श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-83
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
तिरासीवाँ अध्याय
तारकासुर का आख्यान, ब्रह्माजी से वरप्राप्त तारकासुर का अत्याचार, देवों द्वारा भगवान् शिव की स्तुति, भगवती उमा का प्रकट होकर तारकासुर के वध का उपाय बताना, देवताओं द्वारा कामदेव का आवाहन, कामदेव का शिव को विचलित करने के लिये प्रस्थान
अथः त्र्यशीतितमोऽध्यायः
तारकासुरोत्पत्तिः

मुनि बोले — हे लोकेश ! परशुरामजी ने किस स्थान पर परम अद्भुत तप किया था, उसे मुझे बताने की कृपा करें। कथा सुनते हुए मुझे तृप्ति नहीं हो रही है ॥ १ ॥

ब्रह्माजी बोले — चारों युगों में मयूरेश्वर नाम से जो स्थान प्रसिद्ध है और जहाँ देवेश गणपति मयूर पर आरूढ़ होकर अवतीर्ण हुए थे, वहाँ उन्होंने कमलासुर नामक महान् दैत्य का वध किया था। चूँकि वे मयूरपर आरूढ़ होकर प्रकट हुए थे, इसलिये उनका मयूरेश्वर यह नाम  प्रसिद्ध हुआ ॥ २-३ ॥ लोक में देवताओं तथा मुनियों द्वारा उनकी स्तुति की गयी, अतः वे उस मयूरेश्वर नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त हुए। वहाँ परशुरामजी ने गणेशजी का अनुष्ठान किया था और उनसे ‘परशु’ नामक अस्त्र को प्राप्त किया ॥ ४ ॥ तदनन्तर वे राम ‘परशुराम’ इस नाम से तीनों लोकों में प्रसिद्ध हुए । हे मुनिश्रेष्ठ! मैं उस इतिहास को बताता हूँ, आप श्रवण करें ॥ ५ ॥

तारक नाम का एक दैत्य हुआ, जो महान् बल एवं पराक्रमसे सम्पन्न था। उसने हजार दिव्य वर्षों तक अत्यन्त कठोर तपस्या की ॥ ६ ॥ हे द्विज! तब प्रसन्न होकर ब्रह्माजी ने उसे सभी से अभय प्राप्ति का वरदान दिया और कहा — ‘देवर्षि, यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस आदि किसी के भी हाथों तथा उनके शस्त्रों से तुम्हारी किसी प्रकार भी कहीं भी मृत्यु नहीं होगी, जब कार्तिकेय प्रकट होंगे, तब तुम्हारा मरण होगा। ‘हे मुने! ब्रह्माजी का ऐसा वचन सुनकर बल तथा गर्व में भरा हुआ वह तारकासुर तीनों लोकों में निवास करने वाले लोगों को अत्यन्त पीड़ित करने लगा ॥ ७–९ ॥

उसने वेदों के स्वाध्याय में परायण, तप तथा अनुष्ठान करने वाले एवं अग्निहोत्र करने वाले और स्वधर्माचरण करने वाले अन्य ब्राह्मणों को भी कारागार में डाल दिया ॥ १० ॥ सभी राजाओं तथा नागों को अपने अधीनकर वह स्वर्ग में चला गया। [ उससे भयभीत ] इन्द्र आदि सभी देवता हिमालय की गुफाओं में छिप गये ॥ ११ ॥ उसके भय से कहीं भी यज्ञ तथा पूजा आदि कार्य नहीं होते थे। वह कहता था — ‘मैं ही ईश्वर हूँ, मैं ही देवता हूँ, मैं ही ब्राह्मण हूँ, मैं ही कुलदेवता हूँ। मैं ही नमस्कार करने योग्य हूँ, मेरी ही पूजा करनी चाहिये, मेरे अतिरिक्त और कोई दूसरा संसार में (बड़ा) नहीं है। जो मेरे अलावा कहीं भी और किसी दूसरे को प्रणाम करेगा अथवा उसकी पूजा करेगा, वह मेरे द्वारा दण्डनीय और ताडनीय होगा अथवा वह यमलोक चला जायगा।’ इस प्रकार की आज्ञा उसने अपने दूतों द्वारा लोकों में प्रसिद्ध करवायी ॥ १२–१४ ॥

