श्रीगणेशपुराण-उपासना-खण्ड-अध्याय-92
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥
बानबेवाँ अध्याय
देवताओं को गणेशजी से अनेक वरदानों की प्राप्ति, देवताओं आदि द्वारा गणेशजी की द्वादश मूर्तियों की स्थापना, गणेशजी के सुमुख आदि द्वादश नामों के स्मरण का माहात्म्य, उपासनाखण्ड के श्रवण की महिमा तथा उपासनाखण्ड का उपसंहार
अथः द्विनवतितमोऽध्यायः
ब्रह्मव्यास भृगुसोमकान्त संवादे गजानननामनिरूपणं

ब्रह्माजी बोले — इस प्रकार से वे सभी गणेशजी को प्रणाम करके और उनका स्तवन करके उन गणाध्यक्ष से पुनः बोले — ‘आज हम लोग अत्यन्त धन्य हो गये हैं । हमारी तपस्या धन्य है, हमारा दान देना धन्य है, हमारा ज्ञान धन्य है, हमारे द्वारा किये गये यज्ञ-यागादि धन्य हैं, हमारे पूर्वज धन्य हैं और आज हमारे नेत्र धन्य हो गये हैं, जिनके द्वारा गजानन भगवान् का दर्शन किया गया है।’ इस प्रकार उन देवों आदि के अमृतरूपी वचनों तथा उनके द्वारा की गयी स्तुतियों से वे द्विरदानन भगवान् गणेश अत्यन्त सन्तुष्ट हो गये और उन सुनते हुए कश्यपपुत्रों से गम्भीर वाणी में बोले — ॥ १-३ ॥

[हे कश्यपपुत्रो!] आप सब लोगों ने मुझ निर्गुण का विग्रह के रूप में जैसा प्रत्यक्ष दर्शन किया है, वैसा स्वरूप मैंने ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव आदि देवताओं को भी नहीं दिखाया है। मैं तुम लोगों के द्वारा की गयी इस स्तुति से अत्यन्त प्रसन्न हूँ और वर देने के लिये यहाँ उपस्थित हुआ हूँ, आप लोगों को जो-जो भी अभीष्ट हो, उस सबका आप मुझसे वरण कर लें ॥ ४-५ ॥

हे मुनीश्वर ! उन भगवान् गणेश के द्वारा इस प्रकार कहे गये उन कश्यपपुत्रों में जिसका जो अभिलषित था, वह उसने उन गजानन से माँगा ॥ ६ ॥ मेरे चार मुखों के द्वारा भी उन वरदानों का असंख्य होने के कारण यथार्थ वर्णन नहीं किया जा सकता। अतः मैंने संक्षेप में ही आपको बताया ॥ ७ ॥ जिन-जिन वरों को कश्यपपुत्रों ने गणेशजी से माँगा था, उन सभी को वे वर उन्होंने प्रदान किये। गणेशजी उन सभी से पुनः बोले — ‘यह स्तोत्र मुझे अत्यन्त प्रिय है, जो व्यक्ति तीनों सन्ध्या समयों में इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह विद्यावान् तथा पुत्रवान् हो जायगा । वह आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, कीर्ति का विस्तार, विजय एवं अभ्युदय को प्राप्त करेगा और अपनी सभी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर लेगा तथा अन्त में परम पद को प्राप्त करेगा’ ॥ ८-९ ॥

वे गणों के अधिपति गणेशजी पुनः बोले — ‘जो व्यक्ति तीन दिनों तक तीनों संध्याकालों में इस स्तोत्र का पाठ करेगा, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जायँगे ॥ १० ॥ जो आठ दिनों तक इन आठ श्लोकों का एक बार पाठ करेगा और चतुर्थी तिथि को आठ बार इस स्तोत्र को पढ़ेगा, वह आठों सिद्धियों को प्राप्त कर लेगा ॥ ११ ॥ जो एक मास तक प्रतिदिन दस बार इस स्तोत्र का पाठ करेगा, वह राजा के द्वारा बन्धन में डाले गये प्राणदण्ड के भागी व्यक्ति को उस बन्धन से मुक्त कर डालेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ १२ ॥ इस स्तोत्र के पाठ से विद्या का अभिलाषी विद्या को प्राप्त करता है। पुत्र की अभिलाषा रखने वाला पुत्र प्राप्त करता है, भार्या की कामना वाला भार्या प्राप्त करता है तथा धनार्थी व्यक्ति धन प्राप्त करता है । परम श्रद्धा-भक्ति के साथ भगवान् गणेशजी का ध्यान करते हुए इस स्तो त्रका प्रतिदिन इक्कीस बार पाठ करने से सम्पूर्ण मनोरथों की प्राप्ति होती है।’ इस प्रकार कहने के अनन्तर सम्पूर्ण जगत् के आधार, सुन्दर मुखवाले वे भगवान् गजानन सभी के देखते-देखते अन्तर्धान हो गये ॥ १३–१४१/२

तदनन्तर देवताओं ने सुन्दर मुखमण्डलवाली. एक मूर्ति का निर्माण किया और उसे रत्ननिर्मित एक विशाल मन्दिर में प्रतिष्ठापित किया और अत्यन्त विख्यात उनका ‘सुमुख’ यह नाम रखा। उस मूर्ति का पूजन करके तथा उसे प्रणाम करके सभी देवता अपने-अपने स्थानों के लिये चले गये। अपने-अपने कर्तव्यों में तत्पर रहने वाले उन सभी मुनियों ने भी [गणेशजी की एक उत्तम मूर्ति की स्थापना करके उसकी] पूजा की और ‘एकदन्त’ यह प्रसिद्ध नाम रखा ॥ १५–१७१/२

गन्धर्वों तथा किन्नरों ने अत्यन्त श्रेष्ठ सुवर्णमय मन्दिर में गणेशजी की एक दूसरी उत्तम प्रतिमा स्थापित की और अनेक प्रकार से उसकी भलीभाँति पूजा करके उस मूर्ति का ‘कपिल’ यह उत्तम नाम रखा। इसी प्रकार गुह्यकों, चारणों तथा सिद्धों ने गणेशजी की एक दूसरी मूर्ति का निर्माण किया और उस श्रेष्ठ मूर्ति की बहुत बड़े मन्दिर में स्थापना की। स्थापना – प्रतिष्ठा के अनन्तर उन्होंने प्रणाम किया और उसका पूजन किया। उन सभी ने यथार्थ नाम वाला उसका ‘गजकर्ण’ यह प्रसिद्ध नाम रखा। उसके कृपाप्रसाद से वे सभी विमान पर आरूढ़ होकर देवलोक को गये ॥ १८-२१ ॥ मनुष्यों ने ‘लम्बोदर’ इस नाम से गणेशजी की मूर्ति स्थापित की। वन्य जीवों ने एक दूसरी श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित की और ‘विकट’ इस नाम से उसकी पूजा की। तदनन्तर वे वन को चले गये। इसी प्रकार पर्वतों तथा वृक्षों ने एक दूसरी मूर्ति की स्थापनाकर उसकी पूजा की तथा उसका ‘विघ्ननाशन’ यह नाम रखकर वे पृथ्वी में अवस्थित हो गये। उन गणेशजी की कृपा से वे पर्वत तथा वृक्ष भी कीर्ति को प्राप्त हुए ॥ २२–२४ ॥

सभी पक्षियों ने रत्नमयी तथा स्वर्णमयी मूर्ति की स्थापना की। उन्होंने उस मूर्ति का ‘गणाधिप’ यह नाम रखा, तदनन्तर उस मूर्ति का पूजन किया और उसे प्रणाम किया ॥ २५ ॥ सभी सर्पों ने गणनायक गणेशजी की एक मूर्ति स्थापित की और उन्होंने उसका ‘धूम्रकेतु’ यह प्रसिद्ध नाम रखा। सभी जलाशयों ने एक शुभ प्रतिमा की स्थापना की और उस मूर्ति का ‘गणाध्यक्ष’ यह नाम रखकर बड़े ही महोत्सव के साथ उसका पूजन किया ॥ २६-२७ ॥ कृमि तथा कीटादिगणों ने और वनस्पतियों एवं ओषधियों ने मिलकर गणेशजी की एक श्रेष्ठ मूर्ति स्थापित ‘की, जो ‘भालचन्द्र’ नाम से प्रसिद्ध हुई ॥ २८ ॥

दूसरे सचेतन प्राणियों ने विनायक गणेशजी की एक ‘महान् मूर्ति बनाकर रत्ननिर्मित मन्दिर के मध्य उसकी प्रतिष्ठा की, गणेशजी की वह मूर्ति ‘गजानन’ इस नाम से विख्यात हुई। उस मूर्ति का उन्होंने भक्ति – भावपूर्वक पूजन किया । वह ‘गजानन’ नामक गणेश प्रतिमा सभी की सभी अभिलाषाओं को पूर्ण करने वाली है। जिन-जिन सचेतन प्राणियों ने उस गजानन नामक महामूर्ति का पूजन किया था, वे अपनी-अपनी जाति में महान् कीर्ति को प्राप्त हुए। भगवान् गणेशजी की कृपा से सभी अपने-अपने कार्य में दक्ष हुए तथा अत्यन्त सुखी हो गये ॥ २९-३०१/२

[ ब्रह्माजी बोले — हे व्यासजी !] गणेशजी के प्रत्येक नाम का वर्णन करने की सामर्थ्य मुझमें नहीं है। उनके अनन्त नामों में से सार-सार ग्रहणकर उनके सहस्रनाम स्तोत्र की रचना की गयी है। उन सहस्र नामों में भी जो बारह नाम सारभूत हैं, उनका मैंने निरूपण किया है ।  हे ब्रह्मन्! जैसे समुद्र-मन्थन के समय (अनन्त रत्नों में से) रत्नसागर समुद्र से चौदह प्रधान रत्न निकले हैं, वैसे ही ये बारह नाम हैं। इस प्रकार मैंने संक्षेप में गणेशजी की नाम – महिमा बतलायी, उन्हें विस्तार से बतलाने में न तो (हजार मुखवाले) शेष समर्थ हैं, न भगवान् महादेव समर्थ हैं, न मैं (ब्रह्मा) समर्थ हूँ और न विष्णु ही समर्थ हैं तो फिर हे सत्यवतीनन्दन व्यासजी ! अन्य इन्द्रादि देवताओं, मशक आदि प्राणियों, यक्षों तथा राक्षसों की क्या गणना ? इसलिये सभी कार्यों [के आरम्भ]-में भगवान् गजानन का पूजन करना चाहिये ॥ ३१–३५ ॥ जो विघ्नों का समूल उच्छेद करने वाले देवाधिदेव गणेशजी का पूजन नहीं करता है, वह दुरात्मा चाण्डाल के समान दूर से ही परित्याज्य है ॥ ३६ ॥

मुनि बोले — [ हे ब्रह्मन् !] उन बारह नामों का आप मुझसे क्रमशः कथन कीजिये। उन नामों का श्रवण करने तथा पाठ करने से सब कार्य निर्विघ्नता से सम्पन्न हो जाते हैं ॥ ३७ ॥

॥ ब्रह्मोवाच ॥
सुमुखश्चैकदन्तश्च कपिलो गजकर्णकः ।
लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशो गणाधिपः ॥ ३८ ॥
धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः ।
द्वादशैतानि नामानि यः पठेच्छृणुयादपि ॥ ३९ ॥
विद्यारम्भे विवाहे च प्रवेशे निर्गमे तथा ।
सङ्ग्रामे सङ्कटे चैव विघ्नस्तस्य न जायते ॥ ४० ॥
शुक्लाम्बरधरं देवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् ।
प्रसन्नवदनं ध्यायेत् सर्वविघ्नोपशान्तये ॥ ४१ ॥

ब्रह्माजी बोले — सुमुख, एकदन्त, कपिल, गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशन, गणाधिप, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचन्द्र तथा गजानन — इन बारह नामों का जो विद्यारम्भ, विवाह, प्रवेश, यात्राप्रस्थान, संग्राम तथा संकट के समय पाठ करता है अथवा इन्हें सुनता है, तो उसके कार्य में कोई विघ्न उपस्थित नहीं होता ॥ ३८-४० ॥

सभी विघ्न-बाधाओं को शान्त करने के लिये श्वेत वस्त्र धारण करने वाले, चन्द्रमा के समान श्वेत आभावाले. चार भुजाओं को धारण करने वाले तथा प्रसन्न मुखमण्डल से समन्वित भगवान् गणेश का ध्यान करना चाहिये ॥ ४१ ॥

करोड़ों कन्यादानों के करने से, करोड़ों यज्ञ तथा व्रत-उपवास करने से, विविध प्रकार की तपस्याओं, सभी तीर्थों तथा पुण्यक्षेत्रों की यात्राओं से, हजार भार (एक तौल) सुवर्ण का दान करने से तथा अन्य करोड़ों प्रकार के दानों से, कृच्छ्र, तप्तकृच्छ्र, पराक तथा चान्द्रायण व्रतों को करने से जो पुण्य प्राप्त होता है, वह गणेशजी के इन बारह नामों के पाठ करने से प्राप्त होने वाले पुण्य के सौवें भाग के बराबर भी नहीं है ॥ ४२-४३१/२

जो मनुष्य प्रातःकाल उठ करके शौच-स्नान आदि से निवृत्त हो पवित्र होकर समाहित चित्त से श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इन बारह नामों का पाठ करता है, उस व्यक्ति को कोई भी विघ्न बाधा नहीं पहुँचाते। उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं और अन्त में वह मोक्ष प्राप्त करता है ॥ ४४-४५ ॥ उसके दर्शन करने से सभी लोग पवित्र हो जाते हैं । इसलिये हे मुने! शाक्त समुदायवाले हों, शैव हों या वैष्णव हों – सभी गणेशजी के इन द्वादश नामों का पाठ करके अपने सभी कार्यों को करते हैं, तो फिर गणेशजी को अपना इष्ट मानने वाले गाणेश – सम्प्रदाय के लोग ऐसा करें तो इसमें आश्चर्य की कौन-सी बात है ? ॥ ४६-४७ ॥ हे ब्रह्मन्! इन बारह नामों में से किसी एक भी नाम का उच्चारण कार्य के प्रारम्भ में किये बिना कोई भी कार्य सिद्ध नहीं होते। इसलिये किसी एक नाम का उच्चारण अवश्य करना चाहिये ॥ ४८ ॥

जो दुष्ट हैं, नास्तिक हैं, उनके भी जो-जो कार्य सिद्ध होते हैं, [उसमें गणेशानुग्रह ही मुख्य हेतु है ], वे (नास्तिकादि) भी [ वास्तवमें] नाम-महिमा को जाने बिना ही अर्थात् अज्ञान में गणेशजी के बीजमन्त्र का उच्चारण करके अपना कार्य करते हैं ॥ ४९ ॥ हे मुने! इस प्रकार मैंने आपके समक्ष गणेशजी की सम्पूर्ण महिमा को अत्यन्त संक्षेप में बतलाया और उनकी उपासना का जो विविध प्रकार का फल है, उसका भी अपनी बुद्धि के अनुसार निरूपण किया ॥ ५० ॥ भगवान् विष्णु ने जितना कहा था, उतने का मैंने निरूपण कर दिया । उन्होंने भी गणेशजी की उपासना के फल का अन्त नहीं पाया और न ही वे गणेशजी की नाम- महिमा को पूर्ण रूप से जान पाये ॥ ५११/२

भृगुजी बोले — हे राजन् ! इस प्रकार से गणेशजी की वह अद्भुत महिमा मैंने आपको बतलायी, जिसे प्रसन्न हुए ब्रह्माजी ने व्यासजी के समक्ष निरूपित किया था। हे राजन्! सोमकान्त ! [गणेशपुराण के] इस उपासनाखण्ड का मैंने वर्णन किया, यदि आपको श्रवण करने में श्रद्धा हो तो मैं गणनाथ गणेशजी के अन्य चरित को भी बताऊँगा, जो कि सम्पूर्ण पापों का नाश करने वाला है ॥ ५२-५४ ॥

सूतजी बोले — हे शौनक आदि महर्षियो ! इस प्रकार से मैंने विविध कथाओं तथा उनके मध्य आने वाली अवान्तर कथाओं से समन्वित गणेशजी की उस उपासना का वर्णन आपके समक्ष किया, जिसका वर्णन ब्रह्माजी ने महर्षि वेदव्यास के लिये किया था और उसी पापनाशक उपासना का निरूपण महर्षि भृगु ने राजा सोमकान्त के समक्ष किया था ॥ ५५-५६ ॥ जो व्यक्ति इस श्रेष्ठ गणेशपुराण का श्रवण करता है, वह सभी आपत्तियों से मुक्त होकर, अनेक भोगों का उपभोग करके, पुत्र-पौत्रादि से सम्पन्न होकर ज्ञान- विज्ञान से समन्वित हो जाता है और गणेशजी की कृपा से उत्तम मुक्ति प्राप्त करता है। सैकड़ों करोड़ कल्प बीत जाने पर भी उसका [इस संसार में] पुनरागमन नहीं होता ॥ ५७-५८१/२

जो व्यक्ति अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस गणेश- पुराण को सुनाता है तथा जो सुनता है— दोनों ही इस पुराण के सुनने-सुनाने से मिलने वाले कहे गये फल को प्राप्त करते हैं, जिस प्रकार राजा सोमकान्त ने अत्यन्त श्रद्धा-भक्तिपूर्वक इस पुराण को सुनने से [अभीष्ट] फल को प्राप्त किया था, वैसे ही आप लोग भी सर्ववेत्ता और सुखी हो जायँगे ॥ ५९-६० ॥

॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण के अन्तर्गत उपासनाखण्ड में ‘ब्रह्मा एवं व्यास और भृगु तथा सोमकान्त के संवाद में गजानन नाम- निरूपण’ नामक बानबेवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ॥ ९२ ॥
॥ इस प्रकार श्रीगणेशपुराण का उपासनाखण्ड पूर्ण हुआ ॥

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