August 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-63 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ तिरसठवाँ अध्याय गणेश-पूजन में दूर्वांकुर के माहात्म्य के प्रसंग में अनलासुर के आतंक का वर्णन अथः त्रिषष्टितमोऽध्यायः दुर्वामाहात्म्यं गणेशजी के गण बोले — हे योगिजनो! आप सभी अपने चंचल मन को स्थिरकर श्रवण करें। [गणेशजी की] जिस महिमा का कथन करने में [सहस्रमुख ] शेष तथा चतुर्मुख ब्रह्माजी भी समर्थ नहीं हैं, उसका वर्णन करने में कौन समर्थ हो सकता है, फिर भी हम शक्ति के अनुसार उसका वर्णन करते हैं ॥ ११/२ ॥ ब्रह्मा और शिव आदि जिनका सर्वदा स्तवन करते हैं, उन गणनाथ गणेशजी की महिमा का स्पष्ट वर्णन कौन कर सकता है ? तथापि हे निष्पाप [ योगिजन ! ] उनकी इस प्रकार की लीला का श्रवण करो ॥ २-३ ॥ दूर्वांकुरों की महिमा मुनियों और देवताओं को भी ज्ञात नहीं है। [देवाधिदेव गणेशजी को दूर्वादि से अर्चन का जो पुण्य प्राप्त होता है;] वह यज्ञ, दान, तप, व्रत और हवन से भी नहीं प्राप्त होता । इस विषय में यहाँ एक प्राचीन इतिहास का उदाहरण दिया जाता है, जिसमें इन्द्र और महात्मा नारद के संवाद का वर्णन है ॥ ४-५ ॥ एक बार नारदजी इन्द्र को देखने की इच्छा से [स्वर्गलोक में] आये। वहाँ [उनके द्वारा] परम भक्ति से पूजित होकर आसन ग्रहण कर लेने पर बलसूदन इन्द्र ने आदरपूर्वक मुनि से दूर्वा का माहात्म्य पूछा ॥ ६१/२ ॥ इन्द्र बोले — हे ब्रह्मन् ! हे मुने! यह बतलाइये देवाधिदेव महात्मा गणेशजी को दूर्वांकुर विशेष रूप से क्यों प्रिय हैं ? ॥ ७१/२ ॥ मुनि बोले — [ हे देवेन्द्र!] उत्तम दूर्वा-माहात्म्य जैसा मुझे ज्ञात है, वह मैं कहता हूँ । पूर्वकाल में स्थावर नामक नगर में कौण्डिन्य नामवाले एक महामुनि हुए थे । वे गणेशजी के उपासक और तपोबल से सम्पन्न थे । नगर के दक्षिण भाग में उन मुनि का अत्यन्त रमणीय महान् आश्रम था, जो लताओं और वृक्षों से समन्वित था ॥ ८-१० ॥ उसमें अत्यन्त विशाल सरोवर थे, जो पुष्पित कमलों से युक्त थे, उनपर भ्रमर बैठे रहते थे तथा [उन सरोवरों में] हंस, बत्तख, चकवा, बगुला, कच्छप और मुर्गे क्रीडा करते थे । वहाँ उन कौण्डिन्यमुनि ने उत्कट तप करना प्रारम्भ किया ॥ ११-१२ ॥ वे अपने सम्मुख गणेशजी की चतुर्भुज स्वरूपवाली, अत्यन्त प्रसन्न मुखमुद्रा वाली, सुन्दर, वरद मुद्रा वाली, दूर्वा से युक्त और सुपूजित महामूर्ति की स्थापनाकर भगवान् गणेशजी को प्रसन्नता प्रदान करने वाले षडक्षर परम मन्त्र का जप करने लगे। तब उनकी आश्रया नाम वाली पत्नी ने आश्चर्यचकित हो उनसे पूछा —- ॥ १३-१४ ॥ आश्रया बोली — हे स्वामिन्! आप भगवान् गजानन को दूर्वा का भार क्यों चढ़ाते हो ? क्योंकि घास तिनकों से तो कोई प्रसन्न होता नहीं। यदि इससे कोई पुण्य होता हो तो आप कृपया मुझसे कहिये ॥ १५१/२ ॥ कौण्डिन्य बोले — हे प्रिये ! सुनो, मैं दूर्वा के उत्तम माहात्म्य को कहता हूँ॥ १६ ॥ पूर्वकाल की बात है, धर्मराज के नगर में एक उत्तम उत्सव हो रहा था। उसमें सभी देवता, गन्धर्व, अप्सराएँ, सिद्ध, चारण, नाग, मुनि, यक्ष और राक्षस आमन्त्रित किये गये थे। वहाँ नृत्य करती हुई तिलोत्तमा का उत्तरीय भूमि पर गिर पड़ा, [जिससे ] यम ने उसके सुन्दर और विशाल स्तनयुगल को देख लिया। [इससे] वे काम- सन्तप्त, बेचैन और लज्जाहीन-से हो गये ॥ १७–१९ ॥ उन्होंने उसके आलिंगन आदि की इच्छा की। तदनन्तर [बोध होने पर] वे धर्मराज लज्जा से मुख नीचे करके सभा से बाहर निकल गये । जाते समय उनका तेज स्खलित होकर भूमि पर गिर पड़ा; उससे एक विकृत मुख वाला पुरुष उत्पन्न हुआ, जो ज्वालामालाओं से युक्त था। वह अपने क्रूर दंष्ट्रारव (दाँत पीसने की आवाज) -से तीनों लोकों को भयभीत कर रहा था, सम्पूर्ण पृथ्वी को जलाये डाल रहा था तथा अपनी जटाओं से आकाश का स्पर्श कर रहा था ॥ २०–२२ ॥ मन अत्यन्त कम्पित हो उठे, तब सभी सभासद् उसके [भयंकर] नाद से तीनों लोकों के प्राणियों के [भगवान्] विष्णु के पास गये। उन सबने अपनी-अपनी मति के अनुसार अनेक प्रकार के स्तोत्रों से उनका स्तवन किया और सम्पूर्ण लोकों के हित के लिये शान्तभाव से उनकी प्रार्थना की ॥ २३-२४ ॥ [तब] वे भगवान् विष्णु उन सबके साथ अनामय गणेशजी के पास गये। उस (यमपुत्र) – की मृत्यु उन्हीं के हाथ से जानकर उन सबने उन्हें प्रसन्न किया ॥ २५ ॥ देवता और मुनि बोले — आप विघ्नस्वरूप के लिये नमस्कार है, आप विघ्नहारी के लिये नमस्कार है, आप सर्वरूप के लिये नमस्कार है; हे सर्वसाक्षी ! आपको नमस्कार है। महान् देवता के लिये नमस्कार है, जगत् के आदि कारण आपके लिये नमस्कार है; हे कृपानिधान ! आप जगत् का पालन करने वाले हैं, आपके लिये नमस्कार है ॥ २६-२७ ॥ पूर्ण तमोगुणरूप आपको नमस्कार है, आप सर्वसंहारकारी को नमस्कार है, हे भक्तवरद ! आपको नमस्कार है, सर्वदाता के लिये बारम्बार नमस्कार है ॥ २८ ॥ हे अनन्यशरण ! हे समस्त कामनाओं को परिपूर्ण करने वाले ! आपको नमस्कार है । वेद के ज्ञाता आपको नमस्कार है, वेद के कर्ता आपको नमस्कार है ॥ २९ ॥ [आपको छोड़कर] हम किस दूसरे की शरण में जायँ? कौन दूसरा हमारे भय को दूर कर सकता है ? [आपकी] प्रजा [हम सब] – पर अकाल में ही प्रलय कैसे आ गयी ? हा देवेश्वर गजानन ! हा विघ्नहर ! हा अव्यय! हम सब मृत्यु को प्राप्त होने जा रहे हैं, आप हमारी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं ? ॥ ३०-३१ ॥ उनका इस प्रकार का वचन सुनकर शत्रुभय का नाश करने वाले करुणासागर भगवान् गजानन उन सबके सम्मुख शिशुरूप में प्रकट हो गये ॥ ३२ ॥ आभा सैकड़ों चन्द्रमाओं की आभा के समान थी। उनके उनके नेत्र कमल के समान थे तथा उनके मुख की श्रीविग्रह की आभा करोड़ों सूर्यों के आभासमूह के समतुल्य थी तथा उनका सौन्दर्य करोड़ों कामदेवों के सौन्दर्य को पराभूत करने वाला था ॥ ३३ ॥ उनके दाँत कुन्द की कली की और अधर बिम्बाफल की शोभा को जीतने वाले थे। उनकी नासिका उन्नत, भ्रुकुटी और नेत्र सुन्दर तथा कण्ठ शंख के समान था ॥ ३४ ॥ उनका वक्ष:स्थल विशाल था, दोनों भुजाएँ घुटनों तक विस्तृत थीं, उदरप्रदेश गम्भीर नाभि से सुशोभित था, उनका कटिप्रदेश अत्यन्त सुन्दर था तथा वे बलशाली थे। उनकी स्थूल जंघाएँ केले के तने की शोभा से प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। सुन्दर घुटनों, जंघा और एड़ी से उनके चरण-कमल सुशोभित हो रहे थे ॥ ३५-३६ ॥ महामूल्यवान् वस्त्र धारण किये हुए थे । इस प्रकार के [रूप-सौन्दर्य वाले] उन भगवान् गणेश को अपने सम्मुख वे अनेक प्रकार के अलंकारों से सुशोभित और उस नगर की भूमि पर प्रकट हुआ देखकर देवता और मुनिगण जय-जयकार करते हुए उठकर खड़े हो गये । तदनन्तर उन सबने उनको वैसे ही भूमि पर लेटकर दण्डवत् प्रणाम किया, जैसे देवगण इन्द्र को प्रणाम करते हैं ॥ ३७-३८ ॥ देवता और ऋषि बोले — हे विभो ! आप कौन हैं ? कहाँ से आये हैं ? क्या कार्य है ? हमसे कहिये । हम लोग तो यही जान रहे हैं कि बालक का रूप धारण किये आप दुष्टसंहारक परम ब्रह्म परमात्मा हैं, जो अनलासुर के सन्त्रास से अपने कर्मों का त्यागकर बैठे हुए हम लोगों को त्राण देने के निमित्त प्रकट हुए हैं ॥ ३९-४० ॥ उनके इस प्रकार के वचन सुनकर शिशुरूपधारी गजानन गणेशजी ने प्रसन्नमुख होकर हँसते हुए उन देवताओं और मुनियों से इस प्रकार कहा — ॥ ४१ ॥ बालक [ – रूपधारी गणेशजी ]-ने कहा — हे देवताओ एवं ऋषियो! आप लोग ज्ञानसम्पन्न हैं । आप लोगों ने जो कहा, वह सत्य ही है। मैं उस परपीडाकारी (दूसरों को कष्ट देनेवाले) दुष्ट के वध के लिये अपनी इच्छा से बालक का रूप धारण करके शीघ्रतापूर्वक आया हूँ। हे पुण्यात्माओ! मैं उसके वध का जो उपाय बताता हूँ, तुम लोग उसे करो ॥ ४२-४३ ॥ उसे देखकर आप सब मुझे प्रयत्नपूर्वक प्रेरित करना, तब उसके और मेरे महान् आचरण को कौतुकपूर्वक देखियेगा। उनके इस प्रकार के कृपापूर्ण वाक्य सुनकर वे सब हर्ष में भरकर आपस में कहने लगे कि हम सब इनके पराक्रम को नहीं जानते हैं ॥ ४४-४५ ॥ क्या ईश्वर ने ही इसका वध करने के लिये और पीड़ित तीनों लोकों की रक्षा करने के लिये बालक के रूप में अवतार लिया है ? ऐसा कहकर उन सबने उन्हें सादर प्रणाम किया। उसी समय कालानल का स्वरूप धारण किये वह अनलासुर दसों दिशाओं को जलाता हुआ, मनुष्य-लोक का भक्षण करता हुआ वहाँ आया। उस समय वहाँ क्रन्दन करते हुए मनुष्यों का महान् कोलाहल व्याप्त हो गया ॥ ४६–४८ ॥ उसे देखते ही सभी मुनिगण भागने को उद्यत हो गये। उन सबने बालरूपधारी उन गणेशजी से भी कहा कि ‘शीघ्र पलायन करो, नहीं तो यह अत्यन्त प्रचण्ड अनलासुर निश्चित ही आज वैसे ही तुम्हारी हिंसा कर देगा, जैसे तिमिंगल नामक मत्स्य छोटी मछलियों की और गरुड़ सर्पों की [हिंसा कर देते हैं ] ॥ ४९-५० ॥ उनके इस प्रकार के वचनों को सुनकर बालकरूपधारी परमात्मा गजानन गणेशजी हिमालयपर्वत की भाँति अचल होकर वहाँ खड़े हो गये। देवता और ऋषि उन बालरूपधारी गणेशजी को वहीं छोड़कर दूर चले गये ॥ ५१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराणके अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘दूर्वांकुरमाहात्म्यके अन्तर्गत अनलासुरोत्पत्ति’ नामक तिरसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६३ ॥ Content is available only for registered users. 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