शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 32
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
बत्तीसवाँ अध्याय
ब्राह्मण-वेषधारी शिव द्वारा शिवस्वरूप की निन्दा सुनकर मेना का कोपभवन में गमन, शिव द्वारा सप्तर्षियों का स्मरण और उन्हें हिमालय के घर भेजना, हिमालय की शोभा का वर्णन तथा हिमालय द्वारा सप्तर्षियों का स्वागत

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] ब्राह्मण का यह वचन सुनकर [अश्रुपूर्ण नेत्रोंवाली] मेना व्यथित मन से हिमालय से कहने लगीं — ॥ १ ॥

मेना बोलीं — हे शैलेन्द्र ! परिणाम में सुख प्रदान करनेवाले मेरे वचन को सुनें, सभी श्रेष्ठ शैवों से पूछिये कि इस ब्राह्मण ने क्या कह दिया ? ॥ २ ॥ हे नगेश्वर ! इस विष्णुभक्त ब्राह्मण ने शिवजी की निन्दा की है, उसे सुनकर मेरा मन अत्यन्त दुखी है ॥ ३ ॥ हे शैलेश्वर ! मैं कुत्सित रूप एवं शीलवाले उस रुद्र को अपनी सुलक्षणा कन्या नहीं दूंगी ॥ ४ ॥

शिवमहापुराण

यदि आप मेरे वचन को नहीं मानेंगे, तो इसमें सन्देह नहीं कि मैं मर जाऊँगी, तुरंत घर छोड़ दूंगी अथवा विष खा लूँगी अथवा अम्बिका के गले में रस्सी बाँधकर घोर वन में चली जाऊँगी अथवा उसे महासागर में डुबो दूंगी, किंतु उसको अपनी कन्या नहीं दूंगी ॥ ५-६ ॥

इस प्रकार कहकर शोक से सन्तप्त वे मेना शीघ्र कोपभवन में जाकर हार उतारकर रोती हुई भूमि पर लेट गयीं ॥ ७ ॥ हे तात ! उसी समय [काली के] विरह से व्याकुल हुए शंकरजी ने शीघ्र ही उन सप्तर्षियों का स्मरण किया ॥ ८ ॥ जब शिवजी ने उन सभी ऋषियों का स्मरण किया, तब वे दूसरे कल्पवृक्ष के समान तत्काल वहाँ उपस्थित हो गये और साक्षात् सिद्धि के समान अरुन्धती भी वहाँ आ गयीं । सूर्य के समान तेजस्वी उन ऋषियों को देखकर शिवजी ने अपना जप छोड़ दिया ॥ ९-१० ॥

हे मुने ! वे श्रेष्ठ तपस्वी ऋषि शिवजी के आगे खड़े होकर उन्हें प्रणामकर उनकी स्तुति करके अपने को कृतार्थ समझने लगे ॥ ११ ॥ तत्पश्चात् विस्मय में पड़कर वे पुनः लोक-नमस्कृत शिव को प्रणाम करके हाथ जोड़कर सामने खड़े होकर उनसे कहने लगे — ॥ १२ ॥

ऋषिगण बोले — हे सर्वोत्कृष्ट ! हे देवताओं के सम्राट ! हे महाराज ! हमलोग अपने सर्वोत्तम भाग्य की सराहना किस प्रकार करें ॥ १३ ॥ हमलोगों ने जो पूर्व समय में [कायिक, वाचिक तथा मानसिक] तीनों प्रकार की तपस्या की है, उत्तम वेदाध्ययन किया है, अग्निहोत्र किया है तथा नाना प्रकार के तीर्थ किये हैं और ज्ञानपूर्वक वाणी, मन तथा शरीर से जो कुछ भी पुण्य किया है, वह सब आज आपके स्मरणरूप अनुग्रह के प्रभाव से सफल हो गया ॥ १४-१५ ॥ जो मनुष्य आपका नित्य स्मरण करता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, तब उसके पुण्य का क्या वर्णन किया जाय, जिसका स्मरण आप करते हैं ॥ १६ ॥

