September 5, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-89 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ नवासीवाँ अध्याय गणेशजी द्वारा कामदेव को अनेक वरों की प्राप्ति, कामदेव द्वारा गणेश के महोत्कट स्वरूप की आराधना, कामदेव का रुक्मिणी के गर्भ से प्रद्युम्न के रूप में जन्म, शम्बरासुर द्वारा उस बालक का हरण, गणेशजी के कृपाप्रसाद से प्रद्युम्न द्वारा शम्बरासुर का वध और द्वारकापुरी को प्रस्थान, शंकरजी का शेषनाग के दर्प को भंग करना अथः एकोननवतितमोऽध्यायः कामेन कृतं तपः, गणेशेन वरप्रदानम् गणेशजी बोले — हे काम ! जो-जो भी तुमने कामना की है, वह सब सफल होगी। तुम लक्ष्मी के उद रसे जन्म ग्रहणकर सभी अंगों से परिपूर्ण शरीरवाले और सबसे अधिक सौन्दर्यसम्पन्न होओगे। तुम सभी के लिये मान्य तथा तीनों लोकों पर विजय प्राप्त करने वाले होओगे । पुष्प, फल, नूतन पल्लव, कामिनी के अंग-प्रत्यंग, वायु, चन्द्रमा की चाँदनी, चन्दन और कमलपुष्प, भौरों का गुंजन और कोयल, मयूर आदि पक्षियों की मीठी ध्वनि तुम्हारे लिये उद्दीपन बनेंगे और इनके सहयोग से तुम शंकर आदि देवताओं को भी जीत लेनेमें समर्थ होओगे ॥ १-३ ॥ कामिनी आदि इन उद्बुद्ध करने वाले प्राणि-पदार्थों के दर्शन तथा उनके स्मरण से भी तुम लोगों के मन में उत्पन्न हो जाओगे। इस प्रकार लोगों में ‘मनोभू’ तथा ‘स्मृतिभू’ – ये नाम तुम्हारे प्रसिद्ध हो जायँगे ॥ ४ ॥ तुम मुझे कभी नहीं भूलोगे, मेरे चरणों में तुम्हारी दृढ़ भक्ति बनी रहेगी। किसी महान् कार्य के उपस्थित होने पर जब तुम मेरा स्मरण करोगे, तब मैं तुम्हारे समक्ष प्रकट हो जाऊँगा ॥ ५ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे महाभाग ! उन कामदेव को इस प्रकार वरों को देकर भगवान् गजानन देवताओं तथा ऋषियों के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ॥ ६ ॥ तदनन्तर कामदेव ने जैसा उनका दर्शन किया था, वैसी ही उन गणेश की महान् मूर्ति बनवाकर उसकी स्थापना एवं प्रतिष्ठा की और देवी रति द्वारा निर्मित किये गये पक्वान्नों, मोदकों एवं लड्डुओं द्वारा उसका पूजन किया तथा उन गणेशजी के ओजस्वी स्वरूप को देखकर उनका ‘महोत्कट’ यह नाम रखा। उन्होंने रत्नजटित खम्भों से सुशोभित उनका एक अत्यन्त रमणीय मन्दिर भी बनवाया ॥ ७–८१/२ ॥ कुछ समय बाद वे ही कामदेव देवी रुक्मिणी के गर्भ से प्रकट हुए। उन्हें दैत्य शम्बरासुर ने समुद्र में डुबो दिया था। उस बालक को एक मत्स्य ने निगल लिया और उस मत्स्य को धीवरों ने अपने जाल में पकड़ लिया एवं शम्बरासुर को दे दिया। उस शम्बरासुर ने वह मत्स्य अपनी पत्नी मायावती को समर्पित कर दिया ॥ ९-१० ॥ उस मत्स्य के चीरे जाने पर मत्स्य के गर्भ से वह बालक बाहर निकला और मायावती ने उसे पाल-पोषकर बड़ा किया। तब नारदजी ने मायावती से कहा — ‘यह तो कामदेव का अवतार है, जिसे तुमने पाल-पोषकर बड़ा किया है’ ॥ ११ ॥ शम्बरासुर की पत्नी मायावती ने उसे अनेक मायाओं का उपदेश दिया, तदनन्तर उन कामदेव (प्रद्युम्न) – ने शम्बरासुर का वध कर डाला। भगवान् गणेशजी के कृपाप्रसाद एवं मायावती द्वारा उपदिष्ट मायाओं के बल पर उन्होंने अकेले ही बहुतों पर विजय प्राप्त कर ली । वे कामदेव ही ‘प्रद्युम्न’ इस नाम से विख्यात हुए । तदनन्तर वे रति (मायावती) – को लेकर [द्वारका] पुरी को चले गये ॥ १२-१३ ॥ गणेशजी की कृपा से वे सभी देवों के लिये मान्य, तीनों लोकों में विजय प्राप्त करने वाले तथा आनन्दित होकर परम प्रसन्न हो गये । रुक्मिणी आदि स्त्रियाँ उन्हें दूसरे कृष्ण के समान ही देखकर लज्जित हो उठीं और उठकर इधर-उधर चली गयीं ॥ १४-१५ ॥ तदनन्तर नारदजी के कथनानुसार उन्हें अपना पुत्र जानकर वे सब अत्यन्त आनन्दित हो गयीं और उनके समीप जाकर उन्होंने उनका आलिंगन किया । प्रद्युम्न के साथ आयी मायावतीरूपा रति ने भी उन सभी को प्रणाम किया। उनके वहाँ आने पर उस द्वारकापुरी के सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १६१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे महामुने व्यासजी ! इस प्रकार मैंने आपको जनस्थान में स्थित गणेशजी की महिमा का निरूपण किया। उस स्थान पर ही राम [के भ्राता लक्ष्मण] – ने शूर्पणखा का नासिका-छेदन किया था, इसी कारण वह जनस्थान ‘नासिक’ इस नाम से प्रसिद्ध हुआ ॥ १७-१८ ॥ वहाँ के पत्थर के टुकड़े आज भी मोदक-जैसे दिखायी देते हैं। इस प्रकार कामदेव ने षडक्षर मन्त्र के द्वारा गजाननदेव की वैसे ही आराधना की, जिस प्रकार कि शेषनाग ने उनकी आराधना की थी। [गणेशोपासना के] फलस्वरूप रति तथा कामदेव ( मायावती और प्रद्युम्न) दोनों अत्यन्त प्रसन्न हो गये ॥ १९-२० ॥ व्यासजी बोले — ब्रह्मन् ! शेषनाग ने भगवान् गजानन की आराधना किस प्रकार की थी, किसलिये की थी और प्रसन्न हुए गणेशजी से उन्होंने किस वस्तु को प्राप्त किया था ? हे चतुरानन ब्रह्माजी ! यह सब मुझे विस्तार से बतलाइये; क्योंकि भगवान् की कथा के विषय में प्रश्न करने वाले, कथा सुनने वाले तथा कथा को बतलाने वाले — तीनों के पुण्य की वृद्धि होती है ॥ २१-२२ ॥ ब्रह्माजी बोले — हे ब्रह्मन् ! आपने बहुत अच्छी बात पूछी है। मैं उस कथारूपी अमृत को बताता हूँ । सत्यवती के पुत्र हे व्यासजी ! आप सावधान होकर वह सब सुनें ॥ २३ ॥ हे मुने! किसी समय की बात है, पार्वतीजी के साथ भगवान् शिव सुन्दर शिखरवाले श्रेष्ठ हिमालयपर्वत की चोटी पर सुखपूर्वक विराजमान थे। वह पर्वत विविध प्रकार के वृक्षों तथा लताओं से परिव्याप्त तथा झरनों की ध्वनि से निनादित था। स्वर्ण-कमलों पर निवास करने वाले भ्रमर वहाँ गुंजन कर रहे थे । चम्पक, अशोक, बकुल तथा मालती-पुष्पों से सुगन्धित वायु उस पर्वत के शिखर पर निवास करने वाले जनों के चित्त को अत्यन्त आह्लादित कर रही थी ॥ २४–२६ ॥ उस समय गन्धर्व, अप्सराएँ, यक्ष, किन्नर, देवता, मुनिगण तथा नाग उन गिरिजापति भगवान् शंकर का दर्शन करने के लिये वहाँ आये। उनमें से कुछ ने साष्टांग दण्डवत् प्रणामकर उनका अभिवादन किया । गन्धर्वों ने उच्च स्वर से गान किया और अप्सराएँ नृत्य करने लगीं ॥ २७-२८ ॥ उन्होंने दस भुजाधारी, व्याघ्राम्बर धारण किये हुए, नन्दी तथा भृंगी आदि गणों से परिव्याप्त, भाल में चन्द्रमा को धारण किये हुए, त्रिशूल लिये हुए, सारे शरीर में भस्म लगाये हुए, शेषनाग को सिर पर धारण किये हुए, कल्याण करने वाले तथा वृषभ पर आरूढ़ भगवान् शिव की पूजा की। अन्य देवों ने [भी] मानसिक उपचारों द्वारा भगवान् शिव का पूजन किया ॥ २९-३० ॥ कोई-कोई अपनी दोनों आँखें बन्द कर उनका ध्यान करने लगे। वसिष्ठ, वामदेव, जमदग्नि, द्वित, त्रित, अत्रि, कण्व, भरद्वाज तथा गौतम आदि मुनीश्वर विविध स्तुतियों के द्वारा उन पार्वतीपति भगवान् शंकर का स्तवन करने लगे ॥ ३१-३२ ॥ जब वे देवता तथा मुनिगण वहाँ भगवान् शंकर की आराधना कर रहे थे, उस समय शेषनाग अत्यन्त गर्वित हो उठे कि तीनों लोकों में मैं ही सबसे श्रेष्ठ हूँ, दूसरा और कोई श्रेष्ठ नहीं है। शिव [यदि ] श्रेष्ठतर हैं तो मैं तो उनके भी सिर पर विराजमान हूँ, इस पृथ्वी को धारण करने की शक्ति मुझमें ही है और कहीं किसी में नहीं ॥ ३३-३४ ॥ मेरे कुल में उत्पन्न वासुकि नाग ने जब रस्सी बनकर समुद्र-मन्थन में सहयोग प्रदान किया था, तभी देवताओं ने अमृत प्राप्त किया था और तभी उन्होंने अमरत्व प्राप्त किया था, अतः मुझसे श्रेष्ठ और कोई दूसरा नहीं है । उन शेषनाग के मन के अभिमान को जानकर तीनों लोकों का संहार करने वाले तथा कल्याण करने वाले और सब कुछ देख लेने वाले भगवान् शिव मौन हो गये और फिर सहसा उठ खड़े हुए ॥ ३५-३६ ॥ उन्होंने उस प्रकार के अभिमान में चूर शेषनाग को भूमि पर पटक दिया, तब उनका एक-एक सिर दस-दस भागों में विभक्त हो गया। इससे वे शेषनाग आधे प्रहर तक मूर्च्छित और चेतनाहीन से हो गये। तभी से वे शेषनाग हजार फणों से सुशोभित हो गये ॥ ३७-३८ ॥ प्राणों के बच जाने पर वे शेषनाग सोचने लगे कि मैं तीनों लोकों के स्वामी भगवान् शिव का आभूषण था और सम्पूर्ण नागों का भूषणस्वरूप था ॥ ३९ ॥ लेकिन आज न जाने किस कर्म के फलस्वरूप इस अवस्था को प्राप्त हो गया हूँ। जैसे पंखहीन पक्षी चलने में असमर्थ होता है, वैसे ही आज मैं चलने में असमर्थ हो गया हूँ। मैं क्या करूँ, कहाँ जाऊँ। इस समय कौन मेरा रक्षक हो सकता है, और ऐसा कौन है, जो मुझे अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त करने का मंगलमय उपाय बता सकता है ? अथवा कौन है, जो मेरे दुःख को दूर कर सकता है, इस प्रकार वे अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे। उसी समय उन्होंने मार्ग में जाते हुए मुनि नारदजी को देखा ॥ ४०–४२ ॥ जैसे कोई भिक्षुक स्वप्न में धन-सम्पत्ति प्राप्त कर कुछ प्रसन्न हो उठता है, वैसे ही वे नागराज शेष उन्हें देखकर प्रसन्न हुए। नारदजी ने अत्यन्त कष्ट में पड़े हुए उन नागराज को अपने समक्ष देखा ॥ ४३ ॥ उन्हें चेष्टारहित, श्वासक्रिया से हीन तथा एक मुनि की भाँति ध्याननिष्ठ देखकर सब कुछ जानने वाले होने पर भी नारदजी ने उन शेष से पूछा- ॥ ४४ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘काम के पुनर्जन्मसम्बन्धी वृत्तान्त का वर्णन’ नामक नवासीवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ८९ ॥ Content is available only for registered users. 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