श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-33
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तैंतीसवाँ अध्याय
गणेशजी के षडक्षरमन्त्र के प्रभाव से इन्द्र को सहस्त्र नेत्रों की प्राप्ति
अथः त्रयस्त्रिशतितमोऽध्यायः
षडक्षरमन्त्र प्रभावात् इन्द्रस्य दिव्यदेहधारणमं

नारदजी बोले — [ हे राजा रुक्मांगद!] वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र से देवता बोले — हे सौ यज्ञों के कर्ता इन्द्र ! बाहर आओ । हम लोग देवर्षि नारद के सहित वहाँ (गौतममुनि के आश्रम पर) गये थे और वहाँ जाकर गौतममुनि को प्रसन्नकर यहाँ आये हैं। उन्होंने तुम्हारी निष्कृति का उपाय बताया है और तुम्हें वरदान भी दिया है ॥ १-२ ॥ सन्तजन कोई दोष उत्पन्न हो जाने पर स्वयं ही जनसमुदाय में उसका ख्यापन कर देते हैं और सम्यक् रूप से उसका प्रायश्चित्त कर उसके प्रभाव को निरर्थक कर देते हैं ॥ ३ ॥ छिपाने से दोष की वृद्धि होती है और प्रकट कर देने से उसका नाश हो जाता है। इसलिये हे देवेन्द्र ! तुम भी बाहर आकर उसे कह दो ॥ ४ ॥ तुम अपने दोषपूर्ण कृत्य को देवर्षि नारदजी से कह दो और गौतममुनि द्वारा कथित उपाय करो। भगवान् विनायक गणेशजी के षडक्षर मन्त्र को तुम ग्रहण करो ॥ ५ ॥

गिरिराजनन्दिनी पार्वती और महेश के विवाह में ब्रह्मा ने [पार्वती के] अँगूठे का दर्शन कर लिया था, जिससे उनके तेज का पतन हो गया और तब उन्होंने लज्जित होकर सिर झुका लिया ॥ ६ ॥ इसे जानकर महेश्वर ने उपायपूर्वक उन्हें दोषरहित कर दिया। हे राजन्! तब देवर्षियों द्वारा कही गयी इस वाणी को सुनकर तथा वहाँ आये हुए सभी देवताओं की बातों को भी आदरपूर्वक सुनकर इन्द्र कमलिनी-कोश से बाहर आ गये ॥ ७-८ ॥

उस समय उनका शरीर पीप और रक्त से लिप्त, मलिन तथा सड़े हुए मांस की गन्ध से युक्त था। उन देवराज को इस प्रकार देखकर [भी] देवताओं ने उन्हें नमस्कार किया ॥ ९ ॥

हे नृपश्रेष्ठ! अपने नासिका छिद्रों को वस्त्र के अग्रभाग से ढककर बृहस्पतिजी ने सम्यक् रूप से स्नान और तदनन्तर आचमन किये इन्द्र को गणेशजी के षडक्षर महामन्त्र का उपदेश किया। उन (बृहस्पतिजी) – के द्वारा मन्त्रोपदेश करते ही इन्द्र दिव्य देह वाले हो गये ॥ १०-११ ॥

[उस समय] वे सहस्र नेत्रों से युक्त और शोभासम्पन्न होकर दूसरे सूर्य की भाँति प्रतीत हो रहे थे। तब वाद्यों की ध्वनि, देवताओं द्वारा की गयी जय- जयकार की ध्वनि और गन्धर्वों के गायन की ध्वनि से दसों दिशाएँ अनुनादित हो उठीं। सभी देवताओं ने हर्षित होकर पुष्पों की वर्षा की। नारद आदि सभी मुनियों ने उन इन्द्र को आशीर्वाद प्रदान किये। [कुछ] देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक उनका आलिंगन किया और अन्य देवों ने उनकी स्तुति की ॥ १२-१४ ॥

कुछ देवताओं ने प्रसन्न मन से उनसे कहा कि हम आपके संरक्षण में सनाथ हो गये । आपके बिना हमारी शोभा वैसे ही नहीं होती थी, जैसे चन्द्रमा के बिना आकाश की शोभा नहीं होती ॥ १५ ॥ जैसे अपने माता-पिता के बिना बालक सर्वथा सुख का अनुभव नहीं कर पाते, वैसे ही हम सबको भी आपके बिना शान्ति नहीं प्राप्त हो सकती ॥ १६ ॥

[नारद] मुनि बोले — [हे राजन्!] देवताओं के इस प्रकार के वचन सुनकर शतक्रतु इन्द्र हर्षित हो गये और उन्होंने प्रसन्न मन से देवताओं से यथार्थ बात कही ॥ १७ ॥

इन्द्र बोले — देवर्षि नारद के कथन से विमोहित होकर मैंने जो अत्यन्त गर्हित कर्म किया, उसका असहनीय फल मुझे प्राप्त हो गया । मैं आप सब श्रेष्ठ देवगणों तथा परमप्रभावशाली समस्त ऋषियों को नमस्कार करता हूँ, आप सबने आज मेरा उस पाप के गहन पंक से उद्धार कर दिया। आप सभी मेरा उद्धार करने वाले हैं, मैं आप सबकी शरण में हूँ, आप सबको मेरी रक्षा करनी चाहिये ॥ १८-१९ ॥ आप सबने उन गौतममुनि को प्रसन्न करने का कैसे प्रयत्न किया और उन्होंने कैसे मेरे हितार्थ उस परम मन्त्र का कथन किया, आप सब उसे बतलायें ॥ २० ॥

देवताओं ने कहा — हे देवेन्द्र! हम लोग नारद मुनि और देवगुरु बृहस्पतिजी को आगे कर उन गौतम मुनि के पास गये और उन्हें सम्यक् रूप से साष्टांग प्रणाम करके सुधामयी मनोहर वाणी से उन्हें प्रसन्न किया और तब हमारे द्वारा याचना किये जाने पर उन्होंने हमें अपना मन्त्र (स्वयं द्वारा जप किया जाने वाला मन्त्र) बतलाया, जिसके उपदेश से आप सहस्र नेत्रवाले होकर सबके लिये सुखप्रद हो गये। अब आप अपनी अमरावतीपुरी को जायँ और लोकों तथा देवताओं का पालन करें ॥ २१-२२ ॥

इन्द्र बोले — हे श्रेष्ठ देवताओ और ऋषियो ! मैं गणेशजी का कृपा-प्रसाद प्राप्त किये बिना अपनी पुरी को नहीं जाऊँगा। आप सबने साधुवाद का कार्य किया है, अब आप लोग प्रसन्नतापूर्वक खुशी मनाते हुए अपने-अपने दिव्य धाम को जायँ। आप सबने मेरे लिये बहुत श्रम किया। मैं लज्जा के कारण छिपा हुआ था, मेरी बहुत दुर्गति हो रही थी, आपने उससे मुझे बाहर निकाला। आप सबने उन उग्र तेजवाले गौतममुनि को मेरे हितार्थ प्रसन्न किया। आप सबकी कृपा से ही मुझे बहुत-से (सहस्र) नेत्रों की प्राप्ति हुई है ॥ २३-२४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘षडक्षरमन्त्र के प्रभाव का वर्णन’ नामक तैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३३ ॥

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