श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-66
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
छाछठवाँ अध्याय
कुष्ठी ब्राह्मण के वेश में गणेशजी का अपने भक्त द्विज-दम्पती के यहाँ जाना और उनके द्वारा भक्तिपूर्वक प्रदत्त दूर्वांकुरमात्र से तृप्त होना
अथः षट्षष्टितमोऽध्यायः
विरोचना त्रिशिराभ्यां प्रदत्तयार्वया गजाननस्य तृप्तिः

कौण्डिन्य बोले — [हे प्रिये ! ] उन दोनों (द्विजदम्पती) – के लिये पृथ्वी ही आसन (बिछावन) और आकाश ही ओढ़ना था। सभी प्रकार की धातुओं के स्पर्श तक से रहित उन दोनों के लिये दिशाएँ ही वस्त्र थीं। द्विजरूपधारी [गजानन] – ने देखा कि वे दोनों अन्तःकरण की शुद्धि के लिये बिना याचना के जो मिल जाय, वही खानेवाले और जलमात्र से ही सभी धार्मिक क्रियाओं को सम्पन्न करने वाले थे ॥ १-२ ॥ उनका घर चारों ओर से मच्छर और मक्खियों के समूहों से भरा हुआ था। उन्होंने देखा कि उन दोनों (द्विजदम्पती)- के द्वारा अनन्य भक्तिभाव से गणेशजी की मूर्ति की पुष्पों और पल्लवों से पूजा की गयी है तथा वे दोनों उनकी भक्ति में निरत हैं। तब उन्होंने उन दोनों से कहा — ‘हे निष्पाप [ द्विज-दम्पती!] जो बात मैं कह रहा हूँ, उसे सुनो ॥ ३-४॥  मिथिलाधिपति [ महाराज जनक]-की [दान- विषयक ] कीर्ति सुनकर मैं भूख से अत्यन्त पीड़ित होने के कारण तृप्ति की कामना से यहाँ आया था, किंतु उन्होंने मुझे तृप्त नहीं किया । दम्भपूर्ण कार्यों से सत्त्व (धर्म) -की रक्षा नहीं होती। तुम्हारे घर में मेरे लिये कुछ तृप्तिकर हो तो दो’ ॥ ५-६ ॥

[ द्विज- ] दम्पती बोले — [ राजा जनक] जो चक्रवर्ती सम्राट् थे, जब वे आपकी तृप्ति न कर सके तो हम दोनों दरिद्र आपको तृप्तिकारक क्या दे सकेंगे ? ॥ ७ ॥ जो समुद्र असंख्य नदियों और नदों के जल से भी पूर्ण नहीं होता, भला बताओ कि वह बिन्दुमात्र जल से कैसे पूर्ण होगा ? ॥ ८ ॥

द्विज [ -रूपधारी गणेशजी ] बोले — भक्तिपूर्वक दिया हुआ अत्यन्त अल्प पदार्थ भी मुझे बहुत तृप्ति प्रदान करने वाला होता है, जबकि बिना भक्ति के अथवा दिखावे के लिये बहुत अधिक मात्रा में दिया हुआ भी होता है ॥ ९ ॥

उन दोनों (द्विज-दम्पती ) – ने कहा — हे द्विज-व्यर्थ  श्रेष्ठ ! हम शपथपूर्वक कहते हैं कि हमारे घर में कुछ भी नहीं है। गणेशजी की पूजा के लिये हम लोग प्रातःकाल दूर्वांकुर लाये थे । हमने उनसे गणेशजी की पूजा की थी। उन्हीं में से एक दूर्वा बची हुई है ॥ १०१/२

द्विज [ रूपधारी गणेशजी ] बोले — भक्तिपूर्वक दिया हुआ एक दूर्वांकुर भी मेरे लिये तृप्तिकारक होगा, अतः उसे ही दे दीजिये ॥ ११ ॥

कौण्डिन्य [ मुनि ] बोले — [ हे प्रिये !] तब [द्विजपत्नी] विरोचना ने उनके इस कथन को सुनकर उस एक दूर्वांकुर को उनको भक्तिपूर्वक प्रदान कर दिया, जिससे वे द्विज तृप्त हो गये ॥ १२ ॥ विरोचना ने उस दूर्वांकुर में शालि चावल और गोदुग्ध से निर्मित खीर, अनेक प्रकार के पक्वान्नों, व्यंजनों तथा चाटकर एवं चूसकर खाये जाने वाले विभिन्न भोज्य पदार्थों की भावना करके उन्हें उसे दिया था, उसे ग्रहण करके उन ब्राह्मण [-श्रेष्ठ]-ने उसका परम प्रसन्नता से भक्षण किया ॥ १३-१४ ॥  [विरोचना के द्वारा ] भक्तिपूर्वक दिये हुए उस एक दूर्वांकुर से उन द्विज [ श्रेष्ठ ] – की जठराग्नि तत्क्षण शान्त हो गयी। उन्हें तत्काल परम शान्ति की प्राप्ति हो गयी । तदनन्तर तृप्त हुए उन द्विज ने हर्षपूर्वक त्रिशिरा को गले लगा लिया ॥ १५-१६ ॥

