श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-87
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
सतासीवाँ अध्याय
वरदचतुर्थीव्रत का विधान, शिवजी के उपदेश से स्कन्द द्वारा वरदचतुर्थीव्रत का प्रत्यक्ष अनुष्ठान, कार्तिकेय को लक्ष्यविनायक गणेशजी के दिव्य स्वरूप का दर्शन और अनेक वरदानों की प्राप्ति, कार्तिकेय द्वारा लक्ष्यविनायक गणेश की प्रतिमा की स्थापना और तारकासुर का वध
अथः सप्ताशीतितमोऽध्यायः
एलापुरक्षेत्रे स्कन्देन तपः, लक्षविनायकप्रभुना वरदानम् तारकासुर वधः

शंकरजी बोले — [ हे स्कन्द ! ] इस व्रत की उत्तम विधि को मैं तुम्हें बताता हूँ। श्रावणमास के शुक्लपक्ष की चतुर्थी से यह व्रत आरम्भ करना चाहिये ॥ १ ॥ व्रती को चाहिये कि व्रत के दिन प्रातःकाल तिल और आँवले के चूर्ण का उबटन लगाकर स्नान करे। क्रोध से रहित होकर नित्य नैमित्तिक सभी क्रियाओं को सम्पन्न करे । तदनन्तर किसी पवित्र स्थान में एक मण्डप का निर्माण करे, जो केले के स्तम्भ से सुसज्जित हो तथा जो ईख, चामर एवं पुष्पों से सुशोभित हो और दर्पणों की पंक्ति से मण्डित हो ॥ २-३ ॥ उस मण्डप के मध्य देश में दो वस्त्रों से वेष्टित एक कलश की स्थापना करे और वहीं चन्दन से आठ दल वाले एक कमल की रचना करे। तदनन्तर गुरु की अनुमति लेकर पूजा की सामग्री का (जल से) प्रोक्षण करे और सोलह उपचारों के द्वारा गणनायक गणेशजी की पूजा करे ॥ ४-५ ॥

भगवान् गणेश की प्रतिमा अपने-अपने सामर्थ्य के अनुसार सुवर्ण की अथवा रजत की बनवाये । इक्कीस प्रकार के पक्वान्नों को इक्कीस-इक्कीस की संख्या में बनाकर भगवान् गजानन के लिये नैवेद्य निवेदित करे और इक्कीस मुद्रा दक्षिणा के निमित्त प्रदान करे ॥ ६-७ ॥ भगवान् गणेश के निमित्त दक्षिणारूप में स्वर्णमुद्रा अथवा रजतमुद्रा अर्पित करे, इसमें कृपणता न करे। इक्कीस की संख्या में श्वेत अथवा हरित दूर्वा देवदेव गणेशजी को अर्पित करे, तदनन्तर मन्त्रपूर्वक पुष्पांजलि प्रदान करे, इक्कीस की संख्या में ही वेदज्ञ ब्राह्मणों का पूजन करे ॥ ८-९ ॥ ब्राह्मणों को इक्कीस प्रकार के ही पक्वान्नों का भोजन कराये और उतनी ही संख्या में उन्हें दान दे। तदनन्तर उन्हें प्रणाम करे और उनसे क्षमा-याचना करे । अन्त में ( व्रत की न्यूनांगतापूर्ति के लिये) उनसे अच्छिद्रवाचन कराये। गणेशजी की पार्थिवपूजा की विधि को पूर्व में बतलाया गया है, उसी विधि-विधान से यहाँ भी पूजा करनी चाहिये। तदनन्तर गणेशजी का ध्यान करते हुए बन्धु- बान्धवों के साथ स्वयं भी गणेशजी की उस कथा का श्रवण करे और फिर भोजन करे अथवा मौन रहकर उपवास करे ॥ १०–१२ ॥