तभीसे सब लोग धर्म-कर्म से हीन तथा सज्जनों से रहित हो गये। वे शास्त्रों के स्वाध्याय से रहित, वषट्कार तथा यज्ञ एवं दान से रहित हो गये ॥ १५ ॥ लोगों के कुल-धर्म उच्छिन्न हो गये, वे अपने आचार से हीन हो गये और दुष्ट बन गये। मुनिजन तथा सभी साधु वृत्तिवाले लोगों ने पर्वतों की गुफाओं में शरण ले ली। वे सभी मुनिजन भगवान् शिव से प्रार्थना करने लगे कि हे शम्भो ! आपने इस दैत्य को इतना बढ़ावा क्यों दिया है, अब हम आपकी शरण को छोड़ और किस जगदीश्वर की शरण में जायँ ? ॥ १६-१७ ॥ हे विभो ! आप ही जगत् की सृष्टि, पालन तथा
संहार करने वाले हैं। वह दैत्य अभिमान में चूर होकर हम लोगों को उसी प्रकार जला रहा है, जैसे दावाग्नि वन को जला डालती है ॥ १८ ॥ यदि आपकी संहार करने की ही इच्छा है, तो स्वयं संसार का संहार कर डालें, यदि ऐसा नहीं है तो उस सर्वपीडाकारी तारकासुर का आज विनाश करें ॥ १९ ॥

इस प्रकार की प्रार्थना कर वे सभी मुनिगण दुष्कर श्रेष्ठ तप करने लगे। वे पत्तों का भक्षण करके, वायु का सेवन करके, निराहार रहकर तथा केवल जल ही पीकर तपस्या करने लगे। इस प्रकार मुनिजन उससे अज्ञात स्थान में छिपकर तपस्या में निरत थे। इधर उस दैत्यराज तारकासुर ने देवराज इन्द्र के ऐन्द्रपद को ग्रहण कर लिया और वह ब्रह्माजी को प्रताडित करने लगा ॥ २०-२१ ॥ हे मुने! तदनन्तर विष्णु निद्रास्थित होने के लिये क्षीरसागर में चले गये। भगवान् शंकर भी कैलास पर्वत को छोड़कर किसी दूसरी गुफा में चले गये ॥ २२ ॥ दिशाओं के दिक्पालों तथा दिग्गजों ने भी विविध गुफाओं का आश्रय लिया। उन सभी के स्थानों पर दैत्यराज तारकासुर ने अपने दैत्यों को नियुक्त कर दिया ॥ २३ ॥ वह निश्चल होकर इस पृथ्वी पर प्रजाओं को शासित करने लगा। जब वह अपने स्वभाववश गर्जना करने लगता था, तब स्वर्गलोक भी काँप उठता था ॥ २४ ॥

तब इन्द्रादि देवता पर्वत की गुफा में जाकर पार्वतीपति भगवान् शंकर की प्रसन्नतापूर्वक गम्भीर वाणी में स्तुति करने लगे ॥ २५ ॥

देवता बोले — हे प्रभो! आप पृथ्वी, आकाश, वायु, तेज, जल, सूर्य, चन्द्र तथा यजमानरूप में स्थित हैं। हे शंकर! आप ही अपनी इच्छा से इस चराचर जगत् की सृष्टि करते हैं, आप ही इसका पालन-पोषण करते हैं। और आप ही इस सब कुछ का संहार भी करते हैं ॥ २६ ॥ हे प्रभो! आप तो दूसरे के दुःख का निवारण करने वाले हैं, फिर आपके लिये आज अपनी कीर्ति को दूसरे के हाथों में सौंपना उचित नहीं है। अतः आप तारकासुर का विनाश करें अथवा अत्यन्त दुखित चित्तवाले और आपकी सेवामें संलग्न मन वाले सभी मुनियों तथा देवों का विनाश करें ॥ २७ ॥ हे गिरीश ! आपको छोड़कर हम अन्य किसकी शरण ग्रहण करें? हे महेश्वर ! हे भगवन्! हम किसका भजन करें? पापों का नाश करने वाले हे पार्वतीपति ! किससे हम अपनी व्यथा कहें ? हे अखिलेश्वर ! आपको छोड़कर कौन हमारी रक्षा करने में समर्थ है ? ॥ २८ ॥

ब्रह्माजी बोले — जब वे इस प्रकार स्तुति कर रहे थे, उसी बीच उन्हें यह आकाशवाणी सुनायी दी — हे देवो! जब शंकरजी का पुत्र होगा, तभी इस तारकासुर का विनाश होगा, इसके लिये आप लोग प्रयत्न करें। आकाशवाणी सुनकर सभी देवता अत्यन्त हर्ष में भर गये और इन्द्र आदि वे देवता कैलास पर भगवान् शंकरजी के स्थान पर गये। किंतु वहाँ उन्होंने भगवान् शंकर को नहीं देखा। वहाँ देवताओं ने अपने समक्ष मूलप्रकृतिस्वरूपा भगवती उमा का दर्शन किया। सभी देवताओं ने उनसे निवेदन किया कि हे तारके ! आप तारक मन्त्र प्रणव का ज्ञान प्रदान करने वाली हैं। आप तीनों लोकों को पीड़ा पहुँचाने वाले दुष्ट तारकासुर द्वारा अपने स्थान से च्युत कर दिये गये मुनियों तथा देवताओं की रक्षा करें और हे मातः! जैसे उसका विनाश हो सके, उस उपाय का आप चिन्तन करें ॥ २९-३३ ॥ हे शर्वाणि! आप तीनों लोकों की रक्षा करने वाली हैं, आप देवमाता को हम प्रणाम करते हैं । हे त्रिपुरस्वरूपा ! हे परात्परकलारूपा! आप ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा स्तुत होने वाली हैं। आपका यथार्थ स्वरूप वेदोंद्वारा भी अज्ञेय है। हे शंकरप्रिये! आप जगत् का कल्याण करें। हे अनघे! आप अपनी इच्छा से अपना सुन्दर स्वरूप धारण करने वाली हैं, असुरों का संहार करने वाली हैं और इस विश्व की आदिकारणभूता हैं ॥ ३४ ॥

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से प्रार्थित वे जगन्माता भगवती पार्वती उन देवताओं से बोलीं — ‘आकाशवाणी को मैंने जान लिया है, वे शंकर निश्चित ही कल्याण करेंगे। जहाँपर वे भगवान् शंकर स्थित हैं, मेरे साथ ही आप सभी वहाँ चलें। वे भगवान् शंकर उत्तम नियमों का पालन करते हुए परम तप कर रहे हैं’ ॥ ३५-३६ ॥

सभी देवताओं से इस प्रकार कहकर उन पार्वती ने भिल्ली का वेश धारण किया, जिससे कि उसे देखकर वे परम योगी शिव काम के बाणों के वशीभूत हो जायँ । उनका वह रमणीय स्वरूप देखकर उस समय कुछ देवता भी कामविह्वल हो गये। उन सर्वांगसुन्दरी को देखकर उर्वशी, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति आदि अप्सराएँ तथा कामपत्नी रति भी लज्जित हो रही थीं । हे ब्रह्मन् ! हे व्यासजी! तदनन्तर सभी देवता और वे गिरिपुत्री पार्वती उस समय भगवान् शिव के पास पहुँचे ॥ ३७-३९ ॥

उन सभी देवताओं ने स्थाणुभूत उन स्थाणु शिव का दर्शन किया। उनके नेत्र ध्यानावस्था में निश्चल थे । वे मन से परब्रह्म का ध्यान और जप कर रहे थे, वे सभी प्रकार के संग्रहों से रहित थे, भिल्ली का वेश धारण की हुई उन पार्वती ने भी उन त्रिलोचन शिव का दर्शन किया। तदनन्तर देवी उमा ने सभी देवताओं से सुखपूर्वक किया जानेवाला उपाय बताया ॥ ४०-४१ ॥

[ और कहा — हे देवो!] ये सदाशिव देह के भान से रहित होकर तपस्या में एकनिष्ठ होकर बैठे हैं, अतः इनको देह का भान कराने के लिये आप लोग कामदेव से ‘प्रार्थना करें। ये एकनिष्ठ सदाशिव जब उस काम के बाण से विद्ध होंगे, तो इनका देहभाव जाग्रत् हो जायगा और तब तुम्हारा कार्य हो जायगा ॥ ४२-४३ ॥

तदनन्तर सभी देवताओं ने उत्कट कामदेव का स्मरण किया। उस कामदेव के उपस्थित हो जाने पर अपना कार्य सिद्ध करने के लिये निश्चययुक्त बुद्धि वाले देवताओं ने उसे अपना प्रयोजन बतलाया। दूसरे देवताओं ने अपना कार्य सम्पन्न करने के लिये कामदेव की प्रार्थना करते हुए कहा — ॥ ४४१/२

आप इस चराचर जगत् के सभी प्राणियों में व्याप्त हैं । आपसे ही यह सृष्टि उत्पन्न होती है और यह सारा जगत् आपसे व्याप्त है, सभी पुरुष तथा स्त्रियाँ आपके द्वारा ही बलवान् बना दिये जाते हैं। आपके बिना यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगमात्मक जगत् निःसार है। अतः आपको हम सभी का महान् कार्य अवश्य करना चाहिये ॥ ४५-४७ ॥

कामदेव बोला — मैं यद्यपि [इन महायोगी को विह्वल करके मानो] अग्नि में ही प्रवेश करने जा रहा हूँ, तथापि आपके अनुग्रह से मैं देह के विनष्ट होने तक आपलोगों का कार्य अवश्य करूँगा ॥ ४८ ॥ हे देवो! यद्यपि पुष्प ही मेरा धनुष है, भ्रमर ही धनुष की प्रत्यंचा है, स्त्रियों का कटाक्ष ही बाण है और वसन्तऋतु ही मेरा सहयोगी है, तथापि मैं भगवान् शंकरसहित सभी देवताओं पर विजय प्राप्त कर लूँगा ॥ ४९१/२

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर देवताओं के कार्य को सिद्ध करने के प्रयोजन से तथा भगवान् शंकर को काम के वशीभूत करने के लिये वह कामदेव वहाँ गया, जहाँ भगवान् शंकर स्थित थे ॥ ५० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘तारकासुरोत्पत्तिकथन’ नामक तिरासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८३ ॥

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