श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-50
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
पचासवाँ अध्याय
श्रीगणेशजी के मन्त्रों के अनुष्ठान एवं गणेशचतुर्थी व्रत की विधि
अथः पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
हिमवद्गिरिजा संवादे चतुर्थीव्रत कथनं

पार्वतीजी बोलीं — हे गिरिराज ! मैं [ गणेशजी का ] मन्त्र नहीं जानती हूँ, अतः आप ही उसे स्वयं बतायें, जिससे मैं गणेशजी का अनुग्रह और कल्याणकारी शिव को प्राप्त कर सकूँ ॥ १ ॥

हिमवान् बोले — हे देवि ! गणेशजी के अनेक प्रकार के मन्त्र हैं, जो अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्रदान करने वाले हैं। गणेशजी के असंख्य मन्त्रों में से कुछ को मैं तुमसे कहता हूँ ॥ २ ॥ [पूजा के अनन्तर] सम्यक् रूप से पद्मासन पर स्थित होकर और इन्द्रियों का सब प्रकार से नियमन (नियन्त्रण) करके [विभिन्न] न्यासों को करने के बाद अपनी इच्छा के अनुसार (यथेच्छ संख्या में) जप करे ॥ ३ ॥

एकाक्षर मन्त्र का एक लाख पचास हजार, षडक्षर मन्त्र का एक लाख दस हजार और वैसे ही अर्थात् उतनी ही संख्या में पंचाक्षर, दशाक्षर और अष्टाक्षर मन्त्रा तथा अट्ठाइस अक्षरों वाले मन्त्र का अयुत संख्या में (दस हजार) जप करे ॥ ४-५ ॥ हे पार्वती ! इस प्रकार अपनी इष्टसिद्धि के लिये [साधक] अनेक प्रकार के मन्त्रों का जप करते हैं । अब तुम मेरे वचन को एकाग्रचित्त होकर सुनो ॥ ६ ॥

अब तुम एकाक्षर या षडक्षर उत्तम मन्त्र को ग्रहण करो। हे सुव्रते! श्रावण शुक्लपक्ष की चतुर्थी से उसका जप आरम्भ करो। मात्र एक माह का अनुष्ठान करो, तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। तुम शिव को प्राप्त करोगी तथा अन्य भी तुम्हें जो कुछ वांछित होगा, वह भी प्राप्त करोगी, यह स्पष्ट है ॥ ७-८ ॥

मिट्टी की बनी हुई गणेशजी की एक मूर्ति का पूजन करने से भी वह स्त्री या पुरुष को उसके द्वारा अभिलषित धन, पुत्र, [गो आदि] पशु भी प्रदान करती है ॥ ९ ॥ दो मूर्तियों का पूजन करने से मनुष्य असाध्य को भी साधित कर लेता है और तीन मूर्तियों के पूजन से राज्य, रत्न और सम्पूर्ण सम्पत्तियाँ प्राप्त हो जाती हैं ॥ १० ॥ जो चार मूर्तियों का पूजन करता है; वह धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – पुरुषार्थ चतुष्टय को प्राप्त करने वाला होता है और पाँच मूर्तियों के पूजन से सार्वभौम राजा अर्थात् समस्त भूमण्डल का सम्राट् होता है ॥ ११ ॥ छः मूर्तियों के पूजन से सृजन, पालन एवं संहार करने में समर्थ हो जाता है। सात – आठ-नौ मूर्तियों के पूजन से सर्वविद् (सब कुछ जानने वाला) हो जाता है ॥ १२ ॥ भगवान् गणेश की कृपा से वह भूत, वर्तमान और भविष्य को जानने वाला हो जाता है । तैंतीस करोड़ देवता, अग्नि, इन्द्र, शिव, विष्णु, सनकादि मुनि-गण — ये सभी दस गणेश मूर्तियों की पूजा करने से उसकी सेवा करने लगते हैं। एकादश मूर्तियों के अर्चन से वह एकादश रुद्रों का अधिपतित्व प्राप्त कर लेता है ॥ १३-१४ ॥

द्वादश मूर्तियों के अर्चन से [मनुष्य ] द्वादश आदित्यों पर स्वामित्व प्राप्त कर लेता है । अत्यन्त संकट के समय मूर्तियों का वृद्धिक्रम के अनुसार पूजन करे ॥ १५ ॥ एक सौ आठ मूर्तियों के पूजन से जो कुछ भी प्राप्तव्य होता है, वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है तथा प्रतिदिन एक लाख मूर्तियों का पूजन करने से [साधक] महामुक्ति को प्राप्त करता है ॥ १६ ॥

