August 31, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-78 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अठहत्तरवाँ अध्याय मुनि जमदग्नि द्वारा ससैन्य राजा कार्तवीर्य का आतिथ्य; कामधेनु का अद्भुत प्रभाव देखकर राजा का बलपूर्वक उसे ग्रहण करने की इच्छा करना अथः अष्टसप्ततितमोऽध्यायः कार्तवीर्येण (सहस्रार्जुनेन) कामधेनुं नेतुं प्रयत्नः ब्रह्माजी बोले — मुनि जमदग्नि ने अपने शिष्यों से कहा — ‘तुम लोग नदी के तटपर निवास कर रहे राजा कार्तवीर्य को बुलाने के लिये शीघ्र ही वहाँ जाओ’ ॥ १ ॥ उन शिष्यगणों ने राजा के समीप जाकर और उनके समक्ष उनका अभिवादन स्वीकारकर उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया और उनसे मुनि की आज्ञा इस प्रकार निवेदित की — हे राजन्! आप अपनी सेना के साथ सावधानीपूर्वक भोजन के लिये चलें। षड्रसों से समन्वित भोजन के असंख्य पात्र परोसे गये हैं ॥ २-३ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर उठकर उस राजा ने अपने सभी सैनिकों को बुलवाया और भलीभाँति स्नान करके राजा कार्तवीर्य ने वहाँ के लिये प्रस्थान किया ॥ ४ ॥ वहाँ राजा ने मुनि के भवन को देखा तो वैसा दृश्य उसने न कभी सुना था और न देखा ही था । उस प्रकार का गृह का तोरण तीनों लोकों में उसे नहीं दिखायी दिया था ॥ ५ ॥ मुनि जमदग्नि के संकेत की अभिलाषा करने वाले तथा हाथ में बेंत धारण करनेवाले द्वारपालों ने राजा को जब आगे जाने से मना किया तो मुनि के शिष्यगणों ने द्वारपालों को वैसा करने से रोका, तदनन्तर राजा भोजनालय में गये ॥ ६ ॥ वहाँ जाकर भोजनालय के मध्य में स्थित होकर राजा ने मुनि जमदग्नि की सम्पदा को देखा, उस समय राजा ने अपने मन में सोचा कि ऐसी सम्पदा तो न विष्णुजी के पास है और न ही शंकरजी के पास । संसार का पालन-पोषण करने वाले विष्णु, संहार करने वाले भगवान् शिव तथा इस जगत् की सृष्टि करने वाले ब्रह्माजी के पास भी ऐसी समृद्धि नहीं है। तदनन्तर मुनि जमदग्नि ने आगे जाकर राजा की अनुमति प्राप्तकर सभी सैनिकों को भोजनपात्रों के पास पंक्तिबद्ध बैठाया और जो भोजनालय से बाहर भोजन करने वाले थे, उनके लिये भी भोजन पात्रों को भिजवाया ॥ ७-९ ॥ आसनों पर उन सभीके बैठ जानेपर मुनि जमदग्नि ने राजा को बैठाया। तदनन्तर वाद्य के बजने पर उन सभी ने भोजन किया। इस प्रकार के अन्नों तथा स्वादिष्ट फल-मूलों को उनके द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया था । वे सभी आपस में ही इस प्रकार पूछने लगे कि ‘यह क्या है ? यह क्या है ?’ ॥ १०-११ ॥ सब लोग आश्चर्य करने लगे कि एक पहर में ही ऐसी सब व्यवस्था मुनि ने कैसे कर दी ? इच्छापूर्वक सबने भोजन किया और जब वे तृप्त हो गये तो शेष भोजन उन्होंने पात्रों में छोड़ दिया ॥ १२ ॥ तदनन्तर मुनि के शिष्यों ने प्रत्येक भोजनपात्र के पास हाथ-मुँह धोने के लिये प्रक्षालनपात्र भी प्रदान किया और दाँतों में लगे अन्नकणों को निकालने के लिये सुन्दर सींक ( शलाका) – भी प्रदान की। शिष्यों ने अवशिष्ट अन्न को हाथी, घोड़े तथा बैलों को प्रदान किया । तदनन्तर वे सभी बिस्तर बिछाये हुए दूसरे घर में गये, वहाँ उन्होंने ईख, दाख, आम, कटहल तथा दाडिम आदि फलों का सेवन किया। मुनि जमदग्नि द्वारा प्रदत्त इलायची, लौंग, कपूर, खैर के चूर्ण (कत्था) एवं सुपारी से समन्वित पान के पत्तों को ग्रहण किया ॥ १३–१५१/२ ॥ इसके पश्चात् मुनि ने अत्यन्त प्रसन्नता के साथ उन सभी को यथायोग्य मूल्यवान् वस्त्र एवं आभूषण प्रदान किये। राजा को तो और भी अधिक मूल्यवान् वस्त्राभूषण प्रदान किये ॥ १६१/२ ॥ मुनि बोले — [हे राजन्!] साक्षात् विष्णुरूपी तथा सभी प्रकार के मनोरथों से परिपूर्ण आप राजा के लिये मुझ वनवासी मुनि के द्वारा कौन – सा भोजन देय है। मेरे वचनों का पालन करते हुए आपने तीनों लोकों में मेरे यश की अभिवृद्धि की है ॥ १७-१८ ॥ लोक में लोग ऐसा कहेंगे कि मुनि जमदग्नि के यहाँ ससैन्य राजा कार्तवीर्य ने भोजन किया । अत्यन्त पुण्यशाली व्यक्ति के लिये ही लोक में ‘साधु’ शब्द का प्रयोग होता है। यदि कोई महापुरुष क्षुद्र व्यक्ति के वचनानुरोध का पालन करता है, तो वह भी साधुता को प्राप्त करता है और सभी लोकों में अत्यन्त उत्कर्षयुक्त विशद यश को प्राप्त करता है । मेरे वचन का परिपालन करने से आपका महान् अरिष्ट भी दूर हो गया है ॥ १९-२०१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — महर्षि जमदग्नि द्वारा कही गयी इस प्रकार की वाणी को सुनकर राजा उस समय अपने मनमें अत्यन्त विस्मय को प्राप्त हुए और उन्होंने उनसे पूछा ॥ २११/२ ॥ राजा बोले — हे सुव्रत ! यहाँ पहले तो कुछ भी मैंने नहीं देखा था, क्या यह सब माया के प्रभाव से हुआ है अथवा तपस्या के प्रभाव से हो सका है, इसे मुझे सच-सच बतलाइये ॥ २२१/२ ॥ मुनि बोले — हे राजन् ! मैंने कभी पहले परिहास में भी झूठ नहीं बोला है, अतः मैं आपसे सत्य कहता हूँ कि यह सब कुछ कामधेनु के द्वारा ही किया गया है ॥ २३१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे मुने! जिसका भाग्य विपरीत हो जाता है, उसकी बुद्धि भी विपरीत हो जाती है, दुष्ट ग्रह के द्वारा बलपूर्वक अनिष्ट उत्पन्न हो जाता है। अपनी सेना तथा वाहनोंसहित भोजन से भलीभाँति संतृप्त हो जाने पर भी राजा कार्तवीर्य ने कामधेनु को ले जाने का निश्चय किया और वे मुनि से इस प्रकार कहने लगे ॥ २४-२५१/२ ॥ राजा बोले — मैं समझता हूँ कि शान्त चित्तवाले, कन्दमूल तथा फल का सेवन करने वाले, मन से ही सृष्टि तथा संहार करने की क्षमता रखने वाले, प्रत्येक प्रकार की कामना से रहित और इन्द्रियों को सर्वथा जीत लेनेवाले, आप-जैसे ज्ञानीजनों के लिये इस प्रकार की गौ का कोई प्रयोजन नहीं है ॥ २६-२७ ॥ वन में प्राप्त वस्तुओं, फल-मूल आदि का और वायुमात्र का सेवन करने वाले, मोक्ष की साधना करने वाले और निरन्तर वेद के स्वाध्याय में परायण रहने वालों को सम्पत्ति से क्या प्रयोजन ? शास्त्रों के अध्यापन में निरत, धर्मशास्त्र के तत्त्व को जानने वाले और योगाभ्यासपरायण जनों का कामधेनु से क्या प्रयोजन है ? ॥ २८-२९ ॥ महान् पुरुषों को प्राप्त महान् वस्तु महान् कार्य को सम्पन्न करने के लिये ही होती है, आप-जैसे अरण्यवासी के पास यह महान् रत्नरूपी गौ का विद्यमान रहना उचित नहीं प्रतीत होता ॥ ३० ॥ इसलिये हे ब्रह्मन्! आप इस कामधेनु को प्रसन्नतापूर्वक मुझे प्रदान कर दें। आप मन में यह निश्चय कर लीजिये कि मेरे पास रहने पर भी यह गौ आपकी ही होगी ॥ ३१ ॥ अतः ब्रह्मन्! मेरी उस मर्यादा की रक्षा कीजिये, जो मैंने आपके समक्ष रखी है। अन्यथा बलशाली राजाओं के लिये संसार में ऐसी कौन-सी वस्तु है, जो दुर्लभ है। अपना राष्ट्र हो अथवा पराया राष्ट्र हो, राजा अपनी चतुरंगिणी सेना के साथ अपनी मनोभिलषित वस्तु प्राप्त कर लेते हैं ॥ ३२१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे द्विज ! उस दुर्मति राजा कार्तवीर्य के इन वचनों को सुनकर महामुनि जमदग्नि क्रोध से उसी प्रकार अत्यन्त प्रज्वलित हो उठे, जैसे कि अत्यधिक घी की आहुति पड़ने पर अग्नि देदीप्यमान हो उठती है। लाल-लाल आँखों वाले वे ब्राह्मण जमदग्नि उन राजा को अनुशासित करते हुए इस प्रकार बोले — ॥ ३३-३४१/२ ॥ मुनि बोले — हे राजन्! मैंने तुम्हें सदाचारी, शुद्धचित्त एवं राजा होने के कारण आदरणीय समझकर ही भोजन के लिये आमन्त्रित किया था, किंतु तुम्हारे हृदय में बगुले के समान जो कुटिलता व्याप्त थी, उसे मैं जान न सका। जैसे कोयल छल करके अपने बच्चे का पालन कौवे से करवाती है, किंतु अन्त में वह कोयल का बच्चा कौआ होकर भक्ष्य तथा अभक्ष्य सब कुछ खाने में अनुरक्त हो जाता है, इसी प्रकार मैं भी भूल में पड़ गया था, जो कि मैंने इस प्रकार के राजा के साथ मित्रता की। ऐसी मैत्री लोक में न देखी गयी है, न सुनी गयी है और न किसी के द्वारा अनुभूत ही की गयी है ॥ ३५-३८ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘कार्तवीर्योपाख्यान’ नामक अठहत्तरवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ७८ ॥ Content is available only for registered users. 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