शिवमहापुराण – द्वितीय रुद्रसंहिता [पंचम-युद्धखण्ड] – अध्याय 46
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
छियालीसवाँ अध्याय
भगवान् शिव एवं अन्धकासुर का युद्ध, अन्धक की माया से उसके रक्त से अनेक अन्धकगणों की उत्पत्ति, शिव की प्रेरणा से विष्णु का कालीरूप धारणकर दानवों के रक्त का पान करना, शिव द्वारा अन्धक को अपने त्रिशूल में लटका लेना, अन्धक की स्तुति से प्रसन्न हो शिव द्वारा उसे गाणपत्य पद प्रदान करना

सनत्कुमार बोले — हे व्यास ! शिवजी का अभिप्राय जानकर उस दैत्यराज ने गदा लेकर देवगणों से सर्वथा अभेद्य गिल नामक दैत्य को आगे कर सेना के सहित शीघ्र शिवजी की गुफा के दरवाजे पर पहुँचकर वज्र के समान तीखे शस्त्रों से प्रहार करना प्रारम्भ कर दिया, कुछ दैत्यों ने वीरक पर और कुछ दैत्यों ने पार्वती पर शस्त्रों से प्रहार किया । कुछ दैत्यों ने गुफा के मनोहर द्वार को तोड़ दिया, कुछ ने द्वार पर लगे पत्र, पुष्प, फल, मूल तथा मनोहर जल एवं उद्यानमार्गों को नष्ट कर दिया । कुछ ने प्रसन्न होकर पर्वत के दीप्तिमान् शिखरों को तोड़ दिया ॥ १-३१/२ ॥

शिवमहापुराण

तदनन्तर त्रिशूलधारी शिवजी ने कुपित होकर अपनी सेना का, दारुण भूतगणों का तथा सैन्यसहित विष्णु आदि देवगणों का स्मरण किया । शिवजी के स्मरण करते ही रथ, गज, घोड़े, बैल, गाय, ऊँट, गधे, पक्षिगण, सिंह, व्याघ्र, मृग, सूकर, सारस, मीन, मत्स्य, शिशुमार, सर्प, सैकड़ों प्रेत-पिशाच, दिव्य विमान, तालाब, नदी, नद, पर्वत, वाहन एवं अन्य जीवों के साथ समस्त देवता उपस्थित हो गये और हाथ जोड़कर शिवजी को प्रणामकर निर्भय होकर स्थित हो गये । उसके अनन्तर शिवजी ने वीरक को सेनापति बनाकर थके वाहनवाले उन देवताओं एवं युद्ध में निश्चित विजय पानेवाले प्रधान वीरों को भेजा । महेश्वर के द्वारा भेजे गये उन सभी देवगणों ने उस गिलसहित दैत्यराज की सेना के साथ निरन्तर प्रलयकाल के समान मर्यादाहीन घनघोर युद्ध किया । तब विघस ने युद्ध करते हुए उन ब्रह्मा, विष्णु, सूर्य एवं चन्द्रमा आदि समस्त देवों को क्रोधपूर्वक निगल लिया । इस प्रकार विघस के द्वारा अपनी समस्त सेना के निगल लिये जाने पर केवल वीरक रह गया ॥ ४-११ ॥

तब संग्रामभूमि को छोड़कर उस गुफा में प्रवेश करके सिर झुकाकर कामशत्रु शिवजी को प्रणाम करके वक्ताओं में श्रेष्ठ वह वीरक दुखी होकर उनसे सारा वृत्तान्त कहने लगा हे भगवन् ! विघस दैत्य ने आपकी सारी सेना निगल ली । वह त्रिलोकगुरु दैत्यविनाशक भगवान् विष्णु को निगल गया । उसने सूर्य तथा चन्द्रमा को, वरदायक ब्रह्मा तथा इन्द्र को निगल लिया । वह यम, वरुण, पवन एवं कुबेर आदि को भी निगल गया ॥ १२-१३ ॥

केवल मैं ही अकेला रह गया हूँ, मुझे अब क्या करना है । वह अजेय दैत्यपति सेनासहित प्रसन्नचित्त है । मैं भयभीत होकर वायु के समान वेगवान् होकर आप अजेय के पास आया हूँ । भगवान् विष्णु ने अपना मुख फैलाकर कश्यपपुत्र हिरण्यकशिपु को अपने तीव्र नखों से विदीर्ण किया था, वे भक्तों के वशीभूत हो त्रिलोकी के कण्टकों का नाश करने में प्रवृत्त रहते हैं ॥ १४-१५ ॥

पूर्वकाल में उन्हें वसिष्ठादि लोकरक्षक सप्तर्षियों ने शाप दिया था कि तम दैत्यों के साथ चिरकालपर्यन्त युद्ध करते हुए उनके द्वारा निगल लिये जाओगे ॥ १६ ॥ इसके बाद जब विष्णु ने विनम्र होकर मुनियों से प्रार्थना की कि हे मुनिगणो ! इस घोर शाप से मेरा छुटकारा कैसे होगा ? तब क्रुद्ध हुए उन मुनिगणों ने कहा —युद्धकाल में जब घोर बाणों की वर्षा कर विघस नामक दैत्य तुम्हें निगल लेगा, तब तुम अपने घूसों से उसके मुख पर प्रहारकर निकलोगे ॥ १७ ॥ तत्पश्चात् पुण्याश्रम बदरीवन नामक हरिगृह में जब तुम अवतार लोगे, तब शापरहित हो अपने परमात्मारूप में अवस्थित हो जाओगे । तभीसे वह गिल नामक दैत्य प्रतिदिन भूखा रहकर बड़ी प्रसन्नता के साथ युद्धस्थल में घूमता रहता था । जिस प्रकार जगत् को प्रकाशित करनेवाले सूर्य एवं चन्द्रमा से राहु शत्रुता करता है, उसी प्रकार देवताओं के परम शत्रु शुक्राचार्य देवों के द्वारा मारे गये सभी दैत्यों को संजीवनी विद्या के स्तुतिपदों से व्रणरहितकर जीवित कर देते हैं । आपको तथा मुझे युद्धस्थल में भले ही प्राण त्याग करना पड़े, किंतु अब आप ही इस युद्ध में प्रमाण हैं और आप ही इस कार्य को सँभालें ॥ १८-२० ॥

सनत्कुमार बोले — त्रिभुवनपति प्रमथपति सदाशिव पुत्र वीरक की बात सुनकर बहुत कुपित हुए और देर तक विचार करते रहे, तदनन्तर उन्होंने सूर्य के समान देदीप्यमान अपने शरीर से उत्तम सामवेद का गान किया और बड़ा अट्टहास किया, जिससे समस्त अन्धकार दूर हो गया ॥ २१ ॥ तब इस लोक में प्रकाश हो जाने पर वीरक मुनि ने रण में विकृत मुखवाले दैत्यों के साथ पुनः महायुद्ध किया । शिलाद मुनि ने पत्थर का चूर्ण खाकर जिन नन्दीश्वर को उत्पन्न किया था तथा जिन्होंने त्रिपुर को भी पूर्वकाल में जीत लिया था, उन नन्दी ने घनघोर युद्ध प्रारम्भ कर दिया ॥ २२ ॥

नन्दी को भी उस राक्षस ने निगल लिया । ऐसा देखकर योद्धाओं एवं मुनियों में अग्रगण्य तथा सभी विद्याओं के निवास, शम-दम-धैर्यादि गुणों से युक्त स्वयं कपर्दी महारुद्र वृषभ पर सवार हो निगले हुए देवगणों को उगलवा देनेवाले दिव्य मन्त्र का जप करते हुए तीक्ष्ण बाण, शूल तथा खड्ग लेकर युद्ध के लिये उस राक्षस के सम्मुख उपस्थित हुए । इतने में महावीर वीरक सभी को लेकर उस विघस राक्षस के मुख से निकले । इसी प्रकार विष्णु, ब्रह्मा, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य आदि सभी निकल आये । तब उनकी सेना प्रसन्न होकर पुनः युद्ध करने लगी ॥ २३–२५ ॥

उस सेना के जीत लेने पर देवगणों के द्वारा मारे गये समस्त दैत्यों को शुक्राचार्य अपनी संजीवनी विद्या के बल से पुनः जीवित करने लगे । तब गणों ने शुक्राचार्य को पशु के समान बाँधकर शिवजी के समीप उपस्थित किया और त्रिपुरारि शिवजी ने उन दानवगुरु को निगल लिया ॥ २६ ॥ इस प्रकार शुक्राचार्य के विनष्ट हो जाने पर देवताओं ने सारी दैत्यसेना को जीत लिया, विध्वस्त कर दिया और पूर्णरूप से कुचल डाला । उस समय दैत्यों के शरीर को उत्साहपूर्वक खानेवाले भूतगणों से एवं तीक्ष्ण बाण तथा शक्ति हाथ में लिये नाचते हए सिरकटे दैत्यों के धडों से सारी रणभूमि व्याप्त हो गयी । प्रमत्त वेतालों, अत्यन्त दृढ़ चोंच एवं पंजेवाले पक्षियों एवं नाना प्रकार के भेड़ियों ने मरे हुए राक्षसों के मांस को अपने मुख में रखकर आनन्द से भक्षण करना प्रारम्भ कर दिया । इस प्रकार हिरण्यकशिपु के वंश में उत्पन्न हुआ वह दैत्यराज चिरकालपर्यन्त युद्ध करके विष्णु, महेन्द्र एवं शिव से जीत लिया गया ॥ २७-२८ ॥

पराजित होने पर उस दैत्य की सारी सेना पाताल में, पर्वतों की गुफाओं में एवं समुद्र में छिप गयी । अपनी सारी सेना के क्षीण हो जाने पर दैत्यश्रेष्ठ अन्धक, जो क्रुद्ध होने पर न केवल देवताओं, अपितु विश्व का नाश करने में समर्थ था, उसका विष्णु ने गदा के भयंकर प्रहारों से मद चूर-चूर कर दिया ॥ २९ ॥ उसने युद्धभूमि का परित्याग नहीं किया; क्योंकि उसे ब्रह्माजी का वरदान प्राप्त था । उसके बाद इन्द्र के घोर अस्त्रों से पीड़ित हुआ वह दैत्य अपने शस्त्रास्त्रसमूहों, वृक्षों, पर्वतों एवं जल के प्रहारों से देवताओं को शीघ्र जीतकर जोर से गर्जना करते हुए प्रमथपति शिव को संकेतों के द्वारा बुलाकर युद्धभूमि में गिरे हुए अनेक प्रकार के शस्त्रों से युद्ध करता हुआ स्थित रहा । उन सबके समाप्त हो जाने पर वह वृक्षों, सर्पो, वज्र के समान शस्त्रों द्वारा तथा शम्बर की सैकड़ों माया एवं कपट रचना द्वारा गिरिजा एवं महादेव को पीडा पहुंचाने लगा ॥ ३०-३१ ॥

शंकर के समान महावीर, देवताओं से अवध्य, महासत्त्वसम्पन्न, मतिमान्, सैकड़ों वरदान पाने से उन्मत्त हुए दैत्य अन्धक ने शंकर को जीतने के लिये एक और माया की, यद्यपि उसका शरीर देवताओं के शस्त्रास्त्रों के द्वारा जर्जर हो उठा था । उसकी माया के प्रभाव से, उसके गिरे हुए रक्त-बिन्दुओं से अनेक विकृतवदन अन्धकगण रणभूमि में व्याप्त हो गये । तब प्रलयकालीन अग्नि के समान शरीर धारण करनेवाले त्रिपुरारि सदाशिव ने अपने त्रिशूल से उन दैत्यों का भेदन प्रारम्भ किया ॥ ३२-३३ ॥

