श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-36
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
छत्तीसवाँ अध्याय
गृत्समदमुनि के जन्म की कथा
अथः षट्त्रिंशत्तमोऽध्यायः
गृत्समदोपाख्यानं

व्यासजी बोले — हे कमलासन ब्रह्माजी ! मैंने गणेशतीर्थ के माहात्म्य, रुक्मांगद और कौण्डिन्यपुरवासियों के चरित के विषय में श्रवण किया, तथापि हे ब्रह्मन्! आप मुकुन्दा के मनोहर चरित को मुझसे कहिये ॥ ११/२

ब्रह्माजी बोले — हे पुत्र ! राजा रुक्मांगद के चले जाने पर वह मुकुन्दा कामनारूपी अग्नि में उसी प्रकार जल उठी, जैसे ग्रीष्मकाल में दावाग्नि से महान् वनस्थली जल उठती है। मुकुन्दा को न शीतल वायुवाले वन में, न लता-पुष्पमय कुंज में, न चन्द्रमा की चाँदनी में और न चन्दन आलेपन में-कहीं शान्ति नहीं मिल रही थी। उसे हास्य, गीत, नृत्य और वस्त्राभूषणादि भी रुचिकर नहीं लग रहे थे ॥ २-४ ॥ हे मुनीश्वर ! उस कामविह्वला मुकुन्दा को अन्न और जल भी रुचिकर नहीं लगता था। भूख-प्यास और श्रमजनित थकान से उसे क्षणभर में नींद आ गयी ॥ ५ ॥

हे सुत! उस एकान्त वन में सोयी हुई मुकुन्दा को रुक्मांगद के विरह में विह्वल जानकर देवराज इन्द्र रुक्मांगद का रूप धारणकर वहाँ आये। उन्हें देखकर मुकुन्दा को अत्यन्त हर्ष हुआ। इन्द्र ने उस पुत्रार्थिनी नारी को अपने हृदयसे लगा लिया और अपने अनुग्रह से मानो कृतकृत्य-सा करते हुए उसके साथ नानाविध शृंगार चेष्टाएँ कीं । उस पारस्परिक संयोग के फलस्वरूप मुकुन्दा ने गर्भ धारण किया। तदुपरान्त मुकुन्दा को आश्वस्त कर इन्द्र अन्तर्धान हो गये और मुकुन्दा भी सलज्ज भाव से अपने आश्रम को चली आयी ॥ ६-१० ॥

मुकुन्दा ने नवम मास में, शुभ वेला में शुभ लक्षणों से सम्पन्न पुत्र को जन्म दिया, जो मनोहर, सर्वांगसुन्दर और रूप में कामदेव से भी बढ़कर था । उसके धरणी पर गिरते ही महान् शब्द हुआ, जिससे दसों दिशाएँ, आकाश, पृथ्वी और रसातल भी अनुनादित हो गये ॥ ११-१२ ॥ पक्षिगण उड़-उड़कर सम्पूर्ण दिशाओं में भ्रमण करने लगे। वाचक्नवि भी अपना नित्यकर्म छोड़कर वहाँ चले आये। मुकुन्दा के चरित का ज्ञान उन्हें कभी नहीं हो पाया। उन्होंने अत्यन्त हर्षपूर्वक [शिशु के] जातकर्मादि संस्कार किये ॥ १३-१४ ॥ और यथायोग्य दान दिया। दस दिन बीत जाने पर उन उन्होंने [इस अवसर पर] ब्राह्मणों को यथाशक्ति मुनि ने [ शिशुका] नामकरण-संस्कार किया ॥ १५ ॥ ज्योतिषशास्त्र में पारंगत द्विजों से अनुज्ञा लेकर उन्होंने [उस शिशु का] गृत्समद – यह नाम रखा । तदनन्तर पाँचवें वर्ष में उसका व्रतबन्ध-संस्कार उपनयन संस्कारकिया ॥ १६ ॥

उन्होंने उस बटुक के चार वेदव्रत1  संस्कार सम्पन्न किये। तेज से सम्पन्न होने के कारण वह एक बार बोलने पर ही वेदमन्त्रों को ग्रहण कर लेता था ॥ १७ ॥ इस प्रकार वह वेदशास्त्र का निधान और अपने कर्म में भी कुशल हो गया। किसी समय शुभ मुहूर्त में उसके पिता वाचक्नवि ने उसे ऋग्वेद के महान् मन्त्र ‘गणानां त्वा०’ 2 का उपदेश दिया और कहा कि यह वैदिक महामन्त्र सम्पूर्ण सिद्धियों को देनेवाला है ॥ १८-१९ ॥  यह आगमों में कहे गये सम्पूर्ण मन्त्रों में श्रेष्ठ है। भगवान् गजानन गणेशजी का ध्यान करके तुम स्थिर चित्त से इस मन्त्र का जप करो ॥ २० ॥ इससे तुम परम सिद्धि को प्राप्त कर लोगे और तुम्हारा यश संसार में फैल जायगा । तब विप्र गृत्समद पिता के मुख से मन्त्र प्राप्तकर अनुष्ठानपरायण होकर जप और ध्यान में लग गये। इस प्रकार उन मुनिश्रेष्ठ का बहुत समय व्यतीत हो गया ॥ २१-२२ ॥

उस समय मगध देश में जो राजा थे, उनका भी नाम मगध ही था। वे सुन्दर रूपवाले, महान् स्वाभिमानी, दानवीर, शत्रुनाशक, अनेक प्रकार के अलंकारों से विभूषित, महामूल्यवान् आसन पर स्थित, न्यायी, धैर्यवान्, दूसरे इन्द्र के समान, चतुरंगिणी सेना से समन्वित, ज्ञानी और विद्वानों का सम्मान करने वाले थे। उनके दो मन्त्री थे, जो ज्ञाननिधान और गुणों में बृहस्पति से भी बढ़कर थे ॥ २३–२५ ॥ उन (राजा मगध) – की पत्नी का नाम अम्बिका था, जो मनोहर रूपवाली अत्यन्त गुणवती, पतिव्रता, महान् सौभाग्यशालिनी और शाप देने तथा अनुग्रह करने में सक्षम थी ॥ २६ ॥

[एक बार] उन राजा के यहाँ पितृश्राद्ध में राजा द्वारा आमन्त्रित वेदों में पारंगत वसिष्ठ, अत्रि आदि बहुत-से महर्षि आये थे ॥ २७ ॥ तपस्वी और पवित्र अन्तःकरणवाले गृत्समद को भी वहाँ बुलाया गया था। वहाँ किसी शास्त्रसम्बन्धी प्रसंग में गृत्समद ने गर्वपूर्ण बात कही ॥ २८ ॥ तब उन मुनियों के बीच में ही अत्रिजी इस प्रकार कहने लगे कि ‘तुम्हें धिक्कार है ! धिक्कार है! तुम इस बात पर विचार करो, चूँकि तुम तपस्वी हो, इसीलिये मान्य हो। तुम मुनि नहीं हो; क्योंकि तुम्हारा जन्म राजकुमार रुक्मांगद से हुआ है। तुम हम सबके समक्ष पूजा पाने के योग्य नहीं हो, अतः अपने आश्रम को चले ‘जाओ’ ॥ २९-३० ॥

अत्रि के इस प्रकार के वचन सुनकर वे गृत्समद क्रोध से अग्नि के समान प्रदीप्त हो उठे । [ उस समय ] ऐसा लगता था, मानो वे त्रिलोकी को भस्म कर डालेंगे और उन मुनियों को खा जायँगे ॥ ३१ ॥ उनको देखकर अन्य बहुत-से मुनि तो इस प्रकार पलायन कर गये, जैसे सिंह को देखकर हरिण भाग जाते हैं। उन्होंने वहाँ सभा में बैठे हुए वसिष्ठ आदि मुनियों से कहा — ॥ ३२ ॥

गृत्समद बोले — हे मुनीश्वरो ! यदि मैं रुक्मांगद का पुत्र न सिद्ध हुआ तो मैं अपनी शापाग्नि से तुम सबको भस्मावशेष कर दूँगा ॥ ३३ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यास!] उन सभी मुनियों से इस प्रकार कहकर वे अपनी माँ के पास पहुँचे। गृत्समद ने उससे पूछा — अरी दुष्टे! अत्यन्त कामाचारिणी मुकुन्दा! बता, मेरा पिता कौन है ? अन्यथा तू भस्म हो जायगी। तब उनके इस प्रकार के वचन सुनकर मुकुन्दा अत्यन्त व्याकुल होकर उसी प्रकार काँपने लगी, जैसे आँधी के वेग से पुष्पयुक्त कदलीवृक्ष ! वह असती हाथ जोड़कर अत्यन्त दीन वाणी में बोली — ॥ ३४-३६ ॥

मुकुन्दा बोली — आखेट में आसक्त चित्तवाले नृपश्रेष्ठ रुक्मांगद अपने साथवालों से बिछुड़कर यहाँ आ गये थे। तभी मैंने उनको देखा, जो तीनों लोकों में सबसे सौभाग्यशाली और सुन्दर थे ॥ ३७ ॥  मेरे प्रिय पति वाचक्नवि अनुष्ठान में संलग्न थे। “स्त्रियों की कामनाओं का निवारण करना [ धर्मत: ] उचित  नहीं है’ — ब्रह्माजी द्वारा कहे गये इस वाक्य का स्मरणकर  मैं उस राजा में आसक्त मनवाली हो गयी; वे ही तुम्हारे पिता हैं। उसका इस प्रकार का वचन सुनकर वे मुनि गृत्समद  मौन हो गये। उन्होंने लज्जा से मुख नीचे कर लिया और  माता के प्रति शाप देकर वहाँ से चल दिये ॥ ३८-३९१/२

पुत्र ( गृत्समद )-ने कहा — अरी दुष्टे! मूर्ख! पापपरायणे! तू जंगल में कँटीली झाडी हो जा। तुझपर  असंख्य फल लगेंगे, फिर भी तू सभी प्राणियाँ से परित्यक्त  ही रहेगी। इस पर उसने भी क्रोधित होकर पुत्र को शाप  दे दिया — ॥ ४०-४१ ॥

क्योंकि तूने मातृत्व का अनादर करके मुझे शाप दिया है, अतः हे पुत्र! मैं तुझे शाप देती हूँ कि तुझसे उत्पन्न पुत्र अत्यन्त भयंकर होगा। वह त्रैलोक्य को भय  देने वाला महान्‌ बलशाली दैत्य होगा। इस प्रकार उन  माता और पुत्र ने परस्पर शाप दे दिया॥ ४२-४३ ॥

ब्रह्माजी बोले — तब वह मुकुन्दा उस शरीर को त्यागकर वन में पक्षिगणों, जरायुजो और अण्डज प्राणियों से त्यक्त बदरी वृक्ष (बेर की झाडी) हो गयी ॥ ४४ ॥

तदनन्तर आकाशवाणी हुई कि गृत्समद का जन्म  इन्द्र से हुआ है। हे ब्रह्मन्‌! तब वे गृत्समद अनुष्ठान हेतु चले गये ॥ ४५ ॥ गृत्समद के इस आख्यान का जो श्रेष्ठ मनुष्य श्रवण  करता है, उसे कभी संकट की प्राप्ति नहीं होती और वह  सम्पूर्ण मनोकामनाओं को प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड मेँ ‘गृत्समदोपाख्यान’ नामक छत्तीसवोँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३६ ॥

1. चार वेदव्रत हैं – १. महानाम्नी व्रत, २. महाव्रत, ३. उपनिषद् व्रत तथा ४. गोदान ।
प्रथमं स्यान्महानाम्नी द्वितीयं स्यान्महाव्रतम् ।
तृतीयं स्यादुपनिषद् गोदानाख्यं ततः परम् ॥

( संस्कारमयूख में आश्वलायन का वचन)

2. – गणानां त्वा गणपतिं हवामहे कविं कवीनामुपमश्रवस्तमम् ।
ज्येष्ठराजं ब्रह्मणां ब्रह्मणस्पत आ नः शृण्वन्नूतिभिः सीद सादनम् ॥

(ऋक्० २।२३ । १)

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