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॥ श्रीकृष्ण के विभिन्न मन्त्र ॥

* द्वादशाक्षर मन्त्र-
“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ।” (जप-संख्या–१२ लाख)
* बालगोपाल अष्टाक्षर मन्त्र-
“ॐ गोकुलनाथाय नमः ।”
* बालगोपालमन्त्र –
(१) ‘ॐ क्लीं कृष्ण क्लीं नमः ।’
(२) ‘ॐ क्लीं कृष्ण क्लीं ।’

* बालगोपाल के अट्ठारह प्रसिद्ध मन्त्र –


बालगोपाल के अठारह मन्त्र बहुत ही प्रसिद्ध हैं । किसी एक के द्वारा भगवान् की आराधना करने से साधक का अभीष्ट सिद्ध होता है । यहाँ उन मन्त्रों का संक्षेप में स्वरूपनिर्देश किया जाता है –
(१) ॐ कृः । (एकाक्षर)
(२) ॐ कृष्ण । (द्व्यक्षर)
(३) ॐ क्लीं कृष्ण । (त्र्यक्षर)
(४) ॐ क्लीं कृष्णाय । (चतुरक्षर)
(५) ॐ कृष्णाय नमः । (पञ्चाक्षर)
(६) ॐ क्लीं कृष्णाय क्लीं । (पञ्चाक्षर)
(७) ॐ गोपालाय स्वाहा । (षडक्षर)
(८) ॐ क्लीं कृष्णाय स्वाहा । (षडक्षर)
(९) ॐ क्लीं कृष्णाय नमः । (षडक्षर)
(१०) ॐ कृष्णाय गोविन्दाय । (सप्ताक्षर)
(११) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय क्लीं । (सप्ताक्षर)
(१२) ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय । (अष्टाक्षर)
(१३) ॐ दधिभक्षणाय स्वाहा । (अष्टाक्षर)
(१४) ॐ सुप्रसन्नात्मने नमः । (अष्टाक्षर)
(१५) ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय क्लीं । (नवाक्षर)
(१६) ॐ क्लीं ग्लौं श्यामलाङ्गाय नमः । (नवाक्षर)
(१७) ॐ बालवपुषे कृष्णाय स्वाहा । (दशाक्षर)
(१८) ॐ बालवपुषे क्लीं कृष्णाय स्वाहा । (एकादशाक्षर)
प्रातःकाल के सारे नित्यकृत्य समाप्त होने के पश्चात् इनमें से किसी एक का जप करना चाहिये । इन सब मन्त्रों के ऋषि नारद हैं, गायत्री छन्द है और श्रीकृष्ण देवता हैं ।
पौराणिक मन्त्र-
“तासामाविरभूच्छौरिः स्मयमान मुखाम्बुजः ।
पीताम्बरधरः स्रग्वी साक्षान्मन्मथमन्मथः ॥”
(श्रीमद्भागवत १० । ३२ । २)
-इस मन्त्र की एक माला जप करके ‘ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ।’ इस मन्त्र को कम-से-कम ११ माला का जप प्रतिदिन शुद्ध होकर करे । ब्रह्मचर्य का पालन आवश्यक है ।
* कल्पवृक्षस्वरूप अष्टाक्षर कृष्ण-मन्त्र –
“श्रीं ह्रीं क्लीं कृष्णाय नमः ।” (देवीभागवत ९ । ४८ । १५-१६)
* षडक्षर कृष्ण-मन्त्र –
“ॐ क्लीं कृष्णाय नमः ।”
* पुराणोक्त कृष्ण-मन्त्र –
‘जय कृष्ण नमस्तुभ्यम्’
फाल्गुन के शुक्लपक्ष में ‘सुगतिद्वादशी’ का व्रत करनेवाला ‘जय कृष्ण नमस्तुभ्यम्’ मन्त्र से एक वर्ष तक श्रीकृष्ण की पूजा करे । ऐसा करने से मनुष्य भोग और मोक्ष-दोनों प्राप्त कर लेता है । (अग्निपुराण १८८ । १४)
* श्रीवल्लभाचार्य द्वारा प्रकटित शुद्धाद्वैत सम्प्रदाय का अष्टाक्षर भगवन्नाम-महामन्त्र –
‘श्रीकृष्णः शरणं मम ।’
* गोपाल-गायत्री –
‘ॐ कृष्णाय विद्महे दामोदराय धीमहि तन्नः कृष्णः प्रचोदयात् ।’
* पुत्रप्रद चार कृष्ण-मन्त्र –
(१) पुत्रप्रद कृष्ण-मन्त्र (१) –
“ॐ नमो भगवते जगदात्मसूतये नमः ।” (जप-सं.-३ लाख; फल-पुत्र-प्राप्ति)
(२) पुत्रप्रद कृष्ण-मन्त्र (२) –
‘देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥’
(जप-सं.-१ लाख; फल-पुत्र-प्राप्ति)
प्रौढ़ावस्था में भी पुत्र न हो तो यज्ञोपवीत धारण करके श्रीकृष्ण या गणेश के मन्दिर में अथवा गोशाला या पीपल, गूलर या कदम्ब-वृक्ष के नीचे बैठकर कमल, कदम्ब या तुलसी की माला पर इस मन्त्र का प्रतिदिन पाँच हजार, ढाई हजार या एक सहस्र जप करे । इस प्रकार एक लाख जप पूरा हो जाने पर दशांश हवन, तर्पण, मार्जन कर ब्राह्मणों को खीर, मालपुआ, पूड़ी का भोजन कराये । ऐसा करने से श्रीकृष्ण की कृपा से पुत्र प्राप्त होता है ।
(३) पुत्रप्रद कृष्ण-मन्त्र (३) –
“ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ग्लौं
देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥’
(जप-सं.-३ लाख; फल-पुत्र-प्राप्ति)
(४) सनत्कुमारोक्त सन्तानगोपालमन्त्र –
‘ॐ देवकीसुत गोविन्द वासुदेव जगत्पते ।
देहि मे तनयं कृष्ण त्वामहं शरणं गतः ॥’
(जप-सं.-३ लाख; फल-पुत्र-प्राप्ति)

॥ राधाकृष्ण युगल मन्त्र ॥
[युगलस्वरूपकी प्राप्तिके लिये मन्त्र] * एकादशाक्षर मन्त्र –
‘ॐ क्लीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ।’ (जप-संख्या-१० लाख)
* त्रिविध त्रयोदशाक्षर मन्त्र –
(१) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा । (जप-संख्या-५ लाख)
(२) ॐ ह्रीं श्रीं क्लीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा । (जप-संख्या-५ लाख)
(३) ॐ क्लीं ह्रीं श्रीं गोपीजनवल्लभाय स्वाहा । (जप-संख्या-५ लाख)
* अष्टादशाक्षर मन्त्र-
(१) ‘क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा ।’
(२) ‘ॐ क्लीं कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजन-वल्लभाय स्वाहा ।’
(जप-संख्या-५ लाख)
(गोपालतापनी उपनिषद्)
* दशाक्षर मन्त्र-
“ॐ गोपीजनवल्लभाय नमः ।”
* पंचपदीय ‘मन्त्र-चिन्तामणि’ नामक दो युगल-मन्त्र –
(१) षोडशाक्षर मन्त्र –
‘गोपीजनवल्लभचरणान् शरणं प्रपद्ये।’
(२) दशाक्षर मन्त्र –
‘नमो गोपीजनवल्लभाभ्याम् ।’
जो मनुष्य श्रद्धा या अश्रद्धा से भी इस पंचपदीय का जप कर लेता है, उसे निश्चय ही श्रीकृष्ण के प्यारे भक्तों का सान्निध्य प्राप्त होता है । इस मन्त्र को सिद्ध करने के लिये न तो पुरश्चरण की अपेक्षा पड़ती है और न न्यास-विधान का क्रम ही अपेक्षित है । देश-काल का भी कोई नियम नहीं है । अरि और मित्र आदि के शोधन की भी आवश्यकता नहीं है । सभी मनुष्य इस मन्त्र के अधिकारी हैं । इस मन्त्र के ऋषि शिव हैं, बल्लवी-वल्लभ श्रीकृष्ण इसके देवता हैं तथा प्रियासहित भगवान् गोविन्द के दास्यभाव की प्राप्ति के लिये इसका विनियोग किया जाता है । यह मन्त्र एक बार के ही उच्चारण से कृतकृत्य कर देता है । (पद्मपुराण, पातालखण्ड)
* अष्टाक्षर मन्त्र –
(१) ‘क्ली राधाकृष्णाभ्यां नमः ।’
(२) ‘ॐ क्लीं राधाकृष्णाभ्यां नमः ।’

* बीजात्मक मन्त्र –
‘ॐ ह्रीं श्रीं ।’

॥ राधा-मन्त्र ॥
* षडक्षर राधामन्त्र –
‘श्रीं राधायै स्वाहा ।’
‘श्रीराधायै स्वाहा ।’

यह मन्त्र धर्म, अर्थ आदि को प्रकाशित करने वाला है ।
* सप्ताक्षर राधामन्त्र –
(१) ॐ ह्रीं राधिकायै नमः ।
(२) ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा ।
(३) ‘ॐ रां राधायै नमः ।’

* अष्टाक्षर राधामन्त्र –
(१) ॐ ह्रीं श्रीराधिकायै नमः । (जप-सं.-१६ लाख; फल-सर्वार्थ-सिद्धि)
(२) ॐ ह्रीं श्रीं राधिकायै नमः ।
(जप-सं.-१६ लाख; फल-सर्वार्थ-सिद्धि)
(३) ‘क्लीं ऐं राधिकायै क्लीं ऐं ।’
(जप-सं.-१६ लाख; फल-सर्वार्थ-सिद्धि)
(४) ‘रां ह्रीम क्लीं राधायै स्वाहा ।’

* दशाक्षर मन्त्र –
‘ॐ हूं हूं राधिकायै ॐ हूं हूं ।’
* द्वादशाक्षरी मन्त्र –
(१) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं रां रासेश्वर्यै स्वाहा ।
(२) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं रां राधिकायै स्वाहा ।
(३) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं रां रासेश्वरी स्वाहा ।

* षोडशाक्षरी मन्त्र –
(१) ‘क्लीं क्लीं ऐं ऐं ह्रीं ह्रीं राधिकायै क्लीं क्लीं ऐं ऐं ह्रीं ह्रीं ।’
(२) ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं रां रासेशवरी राधिकायै स्वाहा ।’

* विंशोक्षर मन्त्र –
ह्रीं श्रीं क्लीं क्लीं ऐं ऐं ह्रीं ह्रीं राधिकायै क्लीं क्लीं ऐं ऐं ह्रीं ह्रीं ह्रीं श्रीं ।’
* श्रीराधा वाञ्छाचिन्तामणि महामन्त्र-
(१) ‘ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा।
(२) ‘ॐ ह्रीं श्रीराधायै स्वाहा।’

(देवीभागवत ९।५०। ९-१२)
* श्रीराधा षडक्षरी महाविद्याका बीजमन्त्र-
‘रां ओं आं यं स्वाहा।’ (नारदपंचरात्र)
* प्रेमभक्तिप्रदायक राधामन्त्र-
‘ॐ प्रेमधनरूपिण्यै प्रेमप्रदायिन्यै श्रीराधायै स्वाहा ।’
* श्रीराधा-गायत्री-
(१) ॐ ह्रीं राधिकायै विद्महे गान्धर्विकायै धीमहि तन्नो राधा प्रचोदयात् ।
(२) वृषभानुजायै विद्महे कृष्णप्रियायै धीमही तन्नो राधिका प्रचोदयात् ।

 

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