August 30, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-74 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ चौहत्तरवाँ अध्याय संकष्टचतुर्थी व्रत की महिमा के सन्दर्भ में एक गलत्कुष्ठा चाण्डाली की कथा अथः चतुःसप्ततितमोऽध्यायः चाण्डाल्युपाख्यानं व्यासजी बोले — हे ब्रह्मन् ! उन राजा शूरसेन ने आदरपूर्वक इन्द्र के मुख से इतिहाससहित संकष्टचतुर्थी व्रत को सुनकर उस उत्तम व्रत को कैसे किया था ? ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यास!] तब उस राजा शूरसेन ने अपने दूतों को यह कहा कि नगर में जाओ और किसी संकष्टचतुर्थी व्रत करने वाले को ले आओ ॥ २ ॥ [राजा के ऐसा कहने पर ] वे दूत शीघ्रतापूर्वक नगर में गये और घर-घर जाकर पूछने लगे। [इस प्रकार] इधर-उधर भ्रमण करते हुए उन्होंने एक सुन्दर मंगलमय विमान को देखा, जिसमें एक दुष्ट चाण्डाली बैठने जा रही थी। उसके अंग कुष्ठ से गल गये थे । उसके मुख से [कफ और लार का] स्राव हो रहा था । उसका शरीर दुर्गन्धयुक्त और मक्खियों एवं कीड़ों से भरा था। उसका उदर शुष्क, बाल बड़े और दाँत, आँख एवं नासिका [भी] शुष्क थे। वह अत्यन्त मलिन और बड़े- बड़े कर्णछिद्रों वाली थी। उसका स्वर ऐसा था, मानो बादल गरज रहे हों ॥ ३-५ ॥ ऐसे स्वरूपवाली उस भक्त चाण्डालिनी को ले जाने के लिये आये हुए गणेशदूतों को देखकर राजदूत उन्हें प्रणामकर कहने लगे कि ‘यह तो बड़ा ही आश्चर्यजनक है’ ॥ ६ ॥ राजा के दूतों ने देवदेव गणेशजी के सेवकों से कहा — यह अत्यन्त निन्दित और हीन जाति की होकर भी कैसे स्वर्ग जा रही है? हे दूतो! यह पूर्वकाल में कौन थी ? इस प्रकार की यह कैसे हो गयी ? किस पुण्य के फलस्वरूप यह आप लोगों के द्वारा स्वर्ग ले जायी जा रही है ? यदि यह सब बताना सम्भव हो, तो हमें बतलायें ॥ ७-८१/२ ॥ देवदूत बोले — बंगाल प्रान्त में सारंगधर नाम के एक क्षत्रिय थे, उनकी सुन्दरा नाम की सुन्दर कन्या थी । वह कोयल के समान मधुर स्वरवाली, चन्द्रमा के सदृश सुन्दर मुखवाली और अपने सौन्दर्य से रति की सुन्दरता को भी जीत लेने वाली थी। प्रसिद्ध अष्ट नायिकाएँ इसकी दासी बनने के भी योग्य नहीं थीं। वह अपनी तिर्यक् दृष्टि से योगियों के भी चित्त को विमोहित कर देती थी ॥ ९–११ ॥ उसके रूप-सौन्दर्य के दर्शनमात्र से कुछ तरुणों के तेज की हानि हो जाती थी । विश्व को मोह लेनेवाली वह [सुन्दरा] व्यभिचारमार्ग में प्रवृत्त हो गयी ॥ १२ ॥ महामूल्यवान् वस्त्रों और अलंकारों से अलंकृत रहने वाली और अनेक प्रकार के विषयों का भोग करने वाली वह निर्लज्जा बंगाल नगर में वेश्या की भाँति चर्चित हो गयी थी। पिता ने असंख्य द्रव्य व्यय करके जिससे उसका विवाह किया था, ‘चित्र’ नामवाले पति की वह सदैव वंचना करती रहती थी ॥ १३-१४ ॥ किसी समय शयन करते हुए उसे छोड़कर वह अर्धरात्रि में सुन्दर वेष धारणकर जाने लगी तो उसने क्रुद्ध हो हाथ से उसे पकड़ लिया ॥ १५ ॥ तदनन्तर चित्र नामवाले उस पति ने उसे डाँटते हुए कहा — ‘अरी पापाचारिणी! तुझे धिक्कार है, जो तू निरन्तर परपुरुष में ही आसक्त रहती है’ ॥ १६ ॥ तब उसके इस प्रकार के वचनको सुनकर उस समय तो उसने [अपने] क्रोध को शान्त कर लिया, परंतु अभक्ष्य- भक्षण के कारण वह अत्यन्त कामोन्मत्त हो उठी थी । अतः जब अन्धकार घना हो गया तो उस बलशालिनी ने अपने दाहिने हाथ में एक छुरी ली और उससे अपने चित्र नामवाले पति का उदर- विदारणकर चहेते जार पुरुष के पास रमण करने के लिये चली गयी ॥ १७-१८१/२ ॥ जबतक वह वहाँ रमण कर रही थी, उसी समय उसके पड़ोस में रहने वाले व्यक्ति ने, जो जग रहा था, उसका सारा चरित जानकर राजा से निवेदन कर दिया। उस (राजा) के दूत [उस व्यभिचारिणी के घर के निकट ] अन्धकार में स्थित हो गये और वह जैसे ही घर आयी तो राजा के वे दूत उसे पकड़कर राजा के समीप ले गये । राजा की आज्ञा से दूतों ने उसे [नगर के] बाहर ले जाकर मार डाला ॥ १९–२१ ॥ तदनन्तर यमराज की आज्ञा से वह उनके दूतों द्वारा भयंकर नरक में ले जायी गयी । उलटी लटकी हुई वह कृमियों द्वारा खूब डँसी गयी । वहाँ पूर्वजन्म में किये गये दुष्कृत्यों का स्मरण करते हुए उसने अत्यन्त दुःख भोगा और कल्प के अन्त में वह मृत्युलोक में (पृथ्वी पर) अत्यन्त दुर्भाग्यशालिनी चाण्डाली हुई ॥ २२-२३ ॥ एक बार वह मद्यपान करके मत्त होकर दिन में ही सो गयी, तदनन्तर रात्रि के प्रथम प्रहर में जगने पर वह भूख बहुत पीड़ित हुई। तब वह भिक्षा माँगने के लिये [संकष्टचतुर्थी का] व्रत करने वाले के घर गयी। उस (व्रती) – ने उसे (चाण्डाली को) जो अन्न दिया, उसे उसने चन्द्रमा के उदय होने के बाद खाया ॥ २४-२५ ॥ दैवयोग से भोजन करते समय स्वेच्छा से ही उसके मुख से ‘गणेश’ – ऐसा उच्चारित हुआ, तभी [ अन्तकाल में ] गणाधिपति गणेशजी ने [इसे लाने के लिये] यह सुन्दर विमान भेजा है ॥ २६ ॥ ब्रह्माजी कहते हैं — [हे व्यासजी!] देवदूतों का वचन सुनकर राजा के दूतों ने उन्हें नमस्कार करके पुनः कहा— ॥ २६१/२ ॥ राजदूत बोले — [हे देवदूतो!] हम कार्यकर्ताओं ने यह अत्यन्त अद्भुत घटना देखी ॥ २७ ॥ राजा ने हमें जो आज्ञा दी है, उसे सुनिये – इन्द्र एक श्रेष्ठ विमान में बैठकर देवताओं के साथ गृत्समद को देखने के लिये आये थे। वहीं से वे भ्रूशुण्डि के पास आये। उन्हें देखकर [इन्द्र ने उनको] प्रणामकर भली प्रकार से पूजन किया तथा उनसे पूजा ग्रहणकर एवं उनकी अनुमति ले वे अपनी पुरी को चल दिये। गमन करता हुआ उनका विमान कुष्ठग्रस्त [पापी] वैश्यपुत्र की दृष्टि पड़ते ही उसी क्षण उस [राजा] शूरसेन के नगर में गिर पड़ा ॥ २८-३० ॥ [तब] शूरसेन ने वहाँ जाकर उन्हें नमस्कारकर और उनका भली-भाँति पूजनकर [उनसे] विमान के पतन का कारण और उसके [पुनः ] गमन का उपाय पूछा ॥ ३१ ॥ इन्द्र के यह कहने पर कि ‘संकष्टचतुर्थीव्रत-जनित पुण्य से ही यह विमान प्रस्थान करेगा, अतः इसके लिये प्रयत्न कीजिये’ हम दूतगण राजा की आज्ञा से संकष्टचतुर्थीव्रत करने वाले को खोजने यहाँ आये हैं। हे देवदूतो! यदि इसने यह व्रत किया है, तो इसे भूपति शूरसेन के पास ले चलिये। जब यह चाण्डाली संकष्टीव्रत-जनित पुण्य का दान करेगी तो इसका पुण्य द्विगुणित हो जायगा और यह पुनः इस विमानसे प्रस्थान करेगी, साथ ही इन्द्र का विमान भी अपने लोक कें लिये प्रस्थान कर जायगा ॥ ३२-३५ ॥ इससे आप सबका, इस चाण्डाली का, हमारा, राजा शूरसेन का और शचीपति इन्द्र का कार्य सम्पन्न हो जायगा, यदि आप सबको रुचिकर लगे तो ऐसा करें। उनका इस प्रकार का वचन सुनकर भगवान् गणेश के सेवकों ने कहा — ‘इसे दूसरों को देने की आज्ञा गणेशजी द्वारा हमें नहीं हैं’ ॥ ३६-३७ ॥ ऐसा कहकर उन्होंने [जब] उस चाण्डाली को उठाकर विमान में चढ़ाया, तभी वह दिव्य कान्ति से सम्पन्न, दिव्य वस्त्राभूषण से युक्त शरीरवाली हो गयी। तदनन्तर वह दिव्य वाद्यों की ध्वनि के साथ देवदूतों के द्वारा गजानन गणेशजी के समीप ले जायी गयी और राजा के दूत जैसे आये थे, वैसे ही राजा शूरसेन के पास लौट गये और सम्पूर्ण वृत्तान्त उनसे कहा ॥ ३८-३९१/२ ॥ राजा के दूत जब उस वृत्तान्त का वर्णन कर रहे थे, उसी समय दसों दिशाओं को प्रकाशित करता हुआ वह विमान उस चाण्डाली को ले जाते हुए उन सबको दिखायी दिया। तभी उस चाण्डाली की दृष्टि शचीपति इन्द्र के उस विमान पर पड़ी। उनका विमान उसके विमान की वायु के स्पर्श से सभी लोगों, देवताओं और ऋषियों के आश्चर्यपूर्वक देखते-देखते ऊपर की ओर `चला गया ॥ ४०-४२ ॥ इन्द्र के अमरावतीपुरी चले जाने पर सभी अपने-अपने स्थान को चले गये। संकष्टचतुर्थीव्रत के पुण्य से पापों का नाशकर वह चाण्डाली भी दिव्य शरीर से सम्पन्न होकर भगवान् गणेशजी के धाम को चली गयी। इस संकष्टनाशक वृत्तान्त को जो मनुष्य सम्यक् रूप से श्रवण करता है अथवा प्रयत्नपूर्वक दूसरे को सुनाता है, वह [अपने] सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करता है ॥ ४३-४५ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘संकष्टचतुर्थी की महिमा का वर्णन ‘ नामक चौहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७४ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe