August 21, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-35 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ पैंतीसवाँ अध्याय चिन्तामणिक्षेत्रस्थ गणेशतीर्थ में स्नान से राजा रुक्मांगद को दिव्य देह की प्राप्ति तथा उनका माता-पितासहित विनायकलोक को जाना अथः पञ्चत्रिशत्तमोऽध्यायः कादम्बपुर गत वर्णनं व्यासजी बोले — [हे ब्रह्मन्!] देवर्षि नारद के चले जाने पर उन राजा रुक्मांगद ने तब क्या किया ? आप मुझसे इस मनोरम कथा को कहिये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे पुत्र ! जब इस प्रकार का अत्यन्त महान् उपदेश कर नारद नामवाले मुनि चले गये, तभी हर्षयुक्त राजा रुक्मांगद ने अपनी उस चतुरंगिणी सेना को देखा ॥ २ ॥ उस सेना ने भी विकृत रूप में उन राजा को देखा, जो पूर्वकाल में स्वर्णसदृश कान्तिवाले और रूप में रतिपति कामदेव के समान थे। वे अब इस प्रकार के रूपवाले कैसे हो गये – ऐसा संशय करते हुए उन लोगों [सैनिकों]- ने राजा से इस विषय में प्रश्न किया — ॥ ३ ॥ सैनिकों ने कहा — हे राजेन्द्र ! आपके दर्शन को अत्यन्त उत्सुक हम लोग भूखे-प्यासे पहाड़ों, जंगलों और नदियों में भटकते-भटकते यहाँ तक आ गये ॥ ४ ॥ स्थान-स्थान पर देखते-खोजते हुए हमने आपके चरणकमलों को प्राप्त कर लिया, परंतु आपको इस अवस्था में देखकर आपके दुःख से हम लोग और अधिक दुखी हो गये हैं । हे नृपश्रेष्ठ ! ऐसा किस कारण से हो गया है, वह आप हमसे कहिये ॥ ५१/२ ॥ राजा बोले — मैं तुम लोगों से आगे चला आया था। उस समय मैं भूख और प्यास से पीड़ित था। शीघ्र ही मैंने अपने सामने वाचक्नविमुनि का आश्रमरूपी गृह देखा । वहाँ जाकर मैंने उनकी सुमुखी पत्नी को देखा ॥ ६-७ ॥ उस सुन्दरी का नाम मुकुन्दा था। मैंने उससे जल की याचना की। परंतु वह दुष्टा और स्वेच्छाचारिणी थी, उसने मुझसे अकल्याणकारी वचन कहे ॥ ८ ॥ [उसने मुझसे कहा कि] तुम मेरे साथ रतिक्रीड़ा करो, अन्यथा मैं तुम्हें शाप दे दूँगी, परंतु मैंने शुद्ध-अन्तःकरण से उसे बलपूर्वक निवारित कर दिया ॥ ९ ॥ उसके पति जब स्नान करने चले गये थे, तभी उस दुष्टा ने [ अपने प्रस्ताव में असफल होकर ] मुझे क्रोधित होकर शाप दे दिया। तब मैं दुखी होकर एक वृक्ष के नीचे बैठ गया ॥ १० ॥ [उस समय] पूर्वजन्म के पुण्यों के प्रभाव से मुझे नारदमुनि के दर्शन हुए। उन्होंने मुझसे अरिष्टों का नाश करने वाली उत्तम विधि कही — चिन्तामणिक्षेत्र के अन्तर्गत गणेशतीर्थ स्थित है। नारदजी ने विस्तारपूर्वक उसकी महिमा का वर्णन किया ॥ ११-१२ ॥ उन दिव्यदृष्टिसम्पन्न मुनि ने मुझे वहाँ स्नान करने के लिये सम्यक् रूप से कहा था, अतः मैं अपने दोष का निवारण करने के लिये वहाँ स्नान करने जाऊँगा ॥ १३ ॥ यदि इच्छा हो तो तुम लोग भी मेरे साथ स्नान करने के लिये वहाँ चलो। वहाँ स्नानकर यथाशक्ति दान देकर और [ भगवान् चिन्तामणि] – विनायक का सम्यक् प्रकार से पूजन करके गणेशतीर्थ एवं भगवान् गणेश के प्रभाव से पवित्र होकर हम सब अपने नगर को जायँगे ॥ १४१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] राजा का इस प्रकार का निश्चय जानकर वे सब भी उनके साथ चल दिये ॥ १५ ॥ हे मुनीश्वर ! गणेशतीर्थ का दर्शन कर वे राजा रुक्मांगद पूर्व की भाँति तपाये हुए सोने के समान स्वर्णिम आभावाले दिव्य शरीर से सुशोभित हो गये ॥ १६ ॥ तब राजा रुक्मांगद ने मान लिया कि नारदजी द्वारा कही गयी बात अमृत के समान [ हितकारी] थी । तदनन्तर राजा ने वहाँ स्नान करके परम प्रसन्नतापूर्वक ब्राह्मणों को अनेक प्रकार के दान दिये । [विघ्न] विनायक गणेशजी का पूजन करके उन्होंने ब्राह्मणों और सेवकोंसहित एक तेजोराशि का दर्शन किया, जो कि सूर्यसदृश प्रकाशमान विमान था। वह विनायकगणों, अप्सराओं और किन्नरों से युक्त था ॥ १७–१९ ॥ राजा ने उन्हें नमस्कारकर पूछा कि आप लोग कौन हैं ? कहाँ से आये हैं? आप किसके दूत हैं ? यहाँ आने का आपका क्या प्रयोजन है ? – यह सब आप आदरपूर्वक कहिये ॥ २० ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यास!] राजा द्वारा मधुर वाणी में कही गयी बातों को सुनकर विमान से आये गणेशजी के दूतों ने कहा — हे नृपश्रेष्ठ ! आप धन्य हो; जो आपने सर्वभाव से प्रभु चिन्तामणि [ विनायक ] – का ध्यान किया, सम्यक् प्रकार से तीर्थयात्रा की, विधि-विधानपूर्वक दान दिया और चिन्तामणि गणेशजी का पूजन किया । अब आप कृतकृत्य हैं। चिन्तन की हुई कामनाओं को प्रदान करने के कारण ही ये चिन्तामणि विनायक कहे जाते हैं ॥ २१-२३ ॥ उत्तम व्रतों का पालन करने वाले हे नृपश्रेष्ठ! हम सब भी आपके दर्शन से कृतकृत्य हो गये, हम आपकी भक्ति की महिमा को नहीं जान सकते ॥ २४ ॥ आपने शरीर, वाणी और बुद्धि से तथा जीवन समर्पित करके भी सर्वब्रह्माण्डनायक भगवान् [विघ्न] विनायक गणेशजी का आराधन किया है। हे राजन् ! हम सब उन्हीं के दूत हैं और उन्हीं के द्वारा प्रेषित हैं। उन्होंने अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक हम सबसे कहा है कि मेरे भक्त रुक्मांगद को शीघ्र जाकर विमान से मेरे पास ले आओ — यह सुनकर हम सब यहाँ आये हैं । हे देव ! अब आप इस आकाशचारी विमान पर आरूढ़ हों और हमारे साथ [भगवान्] विनायक (गणेशजी) – के पास शीघ्रातिशीघ्र चलें ॥ २५–२७१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] उन दूतों का इस प्रकार का वचन सुनकर राजा रुक्मांगद ने कहा — हे दूतो ! कहाँ मैं मन्दमति और कहाँ वे अखण्डित विग्रहवाले (पूर्ण ब्रह्म), प्रमेयों और तर्कों से परे, चैतन्य स्वरूपवाले, सर्वव्यापक, अविनाशी । जो सृजन – पालन और लय के कारणभूत और स्वयं कारणों से परे हैं, उन्होंने मुझे कैसे इतना आदर दिया — मैं नहीं जानता कि यह इस तीर्थ में [विहित] स्नान का फल है या कि मेरा पूर्वजन्मों का उत्तम पुण्य फलित हुआ है, जिसके कारण मुझे आप लोगों का दर्शन प्राप्त हुआ है और जिसके परिणामस्वरूप आगे [भी] अत्यन्त शुभकारी फल प्राप्त होगा ॥ २८–३१ ॥ आप लोग मुझसे [अधिक] धन्य हैं, जिन्हें सर्वव्यापक [परमात्मा] गणेशजी दिन-रात प्रत्यक्ष दर्शन देते हैं — ऐसा कहकर राजा ने उनके कमलवत् चरणों में नमस्कारकर उनकी पूजा की ॥ ३२ ॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगद ने उन दूतों से प्रार्थना की कि मेरे पिता नृपश्रेष्ठ भीम, जो कि ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी एवं भयंकर पराक्रमवाले हैं, उनके बिना मैं कैसे आऊँ ? मेरी माता चारुहासिनी ने भी देवाधिदेव भगवान् विनायक की आराधना की थी। जन्म से ही उसने अन्य किसी देवता को अपना इष्टदेव नहीं माना था, [अतः उनको छोड़कर मैं कैसे आ सकता हूँ ?] ॥ ३३-३४१/२ ॥ दूत बोला — यदि ऐसी बात है, तो आप उन दोनों के उद्देश्य से भी इस तीर्थ में स्नान कीजिये और उसका फल अपने माता-पिता को प्रदान कीजिये । तब हम लोग उन दोनों को भी इस श्रेष्ठ विमान में बैठाकर ले चलेंगे ॥ ३५-३६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यास !] उस दूत का इस प्रकार का वचन सुनकर राजा रुक्मांगद ने [ माता-पिता की ] कुश की प्रतिकृति बनाकर — कुशोऽसि कुशपुत्रोऽसि ब्रह्मणा निर्मितः पुरा ॥ त्वयि स्नाते तु स स्नातो यस्येदं ग्रन्थिबन्धनम् । ‘तुम कुश हो, कुशपुत्र हो, पूर्वकाल में ब्रह्माजी ने तुम्हारा निर्माण किया था; तुम्हारे स्नान कर लेने से उसका स्नान हो जायगा, जिसके लिये यह ग्रन्थिबन्धन किया गया है’ —- इस मन्त्र का सम्यक् प्रकार से उच्चारण कर राजा ने क्रम से [माता-पिता सहित ] सभी ग्रामों के सभी लोगों के लिये चिन्तामणिक्षेत्र के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थ में स्नान-विधि सम्पन्न कर दी ॥ ३७–३९ ॥ तदनन्तर राजा रुक्मांगद दूत के कथनानुसार सेनासहित उस श्रेष्ठ विमान में आरूढ़ होकर कौण्डिन्यपुर में आये। उस विमान में होने वाली वाद्यध्वनि, वेदध्वनि, गन्धर्वों और अप्सराओं के गान एवं नृत्य की ध्वनि से गगनमण्डल और दशों दिशाएँ अनुनादित हो गयीं ॥ ४०-४१ ॥ राजा रुक्मांगद ने विनायक (गणेश) – तीर्थ में स्नान का पुण्यफल अपने माता-पिता और समस्त लोगों को प्रदान कर दिया ॥ ४२ ॥ कुशनिर्मित प्रतिकृति के स्नानजन्य पुण्यफल को [अन्य लोगों के निमित्त] देनेमात्र से विनायक (गणेशजी ) – की आज्ञा से वहाँ अन्य बहुत-से विमान आ गये ॥ ४३ ॥ उनमें से प्रत्येक आकाशगामी विमान में वे एक- एक करके बैठ गये। इस प्रकार [राजा] रुक्मांगद, [उनके पिता] भीम और उनकी माता चारुहासिनी तथा अन्य सभी लोग वहाँ पहुँच गये, जहाँ भगवान् विनायक थे। इस प्रकार उस नगर के बालकसे लेकर वृद्ध तक तथा ब्राह्मण से चाण्डाल तक — सभी गणेशतीर्थ के स्नानजनित पुण्यफल के प्रभाव से सद्गति को प्राप्त हो गये ॥ ४४–४५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे मुने! इस प्रकार मैंने वह सब कुछ कह दिया, जो कुछ तुम्हारे द्वारा पूछा गया था। चिन्तामणिक्षेत्र 1 के अन्तर्गत स्थित गणेशतीर्थ से सम्बन्धित इस माहात्म्य को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रवण करता है, वह भी उस गति को प्राप्त कर लेता है, जो उस तीर्थ में स्नान से प्राप्त होती है ॥ ४६-४७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कादम्बपुरवर्णन’ नामक पैंतीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३५ ॥ 1. चिन्तामणिक्षेत्र महाराष्ट्र प्रान्त के कदम्बपुर, जिला-यवतमाल में स्थित है। मन्दिर के सामने ही ‘चौमुखी गजानन की मूर्ति है। इसकी विशेषता यह है कि एक ही पत्थर में चारों ओर चार गणेश मूर्तियाँ खुदी हुई हैं। सामने के गर्भगृह में मुख्य चिन्तामणि- गणेश की मूर्ति है। ‘कलम्ब’ नाम से इक्कीस गणपतिक्षेत्र में इसकी गणना है। Content is available only for registered users. 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