इस प्रकार श्रावणमास की चतुर्थी से भाद्रपदमास की शुक्लपक्ष की चतुर्थी तक एक मासभर व्रत करे। भाद्रपद चतुर्थी को अपनी शक्ति के अनुसार बड़े ही श्रद्धापूर्वक महान् उत्सव मनाये ॥ १३ ॥ उस दिन पूर्वोक्त विधान के अनुसार गणनायक गणेशजी का पूजन करे। रात्रि में गीत-वाद्यों आदि की ध्वनियों से जागरण करे। साथ ही पुराण तथा अन्य श्रेष्ठ कथाओं का श्रवण करना चाहिये और गणेशजी के सहस्र-नाममन्त्रों से उनकी स्तुति करे ॥ १४-१५ ॥

प्रभातकाल में पवित्र जल में स्नान करके द्विरदानन गणेशजी का पूजन करे तथा श्रद्धा-भक्तिपूर्वक एक सौ इक्कीस ब्राह्मणों को भोजन कराये ॥ १६ ॥ यथाशक्ति उन्हें गाय, भूमि, स्वर्ण, वस्त्र, आभूषण तथा धन प्रदान करे। दीनों, अन्धों तथा अनाथों को भी भोजन-धन आदि प्रदान करे ॥ १७ ॥ यदि इतना सामर्थ्य न हो तो इक्कीस ब्राह्मणों अथवा फिर एक ही ब्राह्मण को भोजन कराये। यदि गणेशजी की स्वर्ण आदि धातु की मूर्ति बनवायी हो, तो उसे ब्राह्मण को प्रदान कर देना चाहिये । यदि गणेशजी की प्रतिमा मिट्टी की बनायी गयी हो; तो उसे पालकी में रखकर दिव्य वाद्यों की ध्वनि के साथ बड़े ही उत्साहपूर्वक जल के मध्य में विसर्जित कर देना चाहिये ॥ १८-१९ ॥ उस प्रतिमा को ध्वज, पताका आदि से आच्छादित करके, वेदों के घोष तथा गीतों की ध्वनियों और बालकों के दण्डयुद्धरूप क्रीड़ा-कौतुक के साथ विसर्जित करके वापस घर आना चाहिये ॥ २० ॥

हे षडानन! जो इस प्रकार से एक बार भी गणेशजी का व्रत करता है, वह सभी कामनाओं को प्राप्तकर अन्त में गणेशजी के लोक को प्राप्त करता है ॥ २१ ॥ ब्रह्माजी ने सृष्टि-रचना की शक्ति प्राप्त करने के लिये भगवान् गणेशजी के एकाक्षर मन्त्र का जप करते हुए यह व्रत किया था। तब गणेशजी ने उनके सामने प्रकट होकर उन्हें विविध प्रकार की शक्ति प्रदान की थी ॥ २२ ॥ भगवान् विष्णु ने भी सृष्टि का पालन-पोषण करने के लिये इस व्रत को किया था और परम अद्भुत षडक्षर महामन्त्र का जप किया था ॥ २३ ॥ हे षडानन! इस व्रत के प्रभाव से उन्होंने स्वेच्छापूर्वक अवतार धारण करने की क्षमता प्राप्त की थी । हे पुत्र ! मैंने भी गणेशजी के अष्टाक्षर मन्त्र का जप करते हुए इस व्रत को किया था ॥ २४ ॥ इससे मैं विविध प्रकार की शक्तियों से सम्पन्न हो गया और उसी शक्ति-सामर्थ्य से मैं तीनों लोकों का संहार करता हूँ। वृत्रासुर का विनाश करने के लिये देवराज इन्द्र ने तथा दैत्य शम्बरासुर का वध करने के लिये कामदेवावतार प्रद्युम्न ने इस व्रत को किया था। इसी कारण वे दोनों उन दोनों का वध करने में समर्थ हुए। यक्षों, गन्धर्वों, मुनियों, किन्नरों, नागों, राक्षसों, सिद्धों, चारणों तथा मानवों ने अपने-अपने इष्ट की सिद्धि के लिये इस व्रत को किया था । अतः हे स्कन्द ! तुम भी इस चतुर्थी व्रत को करो ॥ २५-२७ ॥ इससे तुम युद्ध में अजेय हो जाओगे और तीनों लोकों में तुम्हारी प्रसिद्धि हो जायगी। मैं वरदाता गणेशजी का षडक्षर मन्त्र तुम्हें प्रदान करता हूँ ॥ २८ ॥

ब्रह्माजी बोले — हे द्विजोत्तम ! तदनन्तर शुभ मुहूर्त में भगवान् शिव ने उन्हें षडक्षरी दीक्षा प्रदान की और वे स्कन्द उसी समय तपस्या के लिये निकल पड़े। वे एक ऐसे अत्यन्त निर्मल स्थान में गये, जो वृक्षों तथा लताओं से व्याप्त था, बहुत से मूलवाले तथा फलवाले वृक्षों से समन्वित था और अनेक सरोवरों तथा वापियों से सुशोभित था ॥ २९-३० ॥ स्कन्दजी ने एक पैर पर खड़े होकर अत्यन्त दारुण तप किया और भगवान् शंकर ने पूर्व में जो व्रत बताया था, उसका विधिवत् पालन किया। तब षडक्षर मन्त्र के अनुष्ठान तथा इस वरदचतुर्थी व्रत के प्रभाव से परमात्मा गजानन उनपर अति प्रसन्न हो गये ॥ ३१-३२ ॥

दर्शयामास सेनान्ये योगिध्येयमनुत्तमम् ।
निजं रूपं महातेजाश्चतुर्भुजविराजितम् ॥ ३३ ॥
महामुकुटसंशोभि कुण्डलाङ्गदशोभितम् ।
एकदन्तं भालचन्द्रं शुण्डादण्डविराजितम् ॥ ३४ ॥
पाशाङ्कुशकरं मालादन्तहस्तं सुशोभनम् ।
मुक्तामणिगणोपेतं सर्पराजयुतोदरम् ॥ ३५ ॥
दिव्यस्त्रपरीधानं दिव्यगन्धानुलेपनम् ।
अनेकसूर्यसङ्काशं तेजोज्वालासुदीपितम् ॥ ३६ ॥

तदनन्तर गणेशजी ने सेनानी कार्तिकेय को अपने उस अत्यन्त श्रेष्ठ स्वरूप का दर्शन दिया, जो योगियों के द्वारा ध्यान करने योग्य था, महान् तेजस्वी था, चार हाथों से सुशोभित था, महान् मुकुट से अलंकृत हो रहा था, कुण्डलों तथा बाजूबन्दों से मण्डित था। भगवान् गणेश के एक दाँत था, माथे पर चन्द्रमा सुशोभित हो रहा था, उनकी लम्बी सूँड़ सुशोभित हो रही थी । वे अपने हाथों में पाश, अंकुश, माला तथा दाँत को धारणकर सुशोभित हो रहे थे। मोती तथा मणियों को धारण किये हुए थे। उदरदेश में नागराज को धारण किये थे। उन्होंने दिव्य वस्त्रों का परिधान धारण किया हुआ था, दिव्य सुगन्धित द्रव्यों का अनुलेप लगाया हुआ था, वे भगवान् गणेश अनेकों सूर्यों के सदृश आभा से देदीप्यमान हो रहे थे और तेज की ज्वाला से आभासित थे ॥ ३३-३६ ॥

ऐसे स्वरूप का दर्शनकर वे षण्मुख कार्तिकेय आश्चर्यचकित और विस्फारित नेत्रों वाले हो गये। उनका चित्त अत्यन्त व्याकुल हो उठा और ‘यह क्या है’– इस प्रकार से वे सोचने लगे। मैंने जिनका ध्यान किया था, क्या ये वे ही हैं या और कोई । मैं इन्हें नहीं जान पा रहा हूँ, ये कौन हैं। तब उन्होंने धीरे से पूछा – ‘आप कौन हैं और आपका नाम क्या है ? ‘ ॥ ३७-३८ ॥

गजानन बोले — हे षडानन ! जिनका तुम एकाग्र मन से रात-दिन ध्यान किया करते थे, वही मैं तुम्हें वर देने के लिये प्रस्तुत हुआ हूँ, तुम्हारे हृदय में जो इच्छा हो, उसे बताओ, मैं गजानन गणेश तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न हूँ और तुम्हें यथेष्ट वर देता हूँ ॥ ३९ ॥

स्कन्द बोले — हे जगदीश्वर ! आपके जिस यथार्थ स्वरूप को न देवता जानते हैं, न शास्त्रकार मुनिगण, न ब्रह्मा आदि देवता और न ही शेषनाग आदि प्रमुख नाग; हे द्विरदानन! उसी स्वरूप का आज मुझे सम्यक् रूप से दर्शन प्राप्त हुआ है ॥ ४० ॥ आपके दर्शन हो जाने से ही आज मैं पूर्ण मनोरथ वाला हो गया हूँ। हे देव! फिर भी आपके कथन के अनुसार आपसे यह याचना करता हूँ कि कभी भी मेरी पराजय न हो और मेरे द्वारा आपका ध्यान किये जाने पर आप मुझे प्रत्यक्ष दर्शन दें ॥ ४१ ॥ [हे प्रभो!] आपके चरणारविन्दों का कभी भी मुझे विस्मरण न हो और सभी देवताओं में मुझे श्रेष्ठता प्राप्त हो। अलक्ष्य अर्थात् अदर्शनीय होने पर भी मुझे आज आपका प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है, इसलिये आप लक्ष्य विनायक नाम से प्रसिद्धि को प्राप्त करें और अपने भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करने के लिये आप कल्पवृक्ष के समान बनें ॥ ४२-४३ ॥

 लक्ष्यविनायक बोले — हे स्कन्द ! वह सब कुछ पूर्ण होगा, जो आज तुमने मुझसे प्रार्थना की है । कभी भी तुम्हें मेरा विस्मरण नहीं होगा । जब-जब तुम मेरा ध्यान करोगे, तब-तब तुम मेरा सान्निध्य प्राप्त करोगे । तुम्हारे शत्रुओं की पराजय होगी और तुम देवताओं में श्रेष्ठ पद प्राप्त करोगे ॥ ४४१/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार स्कन्दजी की नम्रता और उनकी तपस्या के प्रभाव से प्रसन्न होकर देव गणेशजी ने उन्हें माँगे गये सभी वरों को और अपना निजी वाहन ‘मयूर’ भी प्रदान किया । तभी से स्कन्द का ‘मयूरध्वज’ यह नाम भी प्रसिद्ध हो गया ॥ ४५-४६ ॥

गजानन बोले — तुम्हारे हाथों तारक आदि महान् असुर मृत्यु को प्राप्त करेंगे। हे अनघ ! मैं तुम्हारे कथनानुसार भक्तवत्सल के रूप में लक्ष्यविनायक इस नाम से चिरकाल तक इस क्षेत्र में निवास करूँगा ॥ ४७१/२

ब्रह्माजी बोले — ऐसा कहकर विकट नामवाले वे गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर स्कन्द ने ब्राह्मणों के साथ वहाँ गणेशजी की महान् मूर्ति को स्थापित किया और उस समय उन्होंने उस मूर्ति का ‘लक्ष्यविनायक’ यह मंगलमय नाम रखा। उन्होंने एक लाख मोदकों, उतने ही पुष्पों एवं उतने ही दूर्वांकुरों तथा उन उन प्रकार की विविध वस्तुओं से उस मूर्ति की पूजा की और उतनी ही संख्या में अर्थात् एक लाख ब्राह्मणों को भोजन कराया। तदुपरान्त उन लक्ष्यविनायक का स्तवन करके और उन्हें प्रणाम करके स्कन्द मयूर पर आरूढ़ होकर लोगों का कल्याण करने वाले भगवान् शंकर के समीप गये और उनको वह सारा वृत्तान्त बतलाया तथा गणेशजी द्वारा किया गया अपना ‘मयूरध्वज’ नाम भी उनको बतलाया ॥ ४८-५२ ॥

तदनन्तर भगवान् शिव की अनुमति पाकर और उनका आशीर्वाद ग्रहणकर एवं भगवान् गजानन का स्मरणकर स्कन्द तारकासुर के विनाश के लिये चल पड़े। देवताओं तथा ऋषियों ने उन्हें देवसेनापति के पद पर अभिषिक्त किया । तदनन्तर महान् पराक्रमशाली सेनानी कार्तिकेय ने तारकासुर को देखकर उसके साथ युद्ध किया ॥ ५३-५४ ॥ एक लाख वर्ष तक युद्ध करने के अनन्तर उन्होंने अपनी शक्ति के प्रहार से उसे मार डाला। शेषनाग में भी उस युद्ध का वर्णन करने की सामर्थ्य नहीं है ॥ ५५ ॥ तारकासुर के मारे जाने पर सभी देवता, मुनिगण, लोकपाल, नाग तथा सभी मनुष्य प्रसन्न हो गये । आनन्दित होकर उन्होंने स्कन्द के ऊपर फूलों की वर्षा की । तदनन्तर सभी देवता तथा सभी लोग अपने-अपने निवास-स्थानों को चले गये और वे पहले के समान ही यज्ञ-यागादि, श्राद्धादि पितृकर्म तथा अतिथिपूजन आदि करने लगे ॥ ५६–५७१/२

ब्रह्माजी बोले — [ हे व्यासजी !] मैंने गणेशजी की इस प्रकार की अद्भुत महिमा को आपसे कहा । उनके व्रत की महिमा को भी यथार्थ रूप में आपको बतलाया, गणेशजी के इस वरदचतुर्थीव्रत के प्रभाव से ही स्कन्द ने तैंतीस करोड़ देवताओं से भी अवध्य उस महान् असुर तारक को युद्ध में मार गिराया। इसी कारण वे स्कन्द इन्द्र आदि देवताओं के लिये भी पूज्य बन गये ॥ ५८- ६० ॥

व्यासजी बोले — हे प्रजापते ! उन कार्तिकेय ने महान् समाधि में स्थित होकर किस स्थान पर अनुष्ठान किया था, उसे आप मुझे बतायें ॥ ६१ ॥

ब्रह्माजी बोले — जहाँ पर घृषणेश्वर नामक भगवान् शंकर विराजमान हैं, उसी स्थान पर स्कन्द ने अनुष्ठान किया था। स्कन्द द्वारा वहाँ पर स्थापित गणेश लक्ष्यविनायक नाम से प्रसिद्ध हो गये ॥ ६२ ॥ उसी नगर में बाद में अत्यन्त विख्यात एल नामक राजा हुए। हे मुने! उन्हीं के नाम से बाद में वह नगर भी एलनगर1  के नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ ६३ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘तारकवध का वर्णन’ नामक सतासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८७ ॥

1. एलनगर का प्राचीन नाम ‘एलारपुरक्षेत्र’ है। यह वर्तमान में महाराष्ट्र-प्रान्त के औरंगाबाद जिले में स्थित है। इसका नाम बेरोल या बेरुल है। घृष्णेश्वर (घुश्मेश्वर) ज्योतिर्लिंग यहीं है। उसी मन्दिर में गणेशजी की भी मूर्ति है ।

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