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॥ श्रीकृष्णकृतं श्रीराधास्तोत्रम् ॥

एक बार श्रीराधाजी मान करके श्रीकृष्ण के समीप से अन्तर्धान हो गयीं । तब ब्रह्मा, विष्णु और शिव आदि सब देवता ऐश्वर्यभ्रष्ट, श्रीहीन, भार्यारहित तथा उपद्रवग्रस्त हो गये । इस परिस्थिति पर विचार करके उन सबने भगवान् भीकृष्ण की शरण ली । उनके स्तोत्र से संतुष्ट हुए सबके परमात्मा श्रीकृष्ण ने स्नान करके शुद्ध हो सती राधिका की पूजा करके उनका इस प्रकार स्तवन किया —

॥ श्रीकृष्ण उवाच ॥

एवमेव प्रियोऽहं ते प्रमोदश्चैव ते मयि ।
सुव्यक्तमद्य कापट्यवचनं ते वरानने ॥

हे कृष्ण त्वं मम प्राणा जीवात्मेति च संततम् ।
ब्रूषे नित्यं तु यत् प्रेम्णा साम्प्रतं तद् गतं द्रुतम् ॥

अस्माकं वचनं सत्यं यद् ब्रवीमीति तद् ध्रुवम् ।
पञ्चप्राणाधिदेवी त्वं राधा प्राणाधिकेति मे ॥

शक्तो न रक्षितुं त्वां च यान्ति प्राणास्त्वया विना ।
विनाधिष्ठातृदेवीं च को वा कुत्र च जीवति ॥

महाविष्णोश्च माता त्वं मूलप्रकृतिरीश्वरी ।
सगुणा त्वं च कलया निर्गुणा स्वयमेव तु ॥

ज्योतीरूपा निराकारा भक्तानुग्रहविग्रहा ।
भक्तानां रुचिवैचित्र्यानानामूर्तीश्च विभ्रती ॥

महालक्ष्मीश्च वैकुण्ठे भारती च सतां प्रसूः ।
पुण्यक्षेत्रे भारते च सती त्वं पार्वती तथा ॥

तुलसी पुण्यरूपा च गङ्गा भुवनपावनी ।
ब्रह्मलोके च सावित्री कलया त्वं वसुन्धरा ॥

गोलोके राधिका त्वं च सर्वगोपालकेश्वरी ।
त्वया विनाहं निर्जीवो ह्यशक्तः सर्वकर्मसु ॥

शिवः शक्तस्त्वया शक्त्या शवाकारस्त्वया विना ।
वेदकर्ता स्वयं ब्रह्मा वेदमात्रा त्वया सह ॥

नारायणस्त्वया लक्ष्म्या जगत्पाता जगत्पतिः ।
फलं ददाति यज्ञश्च त्वया दक्षिणया सह ॥

बिभर्ति सृष्टिं शेषश्च त्वां कृत्वा मस्तके भुवम् ।
विभर्ति गङ्गारूपां त्वां मूर्ध्नि गङ्गाधरः शिवः ॥

शक्तिमच्च जगत् सर्वं शवरूपं त्वया विना ।
वक्ता सर्वस्त्वया वाण्या सूतो मूकस्त्वया विना ॥

यथा मृदा घटं कर्तुं कुलालः शक्तिमान् सदा ।
सृष्टिं स्रष्टुं तथाहं च प्रकृत्या च त्वया सह ॥

त्वया विना जडश्चाहं सर्वत्र च न शक्तिमान् ।
सर्वशक्तिस्वरूपा त्वं समागच्छ ममान्तिकम् ॥

वह्नौ त्वं दाहिका शक्तिर्नाग्निः शक्तस्त्वया विना ।
शोभास्वरूपा चन्द्रे त्वं त्वां विना न स सुन्दरः ॥

प्रभारुपा हि सूर्ये त्वं त्वां विना न स भानुमान् ।
न कामः कामिनीबन्धुस्त्वया रत्या विना प्रिये ॥

॥ फल-श्रुति ॥

इत्येवं स्तवनं कृत्वा तां सम्प्राप जगत्प्रभुः ।
देवाबभूवुः सश्रीकाः सभार्याः शक्तिसंयुताः ॥
सस्त्रीकं च जगत् सर्वे बभूव शैलकन्यके ।
गोपीपूर्णश्च गोलोको बभूव तत्प्रसादतः ॥
राजा जगाम गोलोकमिति स्तुत्वा हरिप्रियाम् ।
श्रीकृष्णेन कृतं स्तोत्रं राधाया यः पठेन्नरः ॥
कृष्णभक्तिं च तद्दास्यं स प्राप्नोति न संशयः ।
स्त्रीविच्छेदे यः शृणोति मासमेकमिदं शुचिः ॥
अचिराल्लभते भार्यो सुशीलां सुन्दरीं सतीम् ।
भार्याहीनो भाग्यहीनो वर्षमेकं शृणोति यः ॥
अचिराल्लभते भार्या सुशीलां सुन्दरीं सतीम् ।
पुरा मया च त्वं प्राप्ता स्तोत्रेणानेन पार्वति ॥
मृतायां दक्षकन्यायामाज्ञया परमात्मनः ।
स्तोत्रेणानेन सम्प्राप्ता सावित्री ब्रह्मणा पुरा ॥
पुरा दुर्वाससः शापान्निः श्रीकै देवतागणे ।
स्तोत्रेणानेन देवैस्तैः सम्प्राप्ता श्रीः सुदुर्लभा ॥
शृणोति वर्षमेकं च पुत्रार्थी लभते सुतम् ।
महाव्याधी रोगमुक्तो भवेत् स्तोत्रप्रसादतः ॥
कार्तिकीपूर्णिमायां तु तां सम्पूज्य पठेतुः यः ।
अचलां श्रियमाप्नोति राजसूयफलं लभेत् ॥
नारी शृणोति चेत् स्तोत्रं स्वामिसौभाग्यसंयुता ।
भक्त्या शृणोति यः स्तोत्रं बन्धनान्मुच्यते ध्रुवम् ॥
नित्यं पठति यो भक्त्या राधां सम्पूज्य भक्तितः ।
स प्रयाति च गोलोकं निर्मुक्तो भयबन्धनात् ॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते श्रीकृष्णकृतं श्रीराधास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
(प्रकृतिखण्ड ५५ । ७३-१०१)

श्रीकृष्ण बोले — सुमुखि श्रीराधे ! क्या मैं इसी प्रकार तुम्हारा प्रिय हूँ और मुझमें तुम्हारी प्रीति है ? तुम्हारी वाणी में जो छलना थी, वह आज अच्छी तरह प्रकट हो गयी । ‘हे कृष्ण ! तुम मेरे प्राण हो, जीवात्मा हो’ इस तरह की बातें जो तुम नित्य-निरन्तर प्रेमपूर्वक कहा करती थीं, वे अब तत्काल कहाँ चली गयी ? मैं पहले तुम्हारे सामने जो कुछ कहता था, मेरा वचन आज भी ध्रुव सत्य है । तुम मेरे पाँचों प्राण की अधिष्ठात्री देवी हो’, ‘राधा मेरे लिये प्राणों से भी बढ़कर प्रिय है । मेरी ये बातें जैसे पहले सत्य थीं, उसी तरह आज भी हैं । मैं तुम्हें अपने पास रखने में समर्थ न हो सका, अतः तुम्हारे बिना मेरे प्राण चले जा रहे हैं । अधिष्ठात्री देवी के बिना कौन कहाँ जीवित रह सकता है ? तुम महाविष्णु की माता, मूलप्रकृति ईश्वरी हो । अपनी कला से तुम सगुण रूप में प्रकट होती हो । स्वयं तो निर्गुणा (प्राकृत गुणों से रहित) ही हो । ज्योतिःपुञ्ज ही तुम्हारा स्वरूप है । तुम वास्तव में निराकार हो । भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही तुम रूप धारण करती हो । भक्तों की विभिन्न रुचि के कारण नाना प्रकार की मूर्तियाँ ग्रहण करती हो । वैकुण्ठ में महालक्ष्मी और सरस्वती के रूप में तुम्हारा ही निवास है । पुण्यक्षेत्र भारतवर्ष में सत्पुरुषों की जननी भी तुम्हीं हो । सती और पार्वती के रूप में तुम्हारा ही प्राकट्य हुआ है । तुम्ही पुण्यरूपा तुलसी और भुवनपावनी गङ्गा हो । ब्रह्मलोक में सावित्री के रूप में तुम्हीं रहती हो । तुम्हीं अपनी कला से वसुन्धरा हुई हो, गोलोक में तुम्हीं समस्त गोपालों की अधीश्वरी राधा हो । तुम्हारे बिना मैं निर्जीव हूँ । किसी भी कर्म को करने में असमर्थ हूँ । तुम्हें शक्ति के रूप में पाकर ही शिव शक्तिमान् हैं । तुम्हारे बिना वे शिव नहीं, शव हैं । तुम्हें ही वेदमाता सावित्री के रूप में अपने साथ पाकर साक्षात् ब्रह्माजी वेदों के प्राकट्यकर्ता माने गये हैं । तुम लक्ष्मी का सहयोग मिलने से ही जगत्पालक नारायण जगत् का पालन करते हैं । तुम्ही दक्षिणारूप से साथ रहती हो, इसलिये यज्ञ फल देता है । पुत्री के रूप में तुम्हें मस्तक पर धारण करके ही शेषनाग सृष्टि का संरक्षण करते हैं । गङ्गाधर शिव तुम्हें ही गङ्गारूप में अपने मस्तक पर धारण करते हैं । तुमसे ही सारा जगत् शक्तिमान् है । तुम्हारे बिना सब कुछ शव ( मृतक-) के तुल्य है । तुम वाणी हो । तुम्हें पाकर ही सब लोग वक्ता बनते हैं । तुम्हारे बिना पौराणिक सूत भी मूक हो जाता है । जैसे कुम्हार सदा मिट्टी के सहयोग से ही घड़ा बनाने में समर्थ होता है, उसी प्रकार तुम प्रकृतिदेवी के साथ ही मैं सृष्टि-रचना में सफल होता हूँ । तुम्हारे बिना मैं सर्वत्र जड हूँ । कहीं भी शक्ति नहीं हूँ । तुम्हीं सर्वशक्तिस्वरूपा हो । अतः मेरे निकट आओ । अग्नि में तुम्हीं दाहिकाशक्ति हो । तुम्हारे बिना अग्नि दाहकर्म में समर्थ नहीं है । चन्द्रमा ने शोभा बनकर रहती हो । तुम्हारे बिना चन्द्रमा सुन्दर नहीं लगेगा । सूर्य में तुम्हीं प्रभा हो । तुम्हारे बिना सूर्यदेव प्रभापूर्ण नहीं रह सकते । प्रिये ! तुम्हीं रति हो । तुम्हारे बिना कामदेव कामिनियों के प्राणवल्लभ नहीं हो सकते ।

इस प्रकार श्रीराधा की स्तुति करके जगत्प्रभु श्रीकृष्ण ने उन्हें प्राप्त किया । फिर तो सब देवता सश्रीक, सस्त्रीक और शक्तिसम्पन्न हो गये । गिरिराजनन्दिनि । तदनन्तर सारा जगत् सस्त्रीक हो गया । श्रीराधा की कृपा से गोलोक गोपाङ्गनाओं से परिपूर्ण हो गया । इसी प्रकार हरिप्रिया श्रीराधा की स्तुति करके राजा सुयज्ञ गोलोकधाम में चले गये । जो मनुष्य श्रीकृष्ण द्वारा किये गये इस “राधास्तोत्र” का पाठ करता है, वह श्रीकृष्ण की भक्ति और दास्यभाव प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है । स्त्री से वियोग होने पर जो पवित्रभाव से एक मास तक इस स्तोत्र का श्रवण करता है, वह शीघ्र ही सती, सुन्दरी और सुशीला स्त्री को प्राप्त कर लेता है । जो भार्या और सौभाग्य से हीन है, वह यदि एक वर्ष तक इस स्तोत्र का श्रवण करे तो उसे भी शीघ्र ही सुन्दरी, सुशीला एवं सती भार्या की प्राप्ति हो जाती है । पार्वति ! पूर्वकाल में अब दक्षकन्या सती की मृत्यु हो गयी थी, तब परमात्मा श्रीकृष्ण की आशा पाकर मैंने इसी स्तोत्र से श्रीराधा की स्तुति की और तुम्हें पा लिया । पूर्वकाल में ब्रह्माजी को भी इसी स्तोत्र के प्रभाव से सावित्री की प्राप्ति हुई थी । प्राचीन काल में दुर्वासा के शाप से जब देवतालोग श्रीहीन हो गये, तब इसी स्तोत्र से श्रीराधा की स्तुति करके उन्होंने परम दुर्लभ लक्ष्मी प्राप्त की थी । पुत्र की इच्छा-वाला पुरुष यदि एक वर्ष तक इस स्तोत्र का श्रवण करे तो उसे पुत्र प्राप्त हो जाता है । इस स्तोत्र के प्रसाद से मनुष्य बहुत बड़ी व्याधि एवं रोगों से मुक्त हो जाता है ।

जो कार्तिक की पूर्णिमा को श्रीराधा का पूजन करके इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह अविचल लक्ष्मी को पाता है तथा राजसूययज्ञ के फल का भागी होता है । यदि नारी इस स्तोत्र का श्रवण करे तो वह पति के सौभाग्य से सम्पन्न होती है । जो भक्तिपूर्वक इस स्तोत्र को सुनता है, वह निश्चय ही बन्धन से मुक्त हो जाता है । जो प्रतिदिन भक्तिभाव से श्रीराधा की पूजा करके प्रेमपूर्वक इस स्तोत्र का पाठ करता है, वह भवबन्धन से मुक्त हो गोलोकधाम में जाता है ।

 

 

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