श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-69
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
उनहत्तरवाँ अध्याय
देवराज इन्द्र का राजा शूरसेन से संकष्टचतुर्थी व्रत की विधि का निरूपण करना
अथः एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
सङ्कष्टचतुर्थीव्रतस्य साङ्गोपाङ्गमहिमा

[राजा ] शूरसेन बोले — [हे देवराज ! सिद्धि प्रदान करने वाले तथा] हितकर उत्तम संकष्टचतुर्थी व्रत का ब्रह्माजी ने कृतवीर्य के पिता को किस प्रकार उपदेश किया था? वह आप मुझसे कहिये ॥ १ ॥

इन्द्र बोले — हे राजन् ! राजा कृतवीर्य के पिता ने सत्यलोक में जाकर सुखपूर्वक बैठे हुए सर्वज्ञ चतुर्मुख ब्रह्माजी को प्रणाम करके पूछा ॥ २ ॥

कृतवीर्य के पिता बोले — प्रणतजनों के कष्टों का निवारण करनेवाले, जगत्‌ को धारण करने वाले हे देवाधिदेव ! मेरे हृदय में जो प्रश्न है, उसे मैं आपसे पूछता हूँ, आप [कृपया] उसके विषय में बतलाइये ॥ ३ ॥ हे प्रभो! आपत्तियों से घिरे हुए, व्याकुल चित्तवाले, चिन्ता से व्यग्र मनःस्थिति वाले, सुहृज्जनों से वियुक्त, दुर्लभ लक्ष्यप्राप्ति की कामना वाले मनुष्य को कार्य की सिद्धि कैसे हो ? उसे नित्य अर्थसिद्धि की प्राप्ति कैसे हो तथा पुत्र, सौभाग्य और सम्पत्ति की प्राप्ति कैसे हो ? समस्त संकटों के नाश के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिये ? ॥ ४–५१/२

ब्रह्माजी बोले — हे राजन् ! सुनो, मैं तुमसे सम्पूर्ण सिद्धियों को प्रदान करने वाले व्रत को कहता हूँ, जिसके अनुष्ठानमात्र से मनुष्य अपनी सभी मनोकामनाओं की प्राप्ति कर लेता है । व्रत के दिन औषधियों और सफेद तिलमिश्रित जल से स्नान करे। तत्पश्चात् [ व्रत का ] संकल्प करे। भगवान् गजानन का सम्यक् प्रकार से ध्यानकर भक्तिपूर्वक आगमोक्त मन्त्रों से कृष्णपक्ष की चतुर्थीतिथि को रात्रि में चन्द्रमा के उदय होने पर गणेशजी का पूजन करे ॥ ६-८१/२

कृतवीर्य के पिता बोले — हे ब्रह्मन् ! देवाधिदेव गणेशजी का पूजन कैसे करना चाहिये ? प्रेमपूर्वक पूछने वाले मुझसे आप विस्तारपूर्वक कहें ॥ ९१/२

ब्रह्माजी बोले — नित्यकर्म का समापनकर रात्रि में चन्द्रमा के उदित होने पर पवित्र स्थान में गोबर से लीपकर छोटा-सा मण्डप बनाये। वहीं पर गणेशजी के पूजन हेतु पीठ की स्थापनाकर कुंकुमयुक्त अक्षतों से उसका पूजन करे। तदनन्तर उसपर पंचरत्न 1  समन्वित कलश की स्थापना करे। [ और ] उस कलश के ऊपर स्वर्णनिर्मित पात्र रखे ॥ १०–१२ ॥ सुवर्ण के अभाव में चाँदी, ताँबा या बाँस का बना पात्र स्थापित करे और उसमें रेशमी या अपनी शक्ति के अनुसार वस्त्र रखे। तत्पश्चात् उस [ वस्त्र] -के ऊपर आगमों में वर्णित विधान के अनुसार गणेशयन्त्र की रचना करे और उसपर शुभ लक्षणों से युक्त गणेशजी की सोने की मूर्ति प्रतिष्ठापित [करके उन भगवान् गजानन गणेशजी का ध्यान करते हुए इस प्रकार पूजा ] करनी चाहिये — ॥ १३-१४ ॥

[उपासक सर्वप्रथम निम्नोक्त मन्त्रों सें गजाननदेव का ध्यान करे- ] ध्यान –

एकदन्तं महाकायं तप्तकाञ्चनसन्निभम् ।
लम्बोदर विशालाक्षं ज्वलत्पावकलोचनम् ॥
आखुपृष्ठसमारूढं चामरैर्वीजितं गणैः ।
शेषयज्ञोपवीतं च चिन्तयेत् तं गजाननम् ॥

जिनका वर्ण प्रतप्त स्वर्ण के सदृश प्रभावाला है, जो विशाल शरीर और एक दाँतवाले हैं; जिनका उदर विशाल है, जिनकी बड़ी-बड़ी आँखें दहकती हुई अग्नि के समान हैं, जो मूषक [-रूपी वाहन] के पृष्ठदेश पर सम्यक् रूप से आरूढ़ हैं तथा [अपने] गणों द्वारा चँवर डुलाये जा रहे हैं, शेषनाग को यज्ञोपवीत के रूप में धारण किये हुए-ऐसे गजानन गणेशजी का ध्यान करना चाहिये ॥ १५-१६ ॥

आवाहन 2 — हे देवाधिदेव! आप आइये और मुझे संकट से उबारिये। जबतक मेरा व्रत सम्पूर्ण न हो जाय, तबतक आप [इस मूर्ति में] विराजमान रहें ॥ १७ ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘सहस्रशीर्षा० 3 – इस वैदिक ऋचा से आवाहन करे ।
आसन — हे गणाधिपति ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक ! आपको नमस्कार है। हे देव! आप आसन ग्रहण करें और मुझे संकट से उबारें ॥ १८ ॥ [ इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘पुरुष एव०4 ‘ इस वैदिक ऋचा से आसन प्रदान करे।
पाद्य — हे उमापुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मोदकप्रिय ! नमस्कार है । हे देवेश्वर ! [ इस] पाद- प्रक्षालन हेतु दिये गये जल को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ १९ ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘एतावानस्य०5 इस वैदिक ऋचा से पाद्य-समर्पण करे।
अर्घ्य —हे लम्बोदर ! आपको नमस्कार है, हे देवेश्वर! रत्न से युक्त और फल से समन्वित इस अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २० ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर ] ‘त्रिपादूर्ध्व०’ 6  इस वैदिक ऋचा से अर्घ्य – समर्पण करे ।
आचमन — [हे प्रभो!] गंगा आदि सभी तीर्थों से लाये गये उत्तम जल को आचमन हेतु ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २१ ॥ [ इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘ततो विराड०7 इस वैदिक ऋचा से आचमन के लिये जल प्रदान करे ।
पंचामृतस्नान — [हे प्रभो!] दूध, दही, घी, शर्करा और शहद से युक्त इस पंचामृत को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २२ ॥ [ इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘पञ्च नद्यः8  आदि वैदिक मन्त्रों से पंचामृतस्नान कराये ।
स्नान — [हे देव!] नर्मदा, चन्द्रभागा [आदि पुण्यदायिनी नदियों] तथा गंगा-संगम के जल से आप मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक स्नान कराये गये हैं, आप मेरे संकट का निवारण करें ॥ २३ ॥ ‘यत्पुरुषेण०’ 9 इस वैदिक ऋचा से [शुद्धोदक] स्नान कराये।
वस्त्र — हे गजानन ! आपको नमस्कार है। हे परमात्मन्! इस वस्त्रयुगल ( धोती और उत्तरीय) – को ग्रहण कीजिये। हे गणाध्यक्ष ! मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २४ ॥ तं यज्ञम्० 10 इस वैदिक ऋचा से वस्त्र समर्पित करे ।
यज्ञोपवीत — हे विनायक ! आपको नमस्कार है। हे परशुधारिन् ! आपको नमस्कार है, इस उपवीत को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २५ ॥ ‘तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतम्० 11 इस वैदिक ऋचा से यज्ञोपवीत समर्पित करे।
आभूषण — [हे गजानन !] केयूर, कटक, मुद्रिका, अंगद आदि इन अलंकारों को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २६ ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘स हि रत्नानि’  (ऋग्वेद 5.82.3) इस वैदिक ऋचा से अलंकार अर्पण करे ।
गन्ध — हे ईशपुत्र ! आपको नमस्कार है। हे मूषकवाहन! आपको नमस्कार है । हे देव! [इस] चन्दन को ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २७ ॥ तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः०12  इस वैदिक ऋचा से चन्दन समर्पित करे ।
अक्षत — हे देव! घृत और कुंकुम से युक्त सुन्दर मनोहर चावलों को अक्षत के रूप में आपको समर्पित किया है, [इन्हें ग्रहण कीजिये और] मेरे संकट का निवारण कीजिये – ऐसा कहकर अक्षत समर्पित करे ॥ २८ ॥
पुष्प — हे गणाध्यक्ष ! चम्पा, मालती, दूर्वा और अनेक जाति के पुष्प मैं आपके लिये लाया हूँ, इन्हें ग्रहण कीजिये और मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ २९ ॥ ‘तस्मादश्वा० 13 ‘ इस वैदिक ऋचा से पुष्प चढ़ाये।
धूप — हे लम्बोदर ! हे महाकाय ! हे धूम्रकेतु ! [इस ] सुगन्धित धूप को ग्रहण कीजिये। हे देवेश ! मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ ३० ॥ ‘यत्पुरुषं० 14 इस वैदिक ऋचा से धूप आघ्रापित करे ।
दीप — विघ्नरूपी अन्धकार का संहार करने वाले हे देवाधिदेव! [इस] दीप को ग्रहण कीजिये अर्थात् मेरे द्वारा इस दीप दिखाने की सेवा स्वीकार कीजिये। हे देवेश! मेरे संकट का निवारण कीजिये ॥ ३१ ॥ ‘ब्राह्मणो० 15 इस वैदिक ऋचा से दीप दिखाये ।
नैवेद्य — हे देव! मोदक, पुआ, लड्डू, शर्करायुक्त खीर तथा घृत में पके हुए विविध प्रकार के पकवानों को नैवेद्य के रूप में ग्रहण कीजिये ॥ ३२ ॥ ‘चन्द्रमा मनसो०16इस वैदिक ऋचा से नैवेद्य समर्पित करे ।
 फल — हे देवेश! नारियल, अंगूर, आम, अनार के [इन] सुन्दर फलों को ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये ॥ ३३ ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर नाभ्या आसीद्०17  इस वैदिक मन्त्र से ऋतुफल समर्पण करे ।
ताम्बूल — सुपारी, इलायची, लौंग और ताम्बूल- पत्र से युक्त ताम्बूल को ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये ॥ ३४ ॥ ‘सप्तास्या०18इस मन्त्र से ताम्बूल समर्पित करे।
दक्षिणा — हे देव! सुवर्ण सबके लिये प्रीतिकर और सम्पूर्ण सिद्धियों को देने वाला होता है, अतः इसे आप दक्षिणा के रूप में ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये ॥ ३५ ॥ ‘यज्ञेन यज्ञम्०’19  इस मन्त्र से दक्षिणा चढ़ाये ।

तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरों को लेकर भक्तिपूर्वक सावधानचित्त होकर इन नाम-मन्त्रों से भगवान् गणेशजी का अर्चन करे — (१) गणाधिपाय नमः — गणों के अधिपति के लिये नमस्कार है । (२) उमापुत्राय नमः – [भगवती ] उमा के पुत्र के लिये नमस्कार है। (३) अघनाशनाय नमः – पापों का नाश करने वाले के लिये नमस्कार है । (४) एकदन्ताय नमः – एकदन्त को नमस्कार है। (५) इभवक्त्राय नमः – गजमुख के लिये नमस्कार है। (६) मूषकवाहनाय नमः – मूषकवाहन के लिये नमस्कार है । (७) विनायकाय नमः – विनायक के लिये नमस्कार है । (८) ईशपुत्राय नमः – ईशपुत्र के लिये नमस्कार है । (९) सर्वसिद्धिप्रदाय नमः – सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करने वाले के लिये नमस्कार है । (१०) लम्बोदराय नमः – जिनका उदरप्रदेश लम्बा है, ऐसे गणेशजी के लिये नमस्कार है। (११) वक्रतुण्डाय नमः – टेढ़ी सूँड़वाले के लिये नमस्कार है। (१२) मोदकप्रियाय नमः – जिन्हें मोदक प्रिय है, ऐसे गणेशजी के लिये नमस्कार है । (१३) विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः – विघ्नों का विध्वंस करने वाले को नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः – विश्ववन्द्य के लिये नमस्कार है । (१५) अमरेशाय नमः – अमरेश अर्थात् देवताओं के स्वामी के लिये नमस्कार है । (१६) गजकर्णाय नमः – हाथी के कान के सदृश कान वाले के लिये नमस्कार है। (१७) नागयज्ञोपवीतिने नमः – नाग को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाले को नमस्कार है । (१८) भालचन्द्राय नमः – जिन्होंने चन्द्रमा को अपने मस्तक पर धारण कर रखा है, ऐसे गणेशजी के लिये नमस्कार है। (१९) परशुधारिणे नमः – परशु धारण करने वाले को नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः – विघ्नों के अधिपति के लिये नमस्कार है । (२१) विद्याप्रदाय नमः – विद्या प्रदान करने वाले के लिये नमस्कार है ॥ ३६ ॥

नीराजन — हे ईश ! कर्पूर और अग्नि के संयोजन से तैयार की गयी, सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाली आरती को स्वीकार करें और मुझे संकटों से छुटकारा दें ॥ ३७ ॥ [इस पौराणिक मन्त्र का उच्चारणकर] ‘सप्तास्यासन् ० 20  ” इस वैदिक मन्त्र से आरती दिखलाये।
पुष्पाञ्जलि — [हे देव!] चम्पा, अशोक, मौलसिरी, पारिजात के सुन्दर पुष्पों से युक्त इस पुष्पाञ्जलि को स्वीकार करें और मुझे संकटों से मुक्त करें ॥ ३८ ॥ ‘यज्ञेन० 21 इस वैदिक ऋचा से पुष्पांजलि प्रदान करें ।
स्तुति — हे गजानन ! आप ही विश्व का सृजन करते हैं । हे देव ! आप ही विश्व का परिपालन करते हैं । हे अखिलेश्वर! आप ही विश्व का संहार करते हैं । हे विश्वात्मन्! आप ही सम्पूर्ण विश्व में भासित हो रहे हैं ॥ ३९ ॥ इस मन्त्र से स्तुति करे ।
नमस्कार — गणाधिपति भगवान् गणेशजी को मैं प्रणाम करता हूँ, जो भक्तों के कष्टों को दूर करने वाले, भक्तों को मुक्ति प्रदान करने में निपुण, विद्या प्रदान करने वाले, वेदों का सर्वप्रथम विधान करने वाले, विघ्नों के स्वामी और विघ्नों का विनाश करने में दक्ष हैं ॥ ४० ॥ इस मन्त्र से नमस्कार करे ।
प्रदक्षिणा — इस प्रकार स्तुति करके बारम्बार विधिवत् प्रणाम करे और तदनन्तर यथाशक्ति [या न्यूनतम] इक्कीस बार परिक्रमा करे ॥ ४१ ॥
प्रार्थना — हे गणेशजी ! जो मूढजन आपका पूजन न करके अपने मनोरथ की सिद्धि करना चाहते हैं, वे इस संसार में निश्चय ही नष्ट हो जाते हैं, मुझे आपका सम्पूर्ण प्रभाव ज्ञात है ॥ ४२ ॥ इस मन्त्र से प्रार्थना करे ।
वायनदान — हे आचार्य ! हे द्विजाध्यक्ष ! हे सर्वसिद्धिप्रदायक! वायन ग्रहण कीजिये। हे ब्रह्मन्! मेरे संकटों का निवारण कीजिये ॥ ४३ ॥
विशेषार्घ्य — [ हे प्रभो !] फल, पुष्प, अक्षत और जल से युक्त विशेषार्घ्य को मैंने दक्षिणासहित [आपके हेतु] प्रदान किया। [आप] मेरे संकटों का निवारण कीजिये ।
इस प्रकार सोलह उपचारों के द्वारा ‘ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकटं निवारय स्वाहा’ इस मन्त्र  से [गणेशजी का] पूजन करे। साथ ही विद्वान् पुरुष उनके चारों ओर इन्द्रादि लोकपालों 22  का भी पूजन करें ॥ ४४-४५ ॥ [गो-] घृत में पकाकर बनाये गये तिल और मूँग मोदक तथा अन्य भोज्य पदार्थों को यथाशक्ति [ गणेशजी के सम्मुख] रखे तथा [लौंग – इलायची- कर्पूर आदि से समन्वित] ताम्बूल भी निवेदित करे ॥ ४६ ॥

तदनन्तर इक्कीस दूर्वांकुरों को लेकर भक्तिपूर्वक सावधान-चित्त होकर इन नामों से भगवान् गणेश का अर्चन करे —

दूर्वांकुरार्चन — (१) गणाधिपाय नमः – गणों के अधिपति के लिये नमस्कार है। (२) उमापुत्राय नमः – [ भगवती ] उमा के पुत्र के लिये नमस्कार है। (३) अभयप्रदाय नमः – अभय प्रदान करने वाले को नमस्कार है । (४) एकदन्ताय नमः — एकदन्त को नमस्कार है । (५) इभवक्त्राय नमः – गजमुख के लिये नमस्कार है । (६) मूषक- वाहनाय नमः–मूषकवाहन के लिये नमस्कार है। (७) विनायकाय नमः – विनायक के लिये नमस्कार है । ( ८ ) ईशपुत्राय नमः – ईशपुत्र के लिये नमस्कार है । ( ९ ) सर्वसिद्धिप्रदायकाय नमः —सम्पूर्ण सिद्धियाँ प्रदान करने वाले के लिये नमस्कार है । (१०) लम्बोदराय नमः— लम्बोदर को नमस्कार है । (११) वक्रतुण्डाय नमः – वक्रतुण्ड को नमस्कार है । (१२) अघनाशनाय नमः – पापों का नाश करने वाले को नमस्कार है । (१३) विघ्नविध्वंसकर्त्रे नमः – विघ्नविध्वंसकर्ता को नमस्कार है। (१४) विश्ववन्द्याय नमः – विश्ववन्द्य को नमस्कार है । (१५) अमरेश्वराय नमः – अमरेश्वर को नमस्कार है। (१६) गजवक्त्राय नमः – गजानन को नमस्कार है। ( १७ ) नागयज्ञोपवीतिने नमः – नाग को यज्ञोपवीत के रूप में धारण करने वाले को नमस्कार है । (१८) भालचन्द्राय नमः – मस्तक पर चन्द्रमा को धारण करने वाले को नमस्कार है। (१९) परशुधारिणे नमः – परशुधारी को नमस्कार है। (२०) विघ्नाधिपाय नमः – विघ्नों के अधिपति को नमस्कार है । (२१) सर्वविद्या- प्रदायकाय नमः – सभी विद्याएँ प्रदान करने वाले को नमस्कार है ॥ ४७–५१ ॥

इस प्रकार [इन इक्कीस नाम-मन्त्रों से] पृथक्- पृथक् [एक-एक] दूर्वा से भगवान् गणेश का अर्चन करे। [तदनन्तर इस प्रकार कहे – हे देव !] जिस उद्देश्य से मैंने यथाशक्ति सम्यक् रूप से [आपका] पूजन किया है, उससे आप शीघ्र प्रसन्न हों और मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण करें तथा मेरे सभी विघ्नों और उपस्थित दुष्टों का नाश करें ॥ ५२-५३ ॥ मैं आपके कृपाप्रसाद से ही सारे कार्य कर रहा हूँ, आप मेरे शत्रुओं की बुद्धि का नाश और मित्रों का अभ्युदय कीजिये ॥ ५४ ॥ इस प्रकार निवेदनकर देवाधिदेव गणेशजी को बारम्बार प्रणामकर व्रती एक सौ आठ आहुतियों से हवन करे ॥ ५५ ॥

वायनदान — [तदनन्तर] व्रत की सम्यक् रूप से सम्पूर्णता के लिये इक्कीस मोदकों अथवा इक्कीस लड्डुओं या इक्कीस बड़ों को इक्कीस फलों के साथ लाल कपड़े में लपेटकर वायन के रूप में अपने आचार्य को निवेदित करे ॥ ५६१/२
वायनदान मन्त्र — वायनदान का मन्त्र इस प्रकार है — ‘सम्पूर्ण संकल्पों में सिद्धि प्रदान करने वाले हे गणाधिपति! आपको नमस्कार है। इस वायनदान से मेरे संकटों का निवारण कीजिये ।’
तदनन्तर पुण्यमयी कथा का श्रवणकर समाहित चित्तवाला होकर अर्घ्य प्रदान करे ॥ ५७-५८ ॥
तिथ्यर्घदान —तिथियों में उत्तम हे देवि ! गणेशजी की हे प्रिय वल्लभा! [इस] अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये। हे देवि ! आपको नमस्कार है ॥ ५९ ॥ ऐसा कहकर तिथ्यर्घ दे।
देवार्थ अर्घ्यदान — हे मोदकप्रिय लम्बोदर गणेशजी ! आपको निरन्तर नमस्कार है । हे देव ! [ इस ] अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और मेरे संकटों का निवारण कीजिये, आपको नमस्कार है। हे गजानन ! आपको नमस्कार है, है गजकर्ण! हे महाबल ! मेरे द्वारा प्रदत्त अर्घ्य को ग्रहण कीजिये और संकटों से मुझे दूर कीजिये। हे गणराज ! हे महाकाय! हे विघ्नराज ! हे गजानन ! हे सभी कार्यों में अभीष्ट फल देने वाले ! अर्घ्य ग्रहण कीजिये । आपको नमस्कार है। हे प्रभो! हे देवेश ! मेरे जो-जो संकट तथा विघ्न हों, उन सबका शीघ्र ही ध्वंस कीजिये और अर्ध्य ग्रहण कीजिये। आपको नमस्कार है ॥ ६०-६३ ॥ ऐसा कहकर भगवान् गणेशके लिये अर्घ्य दे ।
चन्द्रार्थ अर्घ्यदान – [देवराज इन्द्र राजा शूरसेन से कहते हैं—] हे राजन्! इस मन्त्रसे चन्द्रमा को सात बार अर्घ्य दे ‘क्षीरसागर [- का मन्थन होने] से प्रकट हुए, अत्रिगोत्र में उत्पन्न हे चन्द्रदेव ! मेरे द्वारा दिये गये अर्घ्य को रोहिणी सहित ग्रहण करें’ ॥ ६४ ॥ यह चन्द्रमा को अर्घ्य देने का मन्त्र है।

तदनन्तर भगवान् से क्षमा-याचना करे, उसके बाद ब्राह्मणों को भोजन कराये। फिर ब्राह्मणों को अर्पित करने के बाद जो शेष बचा हो, उसका स्वयं भोजन करे ॥ ६५ ॥ मौन रहते हुए यथाशक्ति, यथारुचि सात ग्रास भोजन करे। इस प्रकार चार महीने तक विधानपूर्वक [संकष्टचतुर्थी] व्रत करे ॥ ६६ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्डमें ‘संकष्टचतुर्थीव्रतविधिवर्णन’ नामक उनहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ६९ ॥

1. -कनकं कुलिशं मुक्ता पद्मरागं च नीलकम् ।
एतानि पञ्चरत्नानि सर्वकार्येषु योजयेत् ॥
अर्थात् सोना, हीरा, मोती, पद्मराग और नीलम – ये पंचरत्न कहे जाते हैं।
2. -कतिपय विद्वान् इन आवाहनादि सभी उपचारों का समर्पण ‘ॐ नमो हेरम्ब मदमोदित मम संकष्टं निवारय हुं फट् स्वाहा’—इस मन्त्र के द्वारा करने का निर्देश करते हैं।

3. सहस्रशीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः सहस्रपात् । स भूमिꣳ सर्वत स्पृत्वाऽत्यतिष्ठद्दशाङ्गुलम् ॥ (यजु० ३१ । १)
4. पुरुष एवेदꣳ सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् । उतामृतत्वस्येशानो यदन्नेनातिरोहति ॥ (यजु० ३१ । २)
5. एतावानस्य महिमातो ज्यायाँश्च पूरुषः । पादोऽस्य विश्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतं दिवि ॥ (यजु० ३१ । ३)
6. त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः । ततो विष्वङ् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥ (यजु० ३१ । ४)
7. ततो विराडजायत विराजो अधि पूरुषः । स जातो अत्यरिच्यत पश्चाद्भूमिमथो पुरः ॥ (यजु० ३१ । ५)
8. पञ्च नद्यः सरस्वतीमपि यन्ति सस्रोतसः । सरस्वती तु पञ्चधा सो देशेऽभवत्सरित् ॥ (यजु० ३४ । ११)
9. . यत्पुरुषेण हविषा देवा यज्ञमतन्वत । वसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धविः ॥ (यजु० ३१ । १४)
10. . तं यज्ञं बर्हिषि प्रौक्षन् पुरुषं जातमग्रतः । तेन देवा अयजन्त साध्या ऋषयश्च ये ॥ (यजु० ३१ । ९)
11. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् । पशूंस्ताँश्चक्रे वायव्यानारण्या ग्राम्याश्च ये । (यजु० ३१ । ६)
12. तस्माद् यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दासि जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ॥ (यजु० ३१ । ७)
13. तस्मादश्वा अजायन्त ये के चोभयादतः । गावो ह जज्ञिरे तस्मात् तस्माज्जाता अजावयः ॥ (यजु० ३१ । ८)
14. यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधा व्यकल्पयन् । मुखं किमस्यासीत् किं बाहू किमूरू पादा उच्येत ॥ (यजु० ३१ । १०)
15. ब्राह्मणोऽस्य मुखमासीद् बाहू राजन्यः कृतः । ऊरू तदस्य यद्वैश्यः पदभ्याः शूद्रो अजायत ॥ (यजु० ३१ । ११)
16. चन्द्रमा मनसो जातश्चक्षोः सूर्यो अजायत । श्रोत्राद्वायुश्च प्राणश्च मुखादग्निरजायत् ॥ (यजु० ३१ । १२)
17. नाभ्या आसीदन्तरिक्षः शीर्ष्णा द्यौः समवर्तत । पद्भ्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथा लोकाँर अकल्पयन् ॥ (यजु० ३१ । १३)
18. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ (यजु० ३१ । १५)
19. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (यजु० ३१ । १६)
20. सप्तास्यासन् परिधयस्त्रिः सप्त समिधः कृताः । देवा यद्यज्ञं तन्वाना अबध्नन् पुरुषं पशुम् ॥ (यजु० ३१ । १५)
21. यज्ञेन यज्ञमयजन्त देवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । ते ह नाकं महिमानः सचन्त यत्र पूर्वे साध्याः सन्ति देवाः ॥ (यजु० ३१ । १६)
22. वस्तुतः ‘इन्द्रादि लोकपालानां’ शब्द से यहाँ ‘इन्द्रादि दस दिक्पालों’ का अर्थ लेना चाहिये। पूर्व में इन्द्र, अग्निकोण में अग्नि, दक्षिण में यम, नैर्ऋत्यकोण में निर्ऋति, पश्चिम में वरुण, वायव्यकोण में वायु, उत्तर में कुबेर, ईशानकोण में ईशान, ईशान और पूर्व के मध्य में ब्रह्मा, नैर्ऋत्य-पश्चिम के मध्य में अनन्त का आवाहन, स्थापन और पूजन करना चाहिये ।

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