श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-51
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
इक्यावनवाँ अध्याय
गणेशचतुर्थीव्रतानुष्ठान विधि के वर्णन के प्रसंग में राजा कर्दम के पूर्वजन्म की कथा
अथः पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
हिमवत् पार्वती संवाद

पार्वतीजी बोलीं — हे पिताजी ! आपने गणेश- चतुर्थी की महिमा [एवं उसके अनुष्ठानादि का] भली-भाँति वर्णन किया, मैं अब आपके अमृततुल्य वचनों [-के श्रवण]-से प्रसन्न हो गयी हूँ; परंतु हे हिमालय ! मुझे कुछ संशय है, आप उसका निवारण करें ॥ १ ॥ हे महीधर! पूर्वकाल में इस व्रत को किस-किसने किया था और इस [व्रत-विधि]-को किसने किससे कहा था तथा किसने कौन-सी सिद्धि प्राप्त की थी ? ॥ २ ॥ मेरे संशय का उच्छेदन करने के लिये इसे मुझसे विस्तारपूर्वक कहिये । गजानन गणेशजी की मंगलमयी कथा के विषय में जो प्रश्न करता है, जो कथा को कहता है और जो अन्य कोई भी श्रवण करता है – वे तीनों मनुष्य पुण्य के भागी होते हैं। उनका जीवन, जन्म लेना, ज्ञान और कर्म सफल हो जाते हैं ॥ ३-४ ॥

ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी !] इस प्रकार उन (पार्वती)- के द्वारा पूछे जाने पर हिमवान् ने अनेक मनुष्यों के द्वारा किये गये वरदायक गणेशजी के व्रत विषय में कहा — ॥ ५ ॥

हिमवान् बोले — हे पार्वती ! सुनो, मैं तुमसे इस सर्वसिद्धिकर व्रत के इतिहाससहित पुरातन संवाद को कहता हूँ। गिरिश्रेष्ठ कैलास में सुखासन में विराजमान तेजस्वी और देवताओं, गन्धर्वों एवं श्रेष्ठ ऋषियों के साथ प्रसन्नतापूर्वक क्रीडा करते हुए जगद्गुरु भगवान् शंकर को नमस्कार करके और उनका स्तवनकर महान् षडानन स्कन्द ने उनसे पूछा — ॥ ६–७१/२

स्कन्द बोले — हे देवाधिदेव ! हे जगन्नाथ ! हे भक्तों को अभय करने वाले ! मैंने आपकी कृपा से अनेक दिव्य कथाओं का श्रवण किया; तथापि हे तात! [उनका श्रवणकर] मैं वैसे ही तृप्त नहीं हो पा रहा हूँ; जैसे बारम्बार अमृत का पान करने पर भी तृप्ति नहीं होती । हे देव! अब मुझे सर्वार्थसिद्धि देने वाले व्रत के विषय में बताइये, जिसका अनुष्ठान करने से वरदायक गणेशजी की कृपा से सिद्धियाँ साधक मनुष्य की हथेली पर स्थित होने के समान [सुलभ] हो जाती हैं ॥ ८-१०१/२

शिवजी बोले — हे स्कन्द ! तुम्हारे द्वारा पूछा गया प्रश्न सम्पूर्ण प्राणियों का हित करने वाला है, अतः तुम्हें साधुवाद है। हे पुत्र ! मैं तुम्हारी प्रसन्नता के लिये गणेशजी को प्रिय, महासिद्धि प्रदान करने वाला और पृथ्वी पर किये जाने वाले व्रतों में उत्तम [इस गणेशचतुर्थी ] व्रत को कहता हूँ ॥ ११-१२ ॥ हे कार्तिकेय! [यह व्रत] सभी पुरुषार्थों का साधक है। हे स्कन्द! यज्ञ, दान, जप और होमादि के बिना भी यह व्रत सर्वसिद्धिकर और पुत्र-पौत्रों की वृद्धि करने वाला है। यह महत्तम व्रत राजा, राजकुमार या राजा के मन्त्री को भी शीघ्र वश में करने वाला है। इस व्रत के प्रभाव से पुरुष अनेक जन्मों में एकत्रित महापापों और उपपापों से क्षणभर में मुक्त हो जाता है तथा सम्पूर्ण सिद्धियों का भाजन हो जाता है। इस व्रत के समान गणेशजी को प्रीति प्रदान करने वाला पृथ्वी पर कोई अन्य व्रत नहीं है ॥ १३-१६१/२

