August 23, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-44 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौवालीसवाँ अध्याय नारदजी के निर्देश से भगवान् शंकर का तप करके गणेशजी को प्रसन्न करना अथः चतुश्चत्वारिंशोऽध्यायः शङ्करेण तपः, गजाननेन दर्शनम्, शङ्करेण वरप्राप्तिः व्यासजी बोले — [हे ब्रह्मन्!] तब त्रिपुरासुर से पराजित शम्भु ने क्या किया ? कैसे उस जयशाली दैत्य त्रिपुरासुर पर उन्होंने विजय प्राप्त की ? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — [हे व्यासजी !] तब भूतल को स्वाहा और स्वधा से विहीन (देवकार्य और पितृकार्य से विहीन) समझकर भगवान् शम्भु मन में बार-बार चिन्ता करने लगे कि देवगण कब कष्ट से मुक्त होंगे और अपने स्थान को प्राप्त कर सकेंगे अथवा किस उपाय से इस दुर्जय [ दैत्य ] – की पराजय होगी ? ॥ २-३ ॥ उनके इस प्रकार चिन्तातुर होने पर संयोग से [उसी समय] मुनिश्रेष्ठ नारदजी भगवान् शंकर और सभी देवताओं को देखने के लिये आये ॥ ४ ॥ उन्हें देखकर भगवान् शिव वैसे ही हर्षित हो उठे, जैसे कोई मुमूर्षु व्यक्ति अमृत को प्राप्त करके हर्षित हो उठता है। उन्होंने उन्हें आसन पर विराजमानकर उनका विधिवत् पूजन किया ॥ ५ ॥ चिन्ता से अत्यन्त आतुर उन शिव ने उनका आलिंगन करके देवताओं के हित और दैत्य के वध की इच्छा से उनसे कह — ॥ ६ ॥ शिवजी बोले — [हे मुनिवर !] दैत्य त्रिपुरासुर ने सम्पूर्ण देवताओं को बलपूर्वक पराजितकर उनकी दुर्दशा कर दी है। उसके साथ संग्राम में सभी देवताओं को विफल मनोरथ होकर भागना पड़ा ॥ ७ ॥ हे ब्रह्मन्! वे देवता दसों दिशाओं में भाग गये हैं। मैं नहीं जानता कि कौन कहाँ है । मेरे भी अस्त्र उसके अस्त्रों से [टकराकर] सहस्रों खण्ड हो गये हैं ॥ ८ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी !] मुनिश्रेष्ठ नारदजी ने शिवजी के वचन सुनकर तीनों लोकों के ईश्वर शिव के पराभव को परम आश्चर्य का विषय मानते हुए उनसे कहा — ॥ ९ ॥ नारदजी बोले — हे प्रभो ! आप सब कुछ जाननेवाले, सम्पूर्ण विद्याओंके स्वामी, सबके स्वामी, सब कुछ करने वाले, सबके रक्षक, सबका संहार करने वाले, सबका नियमन करने वाले, कर्तुमकर्तुमन्यथाकर्तुं समर्थ, अणिमादि सिद्धियों से युक्त तथा षड् ऐश्वर्यों 1 के साथ विलास करने वाले हैं। हे देव ! आप समस्त वक्ताओं में श्रेष्ठ हैं; मैं गायन में आसक्त होकर त्रिलोकी में निरन्तर भ्रमण करने वाला मुनि आपके समक्ष क्या कह सकता हूँ? फिर भी आपके वचनों का मान रखने के लिये विचार करके कुछ कहता हूँ ॥ १०–१२१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी ! ] इस प्रकार कहकर और क्षणभर ध्यान करके मुनि [ नारदजी] -ने शिवजी से पुनः कहा — ॥ १३ ॥ नारदजी बोले — हे वह्निनेत्र (जिनके नेत्र में अग्नि का निवास है) ! हे पिनाकधृक् (पिनाक नामक धनुष धारण करने वाले) ! आपने युद्ध के लिये जब प्रस्थान करने की कामना की थी, उस समय आपने गणों के अधिपति गणेशजी का अर्चन नहीं किया था, इसीलिये आप पराभव को प्राप्त हुए। इस समय पहले आप विघ्नों का निवारण करने वाले विघ्नेश्वर का अर्चन कीजिये, उन्हें आदरपूर्वक प्रसन्न करके, उनसे वर प्राप्त कर युद्ध के लिये प्रस्थान कीजिये । आप उस दैत्य को पराजित करेंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं है ॥ १४- १५१/२ ॥ उस [दैत्य]-ने भी पूर्वकाल में महान् तपस्या के द्वारा उन देव [भगवान् गणेश ] -की आराधना की थी । उस तप के फलस्वरूप उन अखिल विघ्नसमूहों के हर्ता गणेशजी ने उसे वर दिया था कि महेश्वर से अतिरिक्त और किसी से भी तुम्हारी मृत्यु नहीं होगी ॥ १६-१७ ॥ इसलिये हे गिरिशायी शिव! आप उसके इच्छानुसार गमन करने वाले त्रिपुर (स्वर्ण, रजत और लौहनिर्मित तीन विमानों ) — को एक बाण से विदीर्ण कर दीजिय — यही आपकी विजय का उपाय कहा गया है ॥ १८ ॥ ब्रह्माजी बोले — गजमुख गणेशजी द्वारा कही गयी वाणी को स्मरणकर और मुनिश्रेष्ठ नारदजी द्वारा [कहे गये ] उपाय का श्रवणकर गिरिशायी भगवान् शंकर अत्यन्त हर्षित हुए और उन्होंने पुनः उनसे कहा — ॥ १९ ॥ शिवजी बोले — हे ब्रह्मन् ! आपने सत्य कहा है। हे मुने! आपकी बात से मुझे पूर्वकाल में [गणेशजी द्वारा ] उपदिष्ट दो मन्त्रों का स्मरण हो आया है। उनमें से एक षडक्षर और दूसरा एकाक्षर मन्त्र है। वे दोनों [मन्त्र] संकट का हरण करने वाले हैं। युद्ध में विशेष रूप से संलग्न चित्तवाला होने के कारण न तो मैं उन दोनों मन्त्रों का जप कर सका, न सम्यक् रूप से स्मरण ही कर सका । २०-२१ ॥ सम्पूर्ण विघ्नों का हरण करने वाले, सबके कारणस्वरूप, सृजन-पालन और संहार करने वाले गजानन भगवान् विनायक का मैंने स्मरण भी नहीं किया था ॥ २२ ॥ [नारद] मुनि बोले — हे महादेव ! उन महान् देव गजानन गणेशजी को आप प्रसन्न कीजिये ॥ २२१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी!] तब नारदजी को विदाकर भगवान् शिव तपस्या करने के लिये चले गये ॥ २३ ॥ उन्होंने दण्डकारण्यदेश में पद्मासन पर स्थित होकर बलपूर्वक इन्द्रियों का नियमन करके [गणेशजी के] ध्यान में तत्पर होकर [गणेशमन्त्र का] जप किया ॥ २४ ॥ [इस प्रकार] उन भगवान् शंकर ने सौ वर्षों तक उग्र तप किया, तब उनके मुखकमल से एक श्रेष्ठ पुरुष आविर्भूत हुआ ॥ २५ ॥ उसके पाँच मुख, दस भुजाएँ, मस्तक पर चन्द्रमा, गले में मुण्डों की माला, सर्पों के आभूषण, [सिर पर] मुकुट और [हाथों में] बाजूबन्द शोभित हो रहे थे। उसकी [श्रीविग्रह की] प्रभा चन्द्रमा के समान थी ॥ २६ ॥ उसकी कान्ति अग्नि, सूर्य और चन्द्रमा की कान्ति को तिरस्कृत कर रही थी। उसने [अपनी दसों भुजाओं में ] दस आयुध धारण कर रखे थे। उसकी कान्ति से धर्षित उन भगवान् शिव ने उस उग्र स्वरूपवाले [ श्रेष्ठ पुरुष]-को अपने सम्मुख स्थित देखा ॥ २७ ॥ उस दूसरे पंचमुख शिव के समान पंचमुख विनायक को देखकर भगवान् शिव ने विचार किया कि क्या मैं ही दो शरीर वाला हो गया हूँ! ॥ २८ ॥ अथवा क्या मेरा ही रूप धारण करके यह त्रिपुरासुर आ गया है? क्या तैंतीस करोड़ देवताओं में कोई दूसरा भी पाँच मुखवाला है?॥ २९ ॥ अथवा मैंने यह कोई दीर्घकालिक स्वप्न देख लिया है या सम्पूर्ण विघ्नों का हरण करने वाले जिन [इष्ट-] देव का मैं रात-दिन ध्यान करता हूँ, वे गजानन ही मुझे वर देनेके लिये आ गये हैं! ॥ ३०१/२ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [ हे व्यासजी !] उन [शिव] -के इस प्रकार के वचन सुनकर गजानन गणेशजी ने कहा — हे देव! आप अपने अन्तःकरण में जिसका ध्यान करते हैं, मैं वही विघ्नहर्ता विभु हूँ । मेरे स्वरूप को देवता, ऋषि और चार मुखों वाले ब्रह्माजी भी नहीं जानते हैं ॥ ३१-३२ ॥ उपनिषदों सहित वेद भी मेरे स्वरूप को नहीं जानते तो षट्शास्त्रियों (षड्दर्शन 2 के जानने वालों) की तो बात ही क्या ? मैं ही अखिल भुवनों का सृजन, रक्षण और संहार करने वाला हूँ ॥ ३३ ॥ ब्रह्मा से लेकर त्रिगुण (सत्त्व, रज, तम) से युक्त सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक प्राणियों का मैं ही स्वामी हूँ । तुम्हारी इस तपस्या से सन्तुष्ट होकर मैं तुम्हें वर देने के लिये यहाँ आया हूँ । हे महादेव ! आप जितने वरदान चाहते हों, उन्हें मुझसे माँग लें, मैं आप पर सन्तुष्ट हूँ, अतः वे सभी वर प्रदान करूँगा, इसमें सन्देह न करो ॥ ३४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘तपोवर्णन’ नामक चौवालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४४ ॥ 1. ‘सर्वज्ञता तृप्तिरनादिबोधः स्वतन्त्रता नित्यमलुप्तशक्तिः । अनन्तशक्तिश्च महेश्वरस्य यन्मानसैश्वर्यमवैति वेदः ॥ (शिवपुराण, विद्येश्वरसंहिता १८ । १२) अर्थात् सर्वज्ञता, तृप्ति, अनादिबोध, स्वतन्त्रता, नित्य अलुप्त शक्ति आदि से संयुक्त होना और अपने भीतर अनन्त शक्तियों को धारण करना – महेश्वर के इन छः प्रकार के मानसिक ऐश्वर्यौं को केवल वेद जानता है। 2. ‘दृश्यते अनेन इति दर्शनम्’ अर्थात् ‘दर्शन’ शब्द का तात्पर्य है कि जिस शास्त्र या चिन्तन प्रक्रिया द्वारा किसी वस्तु के तात्त्विक स्वरूप को जाना जाय। दर्शन छः हैं — १. मीमांसा, २. वेदान्त, ३. न्याय, ४. वैशेषिक, ५. सांख्य और ६. योग । Content is available only for registered users. 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