श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-90
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
नब्बेवाँ अध्याय
देवर्षि नारदजी का शेषनाग को गणेशोपासना की दीक्षा देना, शेषनाग द्वारा षडक्षर मन्त्र का अनुष्ठान, प्रसन्न होकर गणेशजी का उन्हें दिव्यरूप में दर्शन देना, शेषनाग द्वारा गणेश – स्तवन और अनेक वरों की प्राप्ति, गणेशजी की कृपा से शेषनाग का सहस्र सिरवाला होना, शेषनाग का धरणीधर नाम से गणेश प्रतिमा की प्रतिष्ठा करना
अथः नन्नवतितमोऽध्यायः
शेषोपाख्यानं

नारदजी बोले — [हे नागराज!] तुम इस प्रकार से तेजरहित और अत्यन्त दुखी क्यों हुए हो ? तुम्हारे सिर कैसे फूटे हैं और तुमने किस मुनि का अत्यन्त अप्रिय किया है? क्या तुमसे भगवान् शिव नाराज हैं ? अथवा तुमने गर्व क्यों किया था ? हे शेष ! इन सबका कारण मुझे बताओ, तभी मैं उसको दूर करने का उपाय बतलाऊँगा ॥ १-२ ॥ तुम्हारे बिना कौन ऐसा है, जो चराचर जीवों से समन्वित इस पृथ्वी को धारण कर सकता है। इतने पर भी जब वे शेषनाग कुछ नहीं बोले, तो मुनि नारदजी ने स्वयं ही उन नागराज को अपना पद पुनः प्राप्त करने का शुभ उपाय बताया ॥ ३१/२

नारदजी बोला — सम्पूर्ण कलाओं के निधान हे शेषनाग! मेरे कथन को ध्यानपूर्वक सुनो। मैं वह उपाय बतला रहा हूँ, जिससे ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवता भी तुम्हारे सेवक के समान हो जायँगे और तुम इस सम्पूर्ण पृथ्वी को अपने ऊपर उसी प्रकार धारण कर सकोगे, जैसे कि एक बालक पुष्प की माला को धारण कर लेता है ॥ ४-५ ॥

शेषनाग बोले — मेरा कोई जन्मान्तरीय पुण्य था, जिसके प्रभाव से अकस्मात् मुझे आपका दर्शन हुआ। आगे भी ठीक ही होगा, इसमें कोई संशय नहीं ॥ ६ ॥ अन्यथा जो पुण्यकर्म नहीं करते हैं, उन्हें आपका दर्शन कैसे हो सकता है ? इस समय मेरा शरीर अत्यन्त विह्वल हो गया है, अतः मैं पृथ्वी को धारण करने में असमर्थ हूँ। हे मुने! आप वह उपाय बताइये, जिससे कि मैं पूर्व के समान हो जाऊँ ॥ ७१/२

नारदजी बोले — हे नागराज ! मैं तुमको उन भगवान् गणेशजी के महामन्त्र को बताता हूँ, जिनके कृपाप्रसाद से इन्द्र आदि देवताओं ने अपने-अपने पद प्राप्त किये थे और ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव जिनकी आज्ञा से सृष्टि, स्थिति तथा संहार का कार्य करते हैं ॥ ८-९ ॥ उन सर्वेश्वर भगवान् गणेशजी के प्रसन्न होने पर तुम अपनी पूर्वावस्था को प्राप्त कर लोगे। तुम्हारी दीन दशा देखकर मेरा मन अत्यन्त दयार्द्र हो उठा है ॥ १० ॥ इसी कारण मैं तुम्हें गणेशजी का षडक्षर मन्त्र प्रदान करता हूँ। इसका अनुष्ठानमात्र करने से भगवान् गजानन तुम्हारे ऊपर प्रसन्न हो जायँगे और तुम उन सभी कामनाओं को प्राप्त कर लोगे, जिन-जिनकी तुम उनसे याचना करोगे ॥ १११/२

ब्रह्माजी बोले — शेषनागको उपदेश देकर देवर्षि नारद अन्तर्धान हो गये और शेषनाग ने भी तपस्या करने के लिये अत्यन्त शुभ निश्चय करके अपनी सभी इन्द्रियों को उनके विषयों से लौटाकर उन गणेशजी का ध्यान करते हुए एक हजार वर्षों तक उस श्रेष्ठ (षडक्षर) मन्त्र का जप किया। मन्त्रानुष्ठान पूरा होने पर उन्होंने देवाधिदेव भगवान् गजानन का अपने समक्ष दर्शन किया ॥ १२–१४ ॥

