श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-57
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सत्तावनवाँ अध्याय
भ्रूशुण्डीमुनि का प्रारम्भिक जीवन, मुद्गलमुनि की उनपर कृपा, उनकी कठोर तपस्या तथा उन्हें गणेश – सारूप्य की प्राप्ति
अथः सप्तपञ्चाशत्तमोऽध्यायः
भ्रुशुण्ड्युपाख्यानं

शतक्रतु इन्द्र बोले —  [हे राजन्!] अब मैं तुमसे इस प्राचीन कथा को कहता हूँ कि जिस प्रकार मुनि भ्रूशुण्डी ने गणाधिपति गणेशजी की भक्ति के प्रभाव से उनका सारूप्य प्राप्त कर लिया था ॥ १ ॥ दण्डकारण्य देश में ‘नन्दुर’ संज्ञक नगर में ‘नाम’ नाम से प्रसिद्ध एक दुष्ट कैवर्तक (केवट) रहता था ॥ २ ॥ वह बाल्यकाल से ही चोरी करने लग गया था और युवा होने पर परायी स्त्रियों से व्यभिचारकर्म करने लगा था। वह दूसरों के न देखते और देखते हुए भी उनकी वस्तुएँ चुरा लेता था तथा ‘मैंने चोरी नहीं की’ इस प्रकार की शपथ भी ले लेता था ॥ ३ ॥ वह दो व्यक्तियों (सुहृदों) – के हृदय में भेद उत्पन्न करने के लिये मिथ्या शपथ लेता था । वह जुआ खेलने और मदिरा पीने में लगा रहता था, इसलिये लोगों ने उसे गाँव से बाहर निकाल दिया। तब वह वहाँ से बहुत दूर वन्य प्रान्त के पहाड़ की एक गुफा में पत्नीसहित रहने लगा। उसने उस मार्ग में जाने वाले बहुत-से पथिकों को मार डाला था। इस प्रकार [जब] उसके पास बहुत- सा धन हो गया तो उसने उससे बच्चोंसहित अपनी स्त्री को अनेक प्रकार के अलंकारों से विभूषित किया और अपने धन-वैभव से उन्हें सन्तुष्ट किया ॥ ४-६ ॥

वह शस्त्र, तलवार-ढाल, बहुत-से पाश, उत्तम धनुष, दोनों सिरों पर लौहबद्ध लाठी और बाणों से परिपूर्ण विशाल तरकस धारण किये रहता था ॥ ७ ॥ वह वृक्ष की किसी ऊँची डाल पर बैठकर या उसके कोटर (खोखले भाग)- में छिपकर [ उस मार्ग से जाने वाले] बहुत-से यात्रियों को मारकर उनकी विविध वस्तुओं, वस्त्रों तथा आभूषणों को लाकर घर में संचित करता था तथा दूसरे नगर में ले जाकर उन्हें बेच देता था और नित्य अपने भवन में यथेष्ट विषयों का सेवन किया करता था ॥ ८-९ ॥

इस प्रकार पापपूर्ण आचरण करने वाला वह वन में अनेक पशुओं का भी वध करता था। एक बार किसी वन्य पशु के पीछे दौड़ता हुआ वह एक योजन दूर तक चला गया ॥ १० ॥ [परंतु] पशु उसकी पहुँच से दूर जा चुका था और वह [दौड़ता हुआ] थककर धरती पर गिर पड़ा। तदनन्तर वह दुष्ट बड़े कष्ट से उठकर धीरे-धीरे चलने लगा। मार्ग में चलते हुए उसने पवित्र गणेशतीर्थ को देखा। वहाँ उसने केवल श्रम का परिहार करने के लिये ही स्नान किया ॥ ११-१२ ॥

तदनन्तर अपने व्यवसाय (लूट-पाट)-के उद्देश्य से जब वह जा रहा था तो मार्ग में उसने मुद्गल [मुनि]-को देखा, जो गणनाथ गणेशजी के नाम-मन्त्र का जप कर रहे थे ॥ १३ ॥ तब वह ‘नाम’ नाम का कैवर्तक (केवट) म्यान से तलवार निकालकर उसे उठाये मुद्गल [मुनि ] -के निकट उन्हें मार डालने का मन बनाकर गया। [परंतु] गजानन गणेशजी के भक्त मुद्गल के प्रभाव से उसके शस्त्र तथा दृढ़ मुट्ठी से तलवार भी फिसल गयी और उस दुष्ट की बुद्धि भी उसी क्षण परिवर्तित हो गयी ॥ १४-१५१/२

उसे उस अवस्थामें देखकर वे मुनिवर [ मुद्गलजी ] हँस पड़े। तत्पश्चात् संयतचित्त होकर उससे पूछा — बताओ, तुम्हारे सभी शस्त्र बँधे होने पर भी क्यों गिर पड़े? ॥ १६-१७ ॥

इन्द्र कहते हैं — [हे राजा शूरसेन!] गणेशतीर्थ में स्नान करने और उन मुनि का दर्शन करने से ज्ञान-वैराग्य से युक्त हुआ वह [कैवर्तक (केवट) ] मुद्गलजी से बोला ॥ १८ ॥

कैवर्तक (केवट) बोला — हे ब्रह्मन् ! मैं यह अत्यन्त आश्चर्य की बात मानता हूँ कि इस कुण्ड (गणेशतीर्थ) – में स्नान और विशेष रूप से आपके दर्शन से मेरी बुद्धि परिवर्तित हो गयी। बाल्यकाल से ही मेरी बुद्धि दुष्टतापूर्ण और पापपरायण हो गयी थी । हे प्रभो ! मैंने आज तक असंख्य पाप किये हैं ॥ १९-२० ॥ इस समय आपकी कृपा से मेरी मति [इन पाप-कर्मों से] विरक्त हो गयी है। अब मैं अपने इन गिरे हुए शस्त्रों को पुनः ग्रहण नहीं करूँगा ॥ २१ ॥ अब आप मेरे ऊपर पूर्ण कृपा कीजिये और मेरा इस भवसागर से उद्धार कीजिये। साधु पुरुष दीन पापीजनों पर भी अनुग्रह करते हैं। हे महामुने! जैसे पारसमणि का धातुओं से सम्पर्क व्यर्थ नहीं होता, वैसे ही साधु पुरुषों की संगति कभी भी व्यर्थ नहीं देखी गयी है ॥ २२-२३ ॥

इन्द्र कहते हैं — [हे राजन्!] उस मछुआरे के इस प्रकार कहने पर शरणागत के त्याग में दोष का विशेष रूप से स्मरण करते हुए वे मुद्गलमुनि उससे कृपापूर्वक बोले — ॥ २४ ॥

मुद्गलजी बोले —  दानादि कृत्य विधिपूर्वक किये जाते हैं, उनमें तुम्हारा अधिकार नहीं है, तथापि तुम पर कृपा करने के लिये तुम्हें गजानन गणेशजी के मनुष्यों के लिये सभी सिद्धियों को देने वाले नामजप का उपदेश करता हूँ। तदनन्तर [जब वह] कैवर्तक महर्षि मुद्गल को प्रणाम करने लगा, तो उन्होंने उसके मस्तक पर अपना अभयप्रद श्रीहस्त स्थापित किया और ‘गणेशाय नमः’ इस नाममन्त्र का उपदेश दिया ॥ २५-२६१/२

उन्होंने अपनी यष्टि (छड़ी, लाठी, या लकड़ी) को उसके सामने भूमि में रोपित कर दिया और उससे प्रीतिपूर्वक बोले कि जबतक इस यष्टि में अंकुर न निकल आये और जबतक मैं आ न जाऊँ, तबतक तुम इस मन्त्र का जप करते रहो ॥ २७-२८ ॥ एक आसन में बैठकर वायुमात्र का भक्षण करते हुए एकाग्रचित्त से [जप करते हुए ] सायं-प्रातः नित्य- निरन्तर यष्टिमूल में जल डालते रहना ॥ २९ ॥

