August 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-32 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ बत्तीसवाँ अध्याय देवताओं की गौतममुनि से इन्द्र के शापोद्धार हेतु प्रार्थना और गौतममुनि का उन्हें षडक्षर मन्त्र का उपदेश देना अथः द्वात्रिंशोऽध्यायः मन्त्रकथनं नारदजी बोले — [ हे राजा रुक्मांगद !] इन्द्र जब कमलिनी [-की कली ]-में चले गये, तब मैं उनके लोक को गया । वहाँ मैंने बृहस्पति आदि प्रमुख देवताओं को [चिन्तातुर] बैठे देखा ॥ १ ॥ मैंने उन सबको अहल्या और इन्द्र के समागम, उन दोनों को शाप की प्राप्ति और उसके कारण उनकी शारीरिक विरूपताकी बात बतायी ॥ २ ॥ [मैंने उनसे कहा कि] हे देवताओ ! इन्द्र ने अहल्या का सतीत्व हरण किया, जिसके कारण गौतम के शाप से इन्द्र के शरीर में सहस्र भग हो गये और वह अहल्या शिला हो गयी ॥ ३ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] नारदजी का कथन सुनकर वे सभी देवता शोकमग्न हो गये । वे अत्यन्त दुखित होकर रुदन करने लगे और हड़बड़ी में जोर- जोर से साँस लेने एवं छोड़ने लगे ॥ ४ ॥ देवताओं ने कहा — [हे नारदजी !] जिन्होंने सौ यज्ञों का सम्पादन किया, जिन्होंने दानवों को परास्त किया, जिन्होंने त्रैलोक्य का पालन किया और सौभाग्यशाली ऐन्द्रपद का भोग किया, बहुत-से देवताओं और ब्रह्मज्ञानी ब्राह्मणों का पूजन किया, दूसरों के लिये अत्यन्त दुर्लभ अनेक प्रकार के भोगों का भोग किया — वे देव [-राज] इन्द्र कहाँ रह रहे होंगे ? वे भोजन और शयन कैसे कर रहे होंगे? आज हम उनके या अपने [हित के] लिये किसकी शरण में जायँ ? ॥ ५–७ ॥ कौन हम सबका, ऐन्द्रपद का और शची का पालन करेगा ? मुनिश्रेष्ठ गौतम कैसे प्रसन्न हो सकेंगे ? ॥ ८ ॥ वे गौतममुनि अपनी भार्या से वियुक्त हैं और रोषपूर्वक उस इन्द्र के अपराध का स्मरण करते हैं। गौतममुनि को प्रसन्न करने का अन्य कोई उपाय हमें दिखायी भी नहीं देता है ॥ ९ ॥ हे नारदजी ! इसलिये हम लोग गौतममुनि को सान्त्वना देने के लिये जायँगे । इस प्रकार वे देवता नारदजी के साथ गौतममुनि के आश्रम पर गये ॥ १० ॥ [वहाँ] गौतममुनि के पास जाकर उनके शरणागत होकर हाथ जोड़ करके अनेक प्रकार से प्रार्थनाकर [देवता] उन्हें प्रसन्न करने लगे ॥ ११ ॥ देवता बोले — हे मुने! आपका प्रभाव कह सकने की शक्ति हममें नहीं है। भला, सुमेरु और हिमालय की गरिमा कौन कह सकता है ? ॥ १२ ॥ वर्षा की बूँदों, पृथ्वी के धूलिकणों, गंगाजी की बालुका के कणों, समुद्र के जलकणों और भगवान् विष्णु के गुणों की गणना कौन मूढबुद्धि कर सकता है ? ॥ १३ ॥ पूर्वकाल में [अकाल के समय] आपने प्रातः- काल बीज बोकर मध्याह्न में फसल तैयार कर ली थी और [दुर्भिक्षपीड़ित] श्रेष्ठ ऋषियों की रक्षा की थी ॥ १४ ॥ वालखिल्य मुनियों ने यज्ञ करके दूसरे इन्द्र की रचना कर दी थी, पर बाद में ब्रह्माजी की प्रार्थना पर उसे पक्षियों का इन्द्र बना दिया था ॥ १५ ॥ एक [ अगस्त्यमुनि ] – ने जलनिधि (समुद्र) -को चुल्लू भरकर पी लिया था, बुद्धिमान् गाधिपुत्र विश्वामित्र के द्वारा तो दूसरी सृष्टि का ही निर्माण प्रारम्भ कर दिया गया था ॥ १६ ॥ महात्मा च्यवन के द्वारा इन्द्र की भुजा का स्तम्भन कर दिया गया था। इसलिये सभी प्राणियों को आप-जैसे मुनियों की सब प्रकार से सेवा और उन्हें नमन करना चाहिये; क्योंकि लोकोपकार में रत और दीनों पर अनुग्रह करने वाले आप-जैसे ऋषि-मुनियों का दर्शन, सम्भाषण, पूजन और स्पर्श पापों का नाश करने वाला होता है। हम लोग इन्द्र पर आपके अनुग्रह के निमित्त आपकी शरण में आये हैं, आप ही कृपा करने में समर्थ हैं ॥ १७–१८१/२ ॥ गौतमजी बोले — आप लोगों (देवताओं) – का दर्शन चर्म चक्षुवाले [हम-जैसे मनुष्यों ] – को नहीं होता, मेरे किसी पुण्य का उदय हुआ है, जिससे आपका दर्शन हो सका है, यह मनुष्यों की मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाला है। आप सबके दर्शनमात्र से मेरा जन्म, मेरा आश्रम, मेरी तपस्या, मेरा दान, मेरी देह और आत्मा तथा मेरे द्वारा किये गये व्रत — सभी सार्थक हो गये । इस समय आप सब मुझसे किस विषय में प्रार्थना कर रहे हैं, उसे मेरे समक्ष निरूपित करें, यदि मेरे करने योग्य होगा तो आप सब देवताओं के स्मरण के प्रभाव से मैं उसे अवश्य करूँगा ॥ १९–२११/२ ॥ मुनि (नारदजी ) बोले — [ हे राजा रुक्मांगद ! ] मुनि गौतम के इस प्रकार के वचन सुनकर वे देवता इस प्रकार हर्षित हो गये, जैसे [पूर्ण] चन्द्रमा के उदय होने पर समुद्र हर्ष को प्राप्त करता है अथवा जैसे बालक की [तोतली] वाणी सुनकर माता-पिता मुदित होते हैं।[^1] तब उन सबने महामुनि गौतम से प्रार्थना की ॥ २२–२३१/२ ॥ देवता बोले — ईश्वर का अपराध करने के कारण कामदेव भस्मत्व को प्राप्त हो गया था अर्थात् भस्म हो गया था, परंतु अपराधी होते हुए भी इन्द्र को आपने प्राणहीन नहीं किया। हे मुने ! अब वह पुनः अपना स्थान जैसे पा जाय, वैसा ही आप करें। हम सबके वचनों को मानकर आप उसके अपराधों को क्षमा कर दें। आपके द्वारा ऐसी कृपा करने पर हम सबकी भी इच्छा पूर्ण हो जायगी ॥ २४-२६ ॥ नारदजी बोले — देवसमुदाय के वचनों को सुनकर उन गौतममुनि ने सभी देवगणों से हँसते हुए प्रत्युत्तर में इस प्रकार कहा — ॥ २७ ॥ गौतमजी बोले — उस पतित, पापी, कपटी, मूर्ख, दुष्ट और विवेकहीन का तो नाम भी नहीं लेना चाहिये ॥ २८ ॥ हे देवताओ! जिसे अपने दुष्कृत का पछतावा न हो, उसके उद्धार का तो कोई उपाय ही नहीं होता, फिर भी आप सबके वचन का मान रखने के लिये उसका हित करूँगा ॥ २९ ॥ क्योंकि जब आप लोग रुष्ट हो जायँगे तो शाप मुझ पर पड़ जायगा, जिसपर बहुत-से प्राणी अनुग्रह करते हैं, वह पवित्र हो जाता है ॥ ३० ॥ अतः मैं आप लोगों को एक मन्त्र बतलाता हूँ, आप लोग उस मन्त्र का उस इन्द्र को उपदेश कर देना । यह महासिद्धिप्रद षडक्षरमन्त्र उन देवाधिदेव विनायक गणेशजी का है, जो ब्रह्मारूप से सर्वकर्ता, शिवरूप से सर्वहर्ता, विष्णुरूप से सबके पालनकर्ता और कृपा के निधान हैं । इस मन्त्र का उपदेश करने पर वह दिव्य देह से सम्पन्न हो जायगा । उसके शरीर में बने स्त्रीयोनि के चिह्न नेत्र हो जायँगे। वह इन्द्र अपना राज्य पा जायगा — यह मैं आप लोगों से सत्य कह रहा हूँ ॥ ३१-३३१/२ ॥ [नारदजी बोले — हे राजन्!] देवताओं से इस प्रकार कहकर वे गौतममुनि मौन हो गये ॥ ३४ ॥ तदनन्तर उन देवगणों ने गौतममुनि का प्रसन्नतापूर्वक पूजनकर उन्हें नमस्कार किया और उनकी प्रदक्षिणा की। फिर उनकी आज्ञा प्राप्तकर मुनि की प्रशंसा करते हुए वे वहाँ गये, जहाँ बलासुर और वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र थे। उस समय उन देवताओं की यह मान्यता थी कि गौतममुनि से बढ़कर ज्ञानवान् और सात्त्विक दूसरा कोई नहीं है ॥ ३५-३६ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘मन्त्रकथन’ नामक बत्तीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३२ ॥ [^1]: जौं बालक कह तोतरि बाता । सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥ (रा०च०मा० १।८।९ ) Content is available only for registered users. 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