August 19, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-26 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ छब्बीसवाँ अध्याय दक्ष को राज्य की प्राप्ति और उनकी वंश-परम्परा का वर्णन अथः षड्विंशोऽध्यायः परम्परावर्णनं विश्वामित्रजी बोले — [ हे राजा भीम !] एक दिन जब शुभ ग्रहों की युति थी, [उस समय] शुभ लग्न, शुभ दिन और शुभ फल प्रदान करने वाले योग में नगर में अनेक प्रकार के जनसमुदायों के एकत्रित होने पर राजा चन्द्रसेन की रानी सुलभा ने यह प्रार्थना करते हुए कि ‘ इस जनसमुदाय में से जिसे तुम्हारा अभिमत हो, उसे राजा बनाओ’ रत्नमयी माला उस गजराज की सूँड़ में थमा दी ॥ १ ॥ रानी की आज्ञा स्वीकारकर धातुओं से सम्यक् प्रकार से रंजित तथा ब्राह्मणों, बन्दीजनों एवं चारणगणों से प्रशंसित और अनेक प्रकार के वाद्यों का वादन करने वालों से घिरा हुआ वह गजेन्द्र राजभटों और राज्यार्थी पुरुषों के मध्य भ्रमण करने लगा। तदनन्तर सभा के चारों ओर उपस्थित सभी लोगों को सूँघता हुआ नगर से बाहर चला गया ॥ २ ॥ उस नगर की स्त्रियाँ अपने पुत्रों और पतियों को सुसज्जितकर अपने आगे करके खड़ी थीं, बहुत-से मनुष्य और श्रेणियों के प्रमुख लोग भी वहाँ उपस्थित थे — वे सभी उस गहन नाम वाले गजराज के नगर से बाहर चले जाने पर अनमने होकर अपने-अपने घर को चले गये ॥ ३ ॥ वह हाथी वहाँ गया, जहाँ कमलापुत्र दक्ष गजानन गणेशजी का सम्यक् रूप से पूजन कर रहा था। उसे देखते ही उसने वह माला [पृथ्वी पर] लोगों के और स्वर्ग में देवताओं के देखते-देखते पहना दी ॥ ४ ॥ हे राजन्! तब कौण्डिन्यनगर के निवासियों, [दिवंगत] राजा चन्द्रसेन और दोनों मन्त्रियों के अभिमत को जानकर लोगों ने दक्ष को अनेक वस्त्र, मालाएँ एवं आभूषण प्रदान किये ॥ ५ ॥ उस समय देवलोक में और पृथ्वी पर अनेक प्रकार के वाद्यसमूह बजने लगे। देववृन्द प्रसन्नतापूर्वक मांगलिक पुष्पों की वर्षा करने लगे ॥ ६ ॥ समाज में जिसका जैसा स्थान और क्रम था, लोग उस प्रकार बैठ गये और दोनों मन्त्रियोंसहित उन सबने राजा दक्ष को नमन किया ॥ ७ ॥ राजा दक्ष ने उपस्थित जनसमुदाय को वस्त्र और ताम्बूल प्रदान किया। तत्पश्चात् ब्राह्मणों का [उन्हें] अनेक प्रकार के दान दे करके अपनी माता का पूजनकर भी वस्त्रों और अलंकारों आदि से पूजन किया तथा उनसे भी विधिपूर्वक ब्राह्मणों को दान दिलवाया ॥ ८-९ ॥ उन्हें पालकी पर बैठाकर स्वयं राजा दक्ष हाथी पर आरूढ़ हुआ और ध्वजों-पताकाओं से समन्वित, अलंकृत एवं जल छिड़के हुए मार्ग से नगर को चला। उस समय राजा के दोनों मन्त्री घोड़े पर सवार होकर उसके आगे- आगे चल रहे थे। बन्दीजन और नगरवासी उसकी स्तुति कर रहे थे, अप्सराएँ उसके आगे नृत्य कर रही थीं, गानविद्या प्रवीण गन्धर्व दौड़ते हुए उसके आगे चल रहे थे। उस समय ‘जय’ शब्द, ‘नमः’ शब्द और वाद्यों की ध्वनि स्वर्गलोक तक पहुँच गयी ॥ १०–१२ ॥ राजद्वार पर पहुँचकर कुछ लोग उस (राजा दक्ष)- को प्रणामकर अपने घर चले गये, तदनन्तर उसके साथ इतने राजा उसकी सभा में प्रविष्ट हुए, जिनकी गणना नहीं हो सकती थी ॥ १३ ॥ उस महाबुद्धिमान् राजा दक्ष ने मुद्गलमुनि को लाने के लिये मन्त्री सुमन्तु के साथ छत्र, ध्वज, चामरसहित पालकी भेजी ॥ १४ ॥ मुद्गलमुनि को आते देखकर [राजा दक्ष ने] अपने आसन से उठकर और आगे बढ़कर मुकुटसहित उनके चरणों में सिर झुकाकर उन्हें प्रणाम किया और उन्हें अपने आसन पर बैठाया तथा उनकी आज्ञा से स्वयं दूसरे आसन पर बैठा एवं राजसमुदाय के साथ उन मुनि मुद्गल का पूजन किया ॥ १५-१६ ॥ महाबुद्धिमान् राजा दक्ष ने उन ब्राह्मण (मुद्गल मुनि) को गौ भी प्रदान की और उनसे कहा — हे महामुने! हे मुद्गल ! आज आपकी इस महान् महिमा का संसार को ज्ञान हो गया। मुझे शारीरिक सुन्दरता और राज्य की प्राप्ति आपकी ही कृपा से हुई है ॥ १७-१८ ॥ हे महामुने! कहाँ मेरे पूर्व शरीर की वह अवस्था और कहाँ यह राज्य ! हे मुनिश्रेष्ठ ! मैं तो आपको ही विघ्नविनायक गणेश जानता हूँ ॥ १९ ॥ हे ब्रह्मन्! आप मेरे मस्तक पर पुनः अपना करकमल रख दीजिये। हे मुने! जिससे मैं चिरकाल के लिये सम्पूर्ण कामनाओं का पात्र हो जाऊँ ॥ २० ॥ विश्वामित्रजी बोले — राजा दक्ष के इस प्रकार के वचन सुनकर मुद्गलमुनि ने उससे कहा कि तुम्हें कभी भी शत्रुओं से भय नहीं होगा। तुम जो-जो कामनाएँ करोगे, वे सब पूर्ण होंगी ॥ २१ ॥ तदनन्तर उस राजा दक्ष ने उन [ब्राह्मणश्रेष्ठ ] मुनि मुद्गल को अनेक ग्राम, वस्त्र, रत्न, धन आदि का तथा अन्य ब्राह्मणों को गोधन और वस्त्रों का दान किया। तब वे ब्राह्मण राजा को आशीर्वादों से अभिनन्दित कर अपने-अपने घर को चले गये ॥ २२-२३ ॥ उस (राजा)-ने दोनों मन्त्रियों तथा परिवारीजनों को भी अनेक ग्राम दिये। उस कुण्डिननगर में गणेशजी का एक छोटा और प्राचीन मन्दिर था, उसने उसके स्थान पर विशाल मन्दिर बनवाया । तदनन्तर सभा का विसर्जनकर उसने अपने राजभवन में प्रवेश किया ॥ २४-२५ ॥ जनसमुदाय में हो रही वार्ता को सुनकर [ उसके पिता राजा] वल्लभ भी वहाँ आये । राजा वीरसेन ने अपनी सौभाग्यकांक्षिणी कन्या का शुभ विवाह स्वप्न में प्राप्त गणेशजी के आदेशानुसार तीनों लोकों में विश्रुत कीर्ति वाले महान् राजा दक्ष के साथ कर दिया ॥ २६-२७ ॥ उससे राजा दक्ष को बृहद्भानु नाम से प्रसिद्ध पुत्र की प्राप्ति हुई । उसका पुत्र खड्गधर हुआ। उस खड्गधर का पुत्र सुलभ हुआ। उस सुलभ का पुत्र पद्माकर हुआ। उसका पुत्र दीप्तवपु हुआ। उस दीप्तवपु का पुत्र चित्रसेन हुआ और उस चित्रसेन के पुत्र तुम हो ॥ २८-२९ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] तब विश्वामित्रजी के मुख से अपनी वंश-परम्परा सुनकर उस नरश्रेष्ठ राजा भीम ने उन द्विजश्रेष्ठ मुनि को प्रार्थनापूर्वक सन्तुष्ट कर पूछा ॥ ३०१/२ ॥ राजा भीम ने कहा — हे महामुने ! विघ्नविनायक गणेशजी मुझ पर कब प्रसन्न होंगे ? कब मैं उन देवाधिदेव गणेशजी का दर्शनकर कृतकृत्य होऊँगा? हे विभो! उस उपाय को बताइये, जिससे वे मुझपर अनुग्रह करें ॥ ३१-३२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘परम्पराका वर्णन’ नामक छब्बीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २६ ॥ Content is available only for registered users. 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