August 19, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-30 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ तीसवाँ अध्याय इन्द्र का अहल्या के साथ छल करना अथः त्रिंशतितमोऽध्यायः अहल्याधर्षणं नारदजी बोले — [हे राजन्!] किसी समय मैं इन्द्र से मिलने अमरावती गया हुआ था। उन्होंने मेरा विधिपूर्वक सम्यक् प्रकार से पूजनकर और अत्यन्त विनम्र होकर कहा — ॥ १ ॥ इन्द्र बोले — हे मुने! आप सम्पूर्ण लोकों में भ्रमण करते रहते हैं, सब कुछ आपको ज्ञात भी है, अतः मेरे सन्तोष के लिये कोई आश्चर्यजनक बात बतलाइये ॥ २ ॥ नारदजी बोले — मृत्युलोक में मैंने गौतममुनि का महान् आश्रम देखा; जो अनेक वृक्षों, लता-जालों और विभिन्न प्रकार के पक्षियों के समूहों से युक्त था ॥ ३ ॥ वहाँ मैंने अहल्यासहित गौतममुनि का दर्शन किया, उस अहल्या का रूप देखकर मैं विह्वल हो गया, जिसके रूप के सामने सावित्री, शची (इन्द्रपत्नी), लक्ष्मी, गिरिराजनन्दिनी पार्वती, मेनका, रम्भा, उर्वशी और तिलोत्तमा भी लज्जित हो जाती; उसने अनसूया और अरुन्धती को भी ईर्ष्यालु बना दिया है। सूर्यपत्नी छाया और संज्ञा तथा कश्यप की पत्नी अदिति एवं नागपत्नियों में भी कोई उसकी तुलना करने वाली नहीं है। [तब से] मुझे न गान रुचिकर लग रहा है, न पूजन करना और न भोजन ही । न मुझे अपना ब्रह्मचारी रहना अच्छा लग रहा है और न मैं कभी नींद ही ले पा रहा हूँ, इसीलिये मैं शीघ्रतापूर्वक तुम्हारी इस सुन्दर अमरावतीपुरी को देखने चला आया। लेकिन इसे देखकर मुझे ऐसा लगता है कि उस देवी अहल्या के बिना यह तुच्छ है ॥ ४–८१/२ ॥ नारदजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ ! इन्द्रसे ऐसा कहकर मैं अन्तर्धान हो गया ॥ ९ ॥ मुनिश्रेष्ठ भगवान् नारद के अन्तर्धान हो जाने पर [ मन-ही-मन उनकी बात का स्मरण करते हुए ] जम्भ दैत्य का भेदन करने वाले इन्द्र स्वयं मीनकेतु कामदेव [-के बाणों]-से बिँधकर मूर्च्छा को प्राप्त हो गये ॥ १० ॥ ‘मैं गौतममुनि की भार्या अहल्या को कब देखूँगा, कब उसे प्राप्तकर इस कामाग्नि से मुक्त ‘होऊँगा’ — ऐसा वे चिन्तन करने लगे ॥ ११ ॥ उसके बिना मैं अपना जीवन नहीं देखता – ऐसा संकल्प कर जम्भासुर का वध करने वाले इन्द्र ने गौतम का रूप धारण कर लिया ॥ १२ ॥ मार्ग में इस प्रकार चिन्तन करते हुए वे इन्द्र मुनि के आश्रम पर आये और गौतम के स्नानार्थ चले जाने पर उन्होंने अहल्या को देखा ॥ १३ ॥ तब उन्होंने कुटी के अन्दर प्रवेशकर [अहल्या से ] कहा — ‘हे प्रिये ! सुन्दर शय्या तैयार करो।’ तब उसने कहा कि आप जप छोड़कर घर कैसे आ गये ? आप दिन में संग की इच्छा क्यों कर रहे हैं, जो कि अत्यन्त निन्दित है ? ॥ १४१/२ ॥ गौतम [-रूपधारी इन्द्र ] बोले — जब मैं स्नान के लिये गया हुआ था, उसी समय एक श्रेष्ठ अप्सरा वहाँ स्नान के लिये आयी, वह मेरी आँखों के सामने ही नग्न हो गयी । वह अत्यन्त सुन्दर अंगों वाली थी । उसकी देहयष्टि अत्यन्त सुन्दर थी ॥ १५-१६ ॥ हे देवि! मेरा मन कामपीड़ित होने के कारण जप में नहीं लगा, इसलिये मैं आश्रम वापस आ गया । हे प्रिये ! इस समय तुम मुझे रतिदान दो, नहीं तो तुम मुझे इस कामरूपी अग्नि में जलकर मरा हुआ देखोगी अथवा मैं तुम्हें शाप देकर संन्यासी हो जाऊँगा या [संग के प्रति ] अपने मन का अत्यन्त निग्रह ही कर लूँगा ॥ १७-१८ ॥ अहल्या बोली — हे ब्रह्मर्षे ! आप वेदाध्ययन और देवपूजा का त्यागकर संग के लिये क्यों प्रार्थना कर रहे हैं ? यह आपके लिये उचित नहीं है, तथापि मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगी; क्योंकि पति की सेवा करने के अतिरिक्त स्त्री का कोई अन्य धर्म नहीं है ॥ १९१/२ ॥ नारद बोले — स्वर, आकृति और स्वभाव से अहल्या ने इन्द्र को अपना पति (गौतम) ही समझा था । तब वज्र धारण करने वाले इन्द्र अहल्या के साथ शय्या पर गये। उन्होंने बिना किसी प्रकार की शंका के अहल्या के साथ नानाविध शृंगार चेष्टाएँ कीं ॥ २०-२१ ॥ इस प्रकार जम्भासुरहन्ता इन्द्र ने [ यद्यपि ] गौतम के रूप में उसके साथ क्रीडा की, फिर भी दिव्य गन्धों का आघ्राण कर वह आश्चर्यचकित और अत्यन्त शंकित हो गयी। वह मन में तर्क-वितर्क करने लगी कि यह कपटरूपधारी कौन है ? क्या चन्द्रमा की ही भाँति मुझे भी बहुत बड़ा कलंक तो नहीं लग गया ? ॥ २२-२३ ॥ इस दुष्ट के संगम से कहीं मेरे दोनों कुल तो नष्ट नहीं हो गये ? मैं संसार में यह कलंक से काला मुख कैसे दिखलाऊँगी ? ॥ २४ ॥ मेरे प्रिय पति [गौतम] मुनि मेरी क्या गति करेंगे ? तब उसने क्रोधपूर्वक उस दुष्ट [कपटरूपधारी इन्द्र ]-से प्रश्न किय — ‘रे कपटरूपधारी! तूने मेरे पति का रूप धारण कर मुझे विश्वास में लिया ! बता तू कौन है ? अन्यथा मैं तुझे शाप दे दूँगी’ ऐसा कहे जाने पर शाप से डरकर इन्द्र अपना वास्तविक रूप प्रकट कर दिया ॥ २५-२६ ॥ वे दिव्य आभूषणों से अलंकृत तथा मुकुट और बाजूबन्द धारण किये हुए थे। कुण्डलों की अद्भुत दीप्ति से उनका मुखकमल सुशोभित हो रहा था ॥ २७ ॥ तदनन्तर इन्द्र ने उस (अहल्या ) — से कहा कि तुम मुझे शचीपति इन्द्र जानो, तुम्हारे रूप-सौन्दर्य के दर्शन से मैं व्याकुल हो गया था ॥ २८ ॥ मुझे कहीं शान्ति नहीं प्राप्त हो रही थी, इसीलिये मेरे द्वारा ऐसा किया गया। अतः तुम भी मुझ त्रैलोक्य के ईश्वर को आदरपूर्वक स्वीकार कर लो ॥ २९ ॥ उस (इन्द्र)-के इस प्रकारके वचन सुनकर वह मुनिपत्नी अहल्या क्रोधित हो उठी और मुख से मानो ज्वालाका वमन करती हुई-सी देवराज इन्द्र से बोली — रे शतक्रतु (सौ यज्ञों का कर्ता ) ! रे मन्द [ – बुद्धि ] ! मूढ़ ! मेरे पति के आने पर तेरे इस शरीर की क्या दशा होगी, यह मैं नहीं जानती ॥ ३०-३१ ॥ अरे दुष्ट! तुझ पापी ने मेरा पातिव्रत भंग कर दिया, अब मैं [मुनिश्रेष्ठ ] गौतम की वाणी से निकले शाप से किस अवस्था को प्राप्त होऊँगी ? ॥ ३२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘अहल्याधर्षण’ नामक तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३० ॥ Content is available only for registered users. 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