श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-39
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
उनतालीसवाँ अध्याय
त्रिपुरासुर का इन्द्र पर आक्रमण कर अमरावतीपुरी पर अधिकार कर लेना
अथः एकोनचत्वारिंशोऽध्यायः
इन्द्रपराजयः

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन्‌! गणेशजी से वरदान प्राप्त करने के बाद वरप्राप्ति के अहंकार से भरे त्रिपुरासुर ने क्या किया? उसे आप बिना कुछ शेष रखे बताइये, उस विषय में मुझे कौतूहल हो रहा है ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] तदनन्तर उस त्रिपुरासुर ने काश्मीर देश में उत्पन्न होने वाले पत्थर से एक गजानन गणेशजी की मूर्ति का निर्माण कराया और मन्त्रविद्‌ ब्राह्मणों द्वारा उसकी विधिवत्‌ स्थापना करायी ॥ २ ॥ उसने गणेशपुर के मध्य में एक महान्‌ और सुन्दर मन्दिर का निर्माण करवाया, जो स्वर्णनिर्मित और दिव्य मणि-मुक्ताओं से विभूषित था ॥ ३ ॥ उसने षोडशोपचारों से उन प्रभु का पूजन किया और असंख्य बार नमस्कार, स्तुतियाँ और क्षमा-प्रार्थना करके उन देवाधिदेव की आज्ञा लेकर वहाँ से बाहर आया और ब्राह्मणों को यथायोग्य अनेक दान दिये ॥ ४-५ ॥

तबसे बंगाल में स्थित त्रिपुर का वह स्थान गणेशपुर नाम से विख्यात और सबको सब प्रकार की सिद्धियाँ देने वाला हो गया। तदनन्तर वह त्रिपुर दैत्य गणेशजी के वरदान से मदोन्मत्त होकर मनुष्यों का पालन और देवताओं का अतिक्रमण करने में संलग्न हो गया ॥ ६-७ ॥ उसके पास दसों दिशाओं से बलवान्‌ से बलवान्‌ पैदल, अश्वारोही, गजारोही और रथारोही सैनिक सेवाके लिये आ गये। जो राजा उसके अनुकूल थे, वे सेवक हो गये और जो असमर्थ होते हुए भी उसके प्रतिकूल थे, वे मृत्यु को प्राप्त हो गये ॥ ८-९ ॥

इस प्रकार भूमण्डल का अतिक्रमणकर उसने अमरावती के लिये प्रस्थान किया। तब युद्ध-विद्या में निष्णात अनेक देवगणों से घिरे हुए इन्द्र ने भी कवचबद्ध हो तथा ऐरावत पर समारूढ़ हो युद्ध के लिये प्रस्थान किया। उधर उस महाबली दैत्य त्रिपुरासुर ने भी अपनी चतुरंगिणी- सेना को तीन भागों में विभाजित किया ॥ १०-११ ॥ उसने महान्‌ दैत्य भीमकाय को एक भाग का और वज्रदंष्ट्र नामक दानव को दूसरे भाग का अधिपति बनाया। तदनन्तर उसने धनुर्युद्ध, गदायुद्ध, शस्त्रयुद्ध, अस्त्रयुद्ध और मल्लयुद्ध में निपुण दैत्यश्रेष्ठ भीमकाय से कहा —  “तुम मनुष्यलोक के अधिपति बनो’ ॥ १२-१३ ॥

[इसके बाद] महाबली त्रिपुरासुर ने वज्रदंष्ट्र  से कहा — ‘तुम इस एक तिहाई सेना को लेकर रसातल को जाओ और मेरी आज्ञा से शेषनाग आदि सभी प्रमुख नागों को वश में करो । मैं एक तिहाई सेना लेकर इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओं पर आक्रमण करूँगा’ ॥ १४-१५ ॥

[तत्पश्चात्‌] भीमकाय और वज्रदंष्ट्र ने आज्ञानुसार प्रस्थान किया और स्वयं त्रिपुरासुर चतुरंगिणी सेनासहित नन्दनवन में जा पहुंचा ॥ १६ ॥ वहाँ उन योद्धाओं ने [देव] सैनिकों के रोकने पर भी दिव्य वृक्षों को तोड़ डाला। वहाँ स्थित होकर उस दैत्यराज त्रिपुरासुर ने अपने दूतों को यह कहकर भेजा कि तुम लोग इन्द्र को शीघ्र मेरे सामने ले आओ, मैं उसे देखना चाहता हूँ, अथवा उससे मेरा आदेश कहो कि तुम अभी मृत्युलोक (पृथ्वी)-को चले जाओ, वहाँ मैं तुम्हारा पालन करता रहूँगा, तुम शान्तिपूर्वक अमरावती मुझे दे दो और यदि तुम्हारी बुद्धि में युद्ध करने की बात आ रही हो, तो शीघ्र ही मेरे पास आ जाओ ॥ १७-१९ ॥

उन दूतों ने इन्द्र के पास जाकर त्रिपुरासुर की सारी चेष्टाओं का वर्णन किया। उनके वचनों को सुनकर इन्द्र की स्थिति वञ्र से आहत पर्वत-जैसी हो गयी ॥ २० ॥ जैसे वायु के वेग से वृक्ष काँपने लगता है, वैसे ही पर्वतशत्रु इन्द्र काँपने लगे। “यह क्या हो गया’-ऐसा विचार करते हुए वे चिन्ता से व्याकुल हो गये ॥ २१ ॥ वे क्रोधाग्नि से प्रज्चलित-से हो उठे थे, उनकी आँखें लाल हो गयीं। ऐसा लगता था कि वे सम्पूर्ण लोकों को भस्म कर देंगे और समुद्रों को सुखा डालेंगे ॥ २२ ॥ उन्होंने दूतों से कहा — “जाओ और युद्ध के लिये शीघ्र आओ।’ उनके उस वचन को सुनकर वे सब दूत जैसे आये थे, वैसे ही वापस लौट गये ॥ २३ ॥

[उस समय] देवताओं के शत्रुओं का हनन साक्षात्‌ इन्द्र ने ऐरावतपर आरूढ होकर गर्जना की, उनके [उस] महान्‌ नाद से त्रिभुवन क्षुब्ध हो उठा ॥ २४ ॥ [अन्य] देवताओं ने भी हाथों में अस्त्र-शस्त्र धारण कर लिये और वे [ युद्ध के लिये] सुसज्जित हो गये । कुछ [देवताओं] -ने हाथ में भिन्दिपाल, तो कुछ ने हाथ में शक्ति और ऋष्टि [नामक शस्त्र] धारण कर रखे थे ॥ २५ ॥ कुछ ने हाथों में मुद्गर और तलवार धारण कर रखी थी तो अन्य [देवताओं]-ने धनुष-बाण धारण कर रखे थे। कुछ के हाथों में गदा और खेट थे, तो कुछ दण्डपाणि अर्थात्‌ हाथ मे दण्ड लिये हुए थे ॥ २६ ॥
[तदनन्तर] ब्राह्मणों द्वारा स्वस्त्यन कराकर वज्रधारी इन्द्र इस प्रकार देवताओं के साथ [अमरावतीपुरी से] बाहर आये। उस समय अनेक प्रकार के वाद्यों की ध्वनि हो रही थी ॥ २७ ॥

त्रिपुरासुर ने भी दूत की बात से उनके युद्ध-उद्यम को जानकर अपनी शक्तिशाली और हर्ष से भरी हुई चतुरंगिणी सेना को युद्ध के लिये सुसज्जित किया। [तत्पश्चात्‌] अश्वारूढ़ होकर उसने असंख्य सैनिकों वाली सेना के साथ [युद्ध के लिये] प्रस्थान किया। इस प्रकार वीर योद्धाओं से सुसज्जित दोनों सेनाओं ने एक-दूसरे को देखा ॥ २८-२९ ॥ [उस समय] हाथियों के चिंघाड़ने, घोड़ों के हिनहिनाने, योद्धाओं के युद्धनाद, रथों के चलने की ध्वनि और अनेक प्रकार के वाद्यों के घोष से वहाँ महान्‌ कोलाहल हो गया। तब त्रिपुरासुर के द्वारा हुंकारमात्र से प्रेरित किये उसके वीर योद्धा देवताओं के साथ युद्ध करने लगे और इस प्रकार महान्‌ संग्राम प्रारम्भ हो गया ॥ ३०-३१ ॥

इस युद्ध में सैनिकों को अपने-पराये का ज्ञान न रहा और वे परस्पर एक-दूसरे को मारने लगे। इस प्रकार उस भयंकर युद्ध में बहुत-से दानव मारे गये ॥ ३२ ॥ दैत्योंके शस्त्राघात से अत्यन्त पीड़ित होकर बहुत- से देवता भी उस युद्धभूमि में गिर गये। वहाँ वे [रक्तरंजित] सैनिक पुष्पित पलाश वृक्षों की भाति सुशोभित हो रहे थे ॥ ३३ ॥ ऊँट, हाथी, रथ और घोड़ों पर आरुढ़ होकर युद्ध करने वाले योद्धा तथा बहुत-से पैदल सैनिक [उस युद्धभूमि में] बिना शय्या के ही सो गये थे; उनमें से कुछ के पैर कट गये थे तथा दूसरे बहुत-से दैत्य उसी प्रकार दसों दिशाओं में पलायन कर गये, जैसे अचानक सिंह को देखकर जीवित रहने की इच्छा करने वाले मृग भाग जाते हैं ॥ ३४-३५ ॥

तब देवशत्रु त्रिपुरासुर ने उस भागती हुई अपनी सेना को रोका और स्वयं वह क्रोधाग्नि की महान्‌ ज्चाला में जलता हुआ तथा दूसरे मेघ की भाँति गर्जन करता हुआ इन्द्र के समीप आया। उस समय वह पृथ्वी और आकाश का भक्षण करता हुआ-सा प्रतीत हो रहा था। उसने अपने खड्ग से वज्रधर इन्द्र के हाथ पर तीव्र प्रहार किया ॥ ३६-३७ ॥ [उस प्रहार से] इन्द्र के हाथ से वज्र गिर पडा — यह एक अद्भुत घटना घटित हुई! वज्र को लेकर उस दैत्य ने उसी से ऐरावत हाथी पर प्रहार किया ॥ ३८ ॥ उस प्रहार से [व्यथित होकर] ऐरावत पलायन कर गया। तदनन्तर इन्द्र ने घूँसे से उस दैत्यश्रेष्ठ [ त्रिपुरासुर] पर प्रहार किया ॥ ३९ ॥ उससे वह क्षणभर के लिये भूमिप र गिर पड़ा, तत्पश्चात्‌ पुनः वेगपूर्वक उठकर उसने मुक्के से प्रहार कर इन्द्र को पृथ्वी पर गिरा दिया ॥ ४० ॥

तत्पश्चात्‌ उठकर इन्द्र ने क्रोधपूर्ण वाणी में दैत्य त्रिपुर से कहा — हे असुरेश्वर ! अब तुम मल्लयुद्ध के लिये तैयार हो जाओ ॥ ४१ ॥ तब उस बलगर्वित त्रिपुरासुर ने आश्चर्यचकित होकर कहा — हे देवेश्वर! अपने प्राणों के प्रति क्यों निर्दय हो रहे हो ?॥ ४२ ॥ कृमि, कीट और पतंगों को भी अपने प्राण अत्यन्त प्रिय होते हैं, हे देवराज! धरती पर जाओ, वहाँ मैने तुम्हें सुन्दर स्थान दे रखा है ॥ ४३ ॥

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] उसके इस प्रकार के वचन सुनकर बलासुर और वृत्रासुर का वध करने वाले इन्द्र ने कहा — रे अधम शत्रु! यदि मैं तुझे जीवित छोडुँगा, तब तेरी आज्ञा के वश में होकर पृथ्वी पर जाऊँगा। रे दुष्ट! तू ही आज भग्न सिरवाला होकर पृथ्वी पर जायगा ॥ ४४-४५ ॥

जब देवेन्द्र ऐसा कह रहे थे, तभी उस दुष्ट दैत्यराज ने मुष्टिका से उनके हृदयदेश में प्रहार किया, तब उन दोनों में युद्ध होने लगा । एक-दूसरे को जीतने की इच्छा रखने वाले उन दोनों का वह युद्ध चाणूर और कृष्ण के युद्ध की भाँति था। वे दोनों परस्पर छाती-से-छाती और हाथ-से-हाथ पर प्रहार कर रहे थे ॥ ४६-४७ ॥ चे दोनों घुटनों-से-घुटनों में, जाँघों-से-जाँघों में, मस्तक-से-मस्तक में, कुहनी-से-कुहनी में, पीठ-से-पीठ में, पैरों-से-पैरों में प्रहार कर रहे थे। तभी उस दैत्य त्रिपुर ने इन्द्र के दोनों पैरों को पकड़कर और उन्हें बार-बार घुमाकर इतनी दूर फेंक दिया कि किसी को उनके विषय में कोई जानकारी ही न रही और स्वयं चार दाँतोंवाले गजराज ‘ऐरावत पर आरूढ़ हो गया ॥ ४८-५० ॥

तदनन्तर सभी देवगण उस दैत्य त्रिपुरासुर के सन्त्रासरूपी अग्नि से पीड़ित होकर, इन्द्र को खोजते हुए ‘हिमालयपर्वत की गुफाओं में चले गये ॥ ५१ ॥ वे देव (इन्द्र) कहाँ गिरे हैं ? उन विभु को हम कैसे देखें ?-ऐसा चिन्तन करते और भ्रमण करते हुए उन्होंने उनको देख लिया ॥ ५२ ॥ तब उस देवसमूह ने नीचे को मुख किये आते हुए उन इन्द्र को प्रणाम किया। कुछ अन्य देवताओं ने उनका आलिंगन किया। कुछ अन्य देवताओं ने उनका पूजन किया और कुछ ने उनपर व्यजन डुलाये तथा कुछ ने भक्तिपूर्वक उनके पैर दबाये ॥ ५३-५४ ॥ [तदनन्तर] वे सभी देवता गुप्त रूप से वहीं रहने लगे। [उधर] वह दैत्य (त्रिपुरासुर) ऐरावत पर आरूढ होकर अमरावतीपुरी को चला गया ॥ ५५ ॥ उसने देवताओं से द्वेष रखने वाले दैत्यों को सम्मानपूर्वक देवताओं के पद बाँट दिये और स्वयं इन्द्रासन को हस्तगत कर लिया अर्थात्‌ इन्द्र बन बैठा । किन्नरगणों से सेवित [वह] त्रिपुरासुर दिव्य वाद्यों की ध्वनि और गन्धर्वों के गान का श्रवण करते हुए अप्सराओं के साथ रमण करने लगा ॥ ५६-५७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में इन्द्र पराजयवर्णन’ नामक उनवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ३९ ॥

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