August 25, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-54 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौवनवाँ अध्याय प्रजाजनों को आश्वासन देना, रानी इन्दुमती का राजा को मृत समझकर विलाप करना तथा नारदजी के उपदेश से गणेशचतुर्थी का व्रत करना अथः चतुःपञ्चाशत्तमोऽध्यायः इन्दुमती नारद संवादं पार्वतीजी बोलीं — हे पिताजी ! उस रानी के मूर्च्छित हो जाने पर प्रजाजनों ने क्या किया ? हृदय को आनन्द देने वाले इस प्रसंग को विस्तारपूर्वक बताइये ॥ १ ॥ हिमवान् बोले — तदनन्तर बात-चीत में कुशल सभी नगरनिवासी अपने आँसुओं को पोंछकर राजा की पत्नी के पास जाकर उसे आश्वासन देते हुए कहने लगे — ॥ २ ॥ नगरनिवासी बोले — हे माता ! उठिये, शोक मत कीजिये। अपने पुत्र में मन लगाइये। मृत प्राणी के लिये शोकाश्रु दाहक होते हैं, इसलिये अपने पति का हित करिये। हे शुभानने! मरणधर्मा मनुष्यों में कोई चिरंजीवी नहीं देखा गया है। जैसे जीर्ण वस्त्र को त्यागकर लोग अन्य (नवीन) वस्त्रों को ग्रहण कर लेते हैं, इसी प्रकार प्राणी भी एक देह को छोड़कर दूसरी शुभ (सुन्दर) देह ग्रहण कर लेते हैं ॥ ३–४१/२ ॥ हे कल्याणि! यह अत्यन्त आश्चर्य की बात है कि स्वयं मरणधर्मा और मृत्यु के मुख में स्थित होते हुए भी प्राणी दूसरे मृत व्यक्ति के लिये शोक करता है; वह अपने देह के आत्मा से होने वाले भावी वियोग को नहीं जानता ॥ ५-६ ॥ मनुष्य ‘सब कुछ मेरा है’ – ऐसा मानता है, जबकि हे सत्पुत्रवती! ब्रह्मा से लेकर स्थावरपर्यन्त समुद्रसहित जो चराचर जगत् है, वह स्वयं दैव और काल के वश में है। अतः उसे नाशवान् जानकर शोक का त्यागकर उठो । तुम्हारे धर्मात्मा और पुण्यवान् पति को मुक्ति प्राप्त हो गयी होगी। संसार में यदि वे कदाचित् जीवित होंगे तो घर आ जायँगे; क्योंकि पुण्यों की अधिकता से तो मनुष्य स्वर्ग जाकर भी पुन: लौट आता है अथवा यहाँ आये हुए किसी मुनि से जो भूत-भविष्य का ज्ञाता हो, उससे पूछा जाय तो वह सब कुछ बता देगा, तदनन्तर जो भी करना होगा] वह हम सब करेंगे ॥ ७-१०१/२ ॥ हिमवान् बोले — तदनन्तर इस प्रकार लोगों द्वारा प्रबोधित किये जाने पर रानी इन्दुमती थोड़े ही समय में उनके वचनों से आश्वस्त हो गयी और उसने अपने आँसुओं को वस्त्र से पोंछकर वहाँ आये सभी लोगों को विदा किया ॥ ११-१२ ॥ सौभाग्य-चिह्नों को त्यागकर वह अत्यन्त क्षीणता को प्राप्त हो गयी थी । वह [प्राय: ] रोती रहती, शोक करती रहती, लम्बी-लम्बी साँसें लेती तथा बार-बार मूर्च्छित हो जाती थी। तदनन्तर बारह वर्षों के पश्चात् दिव्यदर्शन नारद मुनि अपनी इच्छा से विचरण करते हुए उसके भवन में आये। उन्हें देखकर वह अपने पति का वृत्तान्त बताते हुए शीघ्र ही रोने लगी और उनसे उस दुःख को कहा, जो उसने बारह वर्ष में अनुभव किया था । तब नारदमुनि ने उसके रुदन को सुनकर उसे हर्ष प्रदान करते हुए कहा — ॥ १३–१५१/२ ॥ नारदजी बोले — तुम्हारा पति कहीं स्थित है, तुम्हें उसके विषय में शोक नहीं करना चाहिये। तुम नीलवर्ण के वस्त्र से अपने सिर को आच्छादित करो । कर्णाभूषणों से दोनों कानों को अलंकृत करो। अपने भालपर कुंकुम की सुन्दर बिन्दी लगाओ, हाथ में कंगन और कण्ठ में मंगलसूत्र धारण करो ॥ १६-१७१/२ ॥ हिमवान् बोले — सत्यवादी और सर्वज्ञ मुनि के वचनों पर विश्वास करके उस (रानी इन्दुमती) – ने तत्काल सभी वस्त्राभूषणों को मँगाकर हर्षित होकर वैसा ही किया, जैसा नारदजी ने कहा था। तदनन्तर उसने समस्त ब्राह्मणों को बुलवाकर सर्वप्रथम नारदजी का सम्यक् प्रकार से पूजनकर सभी ब्राह्मणों का पूजन किया और उन्हें अनेक प्रकार के दान दिये ॥ १८–१९१/२ ॥ तत्पश्चात् उस सौभाग्यशालिनी इन्दुमती ने हर्षित होकर अनेक प्रकार के [ मंगल] वाद्य बजवाये और घर-घर में शर्करा भिजवायी। उसने लोगों को वस्त्र और ताम्बूल देकर घर वापस जाने की आज्ञा दी ॥ २०-२१ ॥ उसके बाद उस राजकन्या ( रानी इन्दुमती) – ने पुनः आदरपूर्वक देवर्षि नारद के चरणों में मस्तक रखकर प्रणाम किया और उनसे अपने पति की प्राप्ति का उपाय पूछा ॥ २२ ॥ इन्दुमती बोली — हे मुने! मेरे पति कहाँ और किस प्रकार रह रहे हैं ? हे वेदज्ञ ! किस उपाय से मुझे उनका दर्शन होगा ? हे मुने! मुझ पर कृपा करिये और उस उपाय को बताइये, चाहे वह कितना भी कठिन व्रत, दान या तप हो ॥ २३-२४ ॥ नारदजी बोले — मैं उस उत्तम व्रत को संक्षेप में तुमसे कहता हूँ । उसे श्रावणमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी से प्रसन्नतापूर्वक आरम्भ करना चाहिये। प्रभातकाल में दातून करके नदी, तालाब या वापी में संकल्पपूर्वक स्नान करे ॥ २५-२६ ॥ तदनन्तर श्वेत वस्त्र धारण करके घर जाकर गणेशजी की चार भुजाओं वाली उत्तम और सुन्दर मूर्ति बनाये तथा स्थिर चित्त से षोडश उपचारों से पूजन करे और दिन-रात में स्वयं [द्वारा] प्रयत्नपूर्वक [बनाये गये ] एक अन्न का भोजन करे अथवा एक बार भोजन करे या उपवास करे। इस प्रकार भाद्रपदमास की शुक्लपक्ष की चतुर्थी तिथि तक व्रत करे ॥ २७-२८१/२ ॥ हे पतिव्रते! हे सुन्दरि! अपने वैभव के अनुरूप गीत, वाद्य और नृत्य आदिपूर्वक महोत्सव करे और ब्राह्मणों को भोजन कराये । हे कल्याणि ! इस प्रकार व्रत करो, इससे तुम्हारा पति के साथ मिलन होगा। हे सुन्दरि ! वह जीवित है, पाताल में नागकन्याओं द्वारा उसे बन्दी बनाया गया है। हे राज्ञि ! मैं सत्य कहता हूँ, मेरा वचन अन्यथा नहीं होगा ॥ २९–३१ ॥ हिमवान् बोले — उन मुनि के द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर रानी ने आदरपूर्वक व्रत प्रारम्भ किया। उन मुनि के चले जाने पर कुछ दिनों बाद श्रावणमास आने पर उसने गजानन गणेशजी की सुन्दर-सी पार्थिव मूर्ति बनायी तथा पहले कही गयी विधि से अत्यन्त मनोहर पूजा की ॥ ३२-३३ ॥ उसने दिव्य गन्धों, दिव्य वस्त्रों, दिव्य पुष्पों, अनेक प्रकार के दिव्य नैवेद्यों, फलों, सुवर्ण [दक्षिणा ], दीपों, पुष्पांजलि, प्रदक्षिणा, नमस्कार, स्तवन, गणेशजी के नाम-स्मरण और ध्यान से तथा गीत, वाद्य, नृत्य एवं ब्राह्मण-भोजन से उन परमात्मा को प्रसन्न किया ॥ ३४-३५१/२ ॥ उसने नारदमुनि के वचनानुसार दीर्घकाल से खोये हुए अपने प्रियतम की प्राप्ति के लिये पलमात्र दुग्ध का पान करते हुए श्रावणमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी तक [गणेशजी का ] उत्तम व्रत किया ॥ ३६-३७ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘इन्दुमती – नारद-संवाद’ नामक चौवनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५४ ॥ Content is available only for registered users. 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