इन्द्र बोले —  कैवर्तक (केवट) नाम मुद्गलमुनि द्वारा उपदेश पाकर और उन मुनि के अन्तर्हित हो जाने के बाद अपने जीवन से निराश होकर वहीं स्थित हो गया ॥ ३० ॥ मुनि की यष्टि को सामने रखकर वन में वृक्ष की छाया का आश्रय लेकर एक आसन में स्थित हुआ वह [गणेशजी के] नाममन्त्र का [ निरन्तर ] जप करता रहा ॥ ३१ ॥ निराहार और निराकांक्ष रहते हुए इन्द्रियसमूहों पर विजय पाकर एवं मन को वश में करके [वह तप करता रहा ।] इस प्रकार सहस्र वर्ष बीत जाने पर उस यष्टि में अंकुर निकल आये। तब वह मुनि के आगमन की प्रतीक्षा करने लगा। [ उस समय] उसका शरीर दीमकों की बाँबी से वेष्टित हो गया था और उसपर लताओं का जाल-सा फैल गया था ॥ ३२-३३ ॥

तदनन्तर वे मुद्गलमुनि दैववशात् उस स्थान में आये, तो उन्हें उस कैवर्त (मछुआरे) और यष्टि का स्मरण हुआ । तब भ्रमण करते हुए उन मुनि ने उस उत्तम यष्टि को अंकुरित हुए और उस मछुआरे को दीमकों की बाँबी से आक्रान्त शरीर वाला देखा ॥ ३४-३५ ॥ उसका वह उत्तम तप सम्पूर्ण मुनियों के लिये भी दुष्कर था। उस समय उन मुद्गलमुनि ने बड़े प्रयत्नपूर्वक मात्र नेत्रों को देखकर उसे पहचाना ॥ ३६ ॥

तदनन्तर उन मुनिश्रेष्ठ ने उसके शरीर पर स्थित दीमकों की बाँबी को हटाया और अभिमन्त्रित जल से उसके सम्पूर्ण शरीर का सिंचन किया। तदुपरान्त जप के प्रभाव से दिव्य शरीर तथा गणपति के सारूप्य को पा लेने वाले उस कैवर्तक को मुनि ने सम्बोधित किया ॥ ३७-३८ ॥ उसके दो [दिव्य ] हाथ थे और वह भगवान् विनायक के शुभ नाम का जप कर रहा था। मुनि के द्वारा उद्बोधित किये जाने पर उसने अपने नेत्र खोले ॥ ३९ ॥ उसके नेत्रों से उत्पन्न अग्नि विद्युत् की भाँति आकाश को चली गयी और वह त्रिलोकी को दग्ध करने के लिये उद्यत हो गयी, तब मुनि के द्वारा उसका निवारण किया गया। वह कैवर्तक (केवट) भी अपने करुणामय गुरु उन मुद्गलमुनि को नमनकर और उनका आलिंगन कर वैसे ही प्रसन्न हुआ, जैसे पुत्र अपने पिता का आलिंगन कर प्रसन्न होता है ॥ ४०-४१ ॥

तब उस ‘नाम’ नामक मछुआरे को, जिसे उपदेश दिया था, पुनः वल्मीक से उत्पन्न होने के कारण उन्होंने अपना पुत्र मान लिया। हे राजन् ! मुद्गलमुनि ने उसका आदरपूर्वक नामकरण किया; उसके भ्रूमध्य से शुण्डा (सूँड़) निकल आयी थी, इसलिये उन्होंने उसका ‘भ्रूशुण्डी’ नाम रखा ॥ ४२-४३ ॥ तदनन्तर उन मुद्गलमुनि ने उसे एकाक्षर मन्त्र का उपदेश दिया और वरदान देते हुए कहा कि तुम मेरे वचन के प्रभाव से इस एकाक्षरमन्त्र के ऋषि बनो और मुनियों में श्रेष्ठ हो जाओ । इन्द्रादि देवताओं, गन्धर्वों और सिद्धों के लिये भी पूज्य हो जाओ। जैसे भगवान् गणेश का ध्यान और दर्शन पापों का नाश करने वाला होता है, वैसे ही [प्रभाव से सम्पन्न हुए ] हे मुनि! तुम भ्रूशुण्डी के रूप में विख्यात हो जाओ। जिसको तुम्हारा दर्शन हो जाय, वह मनुष्य कृतकृत्य हो जायेगा ॥ ४४–४६ ॥ मेरे कथनानुसार (आशीर्वाद से) तुम्हारी आयु एक लाख कल्पों की होगी। इस प्रकार मुद्गलजी जब उसे बहुत-से वरदान दे रहे थे, तो उसी समय इन्द्रादि देवता और नारदादि मुनि भी उसका दर्शन करने के लिये आये और उसे प्रणिपात करते हुए बोले — ‘हे भ्रूशुण्डी ! आपके दर्शन से हमारा जन्म, हमारी विद्या, हमारे माता- पिता, हमारी तपस्या और हमारा यश सार्थक हो गया ॥ ४७-४८ ॥ हे मुने! आप ही गणनाथ हैं, आप ही हमारे पूजनीय हैं। तब उन भ्रूशुण्डीमुनि ने भी उन सबका सम्यक् प्रकार से पूजनकर, उन्हें प्रणामकर विदा कर दिया ॥ ४९ ॥

तत्पश्चात् वे पुनः पद्मासन में स्थित होकर एकाक्षर मन्त्र का जप करने लगे। वे अपने सम्मुख गणेशजी की सुन्दर मूर्ति की प्रतिष्ठाकर प्रतिदिन उसका षोडश उपचारों से पूजन करने लगे । उनका आश्रम वापी, सरोवर, वृक्ष और लताओं से सुशोभित हो रहा था । वहाँ सिंह और मृग तथा नेवले एवं विषधर सर्प भी वैर का त्यागकर रहते थे ॥ ५०–५११/२

तदनन्तर सौ वर्ष बीत जाने पर गजानन गणेशजी प्रसन्न हुए और बोले — ‘तुम तो मेरा सारूप्य प्राप्त कर लिये हो, फिर अब क्यों तपस्या कर रहे हो ? तुम तो कृतकृत्य हो चुके हो अर्थात् तुम्हारे सारे कार्य पूर्ण हो गये हैं; अब तुम अपनी आयु पूर्णकर अन्त में मेरे सायुज्य को प्राप्त करोगे ॥ ५२-५३ ॥ यह क्षेत्र ‘नामल’ 1  नाम से सुविख्यात होगा। यहाँ अनुष्ठान करने वाले मनुष्यों को अनेक प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त होंगी ॥ ५४ ॥ यहाँ स्थित मेरी मूर्ति के दर्शन से मनुष्य पुनर्जन्म का भागी नहीं होगा। [इसके दर्शन से] पुत्रहीन व्यक्ति को पुत्रलाभ की और विद्यार्थी को ज्ञान की प्राप्ति होगी ॥ ५५ ॥

इन्द्र बोले — हे नृपश्रेष्ठ शूरसेन ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब कुछ मैंने वर्णन कर दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ? ॥ ५६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘भ्रूशुण्डी-उपाख्यान’ नामक सत्तावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५७ ॥

1. यह प्राचीन ‘अमलाश्रमक्षेत्र’ है। धर्मराज यम ने माता के शाप से छूटने के लिये यहाँ गणेशजी की आराधना की थी। यमराज द्वारा स्थापित आशापूरक गणेशजी की मूर्ति भी यहाँ है । यहाँ पर ‘सुबुद्धिप्रदतीर्थ’ नामक कुण्ड भी है। भ्रूशुण्डि योगीन्द्र की भी यहाँ मूर्ति है।

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