श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-27
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सत्ताईसवाँ अध्याय
राजा भीम की गणेशोपासना और गणेशजी की कृपा से उसे रुक्मांगद नामक पुत्र की प्राप्ति
अथः सप्तविंशोऽध्यायः
रूक्माङ्गदाभिषेक वर्णनं

व्यासजी बोले — हे पितामह! बुद्धिमान् और कृपावान् विश्वामित्रमुनि ने [राजा] भीम को [गणेशजी के दर्शन का] कौन-सा उपाय बतलाया था, उसे आप मुझसे कहें। जैसे अमृत का पान करने से मृत्यु का भय दूर हो जाता है, वैसे ही इस कथारूपी अमृत का पान करके मेरे मन से मोह का समूह निकल गया है ॥ १-२ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे पराशरपुत्र मुनिश्रेष्ठ व्यास ! उन्होंने राजा भीम से जो उपाय कहा था, उसे तुम श्रवण करो। मुनि (विश्वामित्र) – ने भीम के प्रति एकाक्षर मन्त्र का कथन किया था, मैं उसे तुमसे कहता हूँ, सुनो। धर्म के सुन्दर स्वरूप के ज्ञाता और प्रसन्न मन वाले विश्वामित्र ने उससे कहा — ॥ ३-४ ॥

विश्वामित्रजी बोले — [ हे राजा भीम !] तुम इस [एकाक्षर महामन्त्र]-से सर्वव्यापक भगवान् गणनायक गणेशजी का आराधन करो। तुम दक्ष द्वारा बनवाये गये देवालय में इस मन्त्र का अनुष्ठान करो। भगवान् विघ्नविनायक गणेशजी तुम्हारे ऊपर प्रसन्न होकर तुम्हारी सभी कामनाओं को पूर्ण करेंगे। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष तथा अन्य अपेक्षाओं को भी प्रदान करेंगे। हे भीम! अथवा तुम अपने नगर को जाओ, किसी भी प्रकार की चिन्ता न करो ॥ ५–६१/२ ॥

ब्रह्माजी बोले — उन विश्वामित्र द्वारा ऐसा कहे जाने पर वे राजा भीम उन्हें प्रणाम करके अपनी पत्नी के साथ लौट आये और अपने नगर को देखकर अत्यन्त प्रसन्न हुए। उनके दोनों मन्त्री सेना तथा नगरवासियों के साथ उनका स्वागत करने के लिये आये ॥ ७-८ ॥ [उस समय] वहाँ आये हुए उन नागरिकों में से कुछ ने उनका आलिंगन किया, कुछ ने उन्हें दूर से और कुछ ने निकट जाकर उन्हें नमस्कार किया । तब सबके साथ राजा ने ध्वजा-पताकाओं से अलंकृत नगर में प्रवेश किया ॥ ९ ॥

[उस समय उस] राजमार्ग पर जल का छिड़काव हुआ था और वह सुगन्धिद्रव्यों से सुगन्धित तथा अनेक प्रकार के वाद्यों की ध्वनि से अनुनादित था । लोग आपस में कह रहे थे कि ‘यह पुरी आज वैसे ही सुशोभित हो रही है, जैसे कोई नारी पति को प्राप्त करके शोभित होती है अथवा जैसे कोई अन्धा व्यक्ति सुन्दर नेत्र प्राप्त करके शोभित होता है’ इस प्रकार के वचन सुनते हुए पालकी में बैठे, सुन्दर वस्त्राभूषणों से अलंकृत तथा लोगों द्वारा जिनकी स्तुति हो रही थी ऐसे राजा भीम और उनकी चारुहासिनी रानी दोनों ने प्रसन्न मन से अनेक प्रकार की समृद्धियों से परिपूर्ण और रमणीय नगर में प्रवेश किया ॥ १०-१२ ॥

तदनन्तर उन दोनों (राजा और रानी ) – ने सभी लोगों को वस्त्र, आभूषण, मोती और पान देकर विदा किया और उन सबके चले जाने पर वे दोनों अपने भवन में गये ॥ १३ ॥ तदनन्तर शुभ दिन में राजा भीम राजा दक्ष द्वारा बनवाये गये [गणेशजी के ] मन्दिर में गये, जिसे पूर्वकाल में बुद्धिमान् राजा दक्ष ने कौण्डिन्यपुर में बनवाया था ॥ १४ ॥ वहाँ राजा भीम विघ्नविनायक भगवान् गणेश का नित्य अर्चन करने लगे। वे उपवास करते हुए उनके मन्त्र का नित्य जप किया करते थे ॥ १५ ॥ वे राजा भीम अनन्य भक्तिपूर्वक भोजन, शयन, यात्रा, वार्ता और साँस लेने में भी उन गणेशजी का ही नित्य मानसिक चिन्तन करते रहते थे ॥ १६ ॥ वे नरेश जल, स्थल, आकाश, मार्ग, स्वर्ग, देवताओं, मनुष्यों, वृक्षों, भक्ष्य और पेय पदार्थों में भी श्रेष्ठातिश्रेष्ठ गणेशजी का ही दर्शन करते थे ॥ १७ ॥ वे जिस-जिसको देखते, उसे प्रणाम करते और दृढ़तापूर्वक आलिंगन करते । नगर में सभी लोग उन्हें पिशाच ( विक्षिप्त ) मानने लगे ॥ १८ ॥

तदनन्तर विनायक गणेशजी ने उनके पास जाकर और राजा भीम का हाथ पकड़कर उनसे कहा हे राजन् ! तुम [ जीवन् ]-मुक्त हो, तुम क्या चाहते हो, उसे बताओ ? ॥ १९ ॥

राजा ने उनसे कहा — [हे प्रभो ! ] मैं आपके चरणकमलों के अतिरिक्त कुछ नहीं जानता । तब विनायक गणेशजी ने कहा — मेरी कृपा से तुम्हें सुन्दर, गुणवान् और स्वर्णसदृश शरीर वाले पुत्र की प्राप्ति होगी। तुम अपने घर जाओ और देवताओं तथा ब्राह्मणों की पूजा में लगे रहो ॥ २०-२१ ॥

तत्पश्चात् राजा ने राजमहल में जाकर जैसा गणेशजी ने कहा था, वैसा ही किया। ‘गणेशजी प्रसन्न हों’ – इस भावना से उन्होंने सम्पूर्ण मनोयोग से देवताओं और ब्राह्मणों का पूजन एवं तर्पण किया, इससे अल्पकाल में ही उन्हें शुभ लक्षणों से सम्पन्न पुत्र की प्राप्ति हुई ॥ २२-२३ ॥ पुत्रजन्म के अवसर पर राजा भीम ने अनेक प्रकार के दान दिये और श्रेष्ठ ब्राह्मणों के कथनानुसार उसका ‘ रुक्मांगद’ – यह नामकरण किया ॥ २४ ॥ वह बालक (रुक्मांगद) शुक्ल पक्ष के चन्द्रमा की भाँति नित्य वर्धमान हुआ। राजा भीम ने शिक्षाप्राप्ति के लिये उसे गुरु को समर्पित कर दिया ॥ २५ ॥ सर्वविद्यानिधान गुरु कपिल ने उसे जो भी विद्या प्रदान की, उसने उसे श्रवणमात्र से ग्रहण कर लिया ॥ २६ ॥

इस प्रकार वह [रुक्मांगद] भी दूसरे गणेशजी की ही भाँति विद्यानिधि हो गया। वह रुक्मांगद बलवान् और सभी शास्त्रों का ज्ञाता था ॥ २७ ॥ गुणों की राशि उस राजकुमार रुक्मांगद का राजा भीम ने पट्टाभिषेक किया और [उस अवसर पर] श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दासियाँ, रत्न और धन प्रदान किये ॥ २८ ॥ उस रुक्मांगद ने अपने पिता भीम से भी बढ़कर विघ्नविनायक गणेशजी की महान् भक्ति की । वह अपने पिता द्वारा प्राप्त [गणेशजी के] एकाक्षर मन्त्र का नित्य जप करता था ॥ २९ ॥

एक दिन युवराज रुक्मांगद ने वन में प्रवेश किया और आखेट के व्याज से विचरण करते हुए उसने अनेक गवयों (हिरन जाति का जंगली पशु) और मृगों का वध किया ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् अत्यन्त थकित होने पर उसने किसी मुनि का आश्रम देखा; जो वृक्षों, लताजालों और वैरत्याग किये हुए पशुओं से समन्वित था ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपांसनाखण्ड में ‘रुक्मांगद के अभिषेक का वर्णन’ नामक सत्ताईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २७ ॥

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