श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-68
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
अड़सठवाँ अध्याय
कृतवीर्य के पिता का कृतवीर्य को स्वप्न में दर्शन देना और उसे संकष्टचतुर्थीव्रत की पुस्तक देना
अथः अष्टषष्टितमोऽध्यायः
व्रतनिरूपणं

शूरसेन बोले — हे सौ यज्ञों के कर्ता इन्द्र! आप गणनायक गणेशजी की पुनः [ किसी] अन्य कथा का वर्णन कीजिये । तत्पश्चात् (ब्रह्माजी से वार्ता के पश्चात् ) कृतवीर्य के पिता ने क्या किया ? ॥ १ ॥

इन्द्र बोले — संकष्टचतुर्थी तथा दूर्वांकुर के माहात्म्य- सम्बन्धी आख्यानों को सुनकर वे नृपश्रेष्ठ [वंशरक्षार्थ ] चिन्ता में पड़ गये । [ इधर उनके पुत्र कृतवीर्य को चिन्ता थी कि] पुत्रहीन की सद्गति नहीं होती और मुझे पुत्र की प्राप्ति कैसे होगी ? तदनन्तर [ एक रात्रि ] स्वप्न में वैसे अर्थात् तपोनिरत राजा कृतवीर्य ने अपने पिता को देखा ॥ २-३ ॥ उस समय गद्गदकण्ठ होने के कारण वे दोनों परस्पर कुछ बोल न सके। तदनन्तर प्रेम से विह्वल चित्तवाले उन दोनों ने परस्पर एक-दूसरे का आलिंगन किया। तत्पश्चात् पुत्र का हाथ पकड़कर उसे पलंग पर बैठाकर कृतवीर्य के पिता ने उससे कहा — हे पुत्र ! तुम्हारे द्वारा पुत्र प्राप्ति हेतु बहुत श्रम किया गया । निष्पाप [पुत्र]! अब मैं तुमसे एक उपाय कहता हूँ, जिसे मृत्युलोक से आकर नारद ने मुझसे कहा है ॥ ४-६ ॥ हे पुत्र ! तभी मैं ब्रह्माजी के भवन में गया और सर्वज्ञ ब्रह्माजी को नमस्कारकर मैंने उनसे पूछा — ॥ ७ ॥

हे कमलासन [ब्रह्माजी]! मेरे पुत्र को सन्तान की प्राप्ति कैसे होगी? तब उन्होंने उत्तम संकष्टचतुर्थीव्रत [-का अनुष्ठान करने को] कहा था ॥ ८ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे नृपश्रेष्ठ ! इस व्रत के करने से पापों का क्षय हो जाने पर तुम्हारे पुत्र को अवश्य ही सन्तान की प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है ॥ ९ ॥

[ कृतवीर्य के ] पिता बोले — तदनन्तर जैसा ब्रह्माजीने कहा था, वैसा ही मैंने लिख लिया था; तुम इस पुस्तक को ग्रहण करो और जैसे लिखा है, वैसे ही इस व्रत का अनुष्ठान करो। जब एक वर्ष पूरा हो जायगा, तब सम्पूर्ण संकटों का हरण करने वाले भगवान् सिद्धिविनायक प्रसन्न हो जायँगे ॥ १०-११ ॥ उनके प्रसन्न होने पर तुम्हें पुत्र की प्राप्ति होगी, इसमें संशय नहीं है। हे राजा [शूरसेन ] ! ऐसा कहकर कृतवीर्य के पिता अन्तर्धान हो गये ॥ १२ ॥

तदनन्तर जब वह बलवान् राजा कृतवीर्य जागा, तो उसने अपने हाथ में पुस्तक को देखा तथा स्वप्न-सम्बन्धी विषय का स्मरण किया ॥ १३ ॥ उस समय शोक और हर्ष से समन्वित भावों के कारण उसके नेत्रों से अश्रुपात होने लगा। पिता से वियोग का उसे दुःख हो रहा था और पुस्तक की प्राप्ति से हर्ष की अनुभूति हो रही थी। ठीक उसी समय उसके मन्त्रीगण आ गये और राजा को चारों ओर से घेरकर कहने लगे — ॥ १४१/२

मन्त्रिगण बोले — हे राजन् ! आप प्रमाद का त्याग  कीजिये और सावधान मन वाले होइये। शोक का त्याग कीजिये और हमसे बताइये कि शोक करने का क्या कारण है? आपको [इस प्रकार ] शोकग्रस्त देखकर हमें भी तीव्र शोक हो रहा है ॥ १५-१६ ॥

