August 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-41 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इकतालीसवा अध्याय श्रीगणेशजी का कलाधर विप्र के रूप में त्रिपुरासुर के पास आना और उसे स्वर्ण, रजत एवं लौह से निर्मित तीन पुर प्रदान करना अथः एकचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः गजाननेन ब्राह्मणरूपेण त्रिपुरं पुरतः समर्पणम् व्यासजी बोल — हे चतुर्मुख ब्रह्माजी! [सृजन, पालन और संहार आदि] सम्पूर्ण कार्यों को सम्पन्न करने वाले वरदायक भगवान् गणेशजी ने क्या किया — यह मुझ जिज्ञासु को बतलाइये ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] तदनन्तर गजानन गणेशजी ब्राह्मण का रूप धारणकर त्रिपुरासुर के पास गये। वहाँ उन ब्राहमणश्रेष्ठ ने उसे महामूल्यवान् आसन पर विराजमान देखा ॥ २ ॥ उसने उठकर उन्हें नमस्कार करके अपने आसन पर बैठाया और सम्यक् रूप से उनका पूजनकर पूछा कि “हे द्विज! आपका आगमन कहाँ से हुआ है ?॥ ३ ॥ हे द्विज! आपने किस विद्या का ज्ञान प्राप्त किया है? आपका नाम क्या है ? आपके आने का प्रयोजन क्या है ?यह सब मुझ जिज्ञासु को बताइये, मैं शक्तिभर आपके कार्य को पूर्ण करूँगा’ ॥ ४ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले — हे दैत्य [राज]! हम सर्वज्ञ और सब कुछ जानने वाले हैं; परहित की कामना से इच्छानुसार लोकों में भ्रमण करते रहते हैं और जहाँ सायंकाल हो जाता है, वहीं रुक जाते हैं ॥ ५ ॥ मैं तीनों लोकों में ‘कलाधर’ नाम से प्रसिद्ध हूँ और आपके वैभव को देखने की इच्छा से आपके भवन में आया हूँ। सम्प्रति आपकी सम्पूर्ण सम्पदा को देखकर हम तृप्त हो गये। इस प्रकार की सम्पत्ति तो कैलास, वैकुण्ठ और ब्रह्मलोक में भी नहीं है। इन्द्रलोक में भी ऐसी सम्पत्ति नहीं है, जैसी आपके पास दिखायी देती है ॥ ६-७१/२ ॥ दैत्य ( त्रिपुरासुर) बोला — हे द्विज! आपका नाम ही कलाधर है या आप उसे जानते भी हैं ?॥ ८ ॥ सम्पूर्ण लोकों की सम्पदाओं में आप जो इस सम्पदा की प्रशंसा कर रहे हैं तो यदि आप जानते हों तो मुझे उनमें जो सर्वश्रेष्ठ हो, उसे दिखायें ॥ ९ ॥ हे विज! उसे देखकर मैं आपको आपका वांछित [अवश्य] प्रदान करूँगा, भले ही वह मेरा प्रिय प्राण ही क्यों न हो। हे मुने! मुझे स्मरण नहीं है कि मैंने परिहास में भी कभी असत्य बोला हो ॥ १० ॥ कलाधर बोले — हे देवशत्रु! दूसरों की सम्पदा को देखकर तुम्हारा क्या प्रयोजन सिद्ध होगा? तुम्हारी विनम्रता से मैं प्रसन्न हूँ और अपनी कला से तुम्हें एक बाण पर स्थित स्वर्ण, रजत और लौह निर्मित तीन पुर प्रदान करता हूँ। हे दैत्य! तुम दीर्घकाल तक वहाँ रहकर सुखपूर्वक रमण करो ॥ ११-१२ ॥ ये तीनों पुर देवताओं, गन्धर्वों, मनुष्यों और सर्पों द्वारा अभेद्य, मनोवांछित पदार्थों को देने वाले, इच्छानुसार गमन करने वाले, इच्छित भोगों को प्रदान करने वाले और मंगलमय हैं ॥ १३ ॥ हे दैत्य! कुछ काल बीत जाने पर जब भगवान् शिव एक ही बाण से उनका भेदन कर देंगे, तभी उनका नाश होगा ॥ १४ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] ऐसा कहकर [उन द्विजरूपधारी गणेशजी ने] धनुष लेकर और उसपर बाण का संयोजन कर तीन पुरों का निर्माण किया, जो तीन लोकों के सदृश थे। वे [तीनों.पुर] विशेष रूप से चित्रित भवनों, मनोरम दीर्घिकाओं (जलाशयो) और उद्यानों से युक्त थे; वहाँ अनेक प्रकार के पक्षिसमूह कलरव करते थे। वे तीनों पुर सभी प्रकार के भोगों को प्रदान करने वाले और आकाशमार्ग से गमन करने वाले थे ॥ १५-१६ ॥ [गणेशजी की] माया से मोहित वह दैत्य त्रिपुरासुर वहाँ (उन पुरों के मध्य में) स्थित होकर अत्यन्त हर्षित हुआ। उस दैत्य ने मेघसदृश गर्जन किया, जिससे तीनों लोक काँपने लगे। त्रैलोक्य को क्षुभित करके उसने “मुझसे श्रेष्ठ कोई नहीं है’ — इस प्रकार गर्व और दर्प से युक्त होकर उन ब्राह्मण-देवता (द्विजरूपधारी गणेशजी)- से इस प्रकार कहा — ॥ १७-१८ ॥ हे दविजश्रेष्ठ! आप दुर्लभ-से-दुर्लभ पदार्थ माँगिये, वह मैं आपको दूँगा। यह सुनकर उन द्विज (कलाधर)- ने उस दैत्य (त्रिपुरासुर)-से किसी वस्तु को स्पृहा न होते हुए भी कहा — ॥ १९ ॥ द्विजरूपधारी गणेशजी बोले — मै कैलासपर्वत पर गया था, वहाँ मैने शिवजी द्वारा सम्यक् रूप से पूजित उत्तम गणेशमूर्ति का दर्शन किया, जो समस्त मनोरथों को पूर्ण करने वाली थी। हे असुरेश्वर ! यदि आपमें शक्ति है, तो उसे लाकर मुझे दीजिये; क्योंकि तीनों लोकों में विचरण करते हुए मैंने वैसी मूर्ति कहीं नहीं देखी ॥ २०-२१ ॥ अतः हे दैत्यश्रेष्ठ | उसमें मेरा मन आसक्त हो गया है, हे असुरेशवर! उसे प्राप्तकर मैं कृतकृत्य हो जाऊँगा। मैं चराचरसहित तीनों लोकों में आपकी कीर्ति का विस्तार करूँगा कि ‘त्रिपुरासुर से श्रेष्ठ कोई दाता नहीं है, जो वांछित वस्तु को प्रदान करता है’ ॥ २२-२३ ॥ दैत्य [ त्रिपुरासुर ] बोला — हे द्विजश्रेष्ठ! मैं शंकर को अपना किंकर (सेवक) मानता हूँ, अन्य देवताओं की तो मैं कोई गणना ही नहीं करता। मैं उस मूर्ति को लाकर आपको प्रदान करूँगा ॥ २४ ॥ [उस दैत्य ने] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर का आदरपूर्वक पूजन किया। उसने उन्हें दस ग्राम, गौएँ, वस्त्र, आभूषण, मोती, मूँगे तथा अन्य बहुत-से रत्न एवं रंकु मृग के रोम से बने हुए कम्बल और अनेक प्रकार के आभूषणों से विभूषित सैकड़ों दास-दासियाँ प्रदान किये। उस असुर ने श्रेष्ठ अश्वों से युक्त एवं चाँदी से निर्मित बहुत-से रथ भी उन्हें प्रदान किये, जो रथ की रक्षा करने वाले कवच और सोने के धुरों से युक्त थे ॥ २५-२७ ॥ उस (त्रिपुरासुर) -के द्वारा आग्रहपूर्वक दी गयी सम्पूर्ण दान-सामग्रियों आदि को ग्रहणकर वे [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर अपने आश्रम को प्रस्थान कर गये। [उन्हें देखकर] उनकी पत्नी और सम्पूर्ण आश्रमवासी हर्षित हो गये ॥ २८ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी!] इस प्रकार इस सम्पूर्ण वृत्तान्त को नारदजी ने देवताओं से कहा। वे देवता भी उचित समय की प्रतीक्षा करते हुए दिन व्यतीत करने लगे ॥ २९ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में “नारदागमन’ नामक इकतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ॥ ४१ ॥ Content is available only for registered users. 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