श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-56
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
छप्पनवाँ अध्याय
गणपत्युपासना की महिमा के सन्दर्भ में भ्रूशुण्डीमुनि का आख्यान
अथः षट्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः
इन्द्रविमानपतनं

भृगुजी बोले — हे राजन् ! इस प्रकार मैंने [गणेश- चतुर्थी व्रत के] सम्पूर्ण माहात्म्य को कहा। अब जो ब्रह्माजी द्वारा व्यासजी के प्रति कहा गया था, उसे तुम पुनः सुनो ॥ १ ॥

सोमकान्त बोले — हे महामुने ! अमित बुद्धि वाले व्यासजी ने ब्रह्माजी के मुख से क्या सुना ? उसे आप कहिये । [उसे श्रवण किये बिना] मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ २ ॥

भृगुजी बोले — [ हे राजन् ! ] इस प्रकार [गणेश- चतुर्थीव्रत के माहात्म्य-सम्बन्धी] कथानक को सुनकर व्यासजी ने आदरपूर्वक ब्रह्माजी से पूछा । हे निष्पाप [राजन्] ! तब उन्होंने भी आदरपूर्वक उसको कहना प्रारम्भ किया ॥ ३ ॥

व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन्! आप मुझसे गणनायक गणेशजी की श्रेष्ठ कथा को पुनः कहिये । विघ्नेश्वर गणेशजी की सत्कथा को श्रवण करने की मेरी लालसा अत्यधिक बढ़ती जा रही है ॥ ४ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे व्यासजी ! कौतूहल से भरी हुई गणेशजी की एक अन्य कथा का श्रवण करो, जो शूरसेन आदि [राजाओं]-द्वारा अनुभूत है ॥ ५ ॥ मध्य देश के अत्यन्त रमणीय सहस्र नामक नगर में शूरसेन नाम के एक महान् बलवान् राजा हुए। वे वेद- वेदांग के पारगामी विद्वान्, धनवान्, रूपवान्, दानी, यज्ञकर्ता, प्रजा के रक्षक, शक्तित्रय 1 से सम्पन्न, मानी, राजनीति में व्यवहार्य छः अंगों 2  में दक्ष, [शत्रु पर विजय पाने के] चार उपायों 3  के प्रयोग में चतुर, चतुरंगिणी 4  सेना से सम्पन्न और द्विज- देवताओं के प्रति भक्तिभाव रखने वाले थे ॥ ६-८ ॥

सम्पूर्ण पृथिवीमण्डल सदैव उनके वशवर्ती रहा। उनका नगर पृथ्वीतल पर इन्द्र के नगर (स्वर्ग) – से भी विशिष्ट प्रतीत होता था। उनकी पत्नी का नाम पुण्यशीला था, जो अत्यन्त पुण्यशालिनी थी। उसके रूप की समानता करने वाली नारी त्रैलोक्यमण्डल में कोई नहीं थी ॥ ९-१० ॥ जिसके पातिव्रत्य-सम्बन्धी गुणों को देखकर अरुन्धती को भी लज्जा आ जाती थी और उसके असूयात्याग को देखकर अनसूया भी लघुता को प्राप्त हो जाती थीं ॥ ११ ॥

किसी समय वे राजा शूरसेन मन्त्रियों और श्रेष्ठ वीरों से घिरे हुए राजसभा में विराजमान थे, उस समय उन्होंने नेत्रज्योति का हरण कर लेने वाले अग्निसदृश तेजवाले आकाशचारी उत्तम विमान को देखा। उसे देखकर गायन-श्रवण में आसक्त राजा के साथ सभी सभासद् व्याकुल होकर ‘यह क्या है, यह क्या है ?’ – कहते हुए दूतों को इस विषय में ज्ञात करने के लिये प्रेरित करने लगे। [तब] वे दूत उस सूर्यसदृश प्रभा वाले विमान को देखने के लिये गये ॥ १२-१४ ॥ [उन राजदूतों में] एक कोई राजदूत, जो वैश्य-पुत्र था और [किसी उत्कट पाप के कारण] कुष्ठरोग से ग्रस्त
था। उसकी दृष्टि पड़ते ही वह विमान भूतल पर गिर पड़ा। तदनन्तर दूतों ने राजा के पास जाकर कहा — ‘ हे महाराज ! पुण्यशाली देवगणों से संयुक्त वह देदीप्यमान विमान किसी दुष्ट के दृष्टिपात से भूतल पर गिर पड़ा’ ॥ १५-१६१/२

तब अत्यन्त हर्षित राजा दो मन्त्रियों को साथ ले अश्व पर आरूढ़ हो विमान को देखने की उत्सुकता से अपने को महान् भाग्यशाली मानते हुए अपने बन्धु- बान्धवोंसहित वहाँ गये। उस समय अनेक प्रकार के बाजे बज रहे थे। वहाँ उन सबने सौ यज्ञों के कर्ता इन्द्र को देखा। उन्हें देखकर सब अपने-अपने वाहनों से उतर गये और उन्हें प्रणाम किया ॥ १७–१९ ॥

