शिवमहापुराण – प्रथम विद्येश्वरसंहिता – अध्याय 25
श्री गणेशाय नमः
श्री साम्बसदाशिवाय नमः
पच्चीसवाँ अध्याय
रुद्राक्षधारण की महिमा तथा उसके विविध भेदों का वर्णन

सूतजी बोले — हे महाप्राज्ञ ! हे महामते ! शिवरूप हे शौनक ऋषे ! अब मैं संक्षेप से रुद्राक्ष का माहात्म्य बता रहा हूँ, सुनिये ॥ १ ॥ रुद्राक्ष शिव को बहुत ही प्रिय है । इसे परम पावन समझना चाहिये । रुद्राक्ष के दर्शन से, स्पर्श से तथा उसपर जप करने से वह समस्त पापों का अपहरण करनेवाला माना गया है ॥ २ ॥ हे मुने ! पूर्वकाल में परमात्मा शिव ने समस्त लोकों का उपकार करने के लिये देवी पार्वती के सामने रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन किया था ॥ ३ ॥

शिवमहापुराण

शिवजी बोले — हे महेश्वरि ! हे शिवे ! मैं आपके प्रेमवश भक्तों के हित की कामना से रुद्राक्ष की महिमा का वर्णन करता हूँ, सुनिये ॥ ४ ॥ हे महेशानि ! पूर्वकाल की बात है, मैं मन को संयम में रखकर हजारों दिव्य वर्षों तक घोर तपस्या में लगा रहा ॥ ५ ॥ हे परमेश्वरि ! मैं सम्पूर्ण लोकों का उपकार करनेवाला स्वतन्त्र परमेश्वर हूँ । [एक दिन सहसा मेरा मन क्षुब्ध हो उठा।] अतः उस समय मैंने लीलावश ही अपने दोनों नेत्र खोले ॥ ६ ॥ नेत्र खोलते ही मेरे मनोहर नेत्रपुटों से कुछ जल की बूंदें गिरीं । आँसू की उन बूंदों से वहाँ रुद्राक्ष नामक वृक्ष पैदा हो गये ॥ ७ ॥ भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये वे अश्रुबिन्दु स्थावरभाव को प्राप्त हो गये । वे रुद्राक्ष मैंने विष्णुभक्तों को तथा चारों वर्णों के लोगों को बाँट दिये ॥ ८ ॥

भूतल पर अपने प्रिय रुद्राक्ष को मैंने गौड़ देश में उत्पन्न किया । मथुरा, अयोध्या, लंका, मलयाचल, सह्यगिरि, काशी तथा अन्य देशों में भी उनके अंकुर उगाये । वे उत्तम रुद्राक्ष असह्य पापसमूहों का भेदन करनेवाले तथा श्रुतियों के भी प्रेरक हैं ॥ ९-१० ॥ मेरी आज्ञा से वे रुद्राक्ष ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र जाति के भेद से इस भूतल पर प्रकट हुए । रुद्राक्षों की ही जाति के शुभाक्ष भी हैं ॥ ११ ॥

उन ब्राह्मणादि जातिवाले रुद्राक्षों के वर्ण श्वेत, रक्त, पीत तथा कृष्ण जानने चाहिये । मनुष्यों को चाहिये कि वे क्रमशः वर्ण के अनुसार अपनी जाति का ही रुद्राक्ष धारण करें ॥ १२ ॥ भोग और मोक्ष की इच्छा रखनेवाले चारों वर्णों के लोगों और विशेषतः शिवभक्तों को शिव-पार्वती की प्रसन्नता के लिये रुद्राक्ष के फलों को अवश्य धारण करना चाहिये ॥ १३ ॥ आँवले के फल के बराबर जो रुद्राक्ष हो, वह श्रेष्ठ बताया गया है । जो बेर के फल के बराबर हो, उसे मध्यम श्रेणी का कहा गया है । जो चने के बराबर हो, उसकी गणना निम्न कोटि में की गयी है । हे पार्वति ! अब इसकी उत्तमता को परखने की यह दूसरी प्रक्रिया भक्तों की हितकामना से बतायी जाती है । अतः आप भली-भाँति प्रेमपूर्वक इस विषय को सुनिये ॥ १४-१५ ॥

हे महेश्वरि ! जो रुद्राक्ष बेर के फल के बराबर होता है, वह उतना छोटा होने पर भी लोक में उत्तम फल देनेवाला तथा सुख-सौभाग्य की वृद्धि करनेवाला होता है ॥ १६ ॥ जो रुद्राक्ष आँवले के फल के बराबर होता है, वह समस्त अरिष्टों का विनाश करनेवाला होता है तथा जो गुंजाफल के समान बहुत छोटा होता है, वह सम्पूर्ण मनोरथों और फलों की सिद्धि करनेवाला होता है ॥ १७ ॥ रुद्राक्ष जैसे-जैसे छोटा होता है, वैसे-वैसे अधिक फल देनेवाला होता है । एक छोटे रुद्राक्ष को विद्वानों ने एक बड़े रुद्राक्ष से दस गुना अधिक फल देनेवाला बताया है ॥ १८ ॥ पापों का नाश करने के लिये रुद्राक्षधारण आवश्यक बताया गया है । वह निश्चय ही सम्पूर्ण अभीष्ट मनोरथों का साधक है, अतः उसे अवश्य ही धारण करना चाहिये ॥ १९ ॥

हे परमेश्वरि ! लोक में मंगलमय रुद्राक्ष जैसा फल देनेवाला देखा जाता है, वैसी फलदायिनी दूसरी कोई माला नहीं दिखायी देती ॥ २० ॥ हे देवि ! समान आकार-प्रकारवाले, चिकने, सुदृढ़, स्थूल, कण्टकयुक्त (उभरे हुए छोटे-छोटे दानोंवाले) और सुन्दर रुद्राक्ष अभिलषित पदार्थों के दाता तथा सदैव भोग और मोक्ष देनेवाले हैं ॥ २१ ॥ जिसे कीड़ों ने दूषित कर दिया हो, जो खण्डित हो, फूटा हो, जिसमें उभरे हुए दाने न हों, जो व्रणयुक्त हो तथा जो पूरा-पूरा गोल न हो, इन छः प्रकार के रुद्राक्षों को त्याग देना चाहिये ॥ २२ ॥ जिस रुद्राक्ष में अपने आप ही डोरा पिरोने के योग्य छिद्र हो गया हो, वही यहाँ उत्तम माना गया है । जिसमें मनुष्य के प्रयत्न से छेद किया गया हो, वह मध्यम श्रेणी का होता है ॥ २३ ॥ रुद्राक्षधारण बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाला बताया गया है । ग्यारह सौ रुद्राक्षों को धारण करनेवाला मनुष्य रुद्रस्वरूप ही हो जाता है ॥ २४ ॥

इस जगत् में ग्यारह सौ रुद्राक्ष धारण करके मनुष्य जिस फल को पाता है, उसका वर्णन सैकड़ों वर्षों में भी नहीं किया जा सकता ॥ २५ ॥ भक्तिमान् पुरुष भली-भाँति साढे पाँच सौ रुद्राक्ष के दानों का सुन्दर मुकुट बनाये । तीन सौ साठ दानों को लम्बे सूत्र में पिरोकर एक हार बना ले । वैसे-वैसे तीन हार बनाकर भक्तिपरायण पुरुष उनका यज्ञोपवीत तैयार करे ॥ २६-२७ ॥

हे महेश्वरि ! शिवभक्त मनुष्यों को शिखा में तीन, दाहिने और बाँयें दोनों कानों में क्रमशः छः-छः, कण्ठ में एक सौ एक, भुजाओं में ग्यारह-ग्यारह, दोनों कुहनियों और दोनों मणिबन्धों में पुनः ग्यारह-ग्यारह, यज्ञोपवीत में तीन तथा कटिप्रदेश में गुप्त रूप से पाँच रुद्राक्ष धारण करना चाहिये । हे परमेश्वरि ! [उपर्युक्त कही गयी] इस संख्या के अनुसार जो व्यक्ति रुद्राक्ष धारण करता है, उसका स्वरूप भगवान् शंकर के समान सभी लोगों के लिये प्रणम्य और स्तुत्य हो जाता है ॥ २८-३१ ॥ इस प्रकार रुद्राक्ष से युक्त होकर मनुष्य जब आसन लगाकर ध्यानपूर्वक शिव का नाम जपने लगता है, तो उसको देखकर पाप स्वतः छोड़कर भाग जाते हैं ॥ ३२ ॥

इस तरह मैंने एक हजार एक सौ रुद्राक्ष को धारण करने की विधि कह दी है । इतने रुद्राक्षों के न प्राप्त होने पर मैं दूसरे प्रकार की कल्याणकारी विधि कह रहा हूँ ॥ ३३ ॥

शिखा में एक, सिर पर तीस, गले में पचास और दोनों भुजाओं में सोलह-सोलह रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ ३४ ॥ दोनों मणिबन्धों पर बारह, दोनों स्कन्धों में पाँच सौ और एक सौ आठ रुद्राक्षों की माला बनाकर यज्ञोपवीत के रूप में धारण करना चाहिये ॥ ३५ ॥ इस प्रकार दृढ़ निश्चय करनेवाला जो मनुष्य एक हजार रुद्राक्षों को धारण करता है, वह रुद्र-स्वरूप है; समस्त देवगण जैसे शिव को नमस्कार करते हैं, वैसे ही उसको भी नमन करते हैं ॥ ३६ ॥ शिखा में एक, मस्तक पर चालीस, कण्ठप्रदेश में बत्तीस, वक्षःस्थल पर एक सौ आठ, प्रत्येक कान में एक-एक, भुजबन्धों में छ:-छः या सोलह-सोलह, दोनों हाथों में उनका दुगुना अथवा हे मुनीश्वर ! प्रीतिपूर्वक जितनी इच्छा हो, उतने रुद्राक्षों को धारण करना चाहिये । ऐसा जो करता है, वह शिवभक्त सभी लोगों के लिये शिव के समान पूजनीय, वन्दनीय और बार-बार दर्शन के योग्य हो जाता है ॥ ३७–३९ ॥

सिर पर ईशानमन्त्र से, कान में तत्पुरुष मन्त्र से तथा गले और हृदय में अघोरमन्त्र से रुद्राक्ष धारण करना चाहिये ॥ ४० ॥ विद्वान् पुरुष दोनों हाथों में अघोर बीजमन्त्र से रुद्राक्ष धारण करे और उदर पर वामदेवमन्त्र से पन्द्रह रुद्राक्षों द्वारा गूँथी हुई माला धारण करे ॥ ४१ ॥ सद्योजात आदि पाँच ब्रह्ममन्त्रों तथा अंगमन्त्रों के द्वारा रुद्राक्ष की तीन, पाँच या सात मालाएँ धारण करे अथवा मूलमन्त्र [नमः शिवाय]-से ही समस्त रुद्राक्ष को धारण करे ॥ ४२ ॥

रुद्राक्षधारी पुरुष अपने खान-पान में मदिरा, मांस, लहसुन, प्याज, सहिजन, लिसोड़ा, विड्वराह आदि को त्याग दे ॥ ४३ ॥ हे गिरिराजनन्दिनी उमे ! श्वेत रुद्राक्ष केवल ब्राह्मणों को ही धारण करना चाहिये । गहरे लाल रंग का रुद्राक्ष क्षत्रियों के लिये हितकर बताया गया है । वैश्यों के लिये प्रतिदिन बार-बार पीले रुद्राक्ष को धारण करना आवश्यक है और शूद्रों को काले रंग का रुद्राक्ष धारण करना चाहिये — यह वेदोक्त मार्ग है ॥ ४४ ॥

ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ, गृहस्थ और संन्यासी — सबको नियमपूर्वक रुद्राक्ष धारण करना उचित है । इसे धारण किये बिना न रहे, यह परम रहस्य है । इसे धारण करने का सौभाग्य बड़े पुण्य से प्राप्त होता है । इसको त्यागनेवाला व्यक्ति नरक को जाता है ॥ ४५ ॥ हे उमे ! पहले आँवले के बराबर और फिर उससे भी छोटे रुद्राक्ष धारण करे । जो रोगयुक्त हों, जिनमें दाने न हों, जिन्हें कीड़ों ने खा लिया हो, जिनमें पिरोने योग्य छेद न हो, ऐसे रुद्राक्ष मंगलाकांक्षी पुरुषों को नहीं धारण करना चाहिये । रुद्राक्ष मेरा मंगलमय लिंगविग्रह है । वह अन्ततः चने के बराबर लघुतर होता है । सूक्ष्म रुद्राक्ष को ही सदा प्रशस्त माना गया है ॥ ४६ ॥

सभी आश्रमों, समस्त वर्णों, स्त्रियों और शूद्रों को भी भगवान् शिव की आज्ञा के अनुसार सदैव रुद्राक्ष धारण करना चाहिये । यतियों के लिये प्रणव के उच्चारणपूर्वक रुद्राक्ष धारण करने का विधान है ॥ ४७ ॥ मनुष्य दिन में [रुद्राक्ष धारण करने से] रात्रि में किये गये पापों से और रात्रि में [रुद्राक्ष धारण करनेसे] दिन में किये गये पापों से; प्रातः, मध्याह्न और सायंकाल [रुद्राक्ष धारण करनेसे] किये गये समस्त पापों से मुक्त हो जाता है ॥ ४८ ॥

संसार में जितने भी त्रिपुण्ड्र धारण करनेवाले हैं, जटाधारी हैं और रुद्राक्ष धारण करनेवाले हैं, वे यमलोक को नहीं जाते हैं ॥ ४९ ॥ जिनके ललाट में त्रिपुण्ड्र लगा हो और सभी अंग रुद्राक्ष से विभूषित हों तथा जो पंचाक्षरमन्त्र का जप कर रहे हों, वे आप-सदृश पुरुषों के पूज्य हैं; वे वस्तुतः साधु हैं ॥ ५० ॥ [यम अपने गणों को आदेश करते हैं कि] जिसके शरीर पर रुद्राक्ष नहीं है, मस्तक पर त्रिपुण्ड्र नहीं है और मुख में ‘ॐ नमः शिवाय’ यह पंचाक्षर मन्त्र नहीं है, उसको यमलोक लाया जाय । [भस्म एवं रुद्राक्ष के] उस प्रभाव को जानकर या न जानकर जो भस्म और रुद्राक्ष को धारण करनेवाले हैं, वे सर्वदा हमारे लिये पूज्य हैं; उन्हें यमलोक नहीं लाना चाहिये ॥ ५१-५२ ॥

काल ने भी इस प्रकार से अपने गणों को आदेश दिया, तब वैसा ही होगा’ — ऐसा कहकर आश्चर्यचकित सभी गण चुप हो गये ॥ ५३ ॥इसलिये हे महादेवि ! रुद्राक्ष भी पापों का नाशक है । हे पार्वति ! उसको धारण करनेवाला मनुष्य पापी होने पर भी मेरे लिये प्रिय है और शुद्ध है ॥ ५४ ॥ हाथ में, भुजाओं में और सिर पर जो रुद्राक्ष धारण करता है, वह समस्त प्राणियों से अवध्य है और पृथ्वी पर रुद्ररूप होकर विचरण करता है ॥ ५५ ॥ सभी देवों और असुरों के लिये वह सदैव वन्दनीय एवं पूजनीय है । वह दर्शन करनेवाले प्राणी के पापों का शिव के समान ही नाश करनेवाला है ॥ ५६ ॥
ध्यान और ज्ञान से रहित होने पर भी जो रुद्राक्ष धारण करता है, वह सम्पूर्ण पापों से मुक्त होकर परमगति को प्राप्त होता है ॥ ५७ ॥ मणि आदि की अपेक्षा रुद्राक्ष के द्वारा मन्त्रजप करने से करोड़ गुना पुण्य प्राप्त होता है और उसको धारण करने से तो दस करोड़ गुना पुण्यलाभ होता है ॥ ५८ ॥ हे देवि ! यह रुद्राक्ष, प्राणी के शरीर पर जबतक रहता है, तबतक स्वल्पमृत्यु उसे बाधा नहीं पहुँचाती है ॥ ५९ ॥ त्रिपुण्ड्र को धारणकर तथा रुद्राक्ष से सुशोभित अंगवाला होकर मृत्युंजय का जप कर रहे उस [पुण्यवान् मनुष्य]को देखकर ही रुद्रदर्शन का फल प्राप्त हो जाता है ॥ ६० ॥
हे प्रिये ! पंचदेवप्रिय [अर्थात् स्मार्त और वैष्णव] तथा सर्वदेवप्रिय सभी लोग रुद्राक्ष की माला से समस्त मन्त्रों का जप कर सकते हैं ॥ ६१ ॥ विष्णु आदि देवताओं के भक्तों को भी निस्सन्देह इसे धारण करना चाहिये । रुद्रभक्तों के लिये तो विशेष रूप से रुद्राक्ष धारण करना आवश्यक है ॥ ६२ ॥ हे पार्वति ! रुद्राक्ष अनेक प्रकार के बताये गये हैं । मैं उनके भेदों का वर्णन करता हूँ । वे भेद भोग और मोक्षरूप फल देनेवाले हैं । तुम उत्तम भक्तिभाव से उनका परिचय सुनो ॥ ६३ ॥

