August 26, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-59 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ उनसठवाँ अध्याय कृतवीर्य के पूर्वजन्म की कथा, संकष्टचतुर्थीव्रत की विधि और उसकी महिमा अथः एकोनषष्टितमोऽध्यायः चतुर्थीव्रतकथनं राजा बोले — [हे देवेन्द्र!] भ्रूशुण्डीमुनि के उन पितरों के कुम्भीपाक नरक से निकलकर दिव्य लोक (गणेशजी के धाम) – में चले जाने पर कृतवीर्य के पिता ने [ अपनी वंश-परम्परा को बचाये रखने के लिये] कौन- सा उपाय किया ? ॥ १ ॥ इन्द्र बोले — [हे राजन्!] अपने वंश-विच्छेद की सम्भावना सुनकर दुखी हुए कृतवीर्य के पिता शीघ्र ही ब्रह्मलोक को गये और वहाँ कमल पर आसीन ब्रह्माजी का दर्शन किया ॥ २ ॥ उन्होंने उन्हें प्रणाम करके उनसे अपने वंश के विच्छेद का कारण पूछते हुए कहा — ‘हे विधाता! मेरा पुत्र अत्यन्त धर्मात्मा, दानी, यज्ञकर्ता, देवताओं और अतिथियों के प्रति भक्तिभाव रखने वाला तथा मान्यजनों का अतिशय सम्मान करने वाला है। उसने पुत्र-प्राप्ति के लिये अनेक प्रकार के प्रयत्न भी किये हैं ॥ ३-४ ॥ हे सुरेश्वर! फिर भी उसके पुत्र क्यों नहीं हुआ ? अपना राज्य मन्त्रियों को सौंपकर [ इस समय ] वह मात्र वायु का आहार करते हुए वन में स्थित है ॥ ५ ॥ उसके शरीर में मात्र हड्डियाँ ही रह गयी हैं और वह आज या कल ही मर सकता है। हे प्रभो ! जिससे उसके जन्मान्तरीय पाप का नाश हो जाय — उस उपाय को आप मुझसे दयाकर कहिये। हे कमलासन ! अपने वंश की वृद्धि के लिये मैं उस उपाय को अपने पुत्र को प्राप्त करा दूँगा । तब उनकी इस प्रकार की मधुर वाणी को सुनकर ब्रह्माजी ने भी वैसी ही मधुर वाणी में कहा कि मेरे द्वारा कथित अपने पुत्र के पूर्वजन्म के वृत्तान्त को सुनो ॥ ६–८ ॥ [कृतवीर्य जिस नगर का राजा है,] उसी नगर में पूर्वकाल में साम नाम का एक अन्त्यज रहता था। वह इतना अधिक पापी था कि उसको देख लेनेमात्र से पुण्यों का नाश हो जाता था। एक बार उस [पापी]-ने लोभवश रास्ते में [जाते हुए] सांसारिक विषय-वासनाओं के प्रति तटस्थ भाव रखने वाले बारह ब्राह्मणों को मार डाला और उन्हें एक गुफा के अन्दर फेंक दिया ॥ ९-१० ॥ हे राजन् ! तदनन्तर उनका सब कुछ लेकर वह माघ कृष्ण चतुर्थी की रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर अपने घर आ गया। [वहाँ आकर] उसने ‘गणेश! गणेश !’ कहकर शीघ्रतापूर्वक अपने पुत्र को बुलाया। उस दिन पूरे दिन उसे अन्न-जल नहीं प्राप्त हुआ था, अतः उसने उसी के साथ प्रसन्नतापूर्वक भोजन किया। हे राजन्! बहुत-सा समय बीत जाने के बाद कृष्णपक्ष की चतुर्थी को ही रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने के बाद उसकी मृत्यु हो गयी ॥ ११-१३ ॥ अज्ञानपूर्वक किये गये संकष्टचतुर्थीव्रतजनित पुण्य के प्रभाव से वह श्रेष्ठ विमान में आरूढ़ होकर भगवान् गणेश के सुखदायी धाम में चला गया। उस समय अप्सराओं के समूह उसपर पंखा डुला रहे थे तथा विमानस्थित [चारण और गन्धर्व आदि ] दिव्य पुष्पों से अर्चना कर उसकी स्तुति कर रहे थे ॥ १४-१५ ॥ उसी पुण्य के शेष रह जाने के कारण वह पृथ्वी पर तुम्हारे पुत्र राजा कृतवीर्य के नाम से उत्पन्न हुआ, जो [पूर्वजन्मकृत ब्रह्महत्या के पाप के कारण] अभीतक पुत्रहीनता को प्राप्त है। हे अनघ ! उस महापाप का क्षय हो जाने पर ही उसे पुत्र उत्पन्न हो सकता है ॥ १६१/२ ॥ हे नृपश्रेष्ठ! ब्रह्माजी के इस प्रकार के वचन सुनकर वे काँपने लगे। तत्पश्चात् उन्होंने पुनः पापनाश का उपाय पूछा— ॥ १७१/२ ॥ कृतवीर्य के पिता बोले — हे विधाता ! उसके द्वारा किया गया ब्रह्महत्याजनित पाप कैसे नष्ट होगा ? हे करुणासिन्धु! यद्यपि वह उपाय अत्यन्त दुष्कर होगा, फिर भी उसे बताइये ॥ १८१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — यदि तुम्हारा पुत्र संकष्टचतुर्थी नामक व्रत को सम्यक् रूप से करेगा, तो वह पाप से मुक्त हो जायगा ॥ १९१/२ ॥ राजा (कृतवीर्य के पिता) बोले — हे ब्रह्मन् ! उस व्रत को कैसे और किस शुभ मास में किया जाता है ? हे स्वामिन्! वह सब मुझसे कहिये, जिससे वह पाप नष्ट हो सके ॥ २०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — माघमास के कृष्णपक्ष की चतुर्थी यदि मंगलवार को पड़े तो चन्द्रमा के अनुकूल होने पर शुभ मुहूर्त में इस व्रत का प्रारम्भ करे। पहले दातून करे, फिर इक्कीस बार [किसी पवित्र नदी या सरोव रमें डुबकी लगाकर ] स्नान करे ॥ २१-२२ ॥ तत्पश्चात् नित्य कर्मों का सम्पादनकर [ गणेशजी के] श्रेष्ठ मन्त्र का जप करे। निराहार और मौन रहते हुए परनिन्दा से दूर रहे । नियमों का पालन करे, दुष्कर्म न करे । ताम्बूल सेवन, जलपान, परद्रोह तथा चुगली न करे । दिन के अन्त में अर्थात् सायंकाल तिल और आँवले के चूर्ण को शरीर में लगाकर स्नान करे [गणेशजी के ] एकाक्षर, षडक्षर अथवा वैदिक मन्त्र का जप करे ॥ २३-२५ ॥ गणेशजी की प्रसन्नता के लिये उनके नाम – मन्त्र का यथाविधि जप करे तथा स्थिरचित्त होकर देवाधिदेव गजानन गणेशजी का ध्यान करे । तदनन्तर एक मुहूर्त के पश्चात् गणपति गणेशजी का षोडश उपचारों और अनेक प्रकार के नैवेद्यों से भी पूजन करे ॥ २६-२७ ॥ [नैवेद्य के रूप में] पूड़ी, मोदक, पुआ, लड्डू, बड़ा, खीर, विविध प्रकार के अन्नों से बने हुए अनेक प्रकार के लेह्य और चोष्य व्यंजनों से भोग लगाये ॥ २८ ॥ [तत्पश्चात्] अनेक प्रकार के फलों, ताम्बूल, पूगीफल (सुपाड़ी), दक्षिणा, इक्कीस दूर्वाओं, दीपकों और पुष्पों से उनका अर्चन करे ॥ २९ ॥ चन्द्रमा के उदय होने के समय पहले मन्त्रपूर्वक चतुर्थी तिथि को अर्घ्य दे, फिर गजानन गणेशजी को तत्पश्चात् चन्द्रमा के लिये अर्घ्य प्रदान करे ॥ ३० ॥ तत्पश्चात् [किये गये] पूजन को गणेशजी को निवेदितकर उन्हें प्रणाम और क्षमायाचना करके भक्तिपूर्वक इक्कीस ब्राह्मणों को यथाशक्ति भोजन कराये। आर्थिक रूप से अशक्त होने की स्थिति में दस या बारह ब्राह्मणों को भोजन कराये और उन्हें दक्षिणाएँ देकर भली-भाँति सन्तुष्ट करे। तदनन्तर सम्यक् रूप से गणेशजी की कथा का श्रवणकर स्वयं मौन होकर भोजन करे ॥ ३१-३२ ॥ तत्पश्चात् शेष रात्रि को गायन-वादन एवं जयघोष कर [जागरण करते हुए ] व्यतीत करे। हे राजन् ! इस प्रकार प्रयत्नपूर्वक एक वर्ष तक यह व्रत करने पर [तुम्हारे पुत्र के] सम्पूर्ण पापों का क्षय हो जाने से उसे उत्तम पुत्र की प्राप्ति होगी। इस व्रत के करने वाले मनुष्य की अन्य भी जो-जो कामनाएँ होंगी, वे पूर्ण होंगी। इसके करने से सम्पूर्ण संकटों का नाश होता है और शत्रुओं की सेना से कोई भय नहीं रहता ॥ ३३-३४१/२ ॥ शमीवृक्ष के मूल भाग में बैठकर उपवास करते हुए चन्द्रमा के उदय होने तक गणेशजी के मन्त्र का जप करते हुए इस व्रत को भलीभाँति करे। इस व्रत को करने से अन्धा, गूँगा, मूर्ख, लँगड़ा भी अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है। इस व्रत को करने वाला स्त्री, पुत्र, धन और राज्य को प्राप्त कर लेता है, इसमें सन्देह नहीं है । व्रती को श्रावण आदि पृथक्-पृथक् मासों में घृत, लड्डू आदि पृथक्-पृथक् भोज्य पदार्थों का भोजन करना चाहिये। वर्षपर्यन्त ऐसा करनेवाले को अत्यन्त उत्तम सिद्धि की प्राप्ति होती है ॥ ३५-३७१/२ ॥ [व्रती को व्रत के दिन] श्रावणमास में सात लड्डू, भाद्रपदमास में दही का भोजन करना चाहिये। आश्विनमास में उपवास और कार्तिकमास में दुग्धपान करना चाहिये । मार्गशीर्षमास में उसे निराहार रहना चाहिये और पौषमास में गोमूत्र का पान करना चाहिये। माघमास में उसे तिलों का भक्षण करना चाहिये तथा फाल्गुनमास में शर्करायुक्त घृत खाना चाहिये। चैत्रमास में उसे पंचगव्य का पान करना चाहिये और वैशाखमास में शतपत्रिका का भोजन करना चाहिये। ज्येष्ठमास में उसे घृत का भोजन तथा आषाढमास में मधु का भक्षण करना चाहिये ॥ ३८-४०१/२ ॥ कृतवीर्य के पिता बोले — हे ब्रह्मन् ! अंगारक चतुर्थी का विशेष विधान क्यों कहा गया है ? आपके प्रति आदर का भाव रखने वाले मुझ विनम्र शरणागत से यह सब कृपापूर्वक कहिये । गजानन गणेशजी की मंगलमयी कथा को सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ ४१-४२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘संकष्टचतुर्थी व्रतकथन’ नामक उनसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ५९ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe