शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 41
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
इकतालीसवाँ अध्याय
शंखचूड का रूप धारणकर भगवान् विष्णु द्वारा तुलसी के शील का हरण, तुलसी द्वारा विष्णु को पाषाण होने का शाप देना, शंकरजी द्वारा तुलसी को सान्त्वना, शंख, तुलसी, गण्डकी एवं शालग्राम की उत्पत्ति तथा माहात्म्य की कथा

व्यासजी बोले — [हे मुने!] भगवान् नारायण ने किस उपाय से तुलसी के साथ रमण किया, उसे आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यासजी!] सज्जनों की रक्षा करनेवाले तथा देवताओं का कार्य सम्पन्न करनेवाले भगवान् विष्णु ने शंखचूड का रूप धारणकर उसकी स्त्री के साथ रमण किया । जगन्माता पार्वती एवं शिव की आज्ञा का पालन करनेवाले श्रीहरि विष्णु के आनन्ददायी उस चरित्र को सुनिये ॥ २-३ ॥

शिवमहापुराण

युद्ध के मध्य में आकाशवाणी को सुनकर भगवान् शिवजी से प्रेरित हुए विष्णु शीघ्र अपनी माया से ब्राह्मण का रूप धारणकर शंखचूड का कवच ग्रहण करके पुनः उस शंखचूड का रूप धारणकर तुलसी के घर गये । उन्होंने तुलसी के द्वार के पास दुन्दुभि बजायी और जयशब्द का उच्चारणकर उस सुन्दरी को जगाया ॥ ४-६ ॥

यह सुनकर वह साध्वी बहुत प्रसन्न हुई और अत्यन्त आदरपूर्वक खिड़की से राजमार्ग की ओर देखने लगी ॥ ७ ॥ उसने ब्राह्मणों को बहुत-सा धन देकर मंगल कराया, तदनन्तर अपने पति को आया जानकर शीघ्र शृंगार भी किया ॥ ८ ॥ शंखचूड के स्वरूपवाले तथा देवकार्य करनेवाले वे मायावी विष्णु रथ से उतरकर उस देवी के भवन में गये ॥ ९ ॥ तब अपने स्वामी को सामने आया देखकर प्रसन्नता से युक्त होकर उसने उनका चरणप्रक्षालन किया, प्रणाम किया और वह रोने लगी ॥ १० ॥

उसने उन्हें रत्न के सिंहासन पर बैठाया और कपूरसुवासित ताम्बूल प्रदान किया ॥ ११ ॥

‘आज मेरा जन्म एवं जीवन सफल हो गया, जो कि युद्ध में गये हुए अपने स्वामी को पुनः घर में देख रही हूँ’ — ऐसा कहकर वह मुसकराती हुई प्रसन्नतापूर्वक तिरछी नजरों से स्वामी की ओर देखकर मधुर वाणी में युद्ध का समाचार पूछने लगी ॥ १२-१३ ॥

तुलसी बोली — हे प्रभो ! असंख्य विश्व का संहार करनेवाले वे देवाधिदेव शंकर ही हैं, जिनकी आज्ञा का पालन ब्रह्मा, विष्णु आदि सभी देवता सर्वदा करते हैं ॥ १४ ॥ वे तीनों देवताओं को उत्पन्न करनेवाले, त्रिगुणात्मक होते हुए निर्गुण तथा भक्तों की इच्छा से सगुण रूप धारण करनेवाले ब्रह्मा एवं विष्णु के भी प्रेरक हैं ॥ १५ ॥ कैलासवासी, गणों के स्वामी, परब्रह्म तथा सज्जनों के रक्षक शिवजी ने कुबेर की प्रार्थना से सगुण रूप धारण किया था ॥ १६ ॥

जिनके एक पलमात्र में करोड़ों ब्रह्माण्डों का क्षय हो जाता है तथा जिनके एक क्षणभर में विष्णु एवं ब्रह्मा व्यतीत हो जाते हैं । हे प्रभो ! उन्हीं के साथ आप युद्ध करने गये थे । आपने उन देवसहायक सदाशिव के साथ किस प्रकार संग्राम किया ? ॥ १७-१८ ॥ आप उन परमेश्वर को जीतकर यहाँ सकुशल लौट आये । हे प्रभो ! आपकी विजय किस प्रकार हुई, उसे मुझे बताइये । तुलसी के इस प्रकार के वचन को सुनकर शंखचूड का रूप धारण किये हुए वे रमापति हँसकर अमृतमय वचन कहने लगे — ॥ १९-२० ॥

श्रीभगवान् बोले — जब युद्धप्रिय मैं समरभूमि में गया, उस समय महान् कोलाहल होने लगा और महाभयंकर युद्ध प्रारम्भ हो गया । विजय की कामनावाले देवता तथा दानव दोनों का युद्ध होने लगा, उसमें बल से दर्पित देवताओं ने दैत्यों को पराजित कर दिया ॥ २१-२२ ॥ उसके बाद मैंने बलवान् देवताओं के साथ युद्ध किया और वे देवता पराजित होकर शंकर की शरण में पहुँचे ॥ २३ ॥
रुद्र भी उनकी सहायता के लिये युद्धभूमि में आये, तब मैंने भी अपने बल के घमण्ड से उनके साथ बहुत काल तक युद्ध किया । हे प्रिये ! इस प्रकार हम दोनों का युद्ध वर्षपर्यन्त होता रहा, जिसमें हे कामिनि ! सभी असुरों का विनाश हो गया । तब स्वयं ब्रह्माजी ने हम दोनों में प्रीति करा दी और मैंने उनके कहने से देवताओं का सारा अधिकार उन्हें सौंप दिया ॥ २४-२६ ॥ इसके बाद मैं अपने घर लौट आया और शिवजी शिवलोक को चले गये । इस प्रकार सारा उपद्रव शान्त हो गया और सब लोग सुखी हो गये ॥ २७ ॥

सनत्कुमार बोले — ऐसा कहकर जगत्पति रमानाथ ने शयन किया और रमा से रमापति के समान प्रसन्नता से उस स्त्री के साथ रमण किया । उस साध्वी ने रतिकाल में सुख, भाव और आकर्षण में भेद देखकर सारी बातें जान लीं और उसने कहा —तुम कौन हो ? ॥ २८-२९ ॥

तुलसी बोली — तुम मुझे शीघ्र बताओ कि तुम हो कौन ? तुमने मेरे साथ कपट किया और मेरे सतीत्व को नष्ट किया है, अतः मैं तुमको शाप देती हूँ ॥ ३० ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यासजी!] तुलसी का वचन सुनकर विष्णु ने शाप के भय से लीलापूर्वक अपनी अत्यन्त मनोहर मूर्ति धारण कर ली ॥ ३१ ॥ उस रूप को देखकर और चिह्न से उन्हें विष्णु जानकर तथा उनसे पातिव्रतभंग होने के कारण कुपित होकर वह तुलसी उनसे कहने लगी — ॥ ३२ ॥

तुलसी बोली — हे विष्णो ! आपमें थोड़ी-सी भी दया नहीं है, आपका मन पाषाण के समान है, मेरे पातिव्रत को भंगकर आपने मेरे स्वामी का वध कर दिया ॥ ३३ ॥ आप पाषाण के समान अत्यन्त निर्दय एवं खल हैं, अत: मेरे शाप से आप इस समय पाषाण हो जाइये ॥ ३४ ॥ जो लोग आपको दयासागर कहते हैं, वे भ्रम में पड़े हैं, इसमें सन्देह नहीं है । आपने बिना अपराध के दूसरे के निमित्त अपने ही भक्त का वध क्यों करवाया ? ॥ ३५ ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर शंखचूड की प्रिय पत्नी तुलसी शोक से विकल हो रोने लगी और बार-बार बहुत विलाप करने लगी ॥ ३६ ॥ तब उसे रोती हुई देखकर परमेश्वर विष्णु ने शिव का स्मरण किया, जिनसे संसार मोहित है ॥ ३७ ॥

तब भक्तवत्सल शंकर वहाँ प्रकट हो गये । श्रीविष्णु ने उन्हें प्रणाम किया और बड़े विनय के साथ उनकी स्तुति की । विष्णु को शोकाकुल तथा शंखचूड की पत्नी को विलाप करती हुई देखकर शंकर ने नीति से विष्णु को तथा उस दुखिया को समझाया ॥ ३८-३९ ॥

शिवजी बोले — हे तुलसी ! मत रोओ, व्यक्ति को अपने कर्म का फल भोगना ही पड़ता है । इस कर्मसागर संसार में कोई किसी को सुख अथवा दुःख देनेवाला नहीं है । अब तुम उपस्थित इस दुःख को दूर करने का उपाय सुनो एवं विष्णु भी इसे सुनें । जो तुमदोनों के लिये सुखकर है, उसे मैं तुमलोगों के सुख के लिये बतलाता हूँ ॥ ४०-४१ ॥

हे भद्रे ! तुमने [पूर्व समय में] तपस्या की थी, उसी तपस्या का यह फल प्राप्त हुआ है, तुम्हें विष्णु प्राप्त हुए हैं, वह अन्यथा कैसे हो सकता है ? ॥ ४२ ॥ अब तुम इस शरीर को त्यागकर दिव्य शरीर धारणकर महालक्ष्मी के समान हो जाओ और विष्णु के साथ नित्य रमण करो । तुम्हारी यह छोड़ी हुई काया एक नदी के रूप में परिवर्तित होगी और वह भारत में पुण्यस्वरूपिणी गण्डकी नाम से विख्यात होगी । हे महादेवि ! तुम मेरे वरदान से बहुत समय तक देवपूजन के साधन के लिये प्रधानभूत तुलसी वृक्षरूप में उत्पन्न होगी ॥ ४३-४५ ॥

तुम स्वर्ग, मर्त्य एवं पाताल — तीनों लोकों में विष्णु के साथ निवास करो । हे सुन्दरि ! तुम पुष्पवृक्षों में उत्तम तुलसी वृक्ष बन जाओ । तुम सभी वृक्षों की अधिष्ठात्री दिव्यरूपधारिणी देवी के रूप में वैकुण्ठ में विष्णु के साथ एकान्त में नित्यक्रीड़ा करोगी और भारत में तुम गण्डकी के रूप में रहोगी, वहाँपर भी नदियों की अधिष्ठात्री देवी होकर सभी को अत्यन्त पुण्य प्रदान करोगी तथा विष्णु के अंशभूत लवणसमुद्र की पत्नी बनोगी ॥ ४६-४८ ॥

भारत में उसी गण्डकी के किनारे ये विष्णु भी तुम्हारे शाप से पाषाणरूप में स्थित रहेंगे । वहाँ पर तीखे दाँतवाले तथा भयंकर करोड़ों कीड़े उन शिलाओं को काटकर उसके छिद्र में विष्णु के चक्र का निर्माण करेंगे ॥ ४९-५० ॥ उन कीटों के द्वारा छिद्र की गयी शालग्रामशिला अत्यन्त पुण्य प्रदान करनेवाली होगी । चक्रों के भेद से उन शिलाओं के लक्ष्मीनारायण आदि नाम होंगे ॥ ५१ ॥
उस शालग्रामशिला से जो लोग तुझ तुलसी का संयोग करायेंगे, उन्हें अत्यन्त पुण्य प्राप्त होगा ॥ ५२ ॥ हे भद्रे ! जो शालग्राम-शिला से तुलसी-पत्र को अलग करेगा, दूसरे जन्म में उसका स्त्री से वियोग होगा ॥ ५३ ॥ जो शंख से तुलसीपत्र का विच्छेद करेगा, वह सात जन्मपर्यन्त भार्याहीन रहेगा तथा रोगी होगा ॥ ५४ ॥

इस प्रकार जो महाज्ञानी शालग्रामशिला, तुलसी तथा शंख को एक स्थान पर रखेगा, वह श्रीहरि का प्रिय होगा । तुम एक मन्वन्तरपर्यन्त शंखचूड की पत्नी रही, शंखचूड के साथ यह तुम्हारा वियोग केवल इसी समय तुम्हें दुःख देने के लिये हुआ है ॥ ५५-५६ ॥

सनत्कुमार बोले — [हे व्यास!] ऐसा कहकर शंकरजी ने शालग्रामशिला तथा तुलसी के महान् पुण्य देनेवाले माहात्म्य का वर्णन किया ॥ ५७ ॥

इस प्रकार उस तुलसी तथा श्रीविष्णु को प्रसन्न करके सज्जनों का सदा कल्याण करनेवाले शंकरजी अन्तर्धान होकर अपने लोक चले गये । शिवजी की यह बात सुनकर तुलसी प्रसन्न हो गयी और [उसी समय] उस शरीर को छोड़कर दिव्य देह को प्राप्त हो गयी ॥ ५८-५९ ॥

कमलापति विष्णु भी उसीके साथ वैकुण्ठ चले गये और उसी क्षण तुलसी के द्वारा परित्यक्त उस शरीर से गण्डकी नदी की उत्पत्ति हुई ॥ ६० ॥ भगवान् विष्णु भी उसके तटपर मनुष्यों का कल्याण करनेवाले शालग्रामशिलारूप हो गये । हे मुने ! उसमें कीट अनेक प्रकार के छिद्र करते हैं ॥ ६१ ॥

जो शिलाएँ जल में पड़ी रहती हैं, वे अत्यन्त पुण्यदायक होती हैं एवं जो स्थल में रहती हैं, उन्हें पिंगला नामवाली जानना चाहिये, वे मनुष्यों को सन्ताप ही प्रदान करती हैं ॥ ६२ ॥

[हे मुने!] मैंने आपके प्रश्नों के अनुसार मनुष्यों की सभी कामनाओं को पूर्ण करनेवाले तथा पुण्य प्रदान करनेवाले सम्पूर्ण शिवचरित्र को कह दिया । विष्णु के माहात्म्य से मिश्रित आख्यान, जिसे मैंने कहा है, वह भुक्ति-मुक्ति तथा पुण्य देनेवाला है, आगे [हे व्यास!] अब आप और क्या सुनना चाहते हैं ॥ ६३-६४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में शंखचूडवधोपाख्यान के अन्तर्गत तुलसीशापवर्णन नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४१ ॥

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