एक मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् शिव का स्वरूप है । वह भोग और मोक्षरूपी फल प्रदान करता है । उसके दर्शनमात्र से ही ब्रह्महत्या का पाप नष्ट हो जाता है ॥ ६४ ॥ जहाँ रुद्राक्ष की पूजा होती है, वहाँ से लक्ष्मी दूर नहीं जातीं, उस स्थान के सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं तथा वहाँ रहनेवाले लोगों की सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण होती हैं ॥ ६५ ॥ दो मुखवाला रुद्राक्ष देवदेवेश्वर कहा गया है । वह सम्पूर्ण कामनाओं और फलों को देनेवाला है । वह विशेष रूप से गोहत्या का पाप नष्ट करता है ॥ ६६ ॥ तीन मुखवाला रुद्राक्ष सदा साक्षात् साधन का फल देनेवाला है, उसके प्रभाव से सारी विद्याएँ प्रतिष्ठित हो जाती हैं ॥ ६७ ॥ चार मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् ब्रह्मा का रूप है और ब्रह्महत्या के पाप से मुक्ति देनेवाला है । उसके दर्शन और स्पर्श से शीघ्र ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है ॥ ६८ ॥ पाँच मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् कालाग्निरुद्ररूप है । वह सब कुछ करने में समर्थ, सबको मुक्ति देनेवाला तथा सम्पूर्ण मनोवांछित फल प्रदान करनेवाला है । वह पंचमुख रुद्राक्ष अगम्या स्त्री के साथ गमन और पापान्न-भक्षण से उत्पन्न समस्त पापों को दूर कर देता है ॥ ६९-७० ॥ छः मुखोंवाला रुद्राक्ष कार्तिकेय का स्वरूप है । यदि दाहिनी बाँह में उसे धारण किया जाय, तो धारण करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापों से मुक्त हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ७१ ॥ हे महेश्वरि ! सात मुखवाला रुद्राक्ष अनंग नाम से प्रसिद्ध है । हे देवेशि ! उसको धारण करने से दरिद्र भी ऐश्वर्यशाली हो जाता है ॥ ७२ ॥ आठ मुखवाला रुद्राक्ष अष्टमूर्ति भैरवरूप है । उसको धारण करने से मनुष्य पूर्णायु होता है और मृत्यु के पश्चात् शूलधारी शंकर हो जाता है ॥ ७३ ॥ नौ मुखवाले रुद्राक्ष को भैरव तथा कपिलमुनि का प्रतीक माना गया है अथवा नौ रूप धारण करनेवाली महेश्वरी दुर्गा उसकी अधिष्ठात्री देवी मानी गयी हैं ॥ ७४ ॥ जो मनुष्य भक्तिपरायण होकर अपने बायें हाथ में नवमुख रुद्राक्ष धारण करता है, वह निश्चय ही मेरे समान सर्वेश्वर हो जाता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ७५ ॥ हे महेश्वरि ! दस मुखवाला रुद्राक्ष साक्षात् भगवान् विष्णु का रूप है । हे देवेशि ! उसको धारण करने से मनुष्य की सम्पूर्ण कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं ॥ ७६ ॥ हे परमेश्वरि ! ग्यारह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह रुद्ररूप है; उसको धारण करने से मनुष्य सर्वत्र विजयी होता है ॥ ७७ ॥ बारह मुखवाले रुद्राक्ष को केशप्रदेश में धारण करे । उसको धारण करने से मानो मस्तक पर बारहों आदित्य विराजमान हो जाते हैं ॥ ७८ ॥ तेरह मुखवाला रुद्राक्ष विश्वेदेवों का स्वरूप है । उसको धारण करके मनुष्य सम्पूर्ण अभीष्टों को प्राप्त करता है तथा सौभाग्य और मंगललाभ करता है ॥ ७९ ॥ चौदह मुखवाला जो रुद्राक्ष है, वह परमशिवरूप है । उसे भक्तिपूर्वक मस्तक पर धारण करे, इससे समस्त पापों का नाश हो जाता है ॥ ८० ॥ *

हे गिरिराजकुमारी ! इस प्रकार मुखों के भेद से रुद्राक्ष के [चौदह] भेद बताये गये । अब तुम क्रमशः उन रुद्राक्षों के धारण करने के मन्त्रों को प्रसन्नतापूर्वक सुनो —
१-ॐ ह्रीं नमः । २-ॐ नमः । ३-क्लीं नमः । ४-ॐ ह्रीं नमः । ५-ॐ ह्रीं नमः । ६-ॐ ह्रीं हुं नमः । ७-ॐ हुं नमः । ८-ॐ हुं नमः । ९-ॐ ह्रीं हुं नमः । १०-ॐ ह्रीं नमः । ११-ॐ ह्रीं हुं नमः । १२-ॐ क्रौं क्षौं रौं नमः । १३-ॐ ह्रीं नमः। १४-ॐ नमः [-इन चौदह मन्त्रों द्वारा क्रमशः एक से लेकर चौदह मुखवाले रुद्राक्षों को धारण करने का विधान है।] साधक को चाहिये कि वह निद्रा और आलस्य का त्याग करके श्रद्धाभक्ति से सम्पन्न होकर सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि के लिये उक्त मन्त्रों द्वारा उन-उन रुद्राक्ष को धारण करे ॥ ८१-८२ ॥
इस पृथ्वी पर जो मनुष्य मन्त्र के द्वारा अभिमन्त्रित किये बिना ही रुद्राक्ष धारण करता है, वह क्रमशः चौदह इन्द्रों के कालपर्यन्त घोर नरक को जाता है ॥ ८३ ॥ रुद्राक्ष की माला धारण करनेवाले पुरुष को देखकर भूत, प्रेत, पिशाच, डाकिनी, शाकिनी तथा जो अन्य द्रोहकारी राक्षस आदि हैं, वे सब-के-सब दूर भाग जाते हैं । जो कृत्रिम अभिचार आदि कर्म प्रयुक्त होते हैं, वे सब रुद्राक्षधारी को देखकर सशंक हो दूर चले जाते हैं ॥ ८४-८५ ॥ हे पार्वति ! रुद्राक्षमालाधारी पुरुष को देखकर मैं शिव, भगवान् विष्णु, देवी दुर्गा, गणेश, सूर्य तथा अन्य देवता भी प्रसन्न हो जाते हैं ॥ ८६ ॥ हे महेश्वरि ! इस प्रकार रुद्राक्ष की महिमा को जानकर धर्म की वृद्धि के लिये भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त मन्त्रों द्वारा विधिवत् उसे धारण करना चाहिये ॥ ८७ ॥

[हे मुनीश्वरो !] इस प्रकार परमात्मा शिव ने भगवती पार्वती के सामने भुक्ति तथा मुक्ति प्रदान करनेवाले भस्म तथा रुद्राक्ष के माहात्म्य का वर्णन किया था ॥ ८८ ॥ भस्म और रुद्राक्ष को धारण करनेवाले मनुष्य भगवान् शिव को अत्यन्त प्रिय हैं । उसको धारण करने के प्रभाव से ही भुक्ति-मुक्ति दोनों प्राप्त हो जाती है, इसमें सन्देह नहीं है ॥ ८९ ॥ भस्म और रुद्राक्ष धारण करनेवाला मनुष्य शिवभक्त कहा जाता है । भस्म एवं रुद्राक्ष से युक्त होकर जो मनुष्य [शिवप्रतिमा के सामने स्थित होकर] ‘ॐ नमः शिवाय’ इस पंचाक्षर मन्त्र का जप करता है, वह पूर्ण भक्त कहलाता है ॥ ९० ॥ बिना भस्म का त्रिपुण्ड्र धारण किये और बिना रुद्राक्षमाला लिये जो महादेव की पूजा करता है, उससे पूजित होने पर भी महादेव अभीष्ट फल प्रदान नहीं करते हैं ॥ ९१ ॥ हे मुनीश्वर ! सभी कामनाओं को परिपूर्ण करनेवाले भस्म और रुद्राक्ष के माहात्म्य को मैंने सुनाया । जो इस रुद्राक्ष और भस्म के माहात्म्य को भक्तिपूर्वक सुनता है, उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं । वह पुत्र-पौत्र आदि के साथ इस लोक में सभी प्रकार के सुख भोगकर अन्त में मोक्ष को प्राप्त होता है और भगवान् शिव का अतिप्रिय हो जाता है ॥ ९२-९४ ॥

हे मुनीश्वरो ! इस प्रकार मैंने शिव की आज्ञा के अनुसार उत्तम मुक्ति देनेवाली विद्येश्वरसंहिता आपके समक्ष कही ॥ ९५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराण के प्रथम विद्येश्वरसंहिता के साध्यसाधनखण्ड में रुद्राक्षमाहात्म्यवर्णन नामक पच्चीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २५ ॥
॥ प्रथम विद्येश्वरसंहिता पूर्ण हुई ॥

* एकवक्त्रः शिवः साक्षाद्भुक्तिमुक्तिफलप्रदः ।
तस्य दर्शनमात्रेण ब्रह्महत्यां व्यपोहति ॥
यत्र सम्पूजितस्तत्र लक्ष्मीदूंरतरा न हि ।
नश्यन्त्युपद्रवाः सर्वे सर्वकामा भवन्ति हि ॥
द्विवक्त्रो देवदेवेशः सर्वकामफलप्रदः ।
विशेषतः स रुद्राक्षो गोवधं नाशयेद् द्रुतम् ॥
त्रिवक्त्रो यो हि रुद्राक्षः साक्षात्साधनदः सदा ।
तत्प्रभावाद्भवेयुर्वं विद्याः सर्वाः प्रतिष्ठिताः ॥
चतुर्वक्त्रः स्वयं ब्रह्मा नरहत्यां व्यपोहति ।
दर्शनात् स्पर्शनात् सद्यश्चतुर्वर्गफलप्रदः ॥
पञ्चवक्त्रः स्वयं रुद्रः कालाग्निर्नामतः प्रभुः ।
सर्वमुक्तिप्रदश्चैव सर्वकामफलप्रदः ॥
अगम्यागमनं पापमभक्ष्यस्य च भक्षणम् ।
इत्यादिसर्वपापानि पञ्चवक्त्रो व्यपोहति ॥
षड्वक्त्रः कार्तिकेयस्तु धारणाद् दक्षिणे भुजे ।
ब्रह्महत्यादिकैः पापैर्मुच्यते नात्र संशयः ॥
सप्तवक्त्रो महेशानि ह्यनङ्गो नाम नामतः ।
धारणात्तस्य देवेशि दरिद्रोऽपीश्वरो भवेत् ॥
रुद्राक्षश्चाष्टवक्त्रश्च वसुमूर्तिश्च भैरवः ।
धारणात्तस्य पूर्णायुम॒तो भवति शूलभृत् ॥
भैरवो नववक्त्रश्च कपिलश्च मुनिः स्मृतः ।
दुर्गा वा तदधिष्ठात्री नवरूपा महेश्वरी ॥
तं धारयेद्वामहस्ते रुद्राक्षं भक्तितत्परः ।
सर्वेश्वरो भवेन्नूनं मम तुल्यो न संशयः ॥
दशवक्त्रो महेशानि स्वयं देवो जनार्दनः ।
धारणात्तस्य देवेशि सर्वान्कामानवाप्नुयात् ॥
एकादशमुखो यस्तु रुद्राक्षः परमेश्वरि ।
स रुद्रो धारणात्तस्य सर्वत्र विजयी भवेत् ॥
द्वादशास्यं तु रुद्राक्षं धारयेत् केशदेशके।
आदित्याश्चैव ते सर्वे द्वादशैव स्थितास्तथा ॥
त्रयोदशमुखो विश्वेदेवस्तद्धारणान्नरः ।
सर्वान्कामानवाप्नोति सौभाग्यं मङ्गलं लभेत् ॥
चतुर्दशमुखो यो हि रुद्राक्षः परमः शिवः ।
धारयेन्मूर्धिन तं भक्त्या सर्वपापं प्रणश्यति ॥
(विद्येश्वरसंहिता २५ । ६४-८०)

 

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