तदनन्तर अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत और सम्पूर्ण देवगणों से घिरे हुए बल दैत्य का वध करने वाले इन्द्र से राजा ने हाथ जोड़कर कहा — ‘ हे शचीपते ! आज यह धरणी धन्य हो गयी, मेरा जन्म लेना धन्य हो गया, मेरी सम्पत्ति धन्य हो गयी, मेरे पूर्वज तथा हम सबके नेत्र आज धन्य हो गये, जो कि इस मृत्युलोक में अनुगामियों सहित मुझे आपका दर्शन प्राप्त हुआ ॥ २०-२११/२

ब्रह्मा, ईशान (शिव) आदि देवता भी जिनके वशवर्ती हैं, जिनका दर्शन सौ अश्वमेध यज्ञों द्वारा ही सम्भव है, अन्य किसी भी भाँति नहीं, ऐसे आपका आज हम सब लोगों को दर्शन न जाने किस पुण्य से हुआ है ! हे प्रभो! यह आपका जो विमान है, वह पृथ्वीतल पर कैसे गिर पड़ा? हे देव ! सम्प्रति मेरा यह संशय आप दूर करें और आप कहाँ गये थे अथवा कहाँ जायँगे – यह भी बतलाइये’॥ २२–२४१/२

शतक्रतु इन्द्र बोले — हे राजन् ! उस आश्चर्यमयी घटना को सुनो, जिसे नारदजी ने मुझसे कहा था । हे नृप ! मैं उसे तुमसे कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर [उसका] श्रवण करो ॥ २५१/२

नारदजी बोले — हे शक्र ! मैं मृत्युलोक (पृथ्वी) – में भ्रुशुण्डी के आश्रम में गया था, वे गणेशजी के स्वरूप में स्थित होकर निरन्तर (रात्रि – दिन) [गणेशजी के मन्त्र का ] जप करते रहते हैं ॥ २६ ॥ उनके द्वारा [गणेशजी के स्वरूप का] ध्यान किये जाने से उनका भी स्वरूप वैसा (गणेशजी के स्वरूप-जैसा) ही हो गया है — यह आश्चर्यमयी घटना मैंने वहाँ देखी। उन गजानन स्वरूप धारी मुनि द्वारा पूजित होकर, उन्हें नमस्कार कर और उनकी आज्ञा ले मैं यहाँ आपके दर्शन के लिये आ गया । हे शतयज्ञकर्ता इन्द्र ! मैंने ऐसा [ विलक्षण] सारूप्य पृथ्वी पर अन्यत्र कहीं नहीं देखा ! ॥ २७-२८ ॥

इन्द्र बोले — [ हे राजन्!] तब मैं नारदजी का पूजनकर और उन्हें विदाकर उसी क्षण अत्यन्त उत्सुकतापूर्वक उस प्रकार के मुनि का दर्शन करने के लिये चल दिया ॥ २९ ॥ मन और वायु के समान वेगशाली श्रेष्ठ विमान में आरूढ़ होकर मैंने गजाननरूपधारी [भ्रूशुण्डी] मुनि के [पास जाकर उनका] दर्शन किया। उनका सम्यक् प्रकार से पूजनकर, उनके चरणों में प्रणामकर तथा उनकी पूजा ग्रहणकर जब सपरिवार अमरावती जाने की इच्छा से मैं चला, तो तुम्हारे नगर के समीप यह विमान जैसे ही पहुँचा, उसी समय तुम्हारे कुष्ठरोग से ग्रस्त पापी दूत की दृष्टि पड़ते ही यह यहाँ भूतल पर गिर पड़ा। हे नृप ! मैंने सारी बात तुमसे कह दी ॥ ३०-३२१/२

[ राजा ] शूरसेन बोले — हे शतक्रतु इन्द्र ! किस तपस्या से या किस व्रत-साधन से भ्रूशुण्डी ने गजानन का स्वरूप प्राप्त कर लिया ? हे प्रभो ! वह सब मुझसे कहिये। प्राणी को जैसे अमृत का पान करने पर तृप्ति नहीं होती, और पीने की इच्छा रहती है, वैसे ही इस अमृतोपम कथा का श्रवण करते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है अर्थात् गणपति-महिमा – सम्बन्धिनी अन्य कथाओं का श्रवण करने की लालसा बढ़ती जा रही है। हे स्वामिन्! गजानन की अमृतोपम कथाओं को सुनने से कौन विरत हो सकता है ॥ ३३-३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शक्र के विमान का पतन’ नामक छप्पनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५६ ॥

1. प्रभु, मन्त्र और उत्साह – ये तीन प्रकार की राजशक्तियाँ होती हैं।

2. परराष्ट्रनीति की सफलता के लिये राजा द्वारा व्यवहार्य छः उपाय – १. सन्धि, २. विग्रह, ३.यान (चढ़ाई), ४. आसन (विराम), ५.द्वैधीभाव और ६. संश्रय ।

3. साम, दान, भेद और दण्ड ।

4. पैदल सेना, गजसेना, रथारोही और अश्वारोही ।

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