श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-28
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अट्ठाईसवाँ अध्याय
रुक्मांगद का कुष्ठरोग से ग्रस्त होना
अथः अष्टाविंशतितमोऽध्यायः

प्रायोपवेशनं प्रायोपवेशन (प्रायोपवेशन)।—संज्ञा। भोजन का पूर्णतः त्याग करना और ध्यान की स्थिर मुद्रा में मृत्यु की प्रतीक्षा करना। प्रायश्चित या धार्मिक पुण्य प्राप्ति हेतु किया जाने वाला कार्य।

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] तत्पश्चात् रुक्मांगद ने [वहाँ उस आश्रम में] मंगलमय ऋषि वाचक्नव और स्नेहयुक्त मधुरवाणी बोलने वाली उनकी पत्नी मुकुन्दा का दर्शन किया ॥ १ ॥ अत्यन्त थकित राजा रुक्मांगद ने उन दोनों को नमस्कार किया और उन मुनि के स्नान हेतु चले जाने पर उन नृपश्रेष्ठ ने याचना की कि हे माता मुकुन्दा ! मुझे उत्तम और शीतल जल दो, बिना जल के मेरे प्राण यमलोक को चले जायँगे ॥ २-३ ॥

तब [रुक्मांगद में अनुरक्त] उस मुकुन्दा ने इस वचन को सुनकर कहा — कामदेव से भी अधिक सुन्दर तुम्हारे सदृश कोई पुरुष मैंने देवताओं, नागों, यक्षों, गन्धर्वों और मनुष्यों में भी नहीं देखा । तुम सर्वांगसुन्दर हो, अतः मेरा हृदय तुम्हारे अधरामृत का पान करने के लिये तुम पर अत्यन्त आसक्त हो गया है, अतः उसे मुझे प्रदान करो ॥ ४–५१/२

[ नारद] मुनि बोले — [ हे राजा ! ] थके हुए राजा रुक्मांगद उसके कुत्सित प्रस्ताव को सुनकर अत्यन्त दुखी हो उठे ॥ ६ ॥

उन्होंने तिलोत्तमा से भी उत्तम रूप-सौन्दर्यवाली उस मुकुन्दा से जितेन्द्रियतापूर्वक कहा — पति के रहते हुए भी इस प्रकारकी निर्लज्जतापूर्ण बात को तुम छोड़ दो, मेरा मन परस्त्रीगमन-जैसे निन्दित कर्म में नहीं लगता ॥ ७ ॥ विघ्नविनायक भगवान् गणेशजी की भक्ति के प्रभाव से मेरा मन इस प्रकार के गर्हित कार्यों में कभी नहीं लग सकता । तुझ अत्यन्त दुष्टा द्वारा दिये गये जल का पान |करने की भी मेरी इच्छा नहीं है । ‘अरे अमंगलकारिणि ! यह ऋषि का आश्रम है’ — इसलिये मैं यहाँ चला आया, परंतु अब मैं यहाँ से चला जाऊँगा’। तब जाने के लिये उद्यत रुक्मांगद का हाथ पकड़कर कामातुरा मुकुन्दा ने |कहा — ॥ ८-९ ॥

मुकुन्दा बोली — जो दूसरे की स्त्री को बलपूर्वक चरित्रभष्ट करने की इच्छा करता है, वह ही नरक में जाता है; न कि स्वयं आने वाली के साथ रमण करने वाला ॥ १० ॥ सत्ययुग और त्रेतायुग में ब्रह्माजी ने स्त्रियों को स्वतन्त्रता प्रदान की थी । यदि तुम मेरे कहने के अनुसार नहीं करोगे तो भस्म हो जाओगे अथवा मैं तुम्हें राज्य से भ्रष्टकर जंगल-जंगल भटकने वाला बना दूँगी ॥ १११/२

मुनि बोले — ऐसा कहकर उस कामपीड़िता मुकुन्दा ने दौड़कर राजा रुक्मांगद का दृढ़तापूर्वक आलिंगन कर लिया और हठपूर्वक उनके मुख का चुम्बन किया। तब रुक्मांगद ने उसे बलपूर्वक दूर फेंक दिया ॥ १२-१३ ॥ [उस समय] वह पृथ्वी पर गिरकर उसी प्रकार मूर्च्छित हो गयी, जिस प्रकार आँधी से केले का पेड़ गिर जाता है। तदनन्तर जब वह उठी तो परस्त्री के प्रति विरक्त बुद्धिवाले राजा रुक्मांगद ने उससे कहा — हे महाभाग्यवती मुनिपत्नी ! अरे अविवेकिनि ! जिसका मन परपुरुष में लग जाता है, वह निश्चय ही नरक का भोग करने वाली होती है । भले ही समुद्र सूख जाय, पर मेरा मन कभी भी विचलित नहीं हो सकता ॥ १४-१५१/२

रुक्मांगद से इस प्रकार निरादृत होने पर मुकुन्दा ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दे दिया कि जैसे मैंने कष्ट प्राप्त किया, वैसे तुम भी कुष्ठग्रस्त होकर कष्ट प्राप्त करो; क्योंकि तुम्हारा वज्र से भी कठोर हृदय द्रवित नहीं हुआ ॥ १६-१७ ॥

तब इस प्रकार बोलती हुई उस मुकुन्दा की राजा रुक्मांगद ने बार-बार भर्त्सना की और अत्यन्त दुखित होकर वे उस आश्रम से शीघ्रतापूर्वक निकल गये ॥ १८ ॥ तदनन्तर उन्होंने अपने शरीर को देखा तो वह कुष्ठरोग से युक्त, कान्तिहीन, अत्यन्त कुत्सित और बगुले के शरीर की भाँति श्वेत हो गया था ॥ १९ ॥

तब चिन्तारूपी समुद्र में मग्न राजा रुक्मांगद ने गजानन गणेशजी से कहा—  [ हे देव !] मैंने आपका क्या अपराध किया है? मैं यहाँ कैसे आ ही गया ? मेरी उस दुष्टा मुनिपत्नी मुकुन्दा से भेंट ही क्यों हुई ? हे सिद्धिपते ! निश्चय ही आपने दुष्टों को बहुत बढ़ा दिया है ॥ २०-२१ ॥ आप सज्जनों की रक्षा के लिये अवतार लेते हैं, परंतु आपने इस अपने रूप पर गर्व करने वाली, कुलटा और दुष्ट स्त्री का नाश नहीं किया ॥ २२ ॥ स्वर्ण की कान्ति से स्पर्धा करने वाला मेरा वह सुन्दर शरीर मेरे किस दुष्कर्म से अथवा कैसे इस अवस्था को प्राप्त हो गया ? ॥ २३ ॥ हे नाथ! हे गजानन ! पूर्वकाल में जैसे मैं आपकी भक्ति करता था, वैसे ही मैं अब भी यथाविधि करता रहूँगा, मैं आपको छोड़कर दूसरे किसी की शरण में नहीं जाऊँगा। मैं अपने मुख या इस शरीर को प्रजाजनों को नहीं दिखलाऊँगा, प्रायोपवेशन (अनशन) करके इस शरीर को सुखा डालूँगा ॥ २४-२५ ॥

इस प्रकार का निश्चय करके वे राजा रुक्मांगद बरगद के वृक्ष के नीचे जाकर बैठ गये। उधर उनके सेवकगण इधर- उधर दौड़ते रहे, पर राजा को देख नहीं पाये ॥ २६ ॥ रात्रि हो जाने पर वे लोग अपने-अपने घर को चले गये। [उस समय] राजा और उसके सेवकों की स्थिति चकवा और चकवी – जैसी हो गयी थी ॥ २७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘प्रायोपवेशन’ नामक अट्ठाईसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २८ ॥

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