August 19, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-29 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ उनतीसवाँ अध्याय देवर्षि नारद का राजा रुक्मांगद को कुष्ठ से मुक्ति हेतु गणेशकुण्ड में स्नान की सलाह देना अथः एकोनत्रिंशोऽध्यायः नारदागमनं [ भृगु ] मुनि बोले — [ हे राजा सोमकान्त !] उस वटवृक्ष के नीचे [प्रायोपवेशन के उद्देश्य से] बैठे हुए राजा रुक्मांगद ने किसी दिन मुनिश्रेष्ठ देवर्षि नारद को दूर से [आते] देखा ॥ १ ॥ उन्होंने उन्हें नमस्कार कर क्षणभर विश्राम करने की प्रार्थना की। तब वे करुणानिधान नारदजी आकाशमार्ग से नीचे उतर आये ॥ २ ॥ तब [राजा ने] यथाशक्ति पूजन कर उन मुनि से आदरपूर्वक पूछा — [हे मुनिश्रेष्ठ!] मैं राजा भीम का महाबली पुत्र रुक्मांगद हूँ। आखेट के लिये विचरण करते हुए मैं वाचक्नवि मुनि के आश्रम में जा पहुँचा । हे निष्पाप ! तृषित होने के कारण मैंने वहाँ जल के लिये याचना की ॥ ३-४ ॥ उनकी पत्नी (मुकुन्दा) अत्यन्त भ्रष्ट आचरण वाली थी। उस कामपीड़िता ने मेरा चुम्बन किया । वह कामप्रभाव से आक्रान्त थी, इसलिये मुनि के स्नानार्थ चले जाने पर उसने मन में दुष्ट भाव रखते हुए कहा कि ‘मुझे स्वीकार करो।’ भगवान् की कृपा से जितेन्द्रिय रहते हुए मैंने उसे तिरस्कृत कर दिया ॥ ५-६ ॥ इससे अत्यन्त दुखी हुई उस निष्ठुर चित्तवाली ने मुझे शाप दे दिया कि ‘हे महादुष्ट ! क्योंकि तुम मुझ सकामा का त्याग कर रहे हो, इसलिये कुष्ठी हो जाओ’ ॥ ७ ॥ उसके इस प्रकार के दुर्वचन को सुनकर मैं उस आश्रम से बाहर निकल गया । तदनन्तर मैं श्वेत कुष्ठ से ग्रस्त हो गया । हे मुने! मेरे उद्धार का उपाय बताइये ॥ ८ ॥ मेरे वियोग से [मेरे पिता] राजा भीम भी दुःखरूपी समुद्र में डूबे होंगे ॥ ८१/२ ॥ उन ( रुक्मांगद) – के इस प्रकार के वचन सुनकर सम्पूर्ण विश्व की जानकारी रखने वाले नारदजी ने करुणायुक्त होकर कुष्ठ के नाश के लिये उपाय बतलाया ॥ ९१/२ ॥ नारदजी बोले — मार्ग में आते हुए मैंने एक उत्तम आश्चर्यमयी घटना देखी, [जो इस प्रकार है – ]॥ १० ॥ विदर्भ देश में कदम्बपुर नाम से विख्यात एक नगर है, वहाँ के एक मन्दिर में मैंने भगवान् विनायक की मंगलमयी मूर्ति देखी है ॥ ११ ॥ चिन्तामणि नाम से विख्यात वह मूर्ति सभी की सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाली है। उसके सम्मुख गणेशजी के नाम पर एक महान् कुण्ड है ॥ १२ ॥ हे राजन्! वृद्धावस्था के कारण जर्जर शरीर वाला कोई महाकुष्ठी शूद्र तीर्थयात्रा के प्रसंग से कदम्बपुर आया, जहाँ सत्पुरुषों के द्वारा प्रतिष्ठापित एक परम रमणीय गणपतिक्षेत्र है। [ वहाँ स्थित ] गणेशकुण्ड में स्नान करके उसने दिव्य देह प्राप्त कर ली और विनायक (गणेशजी ) – के स्वरूपवाले गणों के द्वारा लाये गये श्रेष्ठ विमान में आरूढ़ होकर [गणेशजी के] उस उत्तम धाम को चला गया, जहाँ जाकर न कोई दुखी होता है, न पुनः उसका पतन होता है ॥ १३–१५ ॥ हे राजेन्द्र ! यह सब मैंने देखा है, अतः सम्प्रति तुम वहाँ जाकर स्नान करो। स्नान करके अभिलषित पदार्थों को प्रदान करने वाले प्रभु का सम्यक् रूप से अर्चनकर विप्रों को दान दो। इससे तुम शीघ्र ही पवित्र हो जाओगे और जैसे सर्प जीर्ण त्वचा का त्यागकर सुन्दर रूपवाला हो जाता है, वैसे ही तुम भी सुन्दर रूपवान् हो जाओगे ॥ १६-१७ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] नारद द्वारा कहे गये इस प्रकार के वचनों को सुनकर वे नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद [कुछ समय के लिये मानो] आनन्दसागर में निमग्न हो गये और कुछ भी नहीं बोले ॥ १८-१९ ॥ [तत्पश्चात्] रुक्मांगद बोले — हे निष्पाप मुने! पूर्वकाल में उस क्षेत्र में किसने मंगलमयी सिद्धि प्राप्त की थी और मणियों एवं रत्नों से निर्मित उस मंगलमयी वैनायकी मूर्तिकी स्थापना किसने की थी ? हे मुने ! इस विषय में जानने के लिये मेरे मन में बहुत कौतूहल है ॥ २०–२१ ॥ आप-जैसे सत्पुरुषों की बुद्धि तो दूसरों का उपकार करने में ही लगी रहती है, अन्यथा विभिन्न लोकों में आपके भ्रमण करते रहने का कोई कारण नहीं दीखता ॥ २२ ॥ हे द्विज ! बादल सम्पूर्ण लोकों में वर्षा करते हैं, शेषजी पृथ्वी को धारण करते हैं, सूर्य भी [लोगोंका ] उपकार करने के लिये ही दिन-रात भ्रमण करते रहते हैं ॥ २३ ॥ आप समस्त प्राणियों के प्रति समभाव रखते हैं। मैं मूढ़ आप सर्वज्ञ के समक्ष क्या बोल सकता हूँ? हे दयानिधे! हे देवर्षे! फिर भी अपने संशय की निवृत्ति के लिये मैं आपसे पूछता हूँ ॥ २०-२४१/२ ॥ नारदजी बोले — लोकों पर अनुग्रह करने वाले हे राजन्! आपने उचित प्रश्न किया है, मैं तुम्हारे [विनययुक्त ] वचनों से सन्तुष्ट हूँ, अतः सब कुछ बतलाता हूँ ॥ २५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘नारदागमन’ नामक उनतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ २९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe