श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-42
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
बयालीसवाँ अध्याय
भगवान् शंकर और त्रिपुरासुर का युद्ध
अथः द्विचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
शङ्करत्रिपुरयोर्युद्धम्

व्यासजी बोले — [हे ब्रह्मन्!] उन [द्विजश्रेष्ठ] कलाधर के चले जाने के बाद उस दैत्य (त्रिपुरासुर ) – ने क्या किया? उस मंगलमयी चिन्तामणि [गणेशजी की] मूर्ति को उसने कैसे लाकर उन कलाधर को प्रदान किया ? हे चतुरानन ब्रह्माजी ! यह सब मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये; क्योंकि गजानन गणेशजी की लीलाओं को संक्षेप में सुनकर मैं तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ॥ १-२ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे मुनिश्रेष्ठ ! उन [ द्विजश्रेष्ठ कलाधर]-के चले जाने के बाद उस दैत्य त्रिपुरासुर ने जो कुछ किया, वह सब मैं कहूँगा; हे मुने! उसे सावधान होकर श्रवण करो ॥ ३ ॥ [तदनन्तर] उसने मन्दराचल पर स्थित शिव के पास दो दूतों को भेजा। उसने उन्हें यह सिखाया कि शिव पास जाकर आदरपूर्वक मेरी बात उनसे कहो कि तुम्हारे भवन में जो सम्पूर्ण मनोवांछित पदार्थों को प्रदान करने वाली चिन्तामणि – निर्मित मंगलमयी [गणेश ] मूर्ति है, हे पार्वतीपते ! उसे शान्तिपूर्वक दैत्यराज (त्रिपुरासुर ) – को दे दीजिये ॥ ४-५ ॥ पाताल, स्वर्गलोक या मर्त्यलोक में जो भी अद्भुत वस्तुएँ हैं, उन सबको वह दैत्य [राज] बलपूर्वक अपने घर में लाया है, अतः हे देव! उसे आप शीघ्र लाइये, उसे लेकर हम दोनों शीघ्र ही महाबली दैत्य त्रिपुरासुर के पास जायँ । यदि आप उसे शान्तिपूर्वक नहीं देंगे, तब वह पराक्रमी दैत्य उस मूर्ति को आपसे बलपूर्वक ले लेगा, तब आपको दुःख की प्राप्ति होगी — उस दैत्य के इस प्रकार के वचन सुनकर वे दोनों दूत शिव के पास गये ॥ ६-८ ॥

[वहाँ] उन दोनों ने दैत्यराज द्वारा सिखायी गयी बातें महादेवजी से कहीं। दूतों के इस प्रकार के वचन सुनकर त्रिनेत्रधारी भगवान् शिव क्रोध के कारण मूर्च्छित- से हो गये ॥ ९ ॥

उन्होंने कहा — हे दूतो! तुम दोनों दूत हो, इसलिये तुम दोनों द्वारा कहे गये वचनों को सुनकर भी मैं तुम्हें क्षमा कर दे रहा हूँ, अन्यथा तुम दोनों भी कामदेव की भाँति भस्म हो जाते, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १० ॥ मुझ परमात्मा के सामने तिनके के समान उस दैत्य की क्या सामर्थ्य है? फिर भी यदि वह मरने की ही इच्छा कर रहा है तो युद्ध के लिये मेरे पास आये ॥ ११ ॥ उसे यह मूर्ति सौ जन्मों में भी नहीं प्राप्त हो सकती; क्या प्रलयकाल की अग्नि किसी पतिंगे द्वारा बुझायी जा सकती है ॥ १२ ॥ क्या मूषक बल का प्रयोग करके सुमेरुपर्वत को गिरा सकता है ? असंख्य जल [बिन्दुओं ] -को निकाल देने से क्या महासागर सूख सकता है ? ॥ १३ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] भगवान् शंकर की वाणी सुनकर वे दोनों दूत जैसे आये थे, वैसे चले गये और भगवान् शम्भु ने जो कुछ कहा था, वह सब अपने स्वामी [त्रिपुरासुर]-से [जाकर] कह दिया ॥ १४ ॥ उसे सुनकर वह वाक्यार्थविशारद दैत्य [क्रोध से ] जल उठा। क्रोधाग्नि से प्रदीप्त वह ऐसा प्रतीत होता था, मानो तीनों लोकों को जला डालेगा ॥ १५ ॥ उसने अपनी चतुरंगिणी सेनाको युद्धके लिये [प्रस्थान करनेकी] आज्ञा दी और वह सेना सहसा निकलकर मन्दराचलके सम्मुख पहुँच गयी ॥ १६ ॥ उस सेना ने भूतल को वैसे ही आच्छादित कर लिया, जैसे [प्रलयकाल में] समुद्र अपनी सीमा का उल्लंघन कर [भूभाग को] आच्छादित कर लेता है। [उस समय ] कोशोंसे निकले हुए शस्त्र समूहों (-की चमक ) – से वह सेना अनेक सूर्यों के सदृश प्रतीत होती थी ॥ १७ ॥