[ब्रह्माजी व्यासजी से कहते हैं—] हे मुने! कारागृह से मुक्ति की इच्छा वाले को पाँच मूर्तियों का निर्माणकर [उनका पूजन करना चाहिये।] गणेशजी की कृपा से वह इक्कीस दिन में ही मुक्त हो जायगा ॥ १७ ॥ गणेशभक्तिपरायण मनुष्य प्रतिदिन सात मूर्तियों का निर्माण कर पाँच वर्षों तक पूजन करने से महापाप से भी मुक्त हो जाता है। जन्म से लेकर मृत्यु तक अर्थात् आजीवन जो मनुष्य गणेशजी की एक पार्थिव मूर्ति का पूजन करता है, उसे साक्षात् गणेश ही जानना चाहिये, उसके दर्शन से विघ्नों का नाश होता है ॥ १८-१९ ॥ अतः सम्पूर्ण कामनाओं की प्राप्ति के लिये उस (गणेशभक्त)-को गणपतिस्वरूप मानकर उसी का पूजन करना चाहिये। उसके पूजन से गणेशजी को जितनी प्रसन्नता होती है, उतना स्वयं के पूजन से नहीं ॥ २० ॥

सम्पूर्ण रोगों से होने वाली पीड़ाओं से मुक्ति के लिये गणेशजी की तीन उत्तम मूर्तियों की जो नौ दिनों तक पूजा करता है, उसकी सभी पीड़ाएँ दूर हो जाती हैं ॥ २१ ॥ सोना, चाँदी, ताँबा, पीतल, काँसा, मोती या मूँगे से निर्मित मूर्ति भी यह सब प्रदान करती है ॥ २२ ॥

हे देवि! इस प्रकार व्रत करने पर तुम सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त करोगी। जब भाद्रपदमास में चतुर्थी तिथि प्राप्त हो, तो उस तिथि को अपने वैभव के अनुसार आदरपूर्वक महान् उत्सव का आयोजन करना चाहिये । वादन-गायन सहित गणेशजी की कथा का श्रवण करते हुए रात्रि-जागरण करना चाहिये ॥ २३-२४ ॥ [अगले दिन] प्रभातकाल में निर्मल जल में स्नानकर पूर्व की भाँति वरदायक देव भगवान् गणेश का पूजन करे, तदनन्तर हवन-कार्य आरम्भ करे ॥ २५ ॥ जप की सांगता के लिये कुण्ड या स्थण्डिल में जप का दशांश हवन करे, तत्पश्चात् पहले [देव-प्रीत्यर्थ] बलिदान करके फिर पूर्णाहुति करे ॥ २६ ॥

तदनन्तर गौ, भूमि, वस्त्र, धन आदि से आचार्य का पूजन करे, तत्पश्चात् ब्राह्मणों को सन्तुष्टकर हवन के शेष कार्य सम्पन्न करे ॥ २७ ॥ हवन की आहुति-संख्या का दशांश तर्पण करे और तर्पण के दशांश के रूप में वेद के विद्वान् ब्राह्मणों को सपत्नीक तथा कुछ अन्य को भी भोजन कराये ॥ २८ ॥ उन्हें आभूषण, वस्त्र तथा शक्ति के अनुसार दक्षिणा प्रदान करे तथा उनकी पत्नियों एवं अन्य स्त्रियों को भी वस्त्र सहित अलंकार प्रदान करे ॥ २९ ॥ सिद्धि-बुद्धि सहित गणेशजी की प्रसन्नता के लिये वित्तशाठ्य (धनसम्बन्धी कृपणता) न करते हुए अपने वैभव के अनुसार आचरण (गणेश-पूजन) करे ॥ ३० ॥

तत्पश्चात् अपने सुहृज्जनों के साथ स्वयं भी आदरपूर्वक भोजन करे। दूसरे दिन मूर्ति को प्रसन्नतापूर्वक पालकी में स्थापित करे । उसे छत्र, ध्वज, पताकाओं और चँवरों से सुशोभित करे। उसके आगे-आगे किशोर दण्ड-युद्ध करते चलें ॥ ३१-३२ ॥ वाद्यवादकों के द्वारा किये जाते हुए वेणु, वीणा, मृदंग, भेरी, पटह आदि के घोष, गायकों के गायन और नृत्यांगनाओं के नृत्य के साथ उसे किसी विशाल सरोवर में ले जाकर जल में विसर्जित करे, तत्पश्चात् वादन और गायन के साथ अपने घर को वापस लौट आये ॥ ३३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘हिमवान्-पार्वतीसंवादमें चतुर्थीव्रतविधिवर्णन’ नामक पचासवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५० ॥

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