हे सदाशिव ! आपके द्वारा स्मरण किये जाने से हमलोग सर्वोत्कृष्ट हो गये हैं,आप तो किसी के मनोरथमार्ग में किसी प्रकार आते ही नहीं हैं ॥ १७ ॥ जिस प्रकार बौने को फल प्राप्त हो जाता है, जन्मान्ध को नेत्र की प्राप्ति होती है, गूँगे को वाणी मिल जाती है, कंगाल को निधिदर्शन हो जाता है, पंगु को ऊँचे पहाड़ पर चढ़ने की शक्ति प्राप्त हो जाती है तथा वन्ध्या को प्रसव सम्भव हो जाता है, उसी प्रकार हे प्रभो ! हमें आपका यह दुर्लभ दर्शन प्राप्त हो गया ॥ १८-१९ ॥ आज से अब हम मुनीश्वर आपके दर्शन से लोकों में मान्य एवं पूज्य हो गये तथा ऊँची पदवी को प्राप्त हो गये ॥ २० ॥

हे देवेश ! बहुत कहने से क्या ? आप सर्वदेवेश्वर के दर्शन से हम सर्वथा मान्यता को प्राप्त हो गये ॥ २१ ॥ आप-जैसे पूर्ण परमात्मा को किसी से प्रयोजन ही क्या है ? किंतु यदि हम सेवकों पर कृपा करना ही है, तो हम सबके योग्य कार्य के लिये आज्ञा प्रदान कीजिये ॥ २२ ॥

ब्रह्माजी बोले — तब उनकी इस बात को सुनकर लोकाचार का आश्रय लेकर महेश्वर शम्भु मनोहर वचन कहने लगे — ॥ २३ ॥

शिवजी बोले — हे महर्षियो ! ऋषिजन हर तरह से पूज्य हैं, आपलोग तो विशेष रूप से पूज्य हैं । हे विप्रो ! कुछ कारणवश मैंने आपलोगों का स्मरण किया है ॥ २४ ॥ आप सब जानते हैं कि मेरी स्थिति सदैव ही परोपकार करनेवाली है और विशेषकर लोकोपकार के लिये तो मुझे यह सब करना ही पड़ता है ॥ २५ ॥ इस समय दुरात्मा तारकासुर से देवताओं के समक्ष दुःख उत्पन्न हो गया है, क्या करूँ, ब्रह्माजी ने उसे बड़ा विकट वरदान दे रखा है ॥ २६ ॥ हे महर्षियो ! मेरी जो आठ प्रकार की मूर्तियाँ (पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, सूर्य, चन्द्र तथा यजमान) कही गयी हैं, वे सब भी परोपकार के निमित्त ही हैं, स्वार्थ के लिये नहीं हैं, यह बात तो स्पष्ट है ॥ २७ ॥

[इस परोपकार के लिये ही] मैं पार्वती के साथ विवाह करना चाहता हूँ; उसने भी महर्षियों के कहने से दुष्कर कठोर तप किया है ॥ २८ ॥ उसके इच्छानुसार उसका हितकारक फल मुझे अवश्य देना चाहिये; क्योंकि भक्तों को आनन्द देनेवाली मेरी यह स्पष्ट प्रतिज्ञा है ॥ २९ ॥ मैं पार्वती के वचनानुसार भिक्षुक का रूप धारणकर हिमालय के घर गया था और मुझ लीलाप्रवीण ने काली को पवित्र किया था ॥ ३० ॥ वे स्त्री-पुरुष मुझे परब्रह्म जानकर वेदरीति से सद्भक्ति से अपनी कन्या मुझे देने के लिये तत्पर हो गये ॥ ३१ ॥

उसके बाद देवताओं की प्रेरणा से वैष्णव भिक्षु का रूप धारणकर मैं उन दोनों से अपनी निन्दा करने लगा । उससे मेरे प्रति उनकी भक्ति नष्ट हो गयी ॥ ३२ ॥ उसे सुनकर वे बड़े दुखी हो गये और मेरी भक्ति से विमुख हो गये । हे मुनिगणो ! अब वे मुझे अपनी कन्या नहीं देना चाहते हैं ॥ ३३ ॥ इसलिये ! आपलोग निश्चित रूप से हिमालय के घर जायँ और वहाँ जाकर गिरिश्रेष्ठ हिमालय और उनकी पत्नी को समझायें ॥ ३४ ॥ आपलोग प्रयत्नपूर्वक वेदसम्मत वचन उनसे कहें और सर्वथा वही करें, जिससे यह उत्तम कार्य सिद्ध हो जाय ॥ ३५ ॥

हे मुनिसत्तमो ! मैं उनकी पुत्री के साथ विवाह करना चाहता हूँ । मैंने [देवताओं एवं विष्णु के कहने से] विवाह करना स्वीकार कर लिया है और [पार्वती को] वैसा वर भी दे दिया है ॥ ३६ ॥ अब मैं अधिक क्या कहूँ, आपलोग हिमालय तथा मेना को समझाइये, जिससे देवताओं का हित हो ॥ ३७ ॥ आपलोगों ने जिस प्रकार की विधि की कल्पना की है, उससे भी अधिक होनी चाहिये, यह आपलोगों का ही कार्य है और इस कार्य के भागी आपलोग ही हैं ॥ ३८ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार के वचन को सुनकर स्वच्छ अन्तःकरणवाले वे सभी महर्षि प्रभु से अनुगृहीत हो आनन्द को प्राप्त हुए ॥ ३९ ॥ [वे ऋषि परस्पर कहने लगे] हमलोग सर्वथा धन्य तथा कृतकृत्य हो गये और विशेष रूप से सबके वन्दनीय एवं पूजनीय हो गये ॥ ४० ॥ जो ब्रह्मा तथा विष्णु के भी वन्दनीय हैं और सम्पूर्ण मनोरथों को सिद्ध करनेवाले हैं, वे हमलोगों को अपना दूत बनाकर लोक को सुख प्रदान करनेवाले कार्य के लिये भेज रहे हैं ॥ ४१ ॥ ये शिवजी लोकों के स्वामी एवं पिता हैं और वे [पार्वती] जगत् की माता कही गयी हैं । [इन दोनों का] यह उचित सम्बन्ध सर्वदा चन्द्रमा के समान बढ़ता रहे ॥ ४२ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर वे दिव्य ऋषि शिवजी को प्रणामकर आकाशमार्ग से वहाँ गये, जहाँ हिमालय का नगर है । उस दिव्य पुरी को देखते ही ऋषिगण आश्चर्य से चकित हो गये और अपने पुण्य का वर्णन करते हुए परस्पर कहने लगे — ॥ ४३-४४ ॥

ऋषि बोले — हिमालय के इस नगर को देखकर हम सभी पुण्यवान् एवं धन्य हो गये; क्योंकि स्वयं शिवजी ने इस प्रकार के कार्य में हमलोगों को नियुक्त किया है ॥ ४५ ॥ यह [हिमालय की] पुरी तो अलका, स्वर्ग, भोगवती तथा विशेषकर अमरावती से भी उत्तम दिखायी पड़ती है ॥ ४६ ॥ इस पुरी के अत्यन्त मनोहर एवं विचित्र घर और आँगन स्फटिक तथा नाना प्रकार की उत्तम मणियों से बनाये गये हैं । इस पुरी के प्रत्येक घर में सूर्यकान्त एवं चन्द्रकान्त मणियाँ विद्यमान हैं तथा अद्भुत स्वर्गीय वृक्ष लगे हुए हैं ॥ ४७-४८ ॥ तोरणों की शोभा घर-घर में दिखायी दे रही है । इस पुर के विमानों में तोते तथा हंस बोल रहे हैं ॥ ४९ ॥

विचित्र प्रकार के वितान चित्र-विचित्र कपड़ों के बने हैं, जिनमें बन्दनवार बँधे हैं । वहाँ अनेक जलाशय तथा विविध बावलियाँ हैं ॥ ५० ॥ वहाँ विचित्र उद्यान हैं, जिनका लोग प्रसन्नचित्त होकर सेवन करते हैं । यहाँ के सभी पुरुष देवता के सदृश तथा स्त्रियाँ अप्सराओं के सदृश हैं ॥ ५१ ॥ हिमालय के पुर को छोड़कर स्वर्ग की कामना से कर्मभूमि में याज्ञिक एवं पौराणिक लोग व्यर्थ ही अनुष्ठान करते रहते हैं ॥ ५२ ॥ हे विप्रो ! मनुष्यों को स्वर्ग की तभीतक कामना रहती है, जबतक उन्होंने इस पुरी को नहीं देखा, जब इसे देख लिया, तो स्वर्ग से क्या प्रयोजन ? ॥ ५३ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे नारद!] इस प्रकार उस पुरी का वर्णन करते हुए वे सभी ऋषि सब प्रकार की समृद्धि से युक्त हिमालय के घर पहुँचे ॥ ५४ ॥ आकाशमार्ग से आते हुए सूर्य के समान अत्यन्त तेजस्वी उन सात ऋषियों को दूर से ही देखकर हिमवान् विस्मित हो [मन में] कहने लगे ॥ ५५ ॥

हिमवान् बोले — ये सूर्य के समान तेजस्वी सप्तर्षिगण मेरे पास आ रहे हैं, मुझे इस समय प्रयत्नपूर्वक इन मुनियों की पूजा करनी चाहिये ॥ ५६ ॥ हम गृहस्थलोग धन्य हैं, जिनके घर सभी को सुख प्रदान करनेवाले इस प्रकार के महात्मा [स्वयं] आते हैं ॥ ५७ ॥

ब्रह्माजी बोले — इसी बीच आकाश से उतरकर पृथिवी पर स्थित हुए उन सबको अपने सम्मुख देखकर हिमालय सम्मानपूर्वक उनके पास गये ॥ ५८ ॥ उन्होंने हाथ जोड़कर सिर झुकाकर उन सप्तर्षियों को प्रणाम करके पुन: बड़े सम्मान के साथ उनकी पूजा की ॥ ५९ ॥ उस पूजा को स्वीकार करके हित करनेवाले प्रसन्नमुख सप्तर्षियों ने गिरिराज हिमालय से कुशल-मंगल पूछा ॥ ६० ॥

मेरा गृहस्थाश्रम धन्य हो गया — हिमालय ने ऐसा कहकर उन्हें आगे करके आसन लाकर भक्तिपूर्वक समर्पित किया । आसनों पर उनके बैठ जाने पर पुनः उनसे आज्ञा लेकर वे हिमालय स्वयं भी बैठ गये और इसके बाद तेजस्वी ऋषियों से कहने लगे — ॥ ६१-६२ ॥

हिमालय बोले — मैं धन्य तथा कृतकृत्य हो गया, मेरा जीवन सफल हो गया, मैं लोकों में दर्शनीय तथा अनेक तीर्थों के समान हो गया हूँ; क्योंकि विष्णुस्वरूप आपलोग मेरे घर पधारे हैं । कृपणों के घरों में [हर प्रकार से] परिपूर्ण आपलोगों को कौन-सा कार्य हो सकता है ? तो भी मुझ सेवक के योग्य जो कुछ कार्य हो, उसे दयापूर्वक कहिये, जिससे मेरा जन्म सफल हो जाय ॥ ६३-६५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में सप्तर्षियों का आगमनवर्णन नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥

 

 

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