शिवमहापुराण — वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] — अध्याय 28
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ श्रीसाम्बसदाशिवाय नमः ॥
श्रीशिवमहापुराण
वायवीयसंहिता [उत्तरखण्ड] अट्ठाईसवाँ अध्याय
शिवाश्रमसेवियों के लिये नित्य – नैमित्तिक कर्मकी विधि का वर्णन

उपमन्यु बोले – [ हे कृष्ण ! ] अब मैं शिवाश्रम का सेवन करने वालों के लिये शिवशास्त्र में कथित मार्ग से नैमित्तिक विधि क्रम का वर्णन करूँगा ॥ १ ॥ सभी मासों में दोनों ही पक्षों की अष्टमी, चतुर्दशी तिथियों तथा पर्व के अवसर पर, अयन में, विषुवकाल में तथा विशेषकर ग्रहणों में अधिक रूप में अथवा अपने सामर्थ्य के अनुसार शिव की महापूजा करनी चाहिये ॥ २-३ ॥ व्रती को चाहिये कि प्रत्येक मास में विधि के अनुसार ब्रह्मकूर्च1  बनाकर उससे शिवजी को स्नान कराकर शेष [ ब्रह्मकूर्च ] -का पान करे । बहुत बड़े ब्रह्महत्या आदि पापों की भी निष्कृति ब्रह्मकूर्च के पान से हो जाती है, कुछ भी निष्कृति शेष नहीं रह जाती है ॥ ४-५ ॥

महानन्दमनन्तलीलं महेश्वरं सर्वविभुं महान्तम् ।
गौरीप्रियं कार्तिकविघ्नराज-समुद्भवं शङ्करमादिदेवम् ॥


पौष महीने में पुष्य नक्षत्र में शिवजी का नीराजन करे और माघ महीने में मघा नामक नक्षत्र में घृत तथा कम्बल का दान करे। फाल्गुनमास में उत्तराफाल्गुनीयुक्त पूर्णिमा के दिन महोत्सव का प्रारम्भ करे और चैत्रमास में चित्रानक्षत्रयुक्त पूर्णिमा को यथाविधि दोलनोत्सव करे ॥ ६-७ ॥ वैशाखमास में विशाखानक्षत्र में पुष्पमहालय करना चाहिये। ज्येष्ठमास में मूल [ ज्येष्ठा] – संज्ञक नक्षत्र में शीतलजलयुक्त कुम्भ का दान करना चाहिये। आषाढ़मास में उत्तराषाढ़ानक्षत्र में पवित्रारोपण करना चाहिये और सावन महीने में श्रविष्ठा (श्रवण) नामक नक्षत्र में अन्य प्राकृत मण्डल बनाने चाहिये । उसके बाद भाद्रपदमास की पूर्णिमा को पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रयुक्त दिन में [ मन्त्रों से प्रोक्षण एवं] जलविहार करवाना चाहिये । तदनन्तर आश्विनमास की पूर्णिमा को खीर तथा नये चावल का भात निवेदित करे, पुनः उसी से शतभिषानक्षत्र में हवन करे ॥ ८ – ११ ॥ कृत्तिकानक्षत्रयुक्त कार्तिक मास में हजार दीपों का दान करना चाहिये। मार्गशीर्ष (अगहन) – मास में आर्द्रानक्षत्र में घृत से शिवजी को स्नान कराना चाहिये ॥ १२ ॥

यदि उन समयों में यह सब करने में असमर्थ हो, तो उत्सव, सभा, महापूजा अथवा अधिक अर्चन करे । घर में [विवाहादि ] मांगलिक कृत्य होने पर, प्रशस्त कर्मों में, मन के दुखी होने पर, दुराचार में, दुःस्वप्न में, दुष्टों का दर्शन होने पर, उपद्रव उपस्थित होने पर, अन्य अशुभ निमित्त होने पर अथवा प्रबल रोग होने पर स्नान – पूजा-जप- ध्यान-होम-दान आदि क्रियाएँ उद्देश्य के अनुसार पुरश्चरणपूर्वक करे । संस्कृत शिवाग्नि में पुनः सन्धान [ होमादि ] करे ॥ १३–१६ ॥

जो मनुष्य इस प्रकार सावधान होकर नित्य शिवधर्मपरायण रहता है, उसे महेश्वर एक ही जन्ममें मुक्ति प्रदान कर देते हैं । जो नित्यनैमित्तिक कर्मोंमें इसे यथोचित रूपसे करता है, वह श्रीकण्ठनाथके दिव्य आदिलोकको जाता है। मनुष्य वहाँपर सौ करोड़ कल्पोंतक महान् सुखोंको भोगकर कुछ समय बाद वहाँसे लौटकर उमा, कुमार (कार्तिकेय), विष्णु, ब्रह्मा तथा विशेष रूपसे रुद्रके लोकोंको प्राप्त करता है और वहाँपर दीर्घकालतक निवास करके यथोक्त भोगोंको भोगकर पुनः उन पाँचों स्थानोंको पार करके उससे भी ऊपर चला जाता है और वहाँ श्रीकण्ठसे ज्ञान प्राप्तकर वहाँसे शिवलोक चला जाता है ॥ १७- २१ ॥

इन अनुष्ठानोंका आधा करनेवाला भी इसकी दो आवृत्तिसे ही बादमें ज्ञान प्राप्तकर शिवसायुज्य पा जाता है । जो मनुष्य उसके आधेका भी आधा अनुष्ठान करता है, वह शरीरक्षय [के अनन्तर ] ब्रह्माण्ड अथवा ऊपरके दो अव्यक्त भुवनोंको पारकर पार्वतीपतिके पौरुष रौद्रस्थानको प्राप्त करके (वहाँ) अनेक हजार युगोंतक अनेक प्रकारके सुखोंका उपभोग कर पुनः पुण्यके क्षीण होनेपर पृथ्वीलोकमें आकर उच्च कुलमें जन्म लेता है ॥ २२-२४ १/२ ॥ वहाँपर भी महातेजस्वी वह पूर्व संस्कारके कारण पशुधर्मोंका त्याग करके शिवधर्ममें संलग्न रहता है और उस धर्मके प्रभावसे ही शिवका ध्यान करके शिवलोकको जाता है। वहाँ विविध सुखोंको भोगकर विद्येश्वरलोकको जाता है और वहाँ विद्येश्वरोंके साथ क्रमसे अनेक भोगोंको भोगकर ब्रह्माण्डके भीतर अथवा बाहर एक बार फिर लौटता है । तदनन्तर उत्तम भक्ति प्राप्त करके उसीसे शिवज्ञानको सिद्धकर शिवसाधर्म्यकी प्राप्ति करके पुनः संसारमें नहीं आता है ॥ २५ – २८१ / २ ॥

जो विषयमें आसक्त चित्तवालोंकी भाँति शिवके प्रति अत्यधिक भक्तिपरायण है, वह शिवधर्मोंको करता हुआ अथवा न करता हुआ भी मुक्त हो जाता है, वह एक बार, दो बार अथवा तीन बार जन्म लेकर मुक्ति प्राप्त कर लेता है ॥ २९-३० ॥ शिवधर्मका अधिकारी चक्रकी भाँति बार – बार विभिन्न योनियोंमें भ्रमण नहीं करता है । अतः यदि कोई [ अपने] कल्याणके लिये प्रयत्नशील हो, तो उसे शिवका आश्रय लेकर जिस किसी भी उपायसे शिवधर्ममें बुद्धि लगानी चाहिये । [ गुरु कहे कि ] हम किसीको अपनी इच्छासे किसी बन्धनमें आबद्ध नहीं करते हैं, दीक्षाविहीन तथा विवाद करनेवालोंको स्वभावतः यह शिवधर्म रुचिकर नहीं लगता, जो पूर्वजन्मकृत पुण्यसंस्कारके गौरवसे युक्त हैं, उन्हें ही [ इस शिवधर्ममें] रुचि होती है। जो जगत्को सृष्टि आदिका मूल कारण माननेवाले हैं, उनमें यह शिवधर्म आरूढ़ होनेमें समर्थ नहीं हो पाता, अतएव यदि अपना कल्याण अभीष्ट हो तो ऐसे व्यक्तिको उसके स्वभावके अनुरूप गुरु शिवधर्ममें दीक्षित करे ॥ ३१–३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीशिवमहापुराणके अन्तर्गत सातवीं वायवीयसंहिताके उत्तरखण्डमें नित्यनैमित्तिकविधिवर्णन नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

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