मृत्यु के भी मन को कम्पित करने वाली वह सेना मेघ के समान घोर स्वर में गर्जना कर रही थी। उसके पीछे दैत्य [त्रिपुरासुर] भी महान् विमान के सदृश [स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित] तथा मनके सम वेगवाले त्रिपुर में आरूढ़ होकर भगवान् शम्भु को मारने की इच्छा से वहाँ आया ॥ १८१/२

उसने बड़ी-बड़ी मणियों से युक्त सुन्दर कवच, कुण्डल, बाजूबन्द, मोतियों की माला, अँगूठियाँ और सोने की करधनी धारण कर रखी थी । उसने [ सिरपर] रत्नजटित महामूल्यवान् और कान्तिमान् मुकुट कर रखा था ॥ १९-२० ॥ जिसके महान् शब्द से [अखिल सृष्टि का संहार करने वाले] भगवान् हर (महादेव) – ) – का भी मन कम्पित हो गया; तूणीरसहित धनुष, कछुए की पीठ से निर्मित ढाल और दृढ़ खड्ग तथा दिव्य शक्ति; जिसे वह दैत्यश्रेष्ठ धारण किये था, सुशोभित हो रही थी । गायन करते हुए गन्धर्वगण, नृत्य करती हुई अप्सराएँ, [स्तुति -पाठ करते हुए] बन्दी और चारण प्रसन्नतापूर्वक उसके आगे-आगे चल रहे थे ॥ २१-२२१/२

भगवान् शंकर ने दूत का यह वचन सुनकर कि काल द्वारा कर्षित (खिँचा हुआ) वह दैत्य त्रिपुरासुर युद्ध करने की इच्छा से असंख्य सेना लेकर आ गया है, उन शूलपाणि ने भी भगवान् गजानन का सम्यक् रूप से पूजनकर, उन्हें प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके अपनी सेना को अग्रसरकर क्रोध से आँखें लाल किये हुए अपने स्थान से रणमण्डल में आये ॥ २३–२५ ॥ तब [दोनों सेनाओं के] वे वीर योद्धा वीरतापूर्ण शब्दों के घोष से दसों दिशाओं को अनुनादित करते हुए एक-दूसरे के वध की इच्छा से अपने अस्त्र-शस्त्रोंसहित चल पड़े ॥ २६ ॥ रण के मुहाने पर दोनों सेनाओं के मिलने से इतनी धूल उड़ी कि अन्धकार छा गया। उस समय सैनिकों को अपना-पराया नहीं सूझता था, वे केवल शस्त्र प्रहार कर रहे थे ॥ २७ ॥

[उस समय दोनों सेनाओं में] कोलाहलयुक्त भयंकर युद्ध हुआ, जिससे कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था। मरे हुए हाथियों, घोड़ों, रथियों और पैदल वीरों के रक्त से पृथ्वी रक्तमयी हो गयी ॥ २८ ॥ धूल के शान्त हो जाने पर वीर योद्धा [ शत्रुपक्ष ]- के दूसरे योद्धाओं से युद्ध करने लगे। उनमें से कुछ भालों से, कुछ खड्गों से, कुछ पत्थर पर घिसकर तेज किये गये बाणों से, कुछ ऋष्टि (दुधारी तलवार ) – से, कुछ मुष्टिका से, कुछ परशु से, तो कुछ तोमरों से युद्ध कर रहे थे ॥ २९१/२

वहाँ मारे गये वीरों, घोड़ों और पैदल सैनिकों के रक्त से एक रक्त की नदी उत्पन्न हो गयी, जिसमें शैवाल की भाँति केश प्रवाहित हो रहे थे । [ उस नदी में] ढालें कछुओं की भाँति, तलवारें मत्स्यों की तरह और [योद्धाओं के कटे] सिर कमलसदृश प्रतीत हो रहे थे ॥ ३०-३१ ॥ भयंकर से भी भयंकर प्रतीत होने वाली उस नदी में छत्र आवर्त (भँवर)-की भाँति और कबन्ध वृक्ष की भाँति बह रहे थे। वह वीरों के मन में सन्तोष उत्पन्न करने वाली और गृध्रों एवं शृगालों के लिये प्रसन्नता का कारण थी ॥ ३२ ॥ उस नदी को देखकर गिरिशायी बलवान् भगवान् शंकर दैत्य त्रिपुरासुर के निकट गये, [तब] वह दैत्य भी त्रिपुर में आरूढ़ होकर सेना के साथ उनके सामने आया ॥ ३३ ॥

तब दोनों नायकों को युद्धोद्यत देखकर भगवान् शंकर और त्रिपुरासुर के सैनिक बिना व्याकुल हुए परस्पर द्वन्द्व-युद्ध करने लगे ॥ ३४ ॥ उस समय वे अनेक प्रकार के आयुधों दिव्य अस्त्र-शस्त्रों और वृक्षों से प्रहार कर रहे थे। उन योद्धाओं के नामों और युद्धविषयक चेष्टाओं को मैं [आगे] संक्षेप में कहूँगा ॥ ३५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘युद्ध का वर्णन’ नामक बयालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४२ ॥

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