इस प्रकार शिवजी के त्रिशूल के प्रहार के आघात से मांस विदीर्ण हो जाने के कारण प्रवाहित रक्तबिन्दुओं से अनेक अन्धक उत्पन्न होने लगे । तब महाबुद्धिमान् विष्णु ने शंकरजी को बुलाकर योग द्वारा अत्यन्त विकृत मुखवाला, उग्र, अजेय, कराल तथा अत्यन्त शुष्क स्त्री का रूप धारण कर लिया । अनेक भुजाओं से युक्त तथा कुपित भगवान् विष्णु उस युद्धस्थल में शंकरजी के कान से प्रकट हुए ॥ ३४-३५ ॥ युद्ध-भूमि में उत्पन्न हुई वे देवी अपने युगलचरणों से पृथ्वी को सुशोभित करने लगीं । सभी देवगण उनकी स्तुति करने लगे । उसके बाद शंकरजी की प्रेरणा से क्षुधा से व्याकुल वे देवी मांस की कीच से युक्त उस रणभूमि में दैत्यपति के शरीर से निकले हुए उष्ण रुधिर का पान करने लगीं ॥ ३६ ॥

इस प्रकार रक्त के सूख जाने पर वह दैत्य अकेला होने पर भी अपने कुलक्रमागत सनातन क्षात्रधर्म का स्मरण करता हुआ अपने वज्र के समान घूसों, जानु, चरणों, नखों, भुजाओं तथा सिर के द्वारा शंकर से युद्ध करता रहा ॥ ३७ ॥ [इस प्रकार युद्धकर] तब वह रण में शान्त हो गया, बाद में क्रूद्ध हुए शिवजी ने अपने त्रिशूल से उसका हृदय विदीर्ण कर दिया और स्थाणु के समान उसके ठूँठ शरीर को त्रिशूल पर टाँगकर आकाश में उठा लिया । उसका शरीर सूर्य के ताप से सूखने लगा, पवनप्रेरित जलपूर्ण बादलों ने उसके शरीर को गीला कर दिया और उसका सारा शरीर जीर्ण-शीर्ण हो गया ॥ ३८ ॥

सूर्य की किरणों से सन्तप्त, हिमखण्डों से खण्डित होने पर भी उस दैत्यराज ने प्राण-त्याग नहीं किया और वह भगवान् शंकर की निरन्तर स्तुति करता रहा । यह देखकर करुणासागर परम दयालु भगवान् शंकर ने उसकी स्तुति से प्रसन्न होकर उसे गाणपत्यपद प्रदान किया ॥ ३९ ॥ उस समय युद्ध के अन्त में भुवनपति श्रीहरि, ब्रह्मा तथा समस्त देवताओं ने शंकरजी की विधिपूर्वक पूजाकर कंधा झुकाकर मनोहर एवं सारगर्भित स्तुतियों से उनकी स्तुति की तथा प्रसन्न होकर उनकी जय-जयकार करके वे सुखी हो गये । तत्पश्चात् भगवान् भूतपति नाना प्रकार की सामग्री से पूजित देवगणों को सत्कारसहित विदाकर पार्वती के साथ प्रसन्न हो गुहा में क्रीड़ा करने लगे । उस समय वे घोर विघस के मुख से पापरहित पुत्र वीरक के निकल जाने से बड़े ही प्रसन्न हो रहे थे ॥ ४०-४१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के अन्तर्गत द्वितीय रुद्रसंहिता के पंचम युद्धखण्ड में अन्धकवधोपाख्यान में अन्धकयुद्धवर्णन नामक छियालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४६ ॥

 

 

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