स्कन्दजी बोले — हे तात! यह महान् उत्तम व्रत किस मास में होता है ? इसका विधान क्या है और पूर्वकाल में किसने इसका आचरण किया था ? यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो यह सब मुझसे कहिये ॥ १७-१८ ॥

शिवजी बोले — श्रावणमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि को स्नान करके गुरु के घर जाय । गुरु को प्रणाम करके तत्पश्चात् उनका विधिपूर्वक पाद्य, आचमन, वस्त्र एवं श्रेष्ठ आभूषणों से पूजन करके और उन्हें भली प्रकार प्रसन्न करके उनकी आज्ञा से व्रत को आरम्भ करे ॥ १९-२० ॥

[ स्कन्दजी बोले — ] हे तात! आप मुझे सर्वसिद्धिकारक और कामनाओं को प्रदान करने वाले गणेशजी के व्रत का उपदेश कीजिये। हे प्रभो ! हे गुरो ! आप ही मेरे लिये श्रीगणेशजी हैं । हे प्रभो ! मैं आपकी आज्ञा से इस उपदिष्ट व्रत का अनुष्ठान करूँगा, जिससे कि मैं निस्सन्देह समस्त कामनाओं का आश्रय बन सकूँ ॥ २१ ॥

[ शिवजी ने कहा — ] गुरु के द्वारा व्रत का उपदेश दे देने पर वह उनके साथ गंगाजी के किनारे जाय अथवा देवमन्दिर के समीपवर्ती सरोवर में विधिपूर्वक स्नान करे। हे षडानन! सफेद सरसों तथा तिल की खली एवं आँवले के चूर्ण के उबटन को लगाकर स्नान करे, तत्पश्चात् [सन्ध्या-वन्दनादि] नित्यकर्म का सम्पादन कर घर जाय ॥ २२-२३ ॥ [घर जाकर] शुद्ध आसन में बैठकर गणेशजी का पूजन करके तत्पश्चात् गुरु के द्वारा उपदिष्ट विधि से व्रत का आरम्भ करे। श्रावण शुक्लपक्ष की चतुर्थी को गणेशजी की पार्थिव मूर्ति बनाकर उस दिन से भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तक प्रतिदिन उसका पूजन करे ॥ २४-२५ ॥ इस उत्तम व्रत को करते समय ब्रह्मचर्य में स्थित रहना चाहिये। व्रती या तो उपवास रखे या दिन और रात्रि के बीच एक बार भोजन करे या केवल रात्रि में एक बार भोजन करे अथवा बिना माँगे प्राप्त भोजन एक बार करे। दिन के चतुर्थ प्रहर में सम्यक् रूप से बैठकर लवणरहित, मधुर हविष्यान्न का भोजन करे और भक्तिपूर्वक व्रत का आचरण करे ॥ २६-२७२८ ॥

हे षडानन! [उस दिन] गणेश्वर गणेशजी के षडक्षर, अष्टाक्षर अथवा एकाक्षर मन्त्र का जप करे ॥ २८ ॥ हे स्कन्द! अथवा गणेशजी के दशाक्षर या द्वादशाक्षर मन्त्र का जप करे। प्रतिदिन एक लाख या दस हजार जप करना चाहिये ॥ २९ ॥ [ यदि यह जप-संख्या सम्भव न हो तो ] इस जप-संख्या का आधा या इस आधे का आधा जप करना चाहिये तथा जप का दशांश हवन करना चाहिये । व्रत के समय भगवान् गणेशजी का निद्रा तन्द्रा से रहित होकर अहर्निश ध्यान करते रहना चाहिये ॥ ३० ॥ भाद्रपदमास में शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि प्राप्त होने पर एक पल अथवा आधे पल या चौथाई पल की गजानन गणेशजी की सोने की मयूरवाहना या मूषक- वाहना सुन्दर प्रतिमा का निर्माण कराये और लघु मण्डप बनाकर उसके नीचे धान्यराशि फैलाये तथा उसपर सोने, चाँदी या ताँबे के बने कलश स्थापित करे। उस कलश पर सोने, चाँदी या ताँबे का [धान्यपूर्ण ] पात्र रखे । तदनन्तर पंच पल्लव और पंचरत्न से युक्त पात्रसहित कलश को एक जोड़ा वस्त्र में लपेट दे, फिर पहले पीठपूजा करके तब वहाँ उन सर्वव्यापक गणेशजी को स्थापित करे । हे षडानन! [स्थापना के समय ] उनके पूर्वोक्त मूल मन्त्रों तथा वैदिक मन्त्रों का पाठ करता रहे ॥ ३१-३५ ॥

तदनन्तर गजानन भगवान् गणेशजी का ध्यानकर परम प्रसन्नतापूर्वक उनका आवाहन करे और उन्हें आसन, पाद्य और आचमनीय जल प्रदान करे ॥ ३६ ॥ हे स्कन्द! [तत्पश्चात् ] उन्हें रत्नयुक्त जल से अर्घ्य दे और पंचामृत से शुभ स्नान कराये । तदनन्तर सुगन्धित जल से उन परमेश्वर को स्नान कराये ॥ ३७ ॥ तदनन्तर उन्हें धोती और उत्तरीय- दो रक्तवर्ण के वस्त्र और उत्तम यज्ञोपवीत प्रदान करे और उन परमेश्वर को अनेक प्रकार के आभूषणों से विभूषित करे ॥ ३८ ॥

तत्पश्चात् गन्ध, अक्षत, धूप, दीप और विविध प्रकार के नैवेद्यों से भी पूजन करे तथा बड़ा, पुआ, लड्डू, शालि चावल से बनी खीर आदि व्यंजनों को पञ्चामृतों (दुग्ध, दधि, घृत, मधु तथा शर्करा ) – के सहित उन परमेश्वर को भोजनार्थ अर्पण करे। तदनन्तर उनके हाथ में चन्दन का लेप लगाये और फल तथा ताम्बूल अर्पित करे ॥ ३९-४० ॥ तत्पश्चात् गणेशजी को सुवर्ण की दक्षिणा चढ़ाकर उनके ऊपर छत्र लगाये तथा व्यजन एवं चँवर डुलाये ॥ ४१ ॥

तदनन्तर आरती करके मन्त्रपुष्पांजलि देकर स्तुति- प्रार्थना करे । तदनन्तर गणेशजी की उनके सहस्रनामों से स्तुति करके ब्राह्मण-पूजन करे। रात्रि में जागरण करके गीत-नृत्य आदि मांगलिक कृत्य करे ॥ ४२-४३ ॥ प्रभातकाल में निर्मल जल में स्नानकर यथाविधि नित्य कर्मों का सम्पादनकर भगवान् गणेश का पूर्ववत् पूजन करे, तदनन्तर हवन करे। अनेक प्रकार के द्रव्यों से हवन करके आचार्य का पूजन करे। तदनन्तर गाय, भूमि, तिल, स्वर्ण आदि को गुरु को निवेदित करे ॥ ४४-४५ ॥ अन्य ब्राह्मणों को भी पर्याप्त मात्रामें दक्षिणा प्रदान करे, तत्पश्चात् एक सौ आठ ब्राह्मणों को भोजन कराये । यदि शक्ति हो तो उससे भी अधिक ब्राह्मणों को भोजन कराये अथवा इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराये। [ तदुपरान्त ] दीनों, अन्धों एवं दयनीय जनों को खीरसहित भोजन प्रदान करे । ब्राह्मण-भोजन के पश्चात् ब्राह्मणों को पुनः दक्षिणा दे और उनसे उत्तम आशीर्वाद ग्रहणकर मित्रों एवं बन्धु-बान्धवों सहित स्वयं मौन रहकर आदरपूर्वक भोजन करे ॥ ४६-४८ ॥

शिवजी बोले — हे स्कन्द ! इस प्रकार मैंने तुमसे वरदाता गणेशजी के शुभ व्रत के विषय में कहा, जो मनुष्यों को भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला तथा उनकी सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ॥ ४९ ॥

स्कन्द ने कहा — हे पितः ! मुझे भलीभाँति बतलाइये कि इस व्रत का किसने [पूर्वकाल में] पालन किया था और इसके प्रभाव से समस्त सम्पत्तियों को अविकल रूप से प्राप्त किया था ॥ ५० ॥

महादेवजी बोले — हे महाबाहु कार्तिकेय ! तुम आदरपूर्वक आरम्भ से [ इस वृत्तान्त को] श्रवण करो । इस विषय में मैं तुमसे एक पुरातन इतिहास कहता हूँ – पूर्वकाल में कर्दम नाम वाला एक महान् धर्म-परायण राजा हुआ। उसने अपने तेज से समुद्रपर्यन्त सम्पूर्ण पृथ्वी का पालन किया। उसके गुणों के वशीभूत होकर देवता लोग नित्य उसकी सभा में स्थित रहते थे ॥ ५१-५२ ॥ दैवयोग से किसी समय भृगुमुनि उसके भवन में आये। तब राजा ने उठकर अत्यन्त आदरपूर्वक उन्हें श्रेष्ठ आसन पर बैठाकर गुरु के समान उनका पूजन किया। तदनन्तर मुनिश्रेष्ठ भृगु जब भोजनकर [अपने आसन पर ] स्थित हुए तब राजा ने कहा— ॥ ५३-५४ ॥

राजा बोले — हे भगवन्! हे सम्पूर्ण तत्त्वों के जाननेवाले! मैं कुछ पूछता हूँ, उसे बतलायें। मैं पूर्वजन्म में कौन था और मैने कौन-सा सुकृत (पुण्य कार्य) किया था, जिसके कारण मुझे ऐसा कण्टकरहित (शत्रुहीन) राज्य प्राप्त हुआ ? ऐसा राज्य न तो किसी नृपति को प्राप्त हुआ और न ही आगे किसी को प्राप्त होगा ॥ ५५-५६ ॥ मैं गन्धर्वों, नागों, राक्षसों और देवताओं का भी पूज्य हूँ; हे मुने! कुबेर की सम्पत्ति से तुलना करने वाली मेरी सम्पत्ति को देखिये। तीनों लोकों में जो कुछ भी रत्नसदृश अर्थात् सर्वश्रेष्ठ है, उसे मैं अपने तेज से यहाँ ले आया हूँ। जिस-जिस पदार्थ की मैं इच्छा करता हूँ, उस-उसको मैं अपने भवन में स्थित देखता हूँ ॥ ५७-५८ ॥ हे प्रभो! किस कर्म से यह सब मुझे प्राप्त हुआ, उसे बताइये। हे पुण्यवानों में श्रेष्ठ ! मैं उस पुण्य कार्य को पुनः करना चाहता हूँ ॥ ५९ ॥

भृगुजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ ! मैं योगबल से बतलाता हूँ — तुम पूर्वजन्म में पवित्र आचरणवाले दुर्बल क्षत्रिय थे ॥ ६० ॥ तुम अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिये · अनेक प्रकार के कर्म किया करते थे, परंतु तुम्हारे द्वारा किया जाने वाला कर्म फलप्रद नहीं होता था ॥ ६१ ॥ तब भार्या और सन्तानों के निष्ठुर वाक्यों से अत्यन्त पीड़ित होकर पत्नी और पुत्रों से बिना बताये तुम गहन वन को चले गये ॥ ६२ ॥ वहाँ सभी दिशाओं में भ्रमण करते हुए तुमने सिद्धासन में विराजमान और श्रेष्ठ मुनियों से सेवित [मुनिश्रेष्ठ ] सौभरि को देखा ॥ ६३ ॥

वे शिष्यों को दुःखों का नाश करने वाली महाविद्या का उपदेश दे रहे थे। हे नृप ! उन दिव्यर्षि सौभरि तथा अन्य ऋषिगणों को देखकर तुम दण्ड की भाँति पृथ्वी पर गिर पड़े। तब उन सबके द्वारा तुम्हारा अभिनन्दन किया गया और मुनि द्वारा प्रस्तुत किये गये सुन्दर आसन पर तुम बैठ गये। तदनन्तर अवसर पाकर तुमने उन दिव्य मुनि से आदरपूर्वक इस प्रकार पूछा — ॥ ६४–६५१/२

क्षत्रिय ने कहा — हे स्वामिन्! हे मुने! मैंने इस संसार के दुःखों से बहुत अधिक कष्ट पाया है। पत्नी, सन्तान और मित्रों के वचनरूपी बाणों से अत्यन्त पीड़ित हूँ, फिर भी उन निष्ठुर सुहृदों के प्रति मेरे मन में वैराग्य नहीं होता । हे मुने! मैं सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास [ आदि द्वन्द्वों]- से भी बहुत पीड़ित हूँ । मुझे इस दुःखरूपी सागर से पार कराने वाला कोई उपाय बतलायें ॥ ६६-६८ ॥

शिवजी बोले — [हे स्कन्द !] उसके इस प्रकार के वचन सुनकर करुणापूर्ण चित्तवाले सौभरिमुनि ने राजा के दुःख का विनाश करने वाले उपाय का चिन्तन किया; तत्पश्चात् सम्पूर्ण पापों का विनाश करने वाले उस उपाय को उस क्षत्रिय से कहा — ॥ ६९१/२

ऋषि बोले — [हे क्षत्रिय ! ] मैं जिस व्रत को कह रहा हूँ, उसे स्थिर मन से करो ॥ ७० ॥ इसके अनुष्ठानमात्र से सम्पूर्ण दुःखों का नाश हो जाता है। यह ब्राह्मणों, क्षत्रियों, वैश्यों और ब्रह्मर्षियों द्वारा किया गया है ॥ ७१ ॥ इससे वे सम्पूर्ण दुःखों से मुक्त हो गये और उन्होंने उत्तमोत्तम सिद्धि प्राप्त की । वरदायक गणेशजी का यह व्रत धर्म-अर्थ-काम और मोक्ष प्रदान करने वाला है ॥ ७२ ॥

क्षत्रिय ने कहा — वे गणेशजी कौन हैं ? उनका शील कैसा है ? उनका रूप कैसा है ? उनका स्वभाव कैसा है ? उनके क्या कर्म हैं ? वे कैसे उत्पन्न हुए ? यह सब यदि मेरे सुनने योग्य हो और यदि मुझपर आपकी कृपा हो तो मुझसे कहिये ॥ ७३ ॥

ऋषि बोले — जो नित्य, निर्मल, शोकरहित, ज्ञानस्वरूप, परमार्थरूप, आदि-मध्य और अन्त से रहित और सीमारहित ब्रह्म है, उसी को सन्तजन गणाधिपति गणेश कहते हैं ॥ ७४ ॥ जिनसे ओंकार की उत्पत्ति हुई, जिनसे वेद प्रकट हुए और जिनसे जगत् उत्पन्न हुआ, जिनसे यह सम्पूर्ण विश्व व्याप्त है, उन्हें ही गणनायक गणेश जानो ॥ ७५ ॥ जगत् की सृष्टि करने की कामना से ब्रह्माजी ने जिनको सन्तुष्ट करने के लिये पूरे सौ वर्षों तक अत्यन्त दुष्कर तप किया था। तदनन्तर उन प्रसन्न हुए गणेशजी का हर्षित मन वाले विधाता (ब्रह्माजी) – ने अनेक प्रकार के उपचारों, दिव्य रत्नों और फलों से पूजन किया ॥ ७६-७७ ॥

उन्होंने अपने मानसिक संकल्प से सिद्धि-बुद्धि नामक दो कन्याओं को उत्पन्नकर उन गणेशजी को [पत्नीरूप में] प्रदान किया, [तब उनकी आराधना से] प्रसन्न होकर उन सर्वव्यापी भगवान् गणेश ने उन्हें एकाक्षरी विद्या प्रदान की ॥ ७८ ॥ तब वर प्राप्त करके ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण जगत् की सृष्टि की। पूर्वकाल में विष्णु ने [भी] उन्हें षडक्षर मन्त्र से प्रसन्न किया था ॥ ७९ ॥ उन श्रीहरि ने मूर्ति का निर्माणकर पूर्व में कहे गये विधान से उनका व्रत किया। उन्होंने पूरे एक वर्ष तक व्रतसम्बन्धी नियमों का सांगोपांग पालन किया था ॥ ८० ॥ तदनन्तर गणेशजी से वर प्राप्तकर सम्पूर्ण जगत् का पालन किया। इस प्रकार उन गणेशजी को सम्पूर्ण भूमण्डल में स्तुत जानिये ॥ ८१ ॥ वे गणेशजी विश्वरूप, अनादि और सम्पूर्ण कारणों के भी कारण हैं। सम्पूर्ण दुःखों से विमुक्ति के लिये तुम उनका प्रयत्नपूर्वक सम्यक् रूप से आराधन करो ॥ ८२ ॥

क्षत्रिय ने कहा — हे मुनिवर ! अब मुझे यह बताइये कि इस श्रेष्ठ व्रत को किस समय और किस विधि से करना चाहिये। सम्पूर्ण दुःखों की शान्ति के लिये मैं आपके कथनानुसार इस व्रत को करूँगा ॥ ८३ ॥

मुनि (सौभरि ) बोले — श्रावणमास के शुक्ल-पक्ष की चतुर्थी तिथि को इस व्रत का आरम्भ करे और भाद्रपदमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी तक परम भक्ति- पूर्वक इसे करता रहे। गणेशजी की पार्थिव मूर्ति का षोडशोपचार पूजन प्रतिदिन भक्तिपूर्वक करे, तदनन्तर ब्राह्मणों को भोजन कराये। हे राजन् ! तुम ऐसा करो, इससे तुम अपनी सभी मनोकामनाओं को प्राप्त कर लोगे ॥ ८४–८५१/२

भृगु बोले — हे सुव्रत ! यह सुनकर तुमने उस व्रत को किया था। सौभरिमुनि के आश्रम – मण्डल में जब तुम्हारा व्रत समाप्त हुआ तो गणेशजी की कृपा से तुम्हारा घर दिव्य हो गया ॥ ८६-८७ ॥ वह घर दिव्य स्त्री-पुरुषों से युक्त, दास-दासियों से परिपूर्ण था। दिव्य वस्त्रों से विभूषित और अनेक प्रकार के समन्वित, वेदघोष से गुंजायमान और गोरूपी धन से अलंकारों से अलंकृत तुम्हारी पत्नी वैसे ही सुसज्जित तुम्हारे पुत्रों के साथ आश्चर्यचकित होकर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रही थी ॥ ८८-८९ ॥ ‘मेरे पति कब आयेंगे’ – इस प्रकार सोचते हुए वह चिन्तामग्न थी, तभी तुम मुनि से आज्ञा लेकर अपने घर चले गये। उस दिव्य भवन को छोड़कर तुम अपने [पुराने] घर को ढूँढ़ने लगे, तभी तुम्हारी पत्नी द्वारा भेजे गये लोग तुम्हें उस भवन में ले आये ॥ ९०-९१ ॥ तब तुम्हें भी उन वरदायक गणेशजी का प्रभाव ज्ञात हुआ। उसी व्रत के प्रभाव से तुम्हें इस जन्म में राज्य प्राप्त हुआ ॥ ९२ ॥

शिवजी बोले — [ हे स्कन्द !] भृगु के इस प्रकार के वचनों को ‘सुनकर हर्षित मनवाले राजा कर्दम ने वह सब किया, जो भृगु [मुनि ] -द्वारा कहा गया था ॥ ९३ ॥ इस व्रत के प्रभाव से राजा ज्ञान और वैराग्य से युक्त होकर यथेच्छ भोगों का भोग करके तथा पुत्रों को अपने पद पर स्थापितकर गणेशजी के उस धाम को चले गये, जहाँ से पुनरावर्तन नहीं होता । हे स्कन्द ! व्रतों में उत्तम यह व्रत सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है ॥ ९४-९५ ॥

इस तरह का [प्रभावशाली ] अन्य कोई व्रत लोक में नहीं सुना गया है। हे स्कन्द ! यदि तुम्हारी [कोई ] इच्छा हो, तो इस सर्वार्थसाधक व्रत को करो ॥ ९६ ॥ [यह व्रत] देवताओं, दानवों, गन्धर्वों, ऋषियों और मनुष्यों द्वारा किया गया है। इसे [राजा] नल, [रानी] इन्दुमती और राजा चन्द्रांगद ने भी किया था और सम्पूर्ण मनोकामनाओं को सम्यक् रूप से प्राप्तकर [ अन्त में] वे गणेशजी के धाम को चले गये ॥ ९७ ॥

गिरिराज [ हिमवान् ] बोले — [हे पार्वती!] इस प्रकार मैंने तुमसे इतिहाससहित इस महान् व्रत को कहा। तुम मन में वरदायक गणेशजी का ध्यान करके इस व्रत को करो ॥ ९८ ॥ हे महाभागे! तुम इस व्रत को करके [भगवान्] शंकर को [अवश्य] पा लोगी । [ हे पुत्री !] तुम्हारे स्नेहवश मैंने इसे आज तुमसे कहा है । इसे [ अन्य के सम्मुख] प्रकट मत करना ॥ ९९ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘हिमवान् – पार्वती-संवाद’ नामक इक्यावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५१ ॥

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