इन्द्र बोले — [हे राजा शूरसेन !] मन्त्रियों की बात सुनकर कृतवीर्य ने उनसे कहा कि मैंने स्वप्न में पिताजी को देखा, इसीलिये मेरा मन विह्वल है ॥ १७ ॥ संकष्टचतुर्थीव्रत का बोध कराने वाली पुस्तक मेरे हाथ में देकर वे उसी क्षण अन्तर्धान हो गये ॥ १८ ॥ उनके वियोग में मैं वैसे ही शोकाकुल हूँ, जैसे हाथ में आये हुए धन के चले जाने पर निर्धन व्यक्ति शोकाकुल होता है। उन्होंने मुझसे यह वचन कहा कि पुत्र की कामना से तुम यह व्रत करो ॥ १९ ॥ हे मन्त्रिगण! जब मैं प्रबुद्ध हुआ (जगा), तब मैंने [अपने] हाथ में पुस्तक देखी। उसी समय से मैं आश्चर्य, हर्ष और शोक से आँसू बहा रहा हूँ, इसके अतिरिक्त अन्य कोई कारण नहीं है ॥ २० ॥

मन्त्री बोले — [हे राजन्!] जो मनुष्य, सर्प और राक्षसों सहित समस्त लोकों के पिता हैं, उन्हीं गजानन गणेशजी ने पितृरूप में तुमसे सन्तानप्राप्ति का उपाय कहा है; अन्यथा हे नृपश्रेष्ठ! स्वप्नकालिक उपलब्धि वास्तविक कैसे होती और स्वप्न में देखी हुई पुस्तक प्रत्यक्ष कैसे उपस्थित हो जाती! बिना उनकी कृपा के स्वप्न भी विपरीत फल ही देने वाले होते हैं ॥ २१-२२१/२

इन्द्र बोले — [ हे राजा शूरसेन !] मन्त्रियों के इस प्रकार के वचन सुनकर सावधानचित्त होकर राजा ने पण्डितों और सुहृज्जनों को बुलाकर उनसे पूछा कि हे द्विजगण! गणेशजी की कृपा से प्राप्त इस पुस्तक का अर्थ बतलाइये। तब उन सबने उस पुस्तक को देखकर सम्पूर्ण सभा को उसका अर्थ बतलाया ॥ २३-२४१/२

द्विज बोले — हे राजन् ! इसमें आप कृतवीर्य के पिता और ब्रह्माजी का महान् संवाद वर्णित है ॥ २५ ॥ इसमें सम्पूर्ण संकटों का नाश करने वाले [गणेश ] चतुर्थीव्रत का निरूपण हुआ है । चन्द्रमा के उदय होने पर की जाने वाली गणेशजी की पूजा इसमें विस्तारपूर्वक कही गयी है ॥ २६ ॥ इसमें अंगारकचतुर्थी की महिमा का बार-बार वर्णन हुआ है तथा चतुर्थी तिथि, भगवान् गणेश और चन्द्रमा को दिये जाने वाले अर्घ्य का मन्त्रसहित वर्णन है। इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराने, उनका पूजन करने और उन्हें अनेक प्रकार के दान देने का इसमें निरूपण है ॥ २७-२८ ॥ गणेशजी को दूर्वा समर्पण करने के फल का तथा श्वेत दूर्वा समर्पित करने के फल का इसमें पृथक् रूप से वर्णन है। हे निष्पाप महाभाग ! यह व्रत बड़े ही भाग्य से आपको प्राप्त हुआ है ॥ २९ ॥ इससे पहले संसार में इस व्रत को करते न तो किसी को देखा गया था, न ही इसके विषय में सुना गया था। यह भविष्य में लोगों के लिये उपकारी होगा। इसके [माहात्म्य के] श्रवण और स्मरण से भी मनुष्यों के संकटों का हरण होगा ॥ ३० ॥

इन्द्र बोले — [ हे राजा शूरसेन !] पण्डितों के मुख से [संकष्टचतुर्थी विषयक] वह वर्णन सुनकर राजा कृतवीर्य और अन्य सभी लोग आश्चर्यमिश्रित हर्ष से भर गये । तदनन्तर राजा ने उन श्रेष्ठ ब्राह्मणों का पूजन किया तथा उन्हें बहुत-से वस्त्र, अलंकरण, रत्न और धन-धान्य प्रदान किये। तत्पश्चात् राजा कृतवीर्य ने अपने कुलगुरु अत्रि को बुलाकर उनका तथा भगवान् विनायक गणेशजी का यथाविधि पूजनकर शुभ मुहूर्त में [गणेशजी के] शुभ फलदाता एकाक्षर मन्त्र को ग्रहण किया ॥ ३१–३३ ॥

तदनन्तर राजा ने जितेन्द्रियतापूर्वक गणेशजी का ध्यान करते हुए अनन्य भक्ति से उनके मन्त्र का जप किया और गणाधिपति गणेशजी की प्रसन्नता एवं पुत्र-प्राप्ति के लिये उस संकटनाशनव्रत को सम्पन्न किया ॥ ३४ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘व्रतनिरूपण’ नामक अड़सठवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६८ ॥

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