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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 31
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
इकतीसवाँ अध्याय
देवताओं के कहने पर शिव का ब्राह्मण-वेष में हिमालय के यहाँ जाना और शिव की निन्दा करना

ब्रह्माजी बोले — हे नारद ! इस प्रकार मेना और शैलराज की शिव में अनन्य भक्ति देखकर इन्द्र आदि सभी देवताओं ने विचार किया ॥ १ ॥

शिवमहापुराण

देवता बोले — यदि हिमालय शिवजी में अनन्य भक्तिपूर्वक शंकरजी को अपनी कन्या देंगे तो भारत में अवश्य ही निर्वाण पद प्राप्त कर लेंगे ॥ २ ॥ यदि इन अनन्त रत्नों से पूर्ण वे हिमालय वसुन्धरा को त्यागकर चले जायेंगे, तो निश्चय ही इस पृथिवी का रत्नगर्भायह नाम व्यर्थ हो जायगा । इस स्थावररूप को छोड़कर दिव्यरूप धारणकर और अपनी कन्या शूलधारी शंकर को देकर वे अवश्य ही शिवलोक चले जायेंगे ॥ ३-४ ॥ उन्हें शिवलोक में सारूप्य मुक्ति प्राप्त होगी, इसमें संशय नहीं । वहाँ अनेक प्रकार के श्रेष्ठ भोगों को भोगकर वे मुक्त हो जायेंगे ॥ ५ ॥

ब्रह्माजी बोले — यह कहकर वे सभी देवता इस बात का विचारकर विस्मित हो परस्पर मन्त्रणा करके बृहस्पति को हिमालय के पास भेजने की इच्छा करने लगे ॥ ६ ॥ हे नारद ! तब इन्द्रादि सभी देवता स्वार्थसाधन की इच्छा से विनम्र होकर प्रीतिपूर्वक बृहस्पति के घर गये ॥ ७ ॥ वे देवता वहाँ जाकर बृहस्पति को प्रणाम करके आदरपूर्वक उन गुरु से सारा वृत्तान्त कहने लगे — ॥ ८ ॥

देवता बोले — हे गुरो ! आप हमलोगों की कार्यसिद्धि के लिये हिमालय के पास जाइये और वहाँ जाकर प्रयत्नपूर्वक शिव की निन्दा कीजिये ॥ ९ ॥ पार्वती शिव के अतिरिक्त किसी अन्य का वरण नहीं करेंगी और वे हिमालय बिना इच्छा के ही अपनी कन्या पार्वती का विवाह शिवजी के साथ करेंगे और शीघ्र ही इसका फल प्राप्त कर लेंगे । हे गुरो ! हमलोगों की इच्छा है कि हिमालय अभी पृथिवी पर निवास करें । अतः आप अनेक रत्नों को धारण करनेवाले उन हिमालय को पृथ्वी पर स्थापित कीजिये ॥ १०-११ ॥

ब्रह्माजी बोले — देवगणों की यह बात सुनकर बृहस्पति ने अपने कानों पर हाथ रख लिया और शिवजी का नाम-स्मरण करते हुए उन्होंने इस बात को स्वीकार नहीं किया । उदारबुद्धिवाले बृहस्पति महादेवजी का स्मरणकर श्रेष्ठ देवताओं को बार-बार धिक्कारते हुए कहने लगे — ॥ १२-१३ ॥

बृहस्पति बोले — हे देवताओ ! तुमलोग स्वार्थसाधक और दूसरे के कार्य को विनष्ट करनेवाले हो । शंकरजी की निन्दा करके मैं निश्चित रूप से नरक चला जाऊँगा ॥ १४ ॥ इसलिये आपलोगों में से कोई हिमालय के पास जाकर हिमालय को समझाकर अपना कार्य सिद्ध करे, जिससे वे अनिच्छापूर्वक अपनी कन्या शिवजी को देकर भारत में निवास करें; क्योंकि भक्तिपूर्वक कन्या देकर वे निश्चित ही मोक्ष प्राप्त कर लेंगे ॥ १५-१६ ॥ बाद में सप्तर्षि पर्वतराज को समझायेंगे कि यह पार्वती शिवजी को छोड़कर दूसरे किसी का वरण नहीं करेगी ॥ १७ ॥ अथवा हे देवताओ ! आपलोग इन्द्र के साथ ब्रह्मलोक को जायँ और अपना सारा वृत्तान्त ब्रह्माजी को बतायें, वे ही आपलोगों का कार्य सम्पन्न करेंगे ॥ १८ ॥

ब्रह्माजी बोले — यह सुनकर और विचारकर वे सभी देवता मेरी सभा में आये और प्रणामकर आदरपूर्वक अपना सारा वृत्तान्त उन्होंने मुझसे निवेदन किया ॥ १९ ॥ हे मुने ! तब देवताओं की उस शिव-निन्दाविषयक बात को सुनकर वेदवक्ता मैं दुखी होकर उन देवताओं से कहने लगा — ॥ २० ॥

ब्रह्माजी बोले — हे वत्सो ! मैं शिवजी की दुःसह निन्दा नहीं कर सकता हूँ; क्योंकि शिवजी की निन्दा सम्पत्ति का विनाश करनेवाली एवं विपत्तियों का कारण है ॥ २१ ॥ इसलिये हे देवताओ ! आपलोग कैलास पर जायँ और शिव को सन्तुष्ट करें तथा उन्हीं को हिमालय के घर भेजिये । वे ही स्वयं हिमालय के घर जाकर अपनी निन्दा करें; क्योंकि परनिन्दा विनाश के लिये और आत्मनिन्दा यश के लिये कही गयी है ॥ २२-२३ ॥

ब्रह्माजी बोले — वे देवता मेरी बात सुनकर प्रेम से मुझे प्रणामकर शीघ्र ही शैलराज कैलासपर्वत पर गये ॥ २४ ॥ वहाँ जाकर शिवजी को देखकर सिर झुकाकर शिवजी को प्रणाम करके हाथ जोड़कर वे सभी देवता उन शिवजी की स्तुति करने लगे — ॥ २५ ॥

देवता बोले — हे देवदेव ! हे महादेव ! हे करुणाकर ! हे शंकर ! हम सब आपकी शरण में हैं, आपको प्रणाम है, हमलोगों पर कृपा कीजिये ॥ २६ ॥ हे स्वामिन् ! आप भक्तवत्सल हैं, सदा भक्तों का कार्य करनेवाले, दीनों का उद्धार करनेवाले, कृपासिन्धु और भक्तों की आपत्ति दूर करनेवाले हैं ॥ २७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार इन्द्रादि देवगणों ने शिवजी की स्तुति करके बड़े आदर के साथ अपना सारा वृत्तान्त उनसे निवेदन किया ॥ २८ ॥ देवताओं की उस बात को सुनकर शिवजी ने उसे स्वीकार कर लिया और उन्होंने हँसकर देवताओं को आश्वासन देकर उन्हें विदा कर दिया ॥ २९ ॥ तब सभी देवगण प्रसन्न हो गये और अपना कार्य सिद्ध जानकर शिवजी की प्रशंसा करते हुए वे अपने स्थान को चले गये । तब वे भक्तवत्सल, मायेश, निर्विकार महेश्वर भगवान् शम्भु शैलराज के पास गये ॥ ३०-३१ ॥ उस समय गिरिराज अपने बन्धुवर्गों के साथ पार्वतीसहित प्रसन्न मन से सभा में विराजमान थे ॥ ३२ ॥

उसी समय दण्ड, छत्र एवं दिव्य वस्त्र धारण किये तथा उज्ज्वल तिलक लगाये हुए भगवान् सदाशिव उनकी सभा में आ गये ॥ ३३ ॥ वे एक हाथ में स्फटिक की माला और गले में शालग्रामशिला धारण किये हुए थे । वे भली प्रकार ब्राह्मण का वेष धारणकर नारायण के नाम का जप कर रहे थे ॥ ३४ ॥ उन्हें देखकर हिमालय सभासदों के साथ खड़े हो गये और उन्होंने भूतल पर दण्ड के समान पड़कर भक्तिभाव से उन अपूर्व अतिथि को साष्टांग प्रणाम किया ॥ ३५ ॥ ब्राह्मणवेषधारी शिवजी को अपना प्राणेश्वर समझकर पार्वती ने प्रणाम किया और हृदय से परम प्रसन्नता से उनकी स्तुति की ॥ ३६ ॥

ब्राह्मणवेष धारण करनेवाले उन सदाशिव ने बड़े प्रेमपूर्वक उन सबको आशीर्वाद दिया और विशेषकर पार्वती को हृदय से उनका मनोवांछित आशीर्वाद प्रदान किया ॥ ३७ ॥ उन ब्राह्मण ने शैलाधिराज हिमवान् के द्वारा बड़े आदर के साथ दिये गये मधुपर्क आदि को प्रेम से ग्रहण किया ॥ ३८ ॥ हे मुने ! इस प्रकार प्रेमपूर्वक उन द्विजेन्द्र का विधिवत् पूजन करने के पश्चात् पर्वतश्रेष्ठ हिमालय उनका कुशल पूछने लगे । पर्वतराज ने उनसे पूछा कि आप कौन हैं ? तब विप्रेन्द्र गिरिराज से आदरपूर्वक शीघ्र यह वचन कहने लगे — ॥ ३९-४० ॥

विप्रेन्द्र बोले — हे गिरि श्रेष्ठ ! मैं बुद्धिमानों में श्रेष्ठ वैष्णव ब्राह्मण हूँ और ज्योतिषवृत्ति का सहारा लेकर पृथिवीतल में विचरण करता हूँ ॥ ४१ ॥ मैं अपने गुरु की कृपा से मन के समान सर्वत्र चलनेवाला, सर्वत्र गमन करनेवाला, सर्वज्ञ, परोपकारी, शुद्ध मनवाला, दयासिन्धु तथा विकार का नाश करनेवाला हूँ ॥ ४२ ॥ मुझे ज्ञात हुआ है कि आप कमल के समान, दिव्य, उत्तम रूपवाली तथा सर्वलक्षणसम्पन्न अपनी यह कन्या आश्रयरहित, असंग, कुरूप, गुणहीन, श्मशान में रहनेवाले, सर्पधारी, योगी, नग्न, मलिन शरीरवाले, सर्प का आभूषण धारण करनेवाले, अज्ञात कुल तथा नामवाले, कुशील, विहार में रुचि न रखनेवाले, विभूति से लिप्त देहवाले, अत्यन्त क्रोधी, अज्ञानी, अज्ञात आयुवाले, सदा विकृत जटा धारण करनेवाले, सबको आश्रय देनेवाले, भ्रमणशील, नागों का हार पहननेवाले, भिक्षुक, कुमार्ग में निरत तथा हठपूर्वक वैदिक मार्ग का त्याग करनेवाले शिव को देना चाहते हैं ॥ ४३-४७ ॥

[हे हिमालय!] आपका यह अटल विचार अवश्य ही मंगलदायक नहीं है । नारायणकुल में उत्पन्न तथा ज्ञानियों में श्रेष्ठ [गिरिराज!] आप इसपर विचार कीजिये ॥ ४८ ॥ पार्वती के दानकर्म में वे आपके इस दान के अनुरूप पात्र नहीं हैं । बड़े लोग इस बात को सुनकर आपकी हँसी करेंगे । देखिये, उनका कोई बन्धु-बान्धव नहीं है और आप पर्वतराज हैं, उनके पास कुछ भी नहीं है और आप रत्नाकर हैं ॥ ४९-५० ॥ हे शैलाधिराज ! आप पार्वती को छोड़कर [इस विषय में] बान्धवों से, मेना से, पुत्रों से और सभी पण्डितों से प्रयत्नपूर्वक शीघ्रता से पूछिये ॥ ५१ ॥हे गिरिसत्तम ! रोगी को सर्वदा औषधि अच्छी नहीं लगती, अपितु महादोषकारक कुपथ्य ही सदा बहुत अच्छा लगता है ॥ ५२ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर नाना प्रकार की लीला करनेवाले विप्ररूप शिव प्रसन्नतापूर्वक भोजनकर शान्तचित्त हो शीघ्र अपने घर चले गये ॥ ५३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में शिवमायावर्णन नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥

 

 

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