[तत्पश्चात्] उन द्विज ने अपना वह कुत्सित रूप त्याग दिया और गजानन गणेशजी के रूप में प्रकट हो गये। उनका वह स्वरूप चार भुजाओं से युक्त, कमल के समान नेत्रवाला और दण्डसदृश सूँड़ से सुशोभित था ॥ १७ ॥ उन्होंने अपने हाथों में कमल, परशु, माला और दाँत धारण कर रखा था। उनके सिर पर महामूल्यवान् मुकुट सुशोभित हो रहा था और उनके कान स्वर्ण-कुण्डलों से अलंकृत थे। उन्होंने दिव्य वस्त्र धारण कर रखे थे और उनका श्रीविग्रह दिव्य चन्दन से अनुलिप्त था । प्रसन्न मनवाले उन गजानन गणेशजी ने उन दोनों द्विजदम्पती से कहा कि ‘जो-जो तुम्हारे मन में इच्छित कामनाएँ हों, उनके लिये शीघ्र वर माँग लो’ ॥ १८-१९१/२

उन दोनों (द्विज-दम्पती ) – ने कहा — हे देव ! हम दोनों का जहाँ भी जन्म हो, वहाँ [हमारी] आपमें दृढ़ भक्ति बनी रहे अथवा हमें इस अत्यन्त दुस्तर संसार-सागर से मुक्ति प्रदान कर दीजिये। हे गजानन ! हम दोनों के मन में अन्य किसी वस्तु की अपेक्षा नहीं है ॥ २०-२१ ॥

कौण्डिन्य [ मुनि ] बोले — [हे प्रिये !] उन द्विज- दम्पती के इस प्रकार के वचन सुनकर गजानन गणेशजी ने ‘तथास्तु’ कहा और प्रसन्नतापूर्वक [अपने] भक्त त्रिशिरा का पुनः आलिंगन करके अन्तर्धान हो गये ॥ २२ ॥

हे आश्रये ! असंख्य व्यंजनों का भक्षण करने पर भी जो परमात्मा तृप्त नहीं हुए, उन्हें एक दूर्वांकुरमात्र से परम तृप्ति की प्राप्ति हो गयी। इसी कारण से मेरे द्वारा गणेशजी को दूर्वा का भार (इक्कीस दूर्वांकुर) अर्पित किया जाता है। इस प्रकार मैंने दूर्वांकुरसमर्पण – सम्बन्धी मंगलमयी महिमा का तुमसे सम्यक् रूप से वर्णन कर दिया, जिसका श्रवण सम्पूर्ण मनोभिलषितों को प्रदान करने वाला है। जो इस आख्यान को भक्तिपूर्वक सुनता या सुनाता है, वह इहलोक में पुत्र, धन एवं मनोभिलषित वस्तुओं की प्राप्ति करता है और परलोक में भी आनन्दित रहता है तथा गणेशजी की भक्ति प्राप्त करता है । निष्काम भक्त मुक्ति की प्राप्ति करता है ॥ २३-२६ ॥

[ गणेशजी के ] गण बोले — [ हे योगीश्वरो ! ] इस आख्यान का श्रवण करने पर भी आश्रया के हृदय में पुनः सन्देह उत्पन्न हुआ, जिसे जानकर [मुनिवर] कौण्डिन्य ने पुन: कहा — हे आश्रये ! अपने सन्देह का निवारण करने हेतु मेरे कथन का श्रवण करो। हे निष्पाप [प्रिये !] तुम्हारे हृदय में जो [संशय] स्थित है, वह मुझे ज्ञात है, उसीके [निराकरण के] विषय में कहता हूँ — एक दूर्वांकुर लेकर तुम शीघ्र इन्द्र के पास चली जाओ। पहले तुम उन्हें आशीर्वाद दो, तत्पश्चात् उनसे सुवर्ण की याचना करो ॥ २७-२९ ॥ दूर्वांकुर से तौलकर उस स्वर्ण को ग्रहणकर यहाँ ले आओ । हे शुभानने! उस (दूर्वांकुर) के भार से न तो कम और न ही अधिक सुवर्ण ग्रहण करना चाहिये ॥ ३० ॥

[ गणेशजी के ] गणों ने कहा — [ हे योगीश्वरो !] तदनन्तर मुनिवर कौण्डिन्य के इस कथन का श्रवण कर पति के वचन का पालन करने वाली आश्रया एक दूर्वांकुर लेकर शतक्रतु इन्द्र के पास गयी ॥ ३१ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘दूर्वाके माहात्म्य का वर्णन’ नामक छाछठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६६ ॥

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