August 26, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-58 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अट्ठावनवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थीव्रत की महिमा के प्रसंग में भ्रूशुण्डीमुनि के पितरों के उद्धार की कथा अथः अष्टपञ्चाशत्तमोऽध्यायः सङ्कष्ट चतुर्थी व्रत कथनं ब्रह्माजी बोले — हे व्यासजी ! मरुत्वान् इन्द्र के इस प्रकार के उत्तम वचन सुनकर और उस [भ्रूशुण्डि मुनि की] अमृतोपम कथा का श्रवण कर प्रसन्न हुए राजा शूरसेन ने उनसे पुन: पूछा — ॥ १ ॥ शूरसेन बोले — हे देवेन्द्र! किस उपाय से आपका विमान आकाश में जा सकेगा ? हे विभो ! उस उपाय को कीजिये अथवा बताइये कि मैं आपके लिये क्या करूँ ? ॥ २ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे व्यासजी ! इस प्रकार से पुनः प्रश्न करने वाले राजा शूरसेन से सभी लोगों के सुनते हुए देवशत्रुओं का वध करने वाले इन्द्र ने हँसते हुए-से यह वचन कहा — ॥ ३ ॥ इन्द्र बोले — हे नृपश्रेष्ठ ! यदि आपके नगर में कोई ब्राह्मण या क्षत्रिय भी संकष्टचतुर्थी का व्रत करने वाला हो तो उसके द्वारा एक वर्ष तक किये गये उस व्रत के पुण्य का सम्यक् प्रकार से दान दिये जाने पर ही यह गमन कर सकेगा; अन्यथा हे राजन् ! यह अयुत (दस हजार ) पुरुषों के प्रयत्न करने पर भी नहीं चल सकता ॥ ४-५ ॥ राजा बोले — [हे विभो !] मुझे बताइये कि वह मंगलकर संकष्टचतुर्थी व्रत कैसा है ? उसका क्या पुण्य है ? उसका क्या फल है ? उसकी विधि क्या है और उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है ? ॥ ६ ॥ यहाँ प्राचीनकाल में किसने इस व्रत को किया था, जिसे करने से सिद्धि प्राप्त हुई हो । हे इन्द्र ! कृपया यह सब विस्तारपूर्वक बताइये ॥ ७ ॥ इन्द्र बोले — [हे राजन्!] इस सन्दर्भ में एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, जिसमें कृतवीर्य [के पिता] और नारदजी का संवाद है ॥ ८ ॥ इस पृथ्वीतल पर कृतवीर्य नामक एक बलवान् राजा हुआ था। जो सत्यवादी, शीलसम्पन्न, दानी, यज्ञकर्ता, मानी, महारथी जितेन्द्रिय, अल्पाहारी और देव-ब्राह्मण-पूजक था। उसके अश्वारोही, गजारोही योद्धाओं, रथियों और धनुर्धारियों की संख्या की गणना नहीं हो सकती थी। हे राजन् ! वे सभी सह्याद्रिक्षेत्र के निवासी थे ॥ ९-१०१/२ ॥ उसके राजभवन में सभी पलंग और पात्र सोने के ही थे। उनके यहाँ भोजन पकाने के लिये भी कभी ताम्रपात्र का प्रयोग नहीं होता था । उसके यहाँ बारह हजार ब्राह्मण पंक्तिबद्ध होकर भोजन करते थे ॥ ११-१२ ॥ त्रैलोक्यसुन्दरी सुगन्धा उसकी पत्नी थी, जो धार्मिक स्वभाववाली, पतिव्रता और पति को प्राणों से भी अधिक प्रिय मानने वाली थी। वह अनेक प्रकार के अलंकारों से अलंकृत, सौभाग्यवती और ब्राह्मणों, देवताओं एवं अतिथियों के पूजन में रुचि रखने वाली थी । हे राजन् ! वे दम्पती (राजा-रानी) इस प्रकार के अर्थात् सर्वगुणसम्पन्न होते हुए भी पुत्रहीन थे ॥ १३-१४ ॥ पुत्रप्राप्तिहेतु उन दोनों ने सभी प्रकार के दान, व्रत और तप किये तथा अन्य नियमों का पालन किया एवं प्रभूत दक्षिणावाले यज्ञ किये। पुत्र- प्राप्ति की लालसा से उन्होंने अनेक तीर्थों एवं [पुण्य] क्षेत्रों की यात्रा की, फिर भी जन्मान्तर में किये हुए पापों के कारण उन्हें पुत्र नहीं हुआ ॥ १५-१६ ॥ [तब] दुखी होकर राजा ने एक बार मन्त्रियों को बुलाकर राज्य, राजमुद्रा, कोश, प्रजा और जनपद — सब कुछ उन्हें दे दिया और रानीसहित [किसी] श्रेष्ठ वन को चले गये। [वहाँ पहुँचकर] वे दम्पती वल्कल और मृगचर्म धारणकर तप में स्थित हो गये ॥ १७-१८ ॥ केवल सूखे पत्तों तथा वायुमात्र का आहार करते हुए उन दोनों ने इन्द्रियों एवं आहार पर नियन्त्रण कर लिया था । [ समस्त शरीर के वल्मीक और लताजालों से आवृत हो जाने के कारण] उन दोनों के मात्र नेत्र ही परिलक्षित होते थे। उन्हें इस अवस्था में देखकर नारद मुनि ने पितृलोक में स्थित कृतवीर्य के पिता से कहा — ‘मृत्युलोक (पृथ्वी)-में तुम्हारा पुत्र कृतवीर्य पुत्रहीन होने के कारण प्रायोपवेशन ( अनशन) – पर बैठा है, वह कल या परसों मर सकता है। यदि उसे स्वर्गलोक की प्राप्ति कराने वाला पुत्र प्राप्त हो जाय, तभी वह कृतवीर्य जीवित रह सकेगा या मरनेप र स्वर्गलोक को प्राप्त करेगा — इस प्रकार कहकर नारदजी [वहाँ से] चल दिये, तभी उन्होंने पृथ्वीलोक में [भ्रूशुण्डीमुनि की गणेशजी से सारूप्य-सम्बन्धी] अद्भुत घटना देखी ॥ १९-२२ ॥ [उधर] भ्रूशुण्डी के माता-पिता, उनके दोनों पुत्र और पुत्रीसहित पत्नी — ये सभी अग्नि की ज्वालाओं से परिपूर्ण कुम्भीपाक नामक भयंकर नरक में नीचे की ओर मुख करके लटक रहे थे । यमदूतों के द्वारा पीटे जाने पर वे अनेक प्रकार से चीख-पुकार करते हुए क्रन्दन कर रहे थे। उनके क्रन्दन को सुनकर दयानिधान नारदजी ने आकर भ्रूशुण्डी से उनके दुःख को कहा ॥ २३-२४१/२ ॥ नारदजी ने कहा — हे महामुने ! गणेशजी के सारूप्य को प्राप्त हुए जिन आपका दर्शन करने के लिये इन्द्र आदि देवगण तथा कपिल आदि मुनिगण आते हैं, उन आपके माता, पिता, पत्नी, पुत्र, पुत्री और सेवक आपके दोष से यमलोकस्थ कुम्भीपाक नरक में क्यों पकाये जा रहे हैं? आप स्वयं भी ज्ञानसम्पन्न हैं, फिर इस बात को क्यों नहीं जानते ? आप अपने पूर्वजों के उद्धार का प्रयत्न कीजिये ॥ २५-२७१/२ ॥ इन्द्र बोले — [ हे राजा शूरसेन !] मुनि के द्वारा कहे गये वचनों को सुनकर भ्रूशुण्डी अत्यन्त दुखित हो गये । अपने पितरों के दुःख से दुखी होकर वे प्रज्वलित अग्नि की भाँति सन्तप्त हो उठे। तब उन्होंने उनके उद्धार का उपाय सोचा ॥ २८-२९ ॥ तदनन्तर परोक्ष तत्त्व के ज्ञाता भ्रूशुण्डी ने ध्यान द्वारा [अपने पितरों की स्थिति] देखकर भगवान् गजानन का ध्यान करते हुए हाथ में पवित्र जल लेकर संकष्टचतुर्थीव्रत- जनित पुण्यफल अपने पितरों को प्रदान किया । तदनन्तर पितरों के उद्देश्य से भगवान् गणेश से प्रार्थना करते हुए कहा- —॥ ३०-३१ ॥ भ्रूशुण्डी बोले — हे गणपति गणेशजी! यदि मैंने भक्तिपूर्वक आपका व्रत किया हो, तो उसके प्रभाव से आप शीघ्र ही मेरे पूर्वजों का उद्धार कीजिये ॥ ३२ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने उस जल को गजानन गणेशजी के हाथ में डाल दिया। तब उस जल के डालते ही गणेशजी की कृपा से उनके सभी पितर देवताओं के से स्वरूपवाले होकर विमानों में आरूढ़ हो भगवान् गणेशजी के धाम को चले गये। उस समय अप्सराएँ उनकी सेवा कर रही थीं, चारण उनकी स्तुति कर रहे थे और गन्धर्व उनका यशोगान कर रहे थे ॥ ३३-३४१/२ ॥ कुम्भीपाक नरक में जो दूसरे भी पापी मनुष्य थे, वे भी विमानों में आरूढ़ होकर गणेशजी के धाम को चले गये। इस प्रकार मैंने तुमसे इस व्रत की महिमा का वर्णन कर दिया ॥ ३५-३६ ॥ जबकि उस व्रत का मात्र एक दिन का पुण्य प्रदान करने से वे सब सद्गति को प्राप्त हो गये तो जिसने जन्मभर आदरपूर्वक संकष्टचतुर्थी का व्रत किया है, उसके पुण्य की गणना करने में शेषजी भी सक्षम नहीं हैं। इसलिये उस व्यक्ति द्वारा दिये गये पुण्य के प्रभाव से मेरा विमान गतिमान् हो जायगा ॥ ३७-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘संकष्टचतुर्थीव्रत-माहात्म्य-कथन’ नामक अट्ठावनवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५८ ॥ Content is available only for registered users. 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