August 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-31 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इकतीसवाँ अध्याय गौतममुनि द्वारा अहल्या और इन्द्र को शाप अथः एकत्रिंशतितमोऽध्यायः शक्रशापवर्णनं रुक्मांगद बोले — हे महामुने ! गौतम [मुनि ] -के आने पर क्या घटना घटित हुई, उसे आप सम्पूर्ण रूप से मुझे बताइये; इस विषय में जानने की मेरे मन में महान् इच्छा है ॥ १ ॥ नारदजी बोले — [ हे राजा रुक्मांगद !] नित्यकर्म समाप्त करके गौतमजी अपने आश्रम में गये। उन्होंने अपनी पत्नी अहल्या को आवाज देकर कहा कि मुझे पादोदक (चरणों के प्रक्षालनार्थ जल) दो ॥ २ ॥ पूर्वकी भाँति आज तुम मेरे सम्मुख क्यों नहीं आयी ? आसन भी नहीं लायी और मधुर वाणी में वार्तालाप भी क्यों नहीं कर रही हो ? ॥ ३ ॥ उनके इस प्रकार के वचन सुनकर एक मुहूर्त के बाद वह बाहर निकली। उस समय वह अपना मुख नीचे की ओर किये हुए थी और लता की भाँति काँप रही थी ॥ ४ ॥ भूमि पर साष्टांग गिरकर उसने अपना मस्तक उन मुनि के चरणों में रख दिया और शाप के भय से व्याकुल होकर वह धीरे-धीरे मुनि से बोली —- ॥ ५ ॥ आप जब उषाकाल में स्नान के लिये और नित्यकर्म की विधि का सम्पादन करने के लिये गये थे, तब आपका रूप धारण करके देवताओं का राजा दुष्ट इन्द्र मुझसे [आकर ] बोला — मैंने एक सुन्दरी स्त्री देखी, जो श्रेष्ठ अप्सराओं से भी अधिक सुन्दर है; जिससे मेरा मन जप, नित्यकर्म और देवपूजन में स्थिर नहीं हो रहा है ॥ ६-७ ॥ हे शोभने ! इसलिये मैं वापस लौट आया हूँ । तुम मुझे रतिदान दो । तब ‘ऐसा प्रस्ताव करने वाले आप ही हैं’ — इस भ्रान्ति से मैंने जैसा उसने कहा था, वैसा ही किया ॥ ८ ॥ तत्पश्चात् दिव्य गन्ध का आघ्राणकर मुझे शंका हुई तो [मैंने उससे कहा —] रे दुष्टात्मा ! तू कौन है ? बता, नहीं तो भस्म हो जायगा ॥ ९ ॥ तब शाप के भय से वह बल दैत्य का वध करने वाला इन्द्र प्रकट हुआ । हे मुनिश्रेष्ठ ! ठीक उसी समय मैंने आपका वचन सुना ॥ १० ॥ परंतु लज्जा के कारण मैं शीघ्र आ न सकी, मेरे अपराध को क्षमा करें; क्योंकि अपने अपराध का स्वयं निवेदन करने में दोष नहीं होता, दूसरे के द्वारा निवेदन किये जाने पर ही दोष होता है ॥ ११ ॥ मन्त्र, आयु, घर-परिवार के सदस्यों के दोष, धन- सम्पत्ति, रतिक्रिया, औषधि, मान-अपमान और दान का प्रकटीकरण नहीं करना चाहिये ॥ १२ ॥ यह सुनकर वे मुनि कोप से व्याकुल इन्द्रियों वाले हो गये। उन्होंने अपनी पत्नी को शाप दिया — दुष्ट आचरणवाली ! तुम शिला हो जाओ ॥ १३ ॥ अतिकामुके! क्योंकि तुम्हारा मन परपुरुष में निमग्न था, इसलिये तुझे मेरी चेष्टाओं, मेरे स्वरूप और मेरे स्वभाव तथा उसके स्वरूप, स्वभाव एवं उसकी चेष्टाओं में अन्तर नहीं ज्ञात हुआ । जब राजा दशरथ के पुत्र श्रीराम वन- वन में भ्रमण करते हुए यहाँ आयेंगे, तब तुम उनके चरणस्पर्श से पुनः अपने स्वरूप को प्राप्त कर लोगी ॥ १४-१५ ॥ नारदजी बोले — तब वह उन तपोनिधि के वचनों के प्रभाव से शिला हो गयी और अहल्या को प्राप्त शाप को सुनकर इन्द्र उसी प्रकार काँपने लगे, जैसे प्रचण्ड वायु के वेग से हिमालयपर्वत । वे अपने मन में तर्क-वितर्क करने लगे कि अब मुझे क्या करना चाहिये ? ॥ १६-१७ ॥ यदि मैं समुद्र के मध्य में, कुएँ में या तालाब में अथवा कमल में भी छिप जाऊँ तो भी ये [गौतम] मुनि मुझे जान जायँगे ॥ १८ ॥ अतः वज्र धारण करने वाले उन इन्द्र ने बिडाल का रूप धारण किया और वहाँ से चले गये । तदनन्तर जब गौतम ने घर में, द्वार पर और आश्रम में उन्हें कहीं नहीं देखा तो सोचने लगे कि वह दानवों का शत्रु इन्द्र कहाँ चला गया, जिसने मेरी भार्या को विदूषित किया है ? तब उन्होंने ध्यान किया तो क्षणमात्र में उन मुनिश्रेष्ठ ने सब कुछ जान लिया ॥ १९-२० ॥ [तदनन्तर उन्होंने कहा —] रे दुष्ट! चूँकि तू देवेन्द्र है, इसलिये तुझे भस्म नहीं करूँगा, परंतु हे शचीपति! मैं तुझे शाप देता हूँ कि तेरा शरीर स्त्रीयोनि के एक हजार चिह्नों से युक्त हो जाय ॥ २१ ॥ मुनि द्वारा रोषपूर्वक कहे गये इन वचनों को सुनकर जब इन्द्र ने अपने शरीर की ओर देखा तो उसमें स्त्रीयोनि के सहस्र चिह्न हो गये थे । तब बल और वृत्र नामक असुरों का वध करने वाले इन्द्र दुःख के सागर में निमग्न हो गये ॥ २२९/२ ॥ इन्द्र बोले — मैं वृद्धजनों द्वारा अनेक बार धर्मोपदेशों से शिक्षित किया गया था, परंतु मैंने उन वृद्धजनों के वचनों पर आदरपूर्वक विचार नहीं किया। अपनी बुद्धि द्वारा किया हुआ निर्णय हितकर और दूसरे की प्रेरणा से किया गया कार्य विनाश का हेतु होता है ॥ २३-२४ ॥ गुरु द्वारा दी गयी बुद्धि श्रेष्ठ होती है, जबकि स्त्री में आसक्त बुद्धि क्षयकारिणी होती है । नारद का वचन मानकर मैंने उस अनिन्दिता [मुनिपत्नी अहल्या ]-से कैसे दुष्कर्म कर लिया ! ॥ २५ ॥ [इस गर्हित कर्म के कारण] देवताओं का राजा होते हुए भी मैं संसार में अपना मुख कैसे दिखलाऊँगा ? वह मेरी दिव्य देह आज कहाँ चली गयी ? [इस सहस्र भगयुक्त अपने शरीर के विषय में ] मैं अपनी पत्नी से क्या कहूँगा ? ॥ २६ ॥ मुझे धिक्कार है! और उस कामदेव को धिक्कार है, जिसके कारण मैं इस निन्दित अवस्था को प्राप्त हुआ हूँ। प्राणियों को अपने द्वारा किये गये शुभ अथवा अशुभ कर्म का फल भोगना ही पड़ता है ॥ २७ ॥ मैं अपने इस पाप का तिर्यक् योनि में जाकर भोग करूँगा। मैं इन्द्रगोप (वीरबहूटी) नामक कीट का रूप धारणकर कमलिनी की कली में स्थित हो जाता हूँ ॥ २८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शक्रशापवर्णन’ नामक इकतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३१ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe