श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-47
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सैंतालीसवाँ अध्याय
त्रिपुरदाह एवं त्रिपुरासुर का वध
अथः सप्तचत्वारिंशत्तमोऽध्यायः
शङ्करत्रिपुरयोर्युद्धम्, त्रिपुरदहनं

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन् ! गजानन गणेशजी के प्रसन्न होने तथा उनसे सहस्र नामों को प्राप्त कर लेने के अनन्तर शिवजी ने क्या किया; यह सब मुझसे कहिये ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] गणेशजी के द्वारा वरदान तथा सहस्रनाम का उपदेश प्राप्तकर भगवान् शंकर अत्यन्त प्रसन्न होकर नाचने लगे और उन्होंने महान् ध्वनि के साथ गर्जना की ॥ २ ॥ उन्होंने अपने गणों को बुलाया और देवताओं को आदेश दिया कि ‘युद्ध का अवसर आ गया है।’ तब वे देवता भी महान् हर्ष के साथ शिव के निकट गये ॥ ३ ॥ [उस समय] ब्रह्मा, कुबेर, इन्द्र, अग्नि, वायु, चन्द्रमा, वरुण, अर्यमा 1  और गन्धर्वों, यक्षों, ग्रहों, किन्नरों आदि सभी ने भगवान् शिव को नमस्कार कर उनकी स्तुति की — ॥ ४ ॥

देवता बोले — हे महादेव ! हे जगन्नाथ ! हे जगत् को आनन्द देने वाले ! [उस] महादैत्य (त्रिपुरासुर) – को आपके द्वारा मारा गया हम कब देखेंगे ? उस विश्वविघाती ने हम सबको स्थानभ्रष्ट (अपने अधिकारों से वंचित) कर रखा है ॥ ५१/२

ब्रह्माजी बोले — [हे व्यास!] देवताओं के ऐसे वचन सुनकर पिनाक धनुष को धारण करने वाले भगवान् महादेव ने मन-ही-मन गणेशजी का ध्यानकर और युद्ध करने का निश्चय करके प्रसन्नतापूर्वक [ वहाँ से] प्रस्थान किया और देवताओं एवं गन्धर्वों सहित अपने निवासस्थल पर जा पहुँचे ॥ ६-७ ॥ उधर गुप्तचरों ने उस दैत्य त्रिपुरासुर से सारा वृत्तान्त निवेदित किया कि देवताओं की सेना के साथ गिरिजापति महादेवजी युद्ध के लिये आ गये हैं ॥ ८ ॥

तब उसकी भी सेना शस्त्रास्त्रों और कवचों से सुसज्जित हो गयी और उस दैत्य ने भी युद्ध के लिये आभूषणरूप [शस्त्रास्त्र एवं कवच आदि ]- से विभूषित हो भयंकर गर्जन किया ॥ ९ ॥ उसने वस्त्र, माला आभूषण और धन से वीरों को आनन्दित किया। उसके योद्धागण अनेक प्रकार के वाहनों में सवार हो गये और वह महादैत्य त्रिपुरासुर दिशाओं और विदिशाओं को अपने नाद से पूरित करता हुआ स्वयं [सुवर्ण, रजत और लौहनिर्मित] त्रिपुर में आरूढ़ हुआ। तदनन्तर दोनों सेनाओं के मध्य महान् युद्ध प्रारम्भ हो गया ॥ १०-११ ॥

अनेक प्रकार के शस्त्रों तथा मर्मवेधी लौहबाणों के प्रहार से [सैनिकों के शरीर से निकलने वाले रुधिर से] मार्ग का अवरोधन करने वाली रक्त की नदी प्रवाहित होने लगी ॥ १२ ॥ [उस समय] शस्त्रों से घायल हुए योद्धा खिले हुए पलाश-पुष्प के वृक्षों की भाँति शोभित हो रहे थे । कुछ सैनिक शत्रुसैनिकों को दृढ़ वैर होने के कारण जीवित पकड़कर मार दे रहे थे ॥ १३ ॥ कुछ सैनिक शत्रुसैनिकों के सिर के बाल बलपूर्वक पकड़कर उनके सिर काट दे रहे थे । दौड़ते हुए रथों, पैदल वीरों, घोड़ों और हाथियों के पैरों से उठी हुई धूल क्षणभर में पृथ्वी से लेकर अन्तरिक्ष तक व्याप्त हो गयी । उस समय घोर-से भी घोर अन्धकार हो जाने से कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था ॥ १४-१५ ॥

योद्धागण उस समय भी अनेक प्रकार से भयंकर युद्ध कर रहे थे, उन्होंने जीवन की आशा छोड़ दी थी और मरने का निश्चय कर लिया था ॥ १६ ॥ वायु के द्वारा धूल उड़ा दिये जाने पर [युद्धभूमि में] बहुत-से देवता मरे पड़े दिखायी दिये । [यह देखकर ] देवताओं की सेना पलायन कर गयी, जिससे दैत्यसेना अत्यन्त हर्षित हुई ॥ १७ ॥ उस समय हाथ में वज्र धारण किये, युद्ध की इच्छावाले देवराज इन्द्र वहाँ आये। [उनके हाथ में ] तीक्ष्ण धारवाले वज्र को देखकर दैत्य और दानव भागने लगे। उन वज्रधारी इन्द्र ने अपने वज्र के प्रहार से असुरों को चूर-चूर कर डाला। उस प्रचण्ड वज्र के प्रहार से उन्होंने अपने प्राण छोड़ दिये ॥ १८-१९ ॥

उनमें से कुछ के पैर टूट गये, कुछ की गर्दन टूट गयी, कुछ के पेट फट गये और कुछ अन्य [असुरों ] -की भुजाएँ कन्धों से कटकर अलग हो गयीं ॥ २० ॥ कुछ (दैत्य, दानवों और असुरों) की जाँघें कट गयीं, कुछ अन्य का ऊरुभाग टूट गया। कुछ अन्य [दैत्यों]-के गुल्फ (टखने) कट गये और वे गिर पड़े तथा कुछ अन्य इस व्याज से अर्थात् ऐसी दुर्दशा के कारण भयवश गिर पड़े ॥ २१ ॥ योद्धाओं, घोड़ों और हाथियों के अंगों के कटने से तथा मरे हुए सैनिकों के शरीर से बहने वाले रक्त के कारण बहुत-सी नदियाँ उत्पन्न हो गयीं। वे विजय की इच्छा रखने वाले वीरों का उत्साहवर्धन करने वाली थीं ॥ २२१/२

तब इन्द्र द्वारा बहुत-सी सेना मारी गयी देखकर गर्जन करता हुआ त्रिपुरासुर धीरे-धीरे इन्द्र के पास युद्ध करने के लिये आया ॥ २३१/२

उसने इन्द्र को देखकर कहा — क्यों मरने की इच्छा करते हो? हे वासव! जीवित रहते हुए युद्ध से दूर हट जाओ, मैं पीठ पर वार नहीं करता । हे शचीपते ! तुममें मुझसे युद्ध करने की क्या सामर्थ्य है ? मुझे बताओ कि क्या बकरा भी सिंह के साथ युद्ध कर सकेगा ! शक्ति हो तो [मुझसे] युद्ध करो, अन्यथा सुखपूर्वक [यहाँ से] चले जाओ ॥ २४-२६ ॥

इस प्रकार कहने पर भी जब इन्द्र वहाँ स्थित रहे तो दैत्य [राज] त्रिपुरासुर ने धनुष को सुसज्जितकर (प्रत्यंचा चढ़ाकर) बहुत-से बाणों की वर्षा की और देवताओं की सेना पर प्रहार किया ॥ २७ ॥ मन्त्र से अभिमन्त्रित उसके एक बाण से असंख्य बाण निकलते थे। इस प्रकार उसने देवताओं और गन्धर्वों का मर्दनकर पृथ्वी और अन्तरिक्ष को बाणों से परिपूरित कर दिया ॥ २८ ॥ निरन्तर बाण-समूहों की वर्षा से पुनः अन्धकार हो गया। उन बाणों से वे देवता भी अंग-भंग होकर भूतल पर गिर पड़े ॥ २९ ॥ उन प्रचण्ड प्रहारों से पीड़ित होकर बलासुर का वध करने वाले इन्द्र भी भूमि पर गिर पड़े। तब सभी श्रेष्ठ देवताओं के मूर्च्छित हो जाने पर महेश्वर शिव उस आत्मप्रशंसा, गर्जन और युद्ध कर रहे त्रिपुरासुर को सहन न कर सके, फिर भी उन्होंने मन-ही-मन उस दैत्य के पुरुषार्थ की प्रशंसा की ॥ ३०-३१ ॥

इसी बीच वहाँ नारदजी युद्ध देखने की इच्छा से आये और भगवान् शम्भु के द्वारा पूजित होने पर बोले — हे नीललोहित! सुनो ॥ ३२ ॥

नारदजी बोले — हे महेश्वर ! त्रिपुरासुर के वध के विषय में आपको चिन्ता नहीं करनी चाहिये; मैं उसके वध का उपाय कहता हूँ, उसे कीजिये ॥ ३३ ॥ उसने (त्रिपुरासुर ने) पूर्वकाल में ऐसा तप किया था, जो ब्रह्माजी के लिये भी दुष्कर है; उसने गणेशजी की आराधना की थी और उन्होंने उसे सभी वांछित वर दिये थे। जो-जो वर उसने माँगे, भगवान् गणेश ने उसे बिना विचार किये ही दे दिये। उन्होंने उसे एक बाण पर स्थित और इच्छानुसार गति करने वाले तीन महान् पुर प्रदान किये, जो बिना वायु के गति करने वाले और सम्पूर्ण देवताओं से अभेद्य थे ॥ ३४-३५१/२

उन्होंने उससे यह गुप्त बात भी कही थी कि जो एक ही बाण से तुम्हारे तीनों पुरों का भेदन कर देगा, उसके द्वारा ही तुम्हें मृत्यु प्राप्त होगी। प्रलयकाल में सबका संहार करने वाले शिवजी ने मुनिश्रेष्ठ नारदजी के इस प्रकार कहकर चले जाने पर मूर्च्छित देवताओं को सचेत किया और नारदजी के द्वारा स्मरण कराये गये गजानन गणेशजी के कथन का स्मरण किया ॥ ३६-३८ ॥ वे प्रभु [यद्यपि] अपने संकल्पमात्र से सबका नाश करने में समर्थ हैं, [तथापि ] उन्होंने उस दैत्यराज त्रिपुरासुर के वध के लिये स्वेच्छानुरूप महान् प्रयत्न आरम्भ किया ॥ ३९ ॥

उन शिवजी ने पृथ्वी को अपना रथ बनाया, चन्द्रमा और सूर्य उसके पहिये थे । उन्होंने पद्मयोनि ब्रह्माजी को अपना सारथि, गिरिराज हिमालय को धनुष, अपनी महिमा से च्युत (स्खलित) न होने वाले भगवान् विष्णु को बाण बनाया और दोनों अश्विनीकुमारों को [उस रथ की ] दोनों धुरियों के रूप में संयोजित किया ॥ ४० ॥

तदनन्तर उन्होंने आचमन करके मन-ही-मन गणेशजी का चिन्तनकर उनके द्वारा उपदिष्ट सहस्र नामों का जप किया और एकाक्षर मन्त्र से प्रचण्ड पिनाक धनुष को अभिमन्त्रित किया ॥ ४१ ॥ जब शिवजी ने विष्णुरूप महाबाण को अभिमन्त्रित किया तो उस समय शेषनाग, पृथ्वी, वन और पर्वत भी काँपने लगे। पक्षिसमूह [ दिग्भ्रमित – से] भ्रमण करने और चीत्कार करते हुए महान् कोलाहल करने लगे। आजगव धनुष के शब्द (टंकार) – से देवता और मनुष्य भी व्याकुल हो गये ॥ ४२-४३ ॥ उन शिवजी ने जब उस बाण को छोड़ा तो नभतल दग्ध हो उठा और तत्क्षण पातालसहित भूमण्डल ज्वाला – समूहों से व्याप्त हो गया ॥ ४४ ॥

उस बाण को देखकर पुर में आश्रय लिया हुआ दैत्यराज वहाँ से सेनासहित भागा, परंतु वेगपूर्वक आये उस बाण ने [स्वर्ण, रजत तथा लौहनिर्मित] उन तीनों पुरोंसहित उस दैत्य को भी भस्म कर दिया ॥ ४५ ॥ सम्पूर्ण सैनिकों, दैत्यों, दानवों तथा राक्षसों के देखते-देखते दैत्य के शरीर में स्थित तेज भगवान् शिव के शरीर में लीन हो गया । तदनन्तर अन्तरिक्ष में आकाशवाणी हुई कि ‘शिव के द्वारा मारा गया यह दैत्य मुक्त हो गया है।’ तब देवताओं और मुनियों ने भी त्रिलोचन महादेवजी का स्तवन किया ॥ ४६-४७ ॥

गन्धर्व-समूह और चारण [प्रशस्तियों का ] तथा वेदनिष्ठ जन [सामवेदीय मन्त्रों का ] गायन करने लगे । अप्सराएँ नृत्य करने लगीं और किन्नर बाजे बजाने लगे । नारद आदि देवर्षि पुष्पों की वर्षा करने लगे। तत्पश्चात् चिन्तामुक्त हुए देवता शिवजी की आज्ञा से अपने-अपने स्थान को चले गये ॥ ४८-४९ ॥ उद्वेगरहित हुए मुनिगण भी त्रिपुरासुर का वध करने वाले महेश्वर को नमस्कार कर अपने-अपने अनुष्ठानों में संलग्न हो गये ॥ ५० ॥

उस दैत्य के मारे जाने पर वेद-वेदांग के अध्ययन-अध्यापन में निरत रहने वाले [मुनिगण] भूतल पर अग्निहोत्र, यज्ञ, दान और व्रतों में तत्पर हो गये और सभी लोग पुन: उत्साह से परिपूर्ण हो गये। फिर [देवताओं आदि से] अभिवन्दित भगवान् त्रिलोचन ने उस [ अलौकिक ] महारथ को भग्न कर दिया ॥ ५१-५२ ॥ तदुपरान्त भगवान् शिव विजयसूचक जयघोष, तूर्यघोष तथा देवताओं के दुन्दुभिनाद से समादृत होकर प्रसन्नतापूर्वक शिलादपुत्र नन्दी, गणपति, कार्तिकेय और सभी पार्षदों के साथ [मणि-रत्नादि से] अलंकृत पर्वतराज कैलास की ओर चल पड़े। उसी समय से अर्थात् त्रिपुरदाह के उपरान्त उनका ‘त्रिपुरारि’ यह नाम लोक में प्रसिद्ध हुआ ॥ ५३-५४ ॥

इस प्रकार यह महागणपति- मन्त्र की सामर्थ्य कही गयी है। [महागणपति के] सहस्रनाम के भी प्रभाव का यह निरूपण किया गया है। मेरे अतिरिक्त अन्य किसी को भी यह ज्ञात नहीं है, इसे मैंने किसी को बताया भी नहीं है। इसके पढ़ने और सुनने से सम्पूर्ण अभिलाषाओं का पूर्तिरूप फल प्राप्त होता है ॥ ५५-५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शिव की विजय’ नामक सैंतालीसवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ४७ ॥

1. द्वादश आदित्यों में से एक।

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