September 7, 2025 | aspundir | Leave a comment श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-91 ॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ इक्यानबेवाँ अध्याय गणेशजी की आज्ञा से ब्रह्माजी द्वारा सात मानस पुत्रों की सृष्टि, ब्रह्मापुत्र कश्यप द्वारा गणेशजी की आराधना और विविध वरों की प्राप्ति, कश्यपपत्नियों से सृष्टि का विस्तार, कश्यप पुत्रों द्वारा गणेशजी की स्तुति अथः एकनवतितमोऽध्यायः कश्यपसृष्टिवर्णनं व्यासजी बोले — हे देव! भगवान् गणेशजी की दूसरी अन्य कथा भी मुझे बतलाइये । प्रभो ! कथाओं को सुनते हुए मेरा मन अत्यन्त उत्सुक हो रहा है ॥ १ ॥ ब्रह्माजी बोले — एक बार की बात है कि प्रलय होने के अनन्तर भगवान् गजानन ने मुझे आज्ञा देते हुए कहा — ‘हे ब्रह्मन् ! मेरी आज्ञा से आप विविध प्रकार की सृष्टि करें’ ॥ २ ॥ तब मैंने अपने मन से सात मानस पुत्रों को उत्पन्न किया। उनके नाम मैं आपको बताता हूँ । कश्यप, गौतम, जमदग्नि, वसिष्ठ, भरद्वाज, अत्रि एवं विश्वामित्र — ये सात मानस पुत्र सभी विद्याओं के ज्ञाता थे ॥ ३-४ ॥ उन सभी ने मुझसे कहा — ‘हे ब्रह्मन्! हे सुरेश्वर ! हमें आज्ञा दीजिये।’ मैंने कश्यप को उन सभी में अधिक बुद्धिमान् जानकर उन्हें आज्ञा दी। मेरा सृष्टि रचने का कार्य तुम करो — ऐसी आज्ञा मैंने उन्हें दी। वे ‘ठीक है’ ऐसा कहकर तपस्या करने के लिये वन में चले गये ॥ ५-६ ॥ उन्होंने दिव्य हजार वर्षों तक भगवान् गणेशजी के एकाक्षर मन्त्र का जप किया। इससे द्विरदानन भगवान् गणेश प्रसन्न हो गये [ और उनके समक्ष प्रकट हुए ] ॥ ७ ॥ उनकी चार भुजाएँ थीं, कमल के समान सुन्दर उनके नेत्र थे, वे बहुत बड़े मुकुट को धारण किये थे। वे अपने हाथों में पाश, अंकुश, माला तथा हाथीदाँत लिये हुए थे और उन्होंने सुन्दर बाजूबन्द पहन रखा था ॥ ८ ॥ सुवर्ण, मणि तथा रत्नों से समन्वित मौक्तिकमालाओं को धारण करने से उनका कण्ठदेश अत्यन्त सुशोभित हो रहा था। वे अपने उदर में सर्प लपेटे हुए थे। करोड़ों सूर्यों के दीप्तिमान् मण्डल के समान उनकी आभा थी ॥ ९ ॥ उनके प्रफुल्लित नेत्र सुशोभित हो रहे थे। सुन्दर-सूँड़ से उनका मुख रमणीय दिखायी दे रहा था। उनके चरण- युगल छोटी-छोटी घण्टियों तथा नूपुरों की रुन-झुन ध्वनि से झंकृत हो रहे थे । इस प्रकार के स्वरूपवाले भगवान् गजानन कश्यपजी के सामने प्रकट हुए। कश्यपजी उनका दर्शनकर हर्ष से विभोर हो उठे और नृत्य करने लगे ॥ १०-११ ॥ कश्यपजी ने उन्हें प्रणाम करके विविध प्रकार के मांगलिक उपचारों से उनकी पूजा की, तदनन्तर दोनों हाथ जोड़कर अत्यन्त आनन्दित हुए कश्यपजी ने भगवान् गजानन से इस प्रकार कहा — ॥ १२ ॥ हे तात! मेरे पिता धन्य हैं, मेरी माता धन्य हैं, मेरा तप धन्य है, मेरा ज्ञान धन्य है, मेरा यह शरीर धन्य है और आज मेरे ये नेत्र धन्य हो गये, यह पृथ्वी धन्य है और ये लताएँ, वृक्ष तथा फल धन्य हैं। यह एकाक्षर मन्त्र धन्य है, जिसके प्रभाव से आज मुझे अखिलेश्वर, परात्पर, प्रसन्नात्मा, परमात्मा गजानन का दर्शन हुआ है ॥ १३-१४ ॥ जिसके यथार्थ स्वरूप का निर्धारण करने में चारों वेद भी कुण्ठित हो जाते हैं, वेदान्त के विद्वान् मूक हो जाते हैं, जो मन के तर्कों से अगोचर हैं, उन्हीं देव गणेश का आज मैंने दर्शन किया है ॥ १५ ॥ जिनसे ये विष्णु, शिव तथा अग्नि आदि प्रधान देवता प्रकट होते हैं, सातों पाताल तथा चौदहों भुवन आविर्भूत होते हैं और जिनमें लय को प्राप्त होते हैं, उन्हीं देव गणेश का आज मैंने दर्शन किया है। जो निर्गुण हैं, जिनका कोई स्वामी नहीं है, जो गुरु के उपदेश से जानने योग्य हैं, जिनका कोई आकार नहीं है, जिन्हें कुछ लोग ब्रह्म कहते हैं, उन्हीं देव गणेश का आज मैंने दर्शन किया है ॥ १६-१७१/२ ॥ ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार के वचनामृतरूपी रस से भगवान् गजानन अत्यन्त प्रसन्न हुए और विविध स्तुतियों द्वारा स्तवन करने वाले विनयसम्पन्न उन कश्यप से बोले — ॥ १८१/२ ॥ गणेशजी बोले — हे मुने! आपकी श्रद्धा-भक्ति तथा किये गये स्तवन एवं मन्त्रानुष्ठान से मैं आपपर प्रसन्न हूँ। आप अपने मन में जो-जो भी अभिलाषा रखते हैं, वे सब मुझसे माँग लें ॥ १९१/२ ॥ कश्यपजी बोले — हे प्रभो ! विविध प्रकार की सृष्टि करने की सामर्थ्य के साथ ही मुझे यह भी प्रदान करें कि आपके चरणकमलों में मेरी अविचल भक्ति बनी रहे और मुझे कभी भी आपका विस्मरण न हो। मैं जहाँ-कहीं भी आपका स्मरण करूँ, वहाँ-वहाँ आप मुझे दृष्टिगोचर हो जायँ। इसके साथ ही मुझे वैसा पुत्र प्रदान करें, जो कश्यपनन्दन के नाम से विख्यात हो ॥ २०-२११/२ ॥ गणेशजी बोले — हे महामुने ! आप मुझसे जो-जो भी चाहते हैं, वह सब मनोरथ शीघ्र ही पूर्ण होगा। आपको मेरी भक्ति तथा अविस्मरणीय स्मृति प्राप्त होगी और आप संकटकाल में मुझे अपने पास पायेंगे। मेरे कृपाप्रसाद आप विचित्र सृष्टि करने में समर्थ होओगे ॥ २२-२३ ॥ ब्रह्माजी बोले — महर्षि कश्यपजी से इस प्रकार कहकर भगवान् गणेश वहीं अन्तर्धान हो गये और वे कश्यपजी भी प्रसन्नतापूर्वक अपने स्थान को चले गये ॥ २४ ॥ एक समय की बात है, महर्षि कश्यप अकस्मात् अनंग कामदेव द्वारा पीड़ित हो गये । उन्हें कहीं भी शान्ति नहीं मिली, तब वे अपने घर के भीतर चले गये ॥ २५ ॥ उन्हें अपने नित्य, नैमित्तिक तथा काम्य कर्मों को करने का तथा ध्यानयोग का भी स्मरण नहीं रहा। उन्हें उस प्रकार से कामविह्वल देखकर उनकी दिति, अदिति, दनु, कद्रू तथा विनता आदि चौदह पत्नियाँ उनके समक्ष आयीं। तब कश्यपमुनि ने विभिन्न भवनों में उन स्त्रियों के साथ रमण किया ॥ २६–२७ ॥ यथोक्त समय उपस्थित होने पर दिति नामक पत्नी ने अनेक दैत्यों को जन्म दिया। अदिति ने देवताओं तथा गन्धर्वों को और दनु ने दानवों को जन्म दिया ॥ २८ ॥ इसी प्रकार उनकी अन्य स्त्रियों से क्रमशः किन्नर, यक्ष, सिद्ध, चारण, गुह्यक, अनेक प्रकार के ग्राम्य तथा आरण्यक पशु उत्पन्न हुए। इसी प्रकार पृथ्वी, पर्वत, वृक्ष, समुद्र, सरिताएँ, लता, विविध धान्य, अनेक धातुएँ, रल, मुक्ता, कृमि, पिपीलिका, सर्प तथा पक्षिगण आदि चराचर जगत् उन स्त्रियों से उत्पन्न हुआ ॥ २९-३०१/२ ॥ उस समय इस प्रकार की विविध सन्तानों को उत्पन्न हुआ देखकर महर्षि कश्यप अत्यन्त प्रसन्न हो उठे । तदनन्तर उन धीमान् कश्यपजी ने ॠण-धनशोधन, सिद्धमन्त्र और अरिचक्र का विचार करके गणेशजी के विविध मन्त्रों का उपदेश अपने पुत्रों को दिया ॥ ३१-३२ ॥ उन मुनिश्रेष्ठ कश्यपजी ने किसी को गणेशजी का षोडशाक्षर मन्त्र, किसी को अष्टादशाक्षर मन्त्र, किसी को एकाक्षरमन्त्र, किसी को षडक्षर मन्त्र, किसी को पंचाक्षर मन्त्र, किसी को अष्टाक्षर मन्त्र, किसी को द्वादशाक्षर मन्त्र और किसी को उनका महामन्त्र प्रदान किया ॥ ३३-३४ ॥ उन्होंने अपने पुत्रों से यह भी कहा कि जबतक अखिलाधार, सर्वसिद्धिप्रदायक भगवान् गणेशजी का दर्शन नहीं होता, तबतक तुम लोग इन मन्त्रों का अनुष्ठान करते रहो। कश्यपजी ने इस प्रकार की आज्ञा पुत्रों को प्रदान की और तब वे सभी तपस्या करने के लिये विभिन्न स्थानों को चले गये और अपने-अपने को उपदिष्ट मन्त्र का जप करने लगे ॥ ३५-३६ ॥ वे सभी बैठते समय, भोजन के समय, निद्रा के समय तथा जाग्रदवस्था में — इस प्रकार सभी समय अनन्य भक्ति-निष्ठापूर्वक देवेश्वर गजानन का स्मरण करते रहते थे। दिव्य हजार वर्षों के बीत जाने पर अनेक रूप धारण करनेवाले, करुणानिधान भगवान् गजानन उन (कश्यपपुत्रों)-के समक्ष प्रकट हुए ॥ ३७-३८ ॥ गणेशजी के जैसे रूप का जिन्होंने ध्यान किया था, उनके समक्ष वे उसी रूप को धारणकर प्रकट हुए, किसी के समक्ष वे मेघ के समान आभा वाले होकर आठ विशाल भुजाओं को धारण किये हुए प्रकट हुए ॥ ३९ ॥ किसी के समक्ष चन्द्रमा के समान कान्ति से सम्पन्न होकर चार भुजाओं वाले स्वरूपमें वे आविर्भूत हुए, किसी के आगे रक्तवर्ण की आभा से सम्पन्न होकर वे गणेश्वर छः भुजाओं वाले स्वरूप में प्रकट हुए ॥ ४० ॥ किसी को हजार नेत्रों तथा हजार भुजाओंसे समन्वित रूप में वे अपने सामने दिखायी दिये, किसी के सामने बालक के रूप में, किसी के सामने युवावस्थावाले तथा किसी को वृद्ध के रूप में भी वे आभासित हो रहे थे ॥ ४१ ॥ वे गजानन किसी के सामने दस भुजाओं वाले, किसी के सामने बारह भुजाओं वाले, किसी के सामने धूम्रवर्ण के तो किसी के सामने महान् प्रकाश से समन्वित रूप में दिखलायी पड़े। किसी के सामने वे अठारह भुजाओं को धारण किये हुए प्रकट हुए और किसी ने करोड़ों सूर्यौ की प्रभा से सम्पन्न उनके स्वरूप का दर्शन किया। वे अत्यन्त तेज से सम्पन्न तथा विशाल विग्रहवाले थे। कभी वे मूषक की पीठ पर सवार दिखायी देते थे, तो कभी सिंह के ऊपर और कभी मयूरवाहन के रूप में दृश्यमान होते थे। वे कभी हाथी के मुखवाले दीखते थे तो कभी अनेक मुखोंवाले हो जाते थे ॥ ४२-४३ ॥ उन देव गणेशजी का दर्शनकर वे सभी बड़े प्रसन्न हो गये और उन्होंने दोनों हाथ जोड़कर बड़े ही विनयपूर्वक भक्तिभाव से अनेक प्रकार से उन भगवान् गजानन की स्तुति की ॥ ४४ ॥ ॥ सर्वे ऊचुः ॥ यतोऽनन्तशक्तेरनन्ताश्चजीवा यतो निर्गुणादप्रमेयाद्गुणास्ते । यतो भाति सर्वं त्रिधा भेदभिन्नं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ४५ ॥ यतश्चाविरासीज्जगत् सर्ववेत्तुस्तथाऽब्जासनो विश्वगो विश्व गोप्ता । तथेन्द्रादयो दैत्यसङ्घा मनुष्याः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ४६ ॥ यतो वह्निभानू भवो भूर्जलं च यतः सागराश्चन्द्रमा व्योम वायुः । यतः स्थावरा जङ्गमा वृक्षसङ्घाः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ४७ ॥ यतो दानवाः किन्नरा यक्षसङ्घा यतश्चारणा वारणाः श्वापदाश्च । यतः पक्षिकीटा यतो वीरुघश्च सदा तं गणेशं नमामो भजमः ॥ ४८ ॥ यतो बुद्धिरज्ञाननाशो मुमुक्षोयतः सम्पदो भक्तसन्तोषिकाः स्युः । यतो विघ्ननाशो यतः कार्यसिद्धिः सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ४९ ॥ यतः पुत्रसम्पद् यतो वाञ्छितार्थो यतो भक्तिविद्यास्तथाऽनेकरूपाः । यतः शोकमोहौ यतः काम एव सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ५० ॥ यतोऽनन्त शक्तिः स शेषो बभूव धराधारणेऽनेकरूपे च शक्तः । यतोऽनेकधा स्वर्गलोका हि नाना सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ५१ ॥ यतो वेदवाचो विकुण्ठा मनोभिः सदा नेति नेतीति ता यं गृह्णन्ति । परब्रह्मरूपं चिदानन्दभूतं सदा तं गणेशं नमामो भजामः ॥ ५२ ॥ सभी बोले — जिन अनन्त शक्ति वाले परमेश्वर से अनन्त जीव प्रकट हुए हैं; जिन निर्गुण अप्रमेय परमात्मा से उन (सत्त्वादि) गुणों की उत्पत्ति हुई है; सात्त्विक, राजस और तामस — इन तीन भेदों वाला यह सम्पूर्ण जगत् जिनसे प्रकट एवं भासित हो रहा है, उन गणेश का हम जिनसे इस समस्त जगत् का प्रादुर्भाव हुआ है; सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४५ ॥ जिनसे कमलासन ब्रह्मा, विश्वव्यापी विश्वरक्षक विष्णु, इन्द्र आदि देव-समुदाय और मनुष्य प्रकट हुए हैं, उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४६ ॥ जिनसे अग्नि और सूर्य का प्राकट्य हुआ; पृथ्वी, जल, समुद्र, चन्द्रमा, आकाश और वायु का प्रादुर्भाव हुआ तथा जिनसे स्थावर-जंगम और वृक्षसमूह उत्पन्न हुए हैं, उन गणेश का हम सर्वदा नमन एवं भजन करते हैं । जिनसे दानव, किन्नर, चारण और यक्षसमूह प्रकट हुए; जिनसे हाथी और हिंसक जीव उत्पन्न हुए तथा जिनसे पक्षियों, कीटों और लता – बेलों का प्रादुर्भाव हुआ, उन गणेश का हम सदा ही नमन और भजन करते हैं ॥ ४७-४८ ॥ जिनसे मुमुक्षु को बुद्धि प्राप्त होती है और अज्ञान का नाश होता है; जिनसे भक्तों को सन्तोष देने वाली सम्पदाएँ प्राप्त होती हैं तथा जिनसे विघ्नों का नाश और समस्त कार्यों की सिद्धि होती है, उन गणेश का हम सदा नमन एवं भजन करते हैं। जिनसे पुत्र-सम्पत्ति सुलभ होती है; जिनसे मनोवांछित अर्थ सिद्ध होता है; जिनसे अभक्तों को अनेक प्रकार के विघ्न प्राप्त होते हैं तथा जिनसे शोक, मोह और काम प्राप्त होते हैं, उन गणेश का हम सदा नमन एवं भजन करते हैं ॥ ४९-५० ॥ जिनसे अनन्त शक्तिसम्पन्न सुप्रसिद्ध शेषनाग प्रकट हुए; जो इस पृथ्वीको धारण करने एवं अनेक रूप ग्रहण करने में समर्थ हैं; जिनसे अनेक प्रकार के अनेक स्वर्गलोक प्रकट हुए हैं, उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५१ ॥ जिनके विषय में वेदवाणी कुण्ठित है; जहाँ मन की भी पहुँच नहीं है तथा श्रुति सदा सावधान रहकर ‘नेति-नेति’ – इन शब्दों द्वारा जिनका वर्णन करती है; जो सच्चिदानन्दस्वरूप परब्रह्म हैं, उन गणेश का हम सदा ही नमन एवं भजन करते हैं ॥ ५२ ॥ ॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘गणेशजी की स्तुति का वर्णन’ नामक इक्यानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९१ ॥ Content is available only for registered users. 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