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शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [तृतीय-पार्वतीखण्ड] – अध्याय 33
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
तैंतीसवाँ अध्याय
वसिष्ठपत्नी अरुन्धती द्वारा मेना को समझाना तथा सप्तर्षियों द्वारा हिमालय को शिवमाहात्म्य बताना

ऋषि बोले — [हे हिमालय!] शिवजी जगत् के पिता कहे गये हैं और पार्वती जगत् की माता मानी गयी हैं । इसलिये आप अपनी कन्या महात्मा शंकर को प्रदान कर दीजिये । हे हिमालय ! ऐसा करने से आपका जन्म सफल हो जायगा और आप जगद्गुरु के भी गुरु हो जायँगे, इसमें सन्देह नहीं है ॥ १-२ ॥

शिवमहापुराण

ब्रह्माजी बोले — हे मुनीश्वर ! ऋषियों के इस प्रकार के वचन को सुनकर उन्हें प्रणामकर हाथ जोड़कर गिरिराज यह कहने लगे — ॥ ३ ॥

हिमालय बोले — हे महाभाग्यवान् सप्तर्षिगण ! आपलोगों ने जैसा कहा है, उसे मैंने शिवजी की इच्छा से पहले ही स्वीकार कर लिया था । [किंतु हे प्रभो!] इसी समय एक वैष्णवधर्मी ब्राह्मण ने यहाँ आकर शिवजी को लक्ष्य करके प्रेमपूर्वक उनके विपरीत वचन कहा है ॥ ४-५ ॥ तभी से शिवा की माता ज्ञान से भ्रष्ट हो गयी हैं और अपनी पुत्री का विवाह उन योगी रुद्र से नहीं करना चाहती हैं । हे विप्रो ! वे अत्यन्त दुखी होकर मैले वस्त्र धारणकर बड़ा हठ करके कोपभवन में चली गयी हैं और समझाने पर भी नहीं समझ रही हैं । मैं सत्य कह रहा हूँ कि मैं भी ज्ञानभ्रष्ट हो गया हूँ और अब मैं भिक्षुकरूपधारी महेश्वर को कन्या नहीं देना चाहता हूँ ॥ ६-८ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुने ! शिव की माया से मोहित शैलराज इस प्रकार कहकर चुप हो गये और मुनियों के बीच बैठ गये ॥ ९ ॥ उसके बाद उन सभी सप्तर्षियों ने शिवमाया की प्रशंसा करके उन मेना के पास अरुन्धती को भेजा ॥ १० ॥ पति की आज्ञा पाकर ज्ञानदात्री अरुन्धती शीघ्र ही वहाँ गयीं, जहाँ मेना और पार्वती थीं ॥ ११ ॥ वहाँ जाकर अरुन्धती ने शोक से मूर्च्छित होकर [पृथिवी पर] सोयी हुई मेना को देखा । तब उन पतिव्रता ने सावधानीपूर्वक हितकर वचन कहा — ॥ १२ ॥

अरुन्धती बोली — हे साध्वि मेनके ! उठिये, मैं अरुन्धती आपके घर आयी हूँ तथा कृपालु सप्तर्षिगण भी आये हुए हैं ॥ १३ ॥

ब्रह्माजी बोले — अरुन्धती का स्वर सुनकर शीघ्रता से उठकर महालक्ष्मी के समान तेजयुक्त अरुन्धती को सिर झुकाकर प्रणाम करके मेनका कहने लगीं — ॥ १४ ॥

मेना बोलीं — अहो ! आज हम पुण्यवानों का यह कितना बड़ा पुण्य है, जो जगत् के विधाता की पुत्रवधू एवं वसिष्ठ की पत्नी मेरे घर स्वयं आयी हैं ॥ १५ ॥ हे देवि ! आप किसलिये आयी हैं, उसे मुझसे विशेष रूप से कहिये । पुत्री पार्वतीसहित मैं आपकी दासी के समान हूँ, आप कृपा कीजिये ॥ १६ ॥

ब्रह्माजी बोले — जब मेना ने इस प्रकार कहा, तब साध्वी अरुन्धती उन्हें बहुत समझाकर प्रेमपूर्वक वहाँ गयीं, जहाँ सप्तर्षिगण विराजमान थे । इधर, वाक्यविशारद सभी महर्षिगण भी शिव के चरणयुगल का स्मरण करके आदर के साथ गिरिराज को समझाने लगे ॥ १७-१८ ॥

ऋषि बोले — हे शैलराज ! आप हमलोगों का शुभकारक वचन सुनें, आप पार्वती का विवाह शिव के साथ कर दीजिये और संहारकर्ता शिवजी के श्वशुर बन जाइये । तारकासुर के वध के निमित्त ब्रह्माजी ने इस विवाह को करने के लिये उन अयाचक सर्वेश्वर से प्रयत्नपूर्वक प्रार्थना की है । यद्यपि योगियों में श्रेष्ठ होने के कारण सदाशिव इस दारसंग्रह-कार्य के लिये उत्सुक नहीं हैं, किंतु ब्रह्माजी के द्वारा बहुत प्रार्थना करने पर वे आपकी इस कन्या को ग्रहण करेंगे ॥ १९–२१ ॥ आपकी कन्या ने भी [शिवजी को वररूप में प्राप्त करने हेतु] बड़ा तप किया है, इसीलिये उन्होंने उसे वर दिया है, इन्हीं दो कारणों से वे योगीन्द्र विवाह करेंगे ॥ २२ ॥

ब्रह्माजी बोले — ऋषियों की यह बात सुनकर हिमालय हँस करके फिर कुछ भयभीत होकर विनयपूर्वक इस प्रकार कहने लगे — ॥ २३ ॥

हिमालय बोले — मैं शिव के पास कोई राजोचित सामग्री नहीं देख रहा हूँ, न उनका कोई आश्रय और ऐश्वर्य ही दिखायी पड़ रहा है और न तो कोई उनका सगा-सम्बन्धी ही दिखायी पड़ता है । मैं अत्यन्त निर्लिप्त योगी को अपनी पुत्री नहीं देना चाहता हूँ । आपलोग तो ब्रह्मदेव के पुत्र हैं, आपलोग ही निश्चित बात बतायें ॥ २४-२५ ॥ यदि पिता काम, मोह, भय तथा लोभवश अपनी कन्या प्रतिकूल वर को प्रदान करता है, तो वह नष्ट होकर नरक में जाता है ॥ २६ ॥ मैं स्वेच्छा से इस कन्या को शंकर को नहीं दूंगा, हे ऋषियो ! अब जो उचित विधान हो, उसे आपलोग करें ॥ २७ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुनीश्वर ! हिमालय के इस प्रकार के वचन को सुनकर उन ऋषियों में वाक्यविशारद वसिष्ठजी उनसे कहने लगे — ॥ २८ ॥

वसिष्ठजी बोले — हे शैलेन्द्र ! आप मेरी बात सुनिये, जो आपके लिये सर्वथा हितकर, धर्म के अनुकूल, सत्य और इस लोक तथा परलोक में आनन्द प्रदान करनेवाली है । हे शैल ! लोक एवं वेद में तीन प्रकार के वचन होते हैं, शास्त्र का ज्ञाता अपने निर्मल ज्ञानरूपी नेत्र से उन सबको जानता है ॥ २९-३० ॥ जो वचन सुनने में सुन्दर लगे, पर असत्य एवं अहितकारी हो, ऐसा वचन बुद्धिमान् शत्रु बोलते हैं । ऐसा वचन किसी प्रकार हितकारी नहीं होता ॥ ३१ ॥ जो वचन आरम्भ में अप्रिय लगनेवाला हो, किंतु परिणाम में सुखकारी हो, ऐसा वचन दयालु तथा धर्मशील बन्धु ही कहता है । सुनने में अमृत के समान, सभी काल में सुखदायक, सत्य का सारस्वरूप तथा हितकारक वचन श्रेष्ठ होता है ॥ ३२-३३ ॥

