धन है । संसार में बहुत से कुसंग हैं. परंतु उनमें स्त्रीसंग सबसे बढ़कर है; क्योंकि मनुष्य सभी प्रकार के बन्धनों से छुटकारा प्राप्त कर सकता है, किंतु स्त्रीसंग से उसका छुटकारा नहीं होता ॥ ५९-६१ ॥ लोहे तथा लकड़ी के पाशों में दृढ़तापूर्वक बँधा हुआ पुरुष उससे छुटकारा पा सकता है, किंतु स्त्री आदि के पाश में बँधा हुआ कभी मुक्त नहीं होता है ॥ ६२ ॥
[स्त्रीसंग से] महाबन्धनकारी विषय निरन्तर बढ़ते रहते हैं, विषयों से आक्रान्त मनवाले को स्वप्न में भी मोक्ष दुर्लभ हो जाता है ॥ ६३ ॥ यदि बुद्धिमान् पुरुष सुख प्राप्त करना चाहे, तो विषयों को भली-भाँति छोड़ दे । जिन विषयों से प्राणी मारा जाता है, वे विषय विष के समान कहे गये हैं ॥ ६४ ॥ मोक्ष की कामना करनेवाला पुरुष विषयी पुरुषों के साथ वार्ता करनेमात्र से क्षणभर में ही पतित हो जाता है । आचार्यों ने विषयवासना को शर्करा से आलिप्त इन्द्रायनफल के समान (आपातमधुर) कहा है ॥ ६५ ॥

यद्यपि मैं समस्त ज्ञान विशेष रूप से जानता हूँ, फिर भी मैं आपलोगों की प्रार्थना को सफल करूँगा ॥ ६६ ॥ तीनों लोकों में मेरी प्रसिद्धि है कि मैं भक्तों के वश में होने से सभी प्रकार के उचित-अनुचित कार्य करता हूँ ॥ ६७ ॥ मैंने कामरूप देश के राजा की प्रतिज्ञा सफल की और भव-बन्धन में पड़े हुए राजा सुदक्षिण का प्रण मैंने पूरा किया ॥ ६८ ॥ मैंने गौतम को क्लेश दिया, मैं त्र्यम्बकात्मा सबको सुख देनेवाला हूँ और जो भक्तों को दुःख देनेवाले हैं, उन दुष्टों को विशेष रूप से कष्ट तथा शाप प्रदान करता हूँ ॥ ६९ ॥

मैंने अपनी भक्तवत्सलता का भाव प्रकट करने के लिये ही विषपान किया था । हे देवताओ ! मैंने यत्न से सदैव ही देवताओं के कष्टों को दूर किया है ॥ ७० ॥ मैंने भक्तों के लिये बहुत बार अनेक कष्ट उठाया है । मैंने विश्वानर मुनि के घर गृहपति के रूप में जन्म लेकर उनके दुःख को दूर किया है । हे हरे ! हे विधे ! मैं अधिक क्या कहूँ । मैं सत्य कहता हूँ और मेरी जो प्रतिज्ञा है, उसे भी आपलोग अच्छी तरह जानते हैं ॥ ७१-७२ ॥

जब-जब मेरे भक्तों पर किसी प्रकार की विपत्ति आती है, तब-तब मैं उन्हें शीघ्र ही सब प्रकार से दूर कर देता हूँ ॥ ७३ ॥ इस समय तारकासुर के द्वारा जो विपत्ति आपलोगोंपर आ पड़ी है, उसे भी मैं जानता हूँ । उस दुःख को भी मैं दूर कर दूंगा, यह मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ ॥ ७४ ॥ यद्यपि मुझे विवाह में कोई इच्छा नहीं है, तो भी [आपलोगों के लिये] पुत्र उत्पन्न करनेहेतु गिरिजा से विवाह करूँगा । हे देवताओ ! अब आपलोग निडर होकर अपने-अपने घरों को जाइये । मैं आपलोगों का कार्य सिद्ध करूँगा । इसमें सन्देह नहीं करना चाहिये ॥ ७५-७६ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! ऐसा कहकर शंकर पुनः मौन धारणकर समाधिस्थ हो गये और विष्णु आदि समस्त देवता अपने-अपने धामों को लौट गये ॥ ७७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में पार्वतीविवाहस्वीकार नामक चौबीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २४ ॥

 

 

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