श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-52
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
बावनवाँ अध्याय
राजा नल के पूर्वजन्म का वृत्तान्त
अथः द्विपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
नलव्रत निरुपणं

पार्वतीजी बोलीं — हे पिताजी ! नल कौन थे ? उन नल ने इस [गणेशचतुर्थी] व्रत को किस कारण से किया था ? – यह मुझे बतलाइये । [ गणेशजी के व्रतविषयक] इन आख्यानों को श्रवण करने से मेरे मन को शान्ति मिल रही है ॥ १ ॥

हिमवान् बोले — पूर्वकाल में निषधदेश में नल नामवाले एक महान् राजा हुए थे । वे ब्राह्मणभक्त, वेदज्ञ, शूरवीर, दानी, प्रतिष्ठित, धनवान्, मननशील, रथवाहन, खड्ग-बाण-धनुष-तूणीर और कवच धारण करने वाले, बलवान्, अस्त्र-विद्या में निपुण, देवताओं के लिये भी पूज्य, त्रिलोकी में गमन करने की सामर्थ्य से सम्पन्न और पवित्र [हृदयवाले] थे॥ २-३ ॥ उनके गुणों का वर्णन करने में [सहस्र मुखवाले ] शेष भी मौन हो जाते थे। उनके पास संख्या से परे अर्थात् असंख्य घोड़े, हाथी, रथी, धनुर्धारी, शस्त्रधारी और आग्नेयास्त्रधारी थे । उनके भय से दिक्पालों सहित इन्द्रादि देवता [भी] काँपते थे ॥ ४-५ ॥

उनकी पत्नी दमयन्ती [साक्षात् ] सौन्दर्य का निवास- स्थान थी। ब्रह्माजी ने सम्पूर्ण [दोषों का] दमनकर और [रमणीक पदार्थों के] सारभाग को ग्रहणकर उसका निर्माण किया था, इसीलिये वह ‘दमयन्ती’ नाम से प्रसिद्ध हुई । ब्रह्माजी ने तीनों लोकों की स्त्रियों के सौन्दर्य को दमयन्ती में प्रतिष्ठित किया था ॥ ६-७ ॥ वह [दमयन्ती] अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत और अनेक मणियों से विभूषित रहती थी। उसका कण्ठप्रदेश मुक्ताहार से सुशोभित रहता था तथा वह सुन्दरी [सम्पूर्ण] सद्गुणों से सम्पन्न थी ॥ ८ ॥ उन (राजा नल) – का पद्महस्त नामक महान् पराक्रमी मन्त्री था, जो बुद्धि में बृहस्पति के सदृश और नीति में अंगिरा के समान था ॥ ९ ॥

ऊँचाई में वे (नरेश) सुमेरुपर्वत के समान और गाम्भीर्य में समुद्र के सदृश थे। किसी समय की बात है, वे महामनस्वी राजा नल सभागृह में नृपसमूह के मध्य विराजमान थे; सुन्दर स्वरूपवाली दर्शनीय अप्सराएँ उनके सम्मुख नृत्य कर रही थीं। ब्रह्मर्षिगणों से संयुक्त उन (राजा नल) – की वन्दीजन स्तुति कर रहे थे। उसी समय गौतममुनि राजा के पास आये ॥ १०–१२ ॥ राजा ने उठकर उन्हें आदरपूर्वक सुन्दर आसन पर बिठाया, तदनन्तर परम भक्तिभाव से उनका पूजन किया और तब राजा नल ने उनसे पूछा —  ॥ १३ ॥

[ राजा ] नल बोले — हे स्वामिन्! हे महामुने! आपके दर्शन से मैं अनुगृहीत हो गया हूँ। आज [आपके शुभागमन से] मेरा जन्म, मेरा राज्य, मेरे माता-पिता, मेरा कुल और मेरा जीवन सफल हो गया। हे महामुने ! अब आप अपने आने का कारण शीघ्र बतलायें ॥ १४१/२

गौतम [मुनि ] बोले — हे नृप ! मेरे मन में तुम्हारे वैभव को देखने की महती इच्छा थी । स्वर्गस्थित ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु और शूलपाणि शिव आदि देवता भी तुम्हारी स्तुति (प्रशंसा) करते हैं। मृत्युलोक में स्थित हुए भी तुम धन्य हो, जो कि मनुष्य और देवता तुम्हारी प्रशंसा करते हैं ॥ १५-१६ ॥ मैं नित्यतृप्त होते हुए भी तुम्हारी इस पूजा और तुम्हारे वैभव को देखकर तृप्त हो गया हूँ, इस समय मुझे अनुज्ञा दीजिये, मैं अपने आश्रम को जाऊँगा ॥ १७ ॥

नल बोले — हे वेद-वेदांग के ज्ञाता ! हे ब्रह्मन् ! हे सर्वशास्त्रप्रवर्तक! हे दयानिधे! हे मुने! क्षणभर रुककर मेरे संशय को नष्ट कीजिये ॥ १८ ॥

मुनि बोले — हे महाराज ! आपने उचित ही प्रश्न किया है; मैं आपके प्रति स्नेहभाव होने के कारण रुक गया हूँ। आपकी आज्ञा का उल्लंघन तो नाग, [अन्य] राजागण तथा देवता भी नहीं करते हैं ॥ १९ ॥

राजा (नल) बोले — हे ब्रह्मन् ! अपना वैभव देखकर मुझे स्वयं भी आश्चर्य होता है। यह सब मेरे किस पुण्य अथवा किस तपस्या के प्रभाव से हुआ ? मैं पूर्वजन्म में कौन था — यह भी यथार्थ रूप से बतलाइये ॥ २०१/२

मुनि बोले — [ हे राजन् ! ] तुम गौड़ देश के निकटवर्ती देश में पिप्पल नामक पुर में ज्ञानवान् और पवित्र, परंतु धनहीन क्षत्रिय थे। तुम अपनी पत्नी, सन्तानों और मित्रों के वाग्बाणों से अत्यन्त ताड़ित थे । अतः सबसे तुम्हें विराग हो गया और तुम इन सबसे बिना कुछ कहे (बताये) गहन वन में चले गये। वह वन वृक्षों, वल्लरियों, सिंहों, व्याघ्रों, हाथियों और मृगों से भरा हुआ था । वहाँ जल में उत्पन्न होने वाले कमलादि पुष्पों से सुशोभित शीतल जल से युक्त सरोवर भी थे ॥ २१–२३१/२

इस वन से उस वन में घूमते हुए तुमने तपस्या के निधिरूप कौशिकमुनि के आश्रम को देखा, जो वेदघोष (उच्च स्वर में वेदमन्त्रों के पाठ) -से गूँज रहा था। वहाँ जाकर तुमने उन मुनि को भक्तिभाव से प्रणाम किया ॥ २४-२५ ॥ तब दीनों और अनाथों के प्रति दयाभाव रखने वाले उन कौशिकमुनि ने तुम्हें उठाया और दुखी जानकर आशीष देते हुए बोले — ॥ २६ ॥

मेरे [आराध्य] देवेश गजानन गणेशजी तुम्हारे लिये कल्याण करने वाले होंगे। उनके सौम्य आशीष को सुनकर तुम्हें परम प्रसन्नता प्राप्त हुई ॥ २७ ॥ हे राजन्! तब तुमने उन विप्र [श्रेष्ठ ]-से सम्पूर्ण कामनाओं को प्रदान करने वाला, दरिद्रता का नाश करने वाला और भुक्ति-मुक्ति प्रदान करने वाला कल्याणकारी उपाय पूछा, तब कौशिकजी ने तुमसे गणेशजी की आराधना करने को कहा ॥ २८१/२

कौशिक बोले — हे नरेश ! तुम गणेशजी का मात्र एक मास तक व्रत करो। गणेशजी की देखने में सुन्दर लगे – ऐसी एक मिट्टी की मूर्ति का निर्माण करो, उसकी पहले बतायी गयी विधि से पूजा करो और उनकी कथा का श्रवण करो । प्रतिदिन ऐसा करते हुए जब एक मास पूरा हो जायगा, तब तुम सिद्धि प्राप्त कर लोगे ॥ २९-३०१/२

मुनि बोले — ऐसा सुनकर उस भूपति ने पुनः कौशिक से कहा कि मैं गजानन को नहीं जानता हूँ, उनका स्वरूप मुझसे कहिये। उन देवदेवेश [के स्वरूप] -को जानकर मैं उनका उत्तम व्रत करूँगा ॥ ३१-३२ ॥ उनके इस प्रकार प्रश्न करने पर वे मुनिश्रेष्ठ वाणी से परे स्वरूपवाले परब्रह्मस्वरूप गजानन गणेशजी द्वारा अवतार लेकर धारण किये गये वैकारिक स्वरूपों का वर्णन करते हुए बोले — ॥ ३३१/२

कौशिक बोले — जो सम्पूर्ण लोकों के कर्ता, पिता, माता और जगद्गुरु हैं; ब्रह्मा, इन्द्र, शिव और विष्णु के जो ध्येय हैं; वे ही गजानन गणेशजी हैं ॥ ३४१/२

[ गौतम] मुनि बोले — उनके इस प्रकार के वचन सुनकर तुम उन मुनीश्वर के चरणों में प्रणामकर उनकी आज्ञा से अपने घर को चले गये थे। तुमने श्रावण शुक्ल पक्ष की चतुर्थी से [गणेशजी के] उत्तम व्रत का आरम्भ किया ॥ ३५-३६ ॥ तुमने गणेशजी की शास्त्रोक्त पार्थिव मूर्ति का निर्माण किया और स्थिर अवस्था में, बोलते हुए, मौनावस्था में, चलते हुए, शयनावस्था में तथा भोजन करते हुए तुम भगवान् गजानन का ध्यान करते रहने लगे। इससे तुम्हें अत्यन्त उत्तम सिद्धि की प्राप्ति हुई ॥ ३७१/२

[उस] व्रत के प्रभाव से तुम अनेक हाथियों, रथों, अश्वों आदि से सम्पन्न, गोसम्पदा, धन-सम्पत्ति से युक्त, दास-दासियों वाले और श्रीमान् (ऐश्वर्यसम्पन्न) हो गये ॥ ३८१/२

[इष्ट] देव गणेशजी की प्रसन्नता के लिये तुमने सभी प्रकार के दान दिये और प्रसन्नतापूर्वक गणेशजी के महान् मूल्यवान् मन्दिर का निर्माण कराया ॥ ३९१/२

तुम यथेच्छ भोगों का भोगकर समय आने पर मृत्यु को प्राप्त हुए और अब निषधदेश में ‘नल’ नामक राजा रूप में उत्पन्न हुए हो। उसी (गणेशाराधन) – के प्रभाव से तुम त्रैलोक्य के मनुष्यों से वन्दित हो और तुममें अचल लक्ष्मी प्रतिष्ठित है। अब मुझे अनुमति दो; [क्योंकि ] जो कुछ तुमने पूछा था, वह सब मैंने निरूपित कर दिया ॥ ४०–४११/२

हिमवान् बोले — [हे पार्वति !] इस प्रकार गौतम (मुनि)-के चले जाने पर उनके वचनों का विश्वास करके राजा नल ने गणेशजी की सुन्दर मूर्ति का निर्माणकर व्रत को करना आरम्भ किया। उस ( राजा नल ) – ने प्रतिदिन भक्तिपूर्वक गणेशजी की कथा का श्रवणकर इस व्रत के प्रभाव से सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त किया । हे पुत्री ! इस प्रकार मैंने नल द्वारा किये गये व्रत को तुम्हें दिया ॥ ४२–४४ ॥ गौतम ने उन्हें पूर्वजन्म में किये गये व्रत का ही उपदेश दिया था, उसके सम्पूर्ण प्रभाव का कथन करने में तो कोई भी समर्थ नहीं है ॥ ४५ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘राजा नल के द्वारा किये गये व्रत का निरूपण’ नामक बावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५२ ॥

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