हे शैल ! इस प्रकार तीन तरह के वचन नीतिशास्त्र में कहे गये हैं । अब आप ही बताइये कि इन तीन प्रकार के वचनों में हमलोग किस प्रकार का वचन बोलें, जो आपके अनुकूल हो । देवताओं के स्वामी शंकरजी ब्रह्मज्ञान से सम्पन्न हैं । रजोगुणी सम्पत्ति से विहीन हैं, उनका मन तत्त्वज्ञान के समुद्र में सदा निमग्न रहता है ॥ ३४-३५ ॥ ऐसे ज्ञान तथा आनन्द के ईश्वर सदाशिव को रजोगुणी वस्तुओं की इच्छा किस प्रकार हो सकती है, गृहस्थ अपनी कन्या राजसम्पत्तिशाली को देता है ॥ ३६ ॥ पिता यदि अपनी कन्या किसी दीन-दुखी को देता है, तो वह कन्याघाती होता है अर्थात् उसे कन्या के वध का पाप लगता है । हे हिमालय ! कौन कहता है कि शंकर दुखी हैं, कुबेर जिनके दास हैं ॥ ३७ ॥

वे शिवजी तो अपनी भंगिमा की लीलामात्र से संसार का सृजन और संहार करने में समर्थ हैं । वे निर्गुण, परमात्मा, परमेश्वर और प्रकृति से [सर्वथा] परे हैं ॥ ३८ ॥ सृष्टिकार्य करने के लिये जिनकी तीन मूर्तियाँ ब्रह्मा, विष्णु एवं महेश्वररूप से जगत् की उत्पत्ति, पालन तथा संहार करती हैं ॥ ३९ ॥ ब्रह्मा ब्रह्मलोक में रहते हैं, विष्णु क्षीरसागर में वास करते हैं और हर कैलास में निवास करते हैं, ये सभी शिवजी की विभूतियाँ हैं ॥ ४० ॥ यह सारी प्रकृति शिवजी से ही उत्पन्न हुई है, जो तीन प्रकार की होकर इस जगत् को धारण करती है । वह प्रकृति इस जगत् में अपनी लीला से अंशावतारों तथा कलावतारों के रूपों में अनेक प्रकार की प्रतीत होती है ॥ ४१ ॥

उनकी वाणीरूप प्रकृति मुख से उत्पन्न हुई हैं, जो वाणी की अधिष्ठात्री देवी हैं । उनकी लक्ष्मीरूप प्रकृति वक्षःस्थल से आविर्भूत हुई हैं, जो सम्पूर्ण सम्पत्ति की अधिष्ठात्री हैं ॥ ४२ ॥ उनकी शिवा नाम की प्रकृति देवताओं के तेज से प्रादुर्भूत हुई हैं, जो सभी दानवों का वधकर देवताओं के लिये महालक्ष्मी प्रदान करती हैं ॥ ४३ ॥ ये ही शिवा इसके पूर्वकल्प में दक्ष की पत्नी के उदर से जन्म लेकर सती नाम से विख्यात हुईं । दक्ष ने शंकरजी को ही दिया था, किंतु उस जन्म में पिता के द्वारा शिवजी की निन्दा सुनकर उन्होंने अपने शरीर को योग के द्वारा त्याग दिया । वही शिवा अब इस समय आपके द्वारा मेना के गर्भ से उत्पन्न हुई हैं ॥ ४४-४५ ॥

हे शैलराज ! इस प्रकार वे शिवा प्रत्येक जन्म में शिवजी की पत्नी रही हैं, वे प्रतिकल्प में बुद्धिस्वरूपा तथा ज्ञानियों की माता हैं ॥ ४६ ॥ वही सिद्धा, सिद्धिदात्री एवं सिद्धिरूपिणीरूप से सदा प्रादुर्भूत होती हैं । शिवजी सती की अस्थि तथा उनकी चिता की भस्म उनके प्रेम के कारण स्वयं धारण करते हैं ॥ ४७ ॥

इसलिये आप अपनी इच्छा से इस कल्याणी कन्या को शंकर के निमित्त प्रदान कीजिये, अन्यथा आप नहीं देंगे तो भी वह स्वयं अपने पति के पास चली जायगी ॥ ४८ ॥ वे देवेश प्रतिज्ञा करके और यह देखकर कि आपकी कन्या ने असंख्य क्लेश प्राप्त किये, तब ब्राह्मण का रूप धारणकर उसके तपःस्थान पर गये थे और उसे आश्वस्त करके वर देकर अपने स्थान पर लौट आये । हे पर्वत ! उसके प्रार्थना करने पर ही वे शिवजी आपसे शिवा को माँग रहे हैं ॥ ४९-५० ॥ उस समय आप दोनों ने शिवभक्ति में निरत रहने के कारण उन्हें पार्वती को देना स्वीकार भी कर लिया, किंतु हे गिरीश्वर ! अब आप दोनों की ऐसी विपरीत बुद्धि क्यों हो गयी, इसे बताइये । जब सदाशिव पार्वती की प्रार्थना हेतु तुम्हारे पास आये थे और तुमने उसे अस्वीकार कर दिया, तब यहाँ से लौटकर उन्होंने हम ऋषियों को तथा अरुन्धती को शीघ्र ही भेजा है ॥ ५१-५२ ॥

इसलिये हमलोग आपको उपदेश देते हैं कि आप इस पार्वती को शीघ्रता से रुद्र को प्रदान कीजिये । हे शैल ! ऐसा करने से आपको महान् आनन्द की प्राप्ति होगी ॥ ५३ ॥ हे शैलेन्द्र ! यदि आप इस शिवा को शिव के लिये अपनी इच्छा से नहीं देंगे, तो भी भवितव्यता के बल से यह विवाह अवश्य ही होगा ॥ ५४ ॥ हे तात ! इन शंकर ने तप करती हुई इस शिवा को वरदान दिया है, ईश्वर की प्रतिज्ञा कभी निष्फल नहीं होती ॥ ५५ ॥ जब ईश्वर के उपासक महात्माओं की प्रतिज्ञा कभी विफल नहीं होती, तो फिर सारे संसार के अधिपति इन ईश्वर की प्रतिज्ञा की बात ही क्या ! ॥ ५६ ॥

जब अकेले महेन्द्र ने लीला से ही पर्वतों के पंख काट डाले और पार्वती ने अकेले ही मेरु का शिखर ढहा दिया, तो उन सर्वेश्वर की प्रतिज्ञा कैसे निष्फल हो सकती है ? ॥ ५७ ॥ हे शैलेन्द्र ! एक के कारण सारी सम्पत्ति का नाश नहीं करना चाहिये, यह सनातनी श्रुति है कि कुल की रक्षा के लिये एक का त्याग कर देना चाहिये ॥ ५८ ॥ [हे शैलेश्वर!] [पूर्व काल में] अनरण्य नामक राजेश्वर ने अपनी कन्या ब्राह्मण को देकर उसके शाप के भय से अपनी सम्पत्ति की रक्षा की थी ॥ ५९ ॥

ब्राह्मण के शाप से भयभीत हुए उस राजा को नीतिशास्त्र के ज्ञाता गुरुजनों ने एवं श्रेष्ठ बन्धुओं ने समझाया था । हे शैलराज ! इसी प्रकार आप भी अपनी इस कन्या को शिव के निमित्त देकर समस्त बन्धुवर्गों की रक्षा कीजिये तथा देवताओं को अपने वश में कीजिये ॥ ६०-६१ ॥

ब्रह्माजी बोले — वसिष्ठ के इस वचन को सुनकर कुछ हँस करके व्यथित हृदय से उन्होंने राजा अनरण्य का वृत्तान्त पूछा ॥ ६२ ॥

हिमालय बोले — हे ब्रह्मन् ! वह अनरण्य राजा किसके वंश में उत्पन्न हुआ था और उसने अपनी कन्या को देकर किस प्रकार सम्पूर्ण सम्पत्ति की रक्षा की थी ? ॥ ६३ ॥

ब्रह्माजी बोले — हिमालय के इस प्रकार के वचन को सुनकर वसिष्ठजी प्रसन्नचित्त होकर राजा अनरण्य का सुखदायक वृत्तान्त उनसे कहने लगे — ॥ ६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के तृतीय पार्वतीखण्ड में गिरिसान्त्वन नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

 

 

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