August 22, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-40 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चालीसवाँ अध्याय ब्रह्मा, विष्णु और शिव का त्रिपुरासुर के भय से अपने-अपने लोकों से पलायन, देवताओं द्वारा गणेशाराधन, गणेशजी का प्रकट होना, देवताओं द्वारा संकष्टनाशन स्तोत्र से उनका स्तवन अथः चत्वारिंशोऽध्यायः त्रिपुरासुरेण ब्रह्मदेवस्य पराजयः, देवैश्च तपः स्तोत्र निरूपणं ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] देवलोक पर अधिकार करके वह दैत्य ब्रह्मलोक को गया। ब्रह्माजी ने उस दैत्य के पराक्रम को देवताओं के मुख से पहले ही सुन रखा था, अतः वे [विष्णु के] नाभिकमल में छिप गये और विष्णु [वैकुण्ठलोक को छोड़कर] क्षीरसागर में चले गये ॥ ११/२ ॥ उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-के दो मानस पुत्र थे —प्रचण्ड और चण्ड। उसने स्वयं प्रचण्ड को ब्रह्मलोक में अधिनायक के रूप में स्थापित किया और उसके बाद -चण्ड को चैकुण्ठ में वहाँ का स्वामी बनाया ॥ २-३ ॥ तदनन्तर वह कैलास गया और उसे अपनी भुजाओं से चलायमान कर दिया, जिससे भयभीत होकर गिरिराजनन्दिनी पार्वती ने भगवान् शंकर का दृढतापूर्वक आलिंगन कर लिया ॥ ४ ॥ तत्पश्चात् वह महान् असुर युद्धोत्सुक होकर कैलासपर्वत पर चढ़ गया। उस दैत्य के इस पुरुषार्थ से महादेवजी प्रसन्न हो गये ॥ ५ ॥ अपने भक्तों को सुख प्रदान करने वाले [वे उसे] वर देने के लिये [अपने भवन से] बाहर आये और दैत्य त्रिपुर को देखा तथा उससे “वर माँगो ‘ — ऐसा कहा ॥ ६ ॥ उसने कहा कि यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो [यह] कैलासपर्वत मुझे दे दीजिये, जबतक मेरी इच्छा हो, मैं यहाँ रहूँ और आप आज ही मन्दारपर्वत के शिखर पर चले जाइये ॥ ७ ॥ तब भगवान् शंकर ने भी उस अत्यन्त अल्पजीवी को कैलासपर्वत दे दिया और वे स्वयं गिरिशायी [महादेव] गणों से घिरे हुए मन्दराचल को चले गये । कैलासशिखर पर आरूढ़ होकर अर्थात् कैलासपर्वत का स्वामित्व प्राप्तकर त्रिपुरासुर अत्यन्त हर्षित हुआ । इस प्रकार देवताओं को वश में करके वह पुनः रसातल को आया ॥ ८-९ ॥ बलवान् भीमकाय ने भी पृथ्वी पर जाकर बलपूर्वक राजाओं और ऋषियों को अपने वश में कर लिया और उन सबको बाँध लिया। [उसने] देवताओं को तृप्ति प्रदान करनेवाले सभी अग्निकुण्डं, आश्रमों तथा विशेष रूप से तीर्थों को नष्ट-भ्रष्ट कर दिया ॥ १०-११ ॥ उसने तपस्वियों को पीड़ित किया और उन्हें कारागार में डाल दिया । सब प्रकार से अभिमान से भरा हुआ वह (दैत्य भीमकाय) देवयज्ञ, पितृयज्ञ, वषट्कार, वेदाध्ययन करनेवालों और सदाचारीजनों से सदा द्वेष रखता था ॥ १२१/२ ॥ [उधर] वज्रदंष्ट्र ने भी सातो पातालों 1 को अपने वश में कर लिया। उसने शेष, वासुकि और तक्षक प्रभृति सभी नागों तथा विषहीन और विषैले सर्पों को अपने वश में कर लिया। वज्रदंष्ट्र ने [वहाँ से प्राप्त] श्रेष्ठ रत्नों का स्वयं भी भोग किया और [उन्हें] त्रिपुरासुर के लिये भी प्रेषित किया ॥ १३-१४ ॥ वह सदा मदोन्मत्त होकर अत्यन्त हर्ष और कौतूहलपूर्वक नागलोक की नारियों से रमण करता था। [इस प्रकार] वह अनेक प्रकार के भोगों का भोगकर विविध रत्नों को लेकर त्रिपुरासुर के पास आया ॥ १५ ॥ “पाताल को वशमें कर लिया है’ यह बात बताने पर उसने [त्रिपुरासुर से] पहले की भी अपेक्षा अधिक सम्मान, बहुमूल्य वस्त्र, बहुत-से ग्राम और सेवक प्राप्त किये ॥ १६ ॥ इस प्रकार त्रैलोक्य को अपने वश में करके वह दैत्य [त्रिपुरासुर] अत्यन्त आनन्दित हुआ और उधर सभी देवता गुफाओं में रहते हुए नित्य चिन्तित रहते थे कि इस दैत्य का वध कैसे, किस समय और किसके द्वारा होगा ? हम लोग यह भी नहीं जानते कि इसने कहाँ से यह वरदान प्राप्त कर लिया है ॥ १७-१८ ॥ हे मुनिश्रेष्ठ (व्यासजी) ! [जब] देवता लोग इस प्रकार से व्याकुल थे तो [उसी समय] अपनी इच्छा से त्रिलोकी में विचरण करने वाले नारदजी वहाँ आये ॥ १९ ॥ [वे] उन दीन दशावाले देवों को देखकर आकाश- मार्ग से नीचे उतर आये। नारदजी को सहसा आया देखकर वे सब आदरपूर्वक उठकर खड़े हो गये ॥ २० ॥ अवस्था के अनुसार उनमें से कुछ ने उनका आलिंगन किया, कुछ ने नमस्कार किया और कुछ ने उनका पूजन किया; तत्पश्चात् विश्राम के अनन्तर [उन्होंने उनसे] त्रिपुर के वरदान आदि के विषय में पूछा ॥ २१ ॥ देवता बोले — त्रिपुरासुर ने स्थावर-जंगमात्मक सम्पूर्ण प्राणियों सहित त्रैलोक्य को अधीन कर लिया है। उसने हमारे स्थान छीन लिये हैं; ब्रह्मा, विष्णु और शंकर को भी उसने जीत लिया है ॥ २२ ॥ हे [मुने]! अब हम किसकी शरण में जायें? उसका वध कैसे हो ? इस त्रिपुर को किसने वरदान दिया है — यह हमें बतलाइये ॥ २३ ॥ नारदजी बोले — [हे देवताओ!] दैत्य त्रिपुरासुर द्वारा किये गये महान् प्रयास को मैं संक्षेप में कहता हूँ, उसने दिव्य सहस्र वर्षों तक परम तप किया था ॥ २४ ॥ उसने देवाधिदेव भगवान् गणेश को [अपनी तपस्या से] प्रसन्न किया। उन्होंने उसे सबके लिये दुर्धर्ष और भयंकर वर प्रदान किये ॥ २५ ॥ [उन्होंने उसे] एकमात्र परमात्मा शंकर के अतिरिक्त देवताओं, ऋषियों, पितरों, भूतो, यक्षों, राक्षसो, पिशाचों और नागों से अभय होने का वर प्रदान किया है ॥ २६ ॥ अतः [आप लोग] आदरपूर्वक देवताओं के स्वामी गजानन गणेशजी को प्रसन्न करें; सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाले विघ्नेश्वर की आप सभी लोग आराधना करें ॥ २७ ॥ देवता बोले — हे मुनिश्रेष्ठ! उन बुद्धिमान् देवाधिदेव का आराधन कैसे करना चाहिये, कृपया इसे हम सबसे कहिये ॥ २८ ॥ नारदजी बोले — मैं आप सबके प्रति [गणेशजी के] एकाक्षर मन्त्र का कथन करता हूँ, आप सब मेरे द्वारा प्रदत्त उस मन्त्र का स्थिर मन से भक्तिपूर्वक तबतक अनुष्ठान करें, जबतक कि वे देव गणनायक प्रत्यक्ष प्रकट होकर दर्शन न दे दें ॥ २९-३० ॥ वे ही आप सबसे उसके वध का उपाय कहेंगे, [इस विषय में] मैं कोई अन्य उपाय नहीं देखता हूँ। इसलिये मेरे वचन का पालन करो ॥ ३१ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी!] नारदमुनि ने ऐसा कहकर और उन सबको उस (एकाक्षर) मन्त्र का उपदेश देकर वीणा पर [ भगवन्नाम का] गान करते हुए तत्क्षण वहाँ से प्रस्थान कर दिया ॥ ३२ ॥ तदनन्तर वे सभी श्रेष्ठ देवता गणेशजी के ध्यान में संलग्न हो गये। उनमें से कुछ एक पैर पर, कुछ पद्मासन में और कुछ वीरासन में स्थित थे; कुछ ने अपने नेत्र बन्द कर रखे थे। वे सब श्वास पर नियन्त्रण करके निराहार रहते हुए मुनि द्वारा उपदिष्ट मन्त्र का जप करने लगे ॥ ३३-३४ ॥ तदनन्तर बहुत समय बीत जानेपर करुणासागर गजानन गणेशजी देवताओं के दीर्घकाल से चल रहे अनुष्ठान को देखकर उनके समक्ष प्रकट हुए। उन वरदायक [गणेशजी] – के [सिर पर] स्वर्ण मुकुट और [कानों में] सुन्दर कुण्डल सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥ उन्होंने अपने हाथ में दाँत धारण कर रखा था, उनके शरीर पर श्रेष्ठ बाजूबन्द और कटिसूत्र शोभायमान हो रहे थे। उन्होंने अपनी भुजाओं में पाश, अंकुश, परशु और कमल धारण कर रखे थे ॥ ३७ ॥ उनका [मस्तक] रक्तचन्दन, कस्तूरी, सिन्दूर और चन्द्रमा से विभूषित था। उनके श्रीविग्रह का तेज विद्युत् के समान और उनकी कान्ति करोड़ों सूर्यों की प्रभा के समान थी ॥ ३८ ॥ सहसा अनामय देव विनायक को [अपने समक्ष] देखकर सभी देवता उनके तेज से पराभूत हो गये। उनमें से कुछ भयभीत हो गये, कुछ देवता सहसा उन गजानन को प्रणाम करने लगे, कुछ अन्य देवताओं ने हर्ष से गद्गद वाणी में उनका पूजन किया ॥ ३९-४० ॥ संकट से रक्षा करने वाले और कृपा करने के लिये उत्सुक उन सुन्दर मुखवाले भगवान् गणेश का कुछ देवताओं ने अपने संकट के विनाश हेतु स्तवन भी ‘किया ॥ ४१ ॥ ॥ देव कृत सङकटनाशन गणेश स्तोत्र ॥ ॥ देव ऊचुः ॥ नमो नमस्ते परमार्थरूप नमो नमस्तेऽखिलकारणाय । नमो नमस्तेऽखिलकारकाय सर्वेन्द्रियाणामधिवासिनेऽपि ॥ ४२ ॥ नमो नमो भूतमयाय तेऽस्तु नमो नमो भूतकृते सुरेश । नमो नमः सर्वधियां प्रबोध नमो नमो विश्वलयोद्भवाय ॥ ४३ ॥ नमो नमो विश्वभृतेऽखिलेश नमो नमः कारणकारणाय । नमो नमो वेदविदामदृश्य नमो नमः सर्ववरप्रदाय ॥ ४४ ॥ नमो नमो वागविचारभूत नमो नमो विघ्ननिवारणाय । नमो नमोऽभक्तमनोरथघ्न नमो नमो भक्तमनोरथज्ञ ॥ ४५ ॥ नमो नमोऽभक्तमनोरथेश नमो नमो विश्वविधानदक्ष । नमो नमो दैत्यविनाशहेतो नमो नमः सङ्कटनाशकाय ॥ ४६ ॥ नमो नमः कारूणिकोत्तमाय नमो नमो ज्ञानमयाय तेऽस्तु । नमो नमोऽज्ञानविनाशनाय नमो नमो भक्तविभूतिदाय ॥ ४७ ॥ नमो नमोऽभक्तविभूतिहन्त्रे नमो नमो भक्तविमोचनाय । नमो नमोऽभक्त विबन्धनाय नमो नमस्ते प्रविभक्तमूर्ते ॥ ४८ ॥ नमो नमस्तत्त्वविबोधकाय नमो नमस्तत्त्वविदुत्तमाय । नमो नमस्तेऽखिलकर्मसाक्षिणे नमो नमस्ते गुणनायकाय ॥ ४९ ॥ देवता बोले — हे परमार्थरूप! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अखिल [सृष्टि]-के कारणरूप हैं, आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण प्राणियों को [इस भवसागर से] तारने वाले हैं, आपको नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियों की] सभी इन्द्रियों में भी निवास करते हैं, आपको नमस्कार है ॥ ४२ ॥ आप सम्पूर्ण प्राणियों में स्थित हँ; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे देवेश! आप भूत-सृष्टि के कर्ता हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप [सम्पूर्ण प्राणियों की] बुद्धि के प्रबोधरूप हैं, संसार की उत्पत्ति और लय करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४३ ॥ हे अखिलेश! आप विश्व का भरण-पोषण करने वाले हैँ; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप कारणों के भी कारण हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप वेद के विद्वानों के लिये भी अदृश्य हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सबको वर प्रदान करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४४ ॥ हे वाणी से अनिर्वचनीय [परमात्मन्]! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप विघ्नों का निवारण करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अभक्त के मनोरथ का नाश करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे भक्त के मनोरथ को जानने वाले! आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४५ ॥ हे अव्यक्त मनोरथों के स्वामी! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। हे विश्व का विधान करने में दक्ष (कुशल)! आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप दैत्यों के विनाश में हेतुरूप (कारणरूप) हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप संकटों का नाश करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४६ ॥ आप करुणा करने वालों में सर्वोत्तम हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप ज्ञानमय स्वरूपवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अज्ञान का विनाश करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है । आप भक्तों को ऐश्वर्य प्रदान करनेवाले है; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४७ ॥ आप अभक्तों के ऐश्वर्य का नाश करने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप भक्तों को [भव]-बन्धन से मुक्त करनेवाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप अभक्तों को बन्धन में डालने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप पृथक्-पृथक् स्वरूप से विभिन्न मूर्तियों में (सम्पूर्ण प्राणियों में) व्याप्त हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४८ ॥ आप तत्त्वबोध कराने वाले हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप तत्त्वज्ञों में सर्वश्रेष्ठ हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप सम्पूर्ण कर्मों के साक्षी हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है। आप गणों के नायक हैं; आपको नमस्कार है, नमस्कार है ॥ ४९ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] इस प्रकार देवताओं द्वारा स्तुति किये जाने पर परमात्मा गजानन गणेशजी ने उन श्रेष्ठ देवताओं को हर्षित करते हुए परम प्रसन्नतापूर्वक कहा — ॥ ५० ॥ गणेशजी बोले — हे देवताओ! मैं आप सबके द्वारा किये गये स्तवन और तप से सन्तुष्ट हूँ। हे देवेश्वरो ! मैं आप सबके सम्पूर्ण मनोरथों को प्रदान करूँगा, आप वह सब माँग लीजिये ॥ ५१ ॥ देवता बोले — हे देवेश! यदि आप प्रसन्न हैं तो दानव त्रिपुरासुर, जो हमारे सभी अधिकारों को लेकर बैठा है, उसका वध कर दीजिये ॥ ५२ ॥ आपने ही इसे सम्पूर्ण देवसमूह से अभय प्रदान किया है, जिससे हम लोग संकट में पड़ गये हैं, हम आपकी शरण में आये हैं, आप हमें इस संकर से शीघ्र छुड़ायें — यही हम सबके लिये वर है ॥ ५३१/२ ॥ गणेशजी बोले — [हे देवताओ!] मैं उस अत्यन्त भयंकर राक्षस से आप सबके भय का अवश्य निवारण करूँगा। आप लोगों के द्वारा किया गया यह स्तोत्र मुझे अत्यन्त प्रीति प्रदान करने वाला है, यह स्तोत्र संकटनाशन के नाम से विख्यात होगा। पढ़ने तथा सुनने वाले लोगों के लिये यह सभी मनोरथों को देनेवाला होगा। तीनों सन्ध्याओं में जो इसका पाठ करेगा, वह कभी भी संकट को प्राप्त नहीं होगा ॥ ५४-५६ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] इस प्रकार उन देवताओं को वरदान देकर जगत् के स्वामी परमात्मा गणेशजी मुनियों और देवताओं के देखते-देखते वहीं अन्तर्धान हो गये ॥ ५७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘स्तोत्रनिरूपण नामक चालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४० ॥ 2. अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल-ये पृथ्वीके नीचे स्थित सात लोक हैं; जिनकी सप्तपाताल संज्ञा है। Content is available only for registered users. 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