वे सिंह पर आरूढ़ थे, उनके तीन नेत्र थे, दस भुजाएँ थीं, वे नाग को धारण किये थे तथा कुण्डल एवं बाजूबन्द पहने हुए थे। उन्होंने वक्षःस्थल पर मोतियों की माला धारण की थी, उनका मुकुट अत्यन्त सुन्दर था, वे रत्नमुद्रा तथा अक्षसूत्र लिये हुए थे। वे अनेकों देवों तथा ऋषिवृन्दों द्वारा निरन्तर सेवित हो रहे थे, उनकी सूँड़ टेढ़ी थी और मुख हाथी का था। वे भक्तजनों की अभिलाषा को परिपूर्ण करने के लिये विग्रह धारण किये थे, वे देवताओं तथा मनुष्यों को वर देने वाले थे और आराधना करने वाले को उसका मनोभिलषित पदार्थ प्रदान करने वाले थे ॥ १५ ॥

शेषनाग ने सिद्धि-बुद्धि नामक दो पत्नियों से समन्वित भगवान् गणेशजी का जैसा ध्यान पहले किया था, उसी स्वरूप में वे उन्हें दर्शन देने के लिये प्रकट हुए ॥ १६ ॥ वे हजारों सूर्यों के समान थे और अपनी कान्ति से दिशाओं तथा विदिशाओं को प्रकाशित कर रहे थे । उनके तेज से शेषनाग भी चकाचौंध और अन्धे-जैसे हो गये । वे भयभीत, व्याकुल चित्तवाले तथा अत्यन्त विह्वल होकर काँप उठे। मुहूर्तभर में जब वे स्वस्थचित्त हुए तो अपने मन में यह सोचने लगे ॥ १७-१८ ॥ प्रलयाग्नि के समान दीप्ति से सम्पन्न यह कौन-सा तेज यहाँ उपस्थित हुआ है ? यह कदाचित् सम्पूर्ण लोकों को जला डालेगा अथवा मुझे ही  भस्म कर डालेगा। कल्याणकारी कर्मों को करने पर बीच में अमंगल कैसे आ सकता है ? अथवा नारदजी ने जिस प्रकार कहा है, मैं गणनायक के उसी स्वरूप का दर्शन कर रहा हूँ ॥ १९-२० ॥

इस प्रकार जब शेषनाग अत्यन्त चिन्तातुर हो उठे तो द्विरदानन भगवान् गणेश उनसे बोले — कुतर्क करने में दक्ष हे शेषनाग ! भय मत करो। मैं वरदाता गणेश उपस्थित हो गया हूँ। तुम रात-दिन जिसका ध्यान करते रहते हो, मैं वही हूँ। तुम्हारे मन में जो इच्छा है, उसे माँगो। मैं ही इस जगत् का कर्ता, रक्षक और संहार करनेवाला अखिलेश्वर हूँ ॥ २१-२२ ॥ मेरे ही तेज से चन्द्रमा, अग्नि, सूर्य और ग्रह-नक्षत्र प्रकाशित होते हैं। परब्रह्मस्वरूप होते हुए भी तुम्हारी तपस्या से प्रसन्न होकर मैं तुम्हें वर प्रदान करने के लिये तथा संसार का कल्याण करने के लिये आविर्भूत हुआ हूँ । तुम जिन-जिन वरों की कामना करते हो, उन सबको मुझसे माँग लो ॥ २३-२४ ॥

शेष बोले — हे भगवन्! मैं आपके तेज से धर्षित हो जाने के कारण न तो आपको देखने का साहस कर पा रहा हूँ और न कुछ बोलने का ही साहस कर पा रहा हूँ। हे अनघ! यदि आपका मेरे ऊपर पूर्ण अनुग्रह है तो आप (अपने इस तेजोमय स्वरूप को आवृतकर ) सौम्यरूप में हो जाइये ॥ २५ ॥

ब्रह्माजी बोले — शेषनाग द्वारा इस प्रकार प्रार्थना किये गये करुणासागर वे सुरेश्वर गजानन करोड़ों चन्द्रमाओं की आभा से सम्पन्न तथा सौम्य तेजवाले हो गये । तदनन्तर शेषनाग ने उन अखिलेश्वर को प्रणाम करके उनका स्तवन किया और उनसे वरों की याचना की ॥ २६१/२

॥ शेष उवाच ॥
अनादिनिधनं देवं वन्देऽहं गणनायकम् ॥ २७ ॥
सर्वव्यापिनमीशानं जगत्कारणकारणम् ।
सर्वस्वरूपं विश्वेशं विश्ववन्द्यं नमाम्यहम् ॥ २८ ॥
गजाननं गणाध्यक्षं गरूडेशस्तु तं विभुम् ।
गुणाधीशं गुणातीतं गणाधीशं नमाम्यहम् ॥ २९ ॥
विद्यानामधिपं देवं देवदेवं सुरप्रियम् ।
सिद्धिबुद्धिप्रियं सर्वसिद्धिदं भुक्तिमुक्तिदम् ॥ ३० ॥
सर्वविघ्नहरं देवं नमामि गणनायकम् ।

शेष बोले — जो आदि और अन्त से रहित हैं, उन गणों के नायक भगवान् गणेशजी की मैं वन्दना करता हूँ । जो सर्वत्र व्याप्त हैं, ईशानस्वरूप हैं, इस संसार के कारण के भी कारण हैं, जगत् के स्वामी हैं तथा सम्पूर्ण विश्व के द्वारा वन्दनीय हैं, उन गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २७-२८ ॥ जो गणों के अध्यक्ष हैं, भगवान् विष्णु द्वारा स्तुत हैं, गुणों के स्वामी हैं, गुणातीत हैं, उन गणाधिपति गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ २९ ॥ जो समस्त विद्याओं के स्वामी हैं, देवों के भी देव हैं, देवताओं के अत्यन्त प्रिय हैं, सिद्धि तथा बुद्धि के प्रिय हैं, सब प्रकार की सिद्धियों को देनेवाले हैं, भुक्ति एवं मुक्ति को प्रदान करने वाले हैं तथा सब प्रकार के विघ्नों का नाश करने वाले हैं, उन गणनायक भगवान् गणेश को मैं प्रणाम करता हूँ ॥ ३०१/२

ब्रह्माजी बोले — हे महामुने! इस प्रकार देवताओं के स्वामी, वर प्रदान करने वाले द्विरदानन भगवान् गणेश की स्तुति करके शेष ने उनसे जिन-जिन वरों की याचना की थी, उन्हें आप सुनें ॥ ३११/२

शेष बोले — आज मेरे द्वारा की गयी तपस्या धन्य हो गयी, मेरा ज्ञान धन्य हो गया, मेरे माता-पिता धन्य हो गये, मेरा जन्म लेना सफल हो गया, मेरा शरीर, मेरे अनेक नेत्र तथा बहुत से सिर भी धन्य हो गये । आपकी स्तुति करने में मेरी जो जिह्वा प्रवृत्त हुई, वह भी आज धन्य हो गयी है ॥ ३२-३३ ॥ आपके दोनों चरणों का दर्शन करने से मेरा कुल एवं मेरा शील धन्य हो गया । हे अखण्ड पराक्रम वाले गणनायक! मुझे आप अपनी अखण्डित भक्ति प्रदान करें । हे विघ्नराट् ! आप सर्वज्ञ को मैं अपना क्या-क्या दुःख बताऊँ। अत्यधिक अभिमान करने पर भगवान् शिव के द्वारा अत्यन्त क्रोध करके भूमि पर पटक दिये जाने के कारण मेरे मस्तक फट गये हैं। तदनन्तर देवर्षि नारदजी के अनुग्रह से मुझे आपके चरणारविन्द का दर्शन हुआ ॥ ३४-३६ ॥ हे देव! इस समय आप मुझे तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ होने का वर प्रदान करें। मेरे सभी सिरों में पूर्व की भाँति दक्षता आ जाय और मैं पृथ्वी को धारण करने में समर्थ हो जाऊँ ॥ ३७ ॥ मुझे अचल स्थान प्राप्त हो और मैं निरन्तर आपका दर्शन करता रहूँ। मुझे भगवान् शंकर का भी सान्निध्य प्राप्त हो, मैं नागों के कुल में श्रेष्ठता प्राप्त करूँ और भगवान् शिव में मेरी प्रीति बनी रहे ॥ ३८ ॥

गणपति बोले — हे नागों के स्वामी ! यह जो तुम्हारा मस्तक दस भागों में विभक्त हुआ है, अत: तुम अब एक हजार मुखवाले तथा एक हजार फणों से सुशोभित होओगे। जबतक चन्द्रमा, सूर्य और तारे रहेंगे, तबतक तुम्हारी कीर्ति लोकों में बनी रहेगी और पृथ्वी को धारण करने की तुम्हारी शक्ति और भी दृढ़ हो जायगी ॥ ३९-४० ॥ नागों में श्रेष्ठ हे नागराज ! तुम पाँच मुखवाले भगवान् शिव के पाँचों सिरों में मेरी कृपा से अचल स्थान प्राप्त करोगे और तुम्हें मेरा सान्निध्य निरन्तर प्राप्त होगा । हे शेष ! अन्य भी जो तुम्हारी अभिलाषा है, वह सब सफल होगी ॥ ४११/२

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार के वर गणेशजी ने उन्हें प्रदान किये और अपने उदरदेश में उनको लपेटकर बाँध लिया। तब से गजानन का एक नाम ‘व्यालबद्धोदर ‘ प्रसिद्ध हो गया । तदनन्तर विभु गणेशजी ने अभय होने के लिये उन शेषनाग के मस्तक पर अपना हाथ रखा ॥ ४२-४३ ॥ उन्होंने प्रसन्न होकर अपना विराट् स्वरूप शेषनाग को दिखलाया और अपने शब्द से उस समय आकाश, पृथ्वी तथा दिशा – विदिशाओं को भर दिया था ॥ ४४ ॥ जिन गणेशजी के विराट् स्वरूप में पृथ्वी चरणतल थी, दिशाएँ उनके कान थीं, सूर्य नेत्र था, ओषधियाँ उनके रोमस्वरूप थीं, धरा को धारण करने वाले पर्वत उनके नख थे, मेघ स्वेदरूपी जलबिन्दु थे, चतुरानन ब्रह्माजी उनकी जननेन्द्रिय थे, जिनके कुक्षिदेश में सम्पूर्ण चराचर जगत् और चारों सागर स्थित थे ॥ ४५-४६ ॥ वे एक होते हुए भी अनन्त मुख वाले थे और अनन्त नेत्रों वाले थे, स्वराट् थे, अनन्त रूपवाले थे, अनन्त शक्तियों से सम्पन्न थे और अत्यन्त प्रकाशमान थे। उनके एक-एक रोमकूप में हजारों-हजार ब्रह्माण्ड आभासित हो रहे थे, ऐसे उस विराट् स्वरूप को देखकर शेषनाग भयभीत होकर भ्रान्त-से हो गये ॥ ४७-४८ ॥

तदनन्तर उन्होंने गणेशजी से प्रार्थना की कि वे पुनः सौम्य स्वरूपवाले हो जायँ । तब वे भगवान् गणेश दस भुजाओं से समन्वित और सिंह पर आरूढ़ स्वरूपवाले हो गये । तदनन्तर वर प्रदान करने वाले वे भगवान् गणेश बोले — हे शेष ! तुमने बड़े भाग्य से तथा मेरी कृपा से इस स्वरूप का दर्शन किया है, मेरा यह विराट् स्वरूप तो देवता भी नहीं देख पाये हैं ॥ ४९-५० ॥ प्रसन्न हुए मैंने तुम्हें अपने में, पाताल में तथा भगवान् शिव में अचल स्थान दिया है। तुम इस पृथ्वी को पुष्प की भाँति धारण करो ॥ ५१ ॥

शेष बोले — मैं अपने सिर पर इस धरणी पृथ्वी को धारण करता हूँ, इसलिये मेरा तथा आपका भी धरणीधर यह नाम लोक में अत्यन्त विख्यात हो जाय । आप इस क्षेत्र में स्थित होकर भक्तों की कामनाओं को पूर्ण करें ॥ ५२१/२

ब्रह्माजी बोले — तदनन्तर ऐसा ही होगा — इस प्रकार उनसे कहकर विघ्नेश्वर गणपति स्वयं अन्तर्धान हो गये। शेषनाग ने भी जिस रूप में उनका दर्शन किया था, वैसी ही मूर्ति बनाकर बड़े ही आदर-भक्तिपूर्वक उसकी स्थापना की और एक अत्यन्त ही शुभ मन्दिर का निर्माण किया, जो सुवर्णनिर्मित था और बहुत प्रकार के रत्नों से सुसज्जित था ॥ ५३-५४ ॥ शेषनाग ने उन गणेशजी की मूर्ति का ‘धरणीधर’ यह नाम रखा। तदनन्तर वे शेषनाग भगवान् विष्णु के शय्याभाव को प्राप्त हुए अर्थात् उनकी शय्या बने और उन्होंने अपने मस्तक पर पृथ्वी को उसी प्रकार धारण किया, मानो पुष्प को धारण किया हो ॥ ५५ ॥

वे विघ्नराज गणेशजी के आभूषण के रूप में उनके नाभिकमल में भी स्थित हुए। हे व्यासजी ! इस प्रकार मैंने गणेशजी की अद्भुत महिमा का आपसे वर्णन किया ॥ ५६ ॥ गणेशजी प्रवालनगर में ‘ धरणीधर’ इस नाम से प्रसिद्ध हुए। [हे व्यासजी !] शेषनाग ने इन्हीं अभिलाषाओं की पूर्ति के लिये विभु भगवान् गणेशजी की आराधना की थी ॥ ५७ ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘शेषोपाख्यान’ नामक नब्बेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९० ॥

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