September 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-88 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अठासीवाँ अध्याय कामदेव के दग्ध किये जाने पर कामपत्नी रति द्वारा भगवान् शिव की प्रार्थना, प्रसन्न होकर शिव द्वारा उसे अनेक वरदानों की प्राप्ति तथा कामदेव के सदेह होने का वरदान दिया जाना, कामदेव द्वारा गणेशजी के एकाक्षर मन्त्र का अनुष्ठान तथा गणेशजी की आराधना अथः अष्टाशीतितमोऽध्यायः नारदस्योपदेशानुसारं शेषेन कृतं तपः, गणेशप्रसादनं मुनि बोले — हे ब्रह्मन् ! मैंने गणेशजी के व्रत से सम्बद्ध आख्यान को सुना, यदि उन भगवान् शंकर ने अपनी क्रोधाग्नि से कामदेव को भस्म कर डाला, तो फिर वह कामदेव आज भी सभी लोगों में व्याप्त कैसे दिखायी देता है ? हे चतुर्मुख ब्रह्माजी ! यह सब मुझे विस्तार से बतलाइये ॥ १-२ ॥ ब्रह्माजी बोले — जब भगवान् शंकर ने रुष्ट होकर अपना तीसरा नेत्र खोला था, तब अपने पति कामदेव का अपराध जानकर कामपत्नी रति मृत कामदेव के निमित्त विलाप करती हुई भगवान् शंकर के पास पहुँची और उन्हें साष्टांग प्रणामकर अपनी बुद्धि के अनुसार उनकी स्तुति करने लगी ॥ ३-४ ॥ रति बोली — मैं देवी पार्वती के स्वामी तथा मस्तक में तीसरा नेत्र धारण करनेवाले उन भगवान् वृषध्वज को प्रणाम करती हूँ, जो सत्त्वगुण का आश्रय लेकर समस्त जगत् का पालन करते हैं और रजोगुण से सम्पन्न होकर समस्त लोकों की सृष्टि करते हैं ॥ ५ ॥ सम्पूर्ण लोकों के स्वामी वे महेश्वर तमोगुण से आविष्ट शरीर धारणकर अपनी इच्छा से जगत् का संहार करते हैं। जो हाथ में कपाल धारण करते हैं और भिक्षा ग्रहणकर भी लोगों की समस्त कामनाओं को पूर्ण करते हैं। जो भगवान् शिव स्वेच्छा से सब कुछ करने, कुछ भी न करने तथा कुछ का कुछ करने का सामर्थ्य रखने वाले हैं और महान् पराक्रम से सम्पन्न हैं; दीनों पर अनुग्रह करने वाले ऐसे वे महेश्वर शिव पति से हीन मुझ अबला को शरण प्रदान करें ॥ ६-७ ॥ वे भगवान् शिव शीघ्र ही मेरे मृत पति को जीवनदान दे करके शरण में आयी हुई मुझको सौभाग्यशाली बनायें, यदि ऐसा नहीं होता है, तो हे ईश ! मैं अपने प्राणों का त्याग करके आपकी कीर्ति को अपकीर्ति में बदल दूंगी ॥ ८ ॥ ब्रह्माजी बोले — रति के द्वारा इस प्रकार से स्तुत हुए भगवान् शिव उस पर प्रसन्न हो गये और बोले — ॥ ८१/२ ॥ शम्भु बोले — सुन्दर मुखमण्डलवाली हे कामदेव की पत्नी! हे महाभागे! तुम वर माँगो । तुम्हारी इस स्तुति से प्रसन्न होकर तुम्हारे मन में विद्यमान जो-जो कामनाएँ हैं, मैं उन सभी को देता हूँ ॥ ९१/२ ॥ भगवान् शिव के इस प्रकार के वचन को सुनकर रति अत्यन्त प्रसन्न हो गयी। उसने उन्हें प्रणाम किया । तदनन्तर सौभाग्य की अभिलाषा करने वाली वह रति अत्यन्त व्याकुल होकर उन भगवान् शिव से बोली – ॥ १०१/२ ॥ रति बोली — हे स्वामिन्! यदि आप प्रसन्न हैं, तो मेरे श्रेष्ठ वचन को सुनें। हे त्रिलोचन ! यद्यपि पृथ्वी, आकाश तथा पाताल में भी स्त्रियों में कामिनियों के गुण होते हैं, किंतु उन सबमें किसी में भी मेरे लावण्य के तुल्य लावण्य लेशमात्र भी नहीं है ॥ ११-१२ ॥ मुझे देखकर इन्द्र आदि देवताओं ने भी लज्जारहित होकर अपने तेज का परित्याग कर दिया था। उससे मुझे महान् लज्जा उत्पन्न हो गयी थी, उस लज्जा को आप दूर कर दें । हे शंकर ! मेरे पति कामदेव के न रहने पर मेरा सौन्दर्य सर्वथा निष्प्रयोजन हो गया है। ‘कामपत्नी रति विधवा हो गयी है’ इस प्रकार की अपकीर्ति मुझे जला डाल रही है ॥ १३-१४ ॥ हे देवेश! हे दयानिधे! मुझे पति का दानकर मेरी रक्षा कीजिये । इस प्रकार से उस रति के द्वारा प्रार्थना किये जानेपर लोगों का कल्याण करने वाले भगवान् शंकर कामदेव की पत्नी रतिको आनन्दित करते हुए स्निग्ध वाणी बोले ॥ १५१/२ ॥ शिव बोले — हे कल्याणि ! तुम चिन्ता मत करो और अब लज्जा भी मत करो। हे बाले ! तुम्हारे द्वारा स्मरणमात्र किये जाने पर वे कामदेव तुम्हें दर्शन देंगे। मन से चिन्तित किये जाने पर भी वे तुम्हारे पास आ जायँगे। इसी कारण ‘मनोभू’ उनका यह नाम प्रसिद्ध होगा ॥ १६-१७ ॥ कामदेव तुम्हारे सभी मनोरथों को पूर्ण करेंगे और तुम सर्वत्र मान्य हो जाओगी। जब वे भगवान् विष्णु के द्वारा देवी लक्ष्मी से उत्पन्न होंगे, तब प्रद्युम्न नाम से तुम्हारे पति के रूप में लोगों में प्रसिद्ध होंगे। हे महाभागे ! इस समय तुम अपने घर लौट जाओ ॥ १८-१९ ॥ शिव की आज्ञा मानकर वह रति अपने अत्यन्त सुन्दर भवन में आ गयी। वहाँ आकर उसने अपने पति का स्मरण किया, तो वे अनंग उसके समक्ष प्रकट हो गये। ईश्वर की इच्छा से ही वे अनंग उसके सामने प्रत्यक्ष प्रकट हुए, तब आश्चर्यचकित वह रति अपने पति के साथ अत्यन्त आनन्दित हो गयी। तदनन्तर वे अनंग भगवान् शिवके पास गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार कहने लगे — ॥ २०-२११/२ ॥ अनंग बोले — हे देवेश्वर ! बिना अपराध के ही मुझे आपने अनंग (बिना देहवाला) क्यों बना दिया ? ॥ २२ ॥ हे विभो ! आपसे ही स्कन्द की उत्पत्ति होगी — ऐसा जानने वाले एवं तारकासुर द्वारा पीड़ित इन्द्रादि देवताओं तथा मुनियों ने ही आपकी तपस्या को भंग करने के लिये मुझसे कहा था। इसीलिये मैंने सभी का उपकार करने की दृष्टि से वैसा कर्म किया था ॥ २३-२४ ॥ तीनों लोकों में परोपकार के समान दूसरा कोई पुण्य नहीं है। हे सुरेश्वर ! मेरे लिये वह सब मेरे दुर्भाग्य के कारण विपरीत ही हुआ ॥ २५ ॥ आज से पहले तैंतीस करोड़ देवताओं में मैं ही सबसे अधिक सुन्दर था और सभी के द्वारा सुन्दर पुरुष की उपमा मुझसे ही दी जाती रही है । हे देवेश ! अपने शरीर से रहित मैं प्रेत की भाँति कैसे रहूँ ? अतः हे महादेव ! कृपा करके आप मुझ पर अनुग्रह करें ॥ २६-२७ ॥ ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर प्रणाम करने वाले उन अनंग को भगवान् शिव ने गणेशजी का एकाक्षर मन्त्र प्रदान किया और उसका अनुष्ठान करने के लिये उन्हें आज्ञा प्रदान की। तदनन्तर अनंग एक रमणीय जनस्थान में गये, वह स्थान सब प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाला था। भगवान् शंकरजी की आज्ञा से अनंग ने वहाँ अनुष्ठान किया। उन्होंने गणेशजी के ध्यानपरायण होकर उनके एकाक्षर मन्त्र का जप करते हुए सौ वर्षपर्यन्त महान् तप किया ॥ २८-३० ॥ रति के साथ [वहाँ] स्थित वे नित्य वायु का ही आहार करते थे। तदनन्तर देवदेवेश भगवान् गजानन उन पर प्रसन्न हो गये और उनके समक्ष प्रकट हो गये । उनकी दस भुजाएँ थीं, वे श्रेष्ठ मुकुट से सुशोभित थे, देदीप्यमान रत्नों की आभा से रमणीय, कुण्डलों और बाजूबन्दों से वे मण्डित थे, करोड़ों सूर्यों के समान उनकी आभा थी, मोतियों की मालाओं से वे सुशोभित हो रहे थे, उन्होंने दिव्य मालाएँ और वस्त्र धारण कर रखे थे, दिव्य गन्धों का अनुलेपन किया हुआ था, उनकी सूँड़ तथा उनका मुखमण्डल सिन्दूर के समान अरुण वर्ण का था। दस आयुधवाले उनके दस हाथ सुशोभित हो रहे थे, उनकी नाभि शेषनाग से अलंकृत थी, विविध प्रकार के अलंकारों से वे सुशोभित हो रहे थे, उनके कन्धे सिंह के समान थे, वे महान् समृद्धि से सम्पन्न तथा अपनी चीत्कार ध्वनि से अखिल लोकों को त्रास पहुँचाने वाले थे ॥ ३१–३४१/२ ॥ भगवान् गणेशजी के प्रकट हो जाने पर इन्द्र आदि देवता, सभी मुनिगण, अप्सराओं, यक्षों, गन्धर्वों तथा किन्नरों के साथ वहाँ आये और दिव्य वाद्यों की ध्वनि करते हुए उन सबने पृथक्-पृथक् होकर सोलह उपचारों के द्वारा भगवान् गणेशजी की पूजा की ॥ ३५-३६१/२ ॥ तदनन्तर उठकर कामदेव ने सर्वप्रथम सभी देवताओं को प्रणाम करके उनके चरणों में वन्दना की, इसी प्रकार मुनियों को भी उन्होंने प्रणाम किया । तदनन्तर कृपालु भगवान् गणेश की महिमा का वे गान करने लगे ॥ ३७-३८ ॥ काम बोले — हे भक्तवत्सल ! आप धन्य हैं। सभी देवताओं में आप परब्रह्मस्वरूप हैं। आप निराकार होने पर भी साकाररूप में प्रकट हुए हैं ॥ ३९ ॥ आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया है। मेरी तपस्या भी आज धन्यतर हो गयी है, जो कि सभी दुःखों का मोचन करने वाले आपके युगल-चरणों का आज मुझे दर्शन हुआ है ॥ ४० ॥ आपका दर्शन सभी सिद्धियों का कारण और धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष इस चतुर्विध पुरुषार्थ को देने वाला है । आज मेरे दोनों नेत्र धन्य हो गये हैं, जिन्होंने परम पुरुष परमात्मा का दर्शन किया है ॥ ४१ ॥ जिनके यथार्थ स्वरूप को न वेदान्तदर्शन के विद्वान् जानते हैं, न सांख्यदर्शन के मनीषी और न योगदर्शनकार महर्षि पतंजलि आदि ही जानते हैं । वे ‘नेति नेति’ कहकर मौन हो जाते हैं। जिनके स्वरूप – निर्धारणमें वेद रोम-कूपमें अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड विराजमान हैं, उन प्रभु भी कुण्ठित हो जाता है। जिन अखिलेश्वर के एक-एक गणेशजी का मैंने जिस मन्त्र के प्रभाव से दर्शन किया है, वह मन्त्र भी अत्यन्त धन्य है ॥ ४२-४३ ॥ गणेशजी बोले — हे रतिपते ! तुमने ठीक ही कहा है, ब्रह्मा आदि देवता भी मुझे नहीं जानते हैं। जब मैं साकार रूप धारण करता हूँ, तब वे मुझे जान पाते हैं ॥ ४४ ॥ हे काम! मैं तुम्हारी तपस्या और मन्त्रानुष्ठान से प्रसन्न हुआ हूँ, इसी कारण इस समय तुमने मेरे अनुग्रह से ही मेरा दर्शन किया है । हे काम ! मुझसे तुम सम्पूर्ण मनोरथों को माँग लो, मैं तुम्हें इच्छित वर प्रदान करता हूँ ॥ ४५१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — भगवान् गणेश का ऐसा वचन सुनकर मनोभव कामदेव उनसे पुनः बोले और भगवान् शिव द्वारा किये सम्पूर्ण वृत्तान्त को उन्हें क्रमशः बतलाया। कामदेव ने प्रसन्न होकर वर प्रदान करने वाले उन भगवान् गणेशजी को अपनी अनंगता की प्राप्ति, रति के विलाप, मन्त्र की प्राप्ति, चिरकाल तक किये गये मन्त्रानुष्ठान और शिव से प्राप्त वरदान के विषय में भी बतलाया और फिर कामदेव ने प्रसन्न हुए उन गजानन से वर माँगा ॥ ४६-४८१/२ ॥ काम बोले — हे भगवन् ! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं, तो मुझे देह से सम्पन्न बनाइये। सभी देवताओं में मेरी मान्यता हो, मेरा लावण्य पूर्व की भाँति मुझे प्राप्त हो और आपके चरणों में मेरी दृढ़ भक्ति बनी रहे। साथ ही तीनों लोकों में मुझे विजय की प्राप्ति हो ॥ ४९-५० ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘गणेशवरप्रदान’ नामक अठासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८८ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe