August 27, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-64 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौंसठवाँ अध्याय गणेशपूजन में दूर्वांकुर के माहात्म्य के प्रसंग में अनलासुर के शमन की कथा अथः चतुःषष्टितमोऽध्यायः दूर्वामाहात्म्य वर्णनं आश्रया बोली — हे महामुनि! देवताओं और ऋषियों के पलायन कर जाने पर जब बालकरूपधारी गणेशजी पर्वत के समान स्थित रहे, तब उस बालक और अनलासुर के मध्य कौन-सी आश्चर्यजनक घटना घटित हुई; उसे मुझसे विस्तारपूर्वक शीघ्र कहिये ? ॥ ११/२ ॥ नारदजी बोले — हे शचीपति ! उसके इस प्रकार प्रश्न करने पर मुनिश्रेष्ठ कौण्डिन्य ने जो कहा, वह मैं बतलाता हूँ, उसे सुनो ॥ २१/२ ॥ बालरूपधारी गजानन के पृथ्वी पर पर्वत की भाँति स्थिर हो जाने पर वह अनलासुर दुर्दमनीय कालाग्नि की भाँति वहाँ आया; उस समय अचला पृथ्वी भी पर्वतों सहित चलायमान हो गयी ॥ ३-४ ॥ आकाश में बादलों के गरजने के समान ध्वनि होने लगी। वृक्षों की शाखाओं से पक्षियों के समूह भूतल पर गिर पड़े। समुद्र जलहीन हो गये, वृक्ष जड़ से उखड़ गये। कम्पन की प्रबलता के कारण कुछ भी ज्ञात नहीं हो पा रहा था ॥ ५-६ ॥ उसी क्षण बालकरूपधारी भगवान् गजानन ने उस अनलरूप धारण किये दैत्य को मायाबल से पकड़ लिया और सबके देखते-देखते उसे वैसे ही निगल गये, जैसे अगस्त्यजी ने समुद्र को पी लिया था । तदनन्तर उन परमात्मा गणेशजी ने विचार किया कि यदि यह दैत्य मेरे उदर में चला गया तो मेरे उदर में स्थित तीनों भुवनों को जला डालेगा, जिनका कि मैंने रक्षण किया है। [इसके कारण] सभी ब्रह्माण्डों का नाश हो जायगा, इसलिये मैं इसको कण्ठ में ही रख लेता हूँ। इसी बीच में देवाधिदेव गणपति की परमाश्चर्यमयी लीला को देखने के लिये अग्नि, इन्द्र आदि देवगण वहाँ आ पहुँचे ॥ ७–८१/२ ॥ तब इन्द्र ने उस अग्नि (-रूप असुर के दाह)-को शान्त करनेके लिये चन्द्रमा को उन्हें प्रदान किया ॥ ९ ॥ तब उस चन्द्रमा को मस्तक पर धारण किये हुए भगवान् गणेश का देवताओं और मुनियों ने भी ‘ भालचन्द्र’ इस नाम से स्तवन किया, परंतु फिर भी कण्ठके मध्य भागमें स्थित वह अग्नि शान्त नहीं हुई ॥ १० ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी ने उनको सिद्धि-बुद्धि नामवाली दो मानस कन्याएँ प्रदान कीं। वे केले के सदृश जंघावाली, कमलनयनी, शैवलसदृश सघन केशों वाली, चन्द्रमुखी, अमृतसदृश मधुरभाषिणी, कूपसदृश गम्भीर नाभिवाली, सरिताओंसदृश त्रिवली से युक्त, कमलनालसदृश मध्यभाग वाली (कटिप्रदेश वाली), प्रवाल के सदृश अरुणिम आभा से युक्त हाथों वाली और [उत्ताप को] शीतल करने में समर्थ थीं ॥ ११-१२ ॥ तदनन्तर ब्रह्माजी ने [गणेशजी से] कहा कि इन दोनों का सम्यक् रूप से आलिंगन करने से तुम्हारे कण्ठ में स्थित अग्नि शान्त हो जायगी। परंतु उन दोनों का आलिंगन करने पर भी गणेशजी की कण्ठस्थित अग्नि कुछ ही शान्त हुई। तत्पश्चात् कमलापति भगवान् विष्णु ने उन्हें एक अत्यन्त कोमल कमल पुष्प प्रदान किया। तब से वे [भगवान् गजानन] देवताओं और मनुष्यों द्वारा ‘पद्मपाणि’ कहे जाने लगे ॥ १३-१४ ॥ तब भी अग्नि के शान्त न होने पर वरुण ने शीतल जल से उनको सिंचित किया और गिरिशायी भगवान् शंकर ने उन्हें सहस्र फणवाला नाग प्रदान किया ॥ १५ ॥ उससे उदर को बाँधने के कारण वे ‘व्यालबद्धोदर’ नामवाले हुए, परंतु तब भी उनका अग्नियुक्त कण्ठ शीतल नहीं हुआ ॥ १६ ॥ तदनन्तर अट्ठासी सहस्र मुनिजन उनके समीप आये और उनमें से प्रत्येक ने इक्कीस-इक्कीस दूर्वाएँ उनके मस्तक पर रखीं, जो अमृत के तुल्य [गुणकारी ] थीं। इससे उनके कण्ठ में स्थित अग्नि शान्त हो गयी । तब दूर्वांकुरों के भार से अर्चित वे परमात्मा गणेशजी भी प्रसन्न हो गये ॥ १७-१८ ॥ [गणेशजी दूर्वांकुर से प्रसन्न होते हैं — ] ऐसा जानकर उन सभी [देवताओं और मुनियों ]-ने अनेक दूर्वांकुरों से उन गजानन गणेशजी का पूजन किया, जिससे वे गजानन हर्षित हुए ॥ १९ ॥ उन्होंने देवताओं और मुनियों से कहा कि भक्तिपूर्वक की गयी मेरी पूजा चाहे अल्प हो या महान्, किंतु वह दूर्वांकुरों के बिना व्यर्थ है ॥ २० ॥ बिना दूर्वांकुरों के की गयी पूजा का फल किसी को भी नहीं प्राप्त हो सकता। इसलिये मेरे भक्त को उषाकाल में की गयी पूजा में एक या इक्कीस दूर्वा चढ़ानी चाहिये ॥ २१ ॥ भक्तिपूर्वक समर्पित की गयी दूर्वा जो महान् फल देती है, [वह फल ] सैकड़ों यज्ञों, दानों, व्रतों और अनुष्ठानसमूहों से नहीं प्राप्त हो सकता ॥ २२ ॥ हे देवताओ और मुनिगण ! करोड़ों जन्मों तक की गयी उग्र तपस्या और नियम पालन से भी उतना पुण्य फल नहीं उपार्जित होता, जितना कि दूर्वा समर्पित करने से प्राप्त होता है ॥ २३ ॥ [ मुनि ] कौण्डिन्य बोले — [हे प्रिये!] गणेशजी के इस प्रकार के वचन सुनकर देवताओं ने देवाधिदेव परमात्मा गजानन का पुनः दूर्वांकुरों से अर्चन किया ॥ २४ ॥ तब उन गणेशजी ने पृथ्वी और आकाश को निनादित करते हुए उच्च स्वर से आनन्दयुक्त गर्जन किया । तदनन्तर हर्षित हुए सम्पूर्ण देवताओं, मुनियों और मनुष्यों को भी अनेक वरदान देकर वे बालरूपधारी गणेशजी अन्तर्हित हो गये। तब उन सभी ने उन गणेशजी का ‘कालानल- प्रशमन’ – यह नाम रखा। ॥ २५-२६ ॥ [तत्पश्चात् ] उन सबने वहाँ मन्दिर का निर्माणकर उसमें गजानन गणेशजी की मूर्ति की स्थापना की और देवताओं ने प्रसन्नतापूर्वक उनका ‘विघ्नहर्ता’ – यह नाम रखा ॥ २७ ॥ इन विघ्नहर्ता गणेशजी की कृपा से वहाँ किये हुए स्नान, दान, तप और अनुष्ठान से अनन्त पुण्यफल की प्राप्ति होती है ॥ २८ ॥ वहाँ पर गणेशजी ने [कालानल पर] विजय प्राप्त की थी, इसलिये वह नगर विजयनगर नाम से प्रसिद्ध हुआ और वहाँ पर [गणेशजी ने] सभी के विघ्नों का नाश किया था, इसलिये वे [स्वयं ] ‘विघ्नहर्ता’ नाम से विख्यात हुए ॥ २९-३० ॥ [मुनि] कौण्डिन्य बोले — हे प्रिये ! दूर्वा के उत्तम माहात्म्य से सम्बन्धित यह सारा प्रसंग मैंने तुमसे कह दिया; इसके श्रवण और पठन से सम्पूर्ण पापों का क्षय हो जाता है । अब मैं एक अन्य पुरातन इतिहास का वर्णन कर रहा हूँ, उसका श्रवण करो ॥ ३१ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘दूर्वामाहात्म्यवर्णन’ नामक चौंसठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६४ ॥ Content is available only for